कर्नाटक : कर्नाटक में केन्द्रीय राजनीतिक सवाल अब यह बन गया है कि क्या मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपना पूरा कार्यकाल पद पर बने रहेंगे? उनके बेटे यतीन्द्र सिद्धारमैया के हाल में इस असामान्य दावे कि उनके पिता अपना कार्यकाल पूरा करेंगे, ने मीडिया में हलचल मचा दी है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार उनके शासन में सब कुछ सामान्य नहीं है। मई 2023 से शुरू किए अपने दूसरे कार्यकाल में सिद्धारमैया निश्चिंत दिखाई दे रहे थे। उन्होंने विपक्षी भाजपा को खत्म कर दिया था। कर्नाटक में भाजपा बुरी स्थिति में है। उसका चुनावी आधार एक बिन्दु पर अटक गया है। 2018 में उसका वोट शेयर 36 फीसदी था। तब पार्टी ने 104 सीटें जीती थीं और सरकार बनाई थी। 2023 में उसका वोट शेयर वही यानि 36 फीसदी रहा लेकिन इसे केवल 66 सीटें मिलीं।
काँग्रेस का वोट शेयर हालांकि 38.4 से बढ़कर 42.88 हो गया और इसने 135 सीटें जीतकर सरकार भाजपा से छीन ली। गुटबाजी, अंदरूनी कलह के कारण भाजपा इतनी बुरी स्थिति में है कि अब तक वह सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ सत्तारोधी लहर का फायदा उठाने की स्थिति में नहीं है।
दूसरी तरफ, एक मजबूत स्थिति से अचानक सिद्धारमैया की मुख्यमंत्री के रूप में स्थिति डगमगाने लगी है। लेकिन, चुनौती भाजपा की तरफ से नहीं है। वह अपनी ताकत को बड़ी चुनौती का सामना काँग्रेस के अंदर से ही कर रहे हैं। उनके मंत्रिमंडल में नंबर दो पर डीके शिवकुमार उनकी जगह लेना चाहते हैं। इसने कर्नाटक काँग्रेस में शक्ति संघर्ष को पैदा किया है।
अब तक तो डीके शिवकुमार अपने पत्ते सावधानी से खेल रहे हैं। वह काँग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के खिलाफ जाकर सिद्धारमैया की जगह नहीं लेना चाहते। इसके बावजूद, मुख्यमंत्री बनने की अपनी महत्वकांक्षा को छुपा भी नहीं रहे हैं, भले वह खुलकर बगावत नहीं कर रहे उसके लिए। वह आलाकमान के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। यह नाजुक मामला है।
उधर सिद्धारमैया ने भी अभी अपने समर्थक विधायकों की कोई परेड नहीं कराई कि काँग्रेस आलाकमान को खतरे का संकेत मिले कि वह कर्नाटक में अशोक गहलोत की भूमिका करने वाले हैं। अब, अपने बेटे के जरिए उन्होंने दावा किया है कि वह अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। इस बीच, डीकेएस का खेल बिगाड़ने के लिए गृह मंत्री और दलित नेता जी परमेश्वर ने भी अपना पासा फेंक दिया है।
यतीन्द्र सिद्दरमैया ने डीकेएस का दावा विफल करने के लिए सिद्धारमैया के उत्तराधिकारी के रूप में सतीश झरखोली का नाम भी प्रस्तावित किया है जो प्रदेश काँग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और बेलगाँव से विधायक हैं। वह एसटी वाल्मीकि नायक समुदाय से आते हैं। इस तरह, कर्नाटक काँग्रेस में बहुध्रुवीयता उभरती दिखाई दे रही है। काँग्रेस आलाकमान यथास्थिति बनाए रखना चाहेगा या व्यवस्थित परिवर्तन ला पाएगा यह अंतर्निहित सामाजिक स्थितियों पर निर्भर करेगा।
काँग्रेस भले डीकेएस को अपना वोक्कालिगा चेहरा बताकर देवेगौड़ा के प्रभाव से दूर कर प्रभावशाली वोक्कालिगा जाति में बहुसंख्य लोगों का समर्थन जीत रही है, लेकिन अपना मूल ओबीसी-मुस्लिम-दलित सामाजिक गठजोड़ कमजोर नहीं कर सकती जो कि उसे सत्ता में टिकाए हुए है। इस तरह कर्नाटक में राजनीतिक हालात जटिल हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि बदलाव कैसे आता है।
इस प्रक्रिया को जो दूसरा कारक प्रभावित कर रहा है वह है जाति सर्वेक्षण। अपना ओबीसी आधार मजबूत करने के लिए, सिद्धारमैया सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में 2014 में जाति सर्वे कराया था। जाति सर्वे के नतीजे काफी समय तक नहीं प्रकाशित किए गए, जिसका कारण सर्वे में कमियाँ बताया गया। हालांकि वास्तव में अपर कास्ट के विरोध के डर से ऐसा किया गया।
राहुल गांधी ने जाति सर्वे की मांग को अपने ओबीसी कार्ड को मजबूत करने के लिए उछाला लेकिन मोदी ने अगली जनगणना में जाति गणना की बात मानकर इसकी हवा निकाल दी। इसके बावजूद इसे सरसरी सर्वे बताते हुए काँग्रेस नेतृत्व ने काँग्रेस शासित राज्यों में प्रदेश स्तरीय जाति सर्वे का आह्वान किया। इस तरह सिद्धारमैया सरकार ने अब फिर से जाति सर्वे कराने का आदेश दिया, जिसमें लेकिन पुराने कारणों से ही देरी हो रही है।
कर्नाटक काँग्रेस की अपर कास्ट लॉबी जिसमें डीकेएस खुद भी शामिल हैं, ने सर्वे पर कई सवाल लगाए हैं। कुछ दलित संगठनों ने भी इसका विरोध किया है क्योंकि कुछ दलित उप जातियों की गणना को छोड़ दिया गया है। सुधा मूर्ति और इंफ़ोसिस संस्थापक नारायण मूर्ति के जाति सर्वेक्षण के खुलेआम जातीय और बेतुके विरोध ने भी विवाद को मजबूत किया।
पूरी आशंका है कि दूसरे जाति सर्वेक्षण का भविष्य भी पहले सर्वे से अलग नहीं होगा चूंकि इसने पहले ही ओबीसी समर्थक होने का उद्देश्य हासिल कर लिया है।
जाति राजनीति से दूर जाएँ तो कर्नाटक काँग्रेस सरकार की हाल में कॉर्पोरेट जगत से किरण मजूमदार शॉ और पई ने बेंगलुरू की खराब सड़कों को लेकर आलोचना की है। साइबरसिटी के गड्ढे राजनीतिक गड्ढों में बदल गए हैं।
आंध्र प्रदेश : आंध्र प्रदेश में 15 बिलियन डॉलर का अडानी-गूगल डाटा केंद्र स्थापित करने का फैसला मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की निजी जीत के रूप में दर्शाया जा रहा है। वह अल्पसंख्यक मोदी सरकार को बाहर से समर्थन करने के फायदे उठाते देख रहे हैं। लेकिन, चूंकि डाटा सेंटर बिजली और पानी खूब खींचते हैं तो तटीय विशाखापत्तनम के नाजुक पारिस्थितिकी यंत्र पर इसका पर्यावरणीय प्रभाव क्या होगा और स्थानीय लोगों पर सामाजिक असर क्या होगा, यह देखना होगा।
मुख्यमंत्री के बेटे और आंध्र प्रदेश के मानव संसाधन मंत्री नारा लोकेश की अवांछित टिप्पणी कि पड़ोसी कर्नाटक और तमिलनाडु डाटा सेंटर हासिल करने में आंध्र प्रदेश की जीत से जल रहे हैं, ने उन्हें एक अपरिपक्व व्यक्ति के रूप में ही दिखाया है। चंद्रबाबू नायडू के आस-पास एक जोखिमकारी द्विध्रुवीयता दिख रही है। संख्या के आधार पर सबसे बड़े कापू समुदाय के वोटों को साधने के लिए चंद्रबाबू ने पवन कल्याण को उप मुख्यमंत्री बनाया है।
खुद को हिन्दुत्व योद्धा के रूप में पेश कर पवन कल्याण ने भविष्य में बड़ी महत्वकांक्षाओं का प्रदर्शन किया है। दूसरी तरफ चंद्रबाबू अपने बेटे नारा लोकेश को भी अपने उत्तराधिकारी के रूप में तैयार कर रहे हैं। उन्हें हाल में ऑस्ट्रेलिया की यात्रा पर भी भेजा गया ताकि वह अधिक वैश्विक व्यवसायिक एक्सपोजर पा सकें। चंद्रबाबू नायडू और नारा लोकेश जिस कम्मा समुदाय से आते हैं राज्य की आबादी का केवल 4.8 फीसदी है। लेकिन कापू समुदाय जिससे पवन कल्याण आते हैं 24.7 फीसदी है।
हालांकि, कम्मा लोग ज्यादा व्यावसायिक समझ रखते हैं और कम्मा बुर्जुआ बहुत शक्तिशाली हैं जबकि कापू मुख्य तौर पर कृषि समुदाय है। पवन कल्याण की छवि रूढ़िवादी की है जबकि नारा लोकेश की पाश्चात्य व्यवसाय समर्थक की छवि है। दोनों के बीच भविष्य में टकराव अपरिहार्य है।
किसानों की आत्महत्या की घटनाएं अब भी आंध्र प्रदेश में हो रही हैं हालांकि संख्या कम हुई है और सूखाग्रस्त रायलसीमा में ही नहीं श्रीकाकुलम में भी हो रही हैं। व्यवसाय मित्र की छवि के कारण चंद्रबाबू नायडू किसान समुदाय से दूर हुए और 2004 व 2019 में चुनाव हारे थे। नारा लोकेश भी उसी साँचे में ढल रहे हैं। और जगन मोहन रेड्डी रफ्तार पकड़ रहे हैं। क्या चंद्रबाबू और उनके बेटे को तीसरी बार हार की त्रासदी का सामना करना होगा?
तेलंगाना : हैदराबाद ने हाई टेक हब के रूप में बेंगलुरू को पछाड़ दिया है। यह न केवल नौकरियां पैदा कर रहा है, आंध्र के ज्यादा कुशल प्रवासी कर्मचारियों के खिलाफ नफरत भी पैदा कर रहा है। तेलंगाना की विभिन्न सरकारों को तेलंगाना के बाकी हिस्सों की उपेक्षा कर हैदराबाद को विकसित करने के लिए ज्यादा ध्यान और संसाधन लगाने के लिए भी आलोचना झेलनी पड़ती रही है। हालांकि विभिन्न सत्तारूढ़ पार्टियां तेलंगाना की चमक का राजनीतिक फायदा उठा नहीं पाई हैं।
ठेकेदारों और रियल एस्टेट प्रोमोटरों द्वारा जमीन हड़पने, जमीन घोटालों के खिलाफ किसानों के विरोध प्रदर्शन आम हो चुके हैं। स्थानीय युवाओं में प्रवासियों द्वारा नौकरियां पाने को लेकर असंतोष भी है। ओसमानिया छात्रों ने कैम्पस में पेड़ काटे जाने का विरोध किया क्योंकि सरकारी जमीन रियल एस्टेट माफिया को सौंपी जा रही थी। अधिकतर रेड्डी जमींदार हैं। उतने ही ताकतवर वेलामा जमींदार हैं, हालांकि इनकी संख्या कम है।
टीआरएस (अब बीआरएस) चंद्रशेखर राव खुद ताकतवर जमींदार हैं जो वेलामा समुदाय से आते हैं। सिंचाई विकास के नाम पर ग्रामीण अमीरों की सेवा कर उन्होंने केवल भ्रष्ट ठेकेदार अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया। भ्रष्टाचार ने न सिर्फ बीआरएस को राजनीतिक नुकसान पहुंचाया बल्कि चंद्रशेखर राव परिवार को विभाजित भी कर दिया। उनकी बेटी ने शराब घोटाले की लूट का हिस्सा अपने से साझा करने से इनकार कर दिया।
लोगों के असंतोष के कारण काँग्रेस सत्ता में आई और रेवंत रेड्डी 2023 में मुख्यमंत्री बने। रेवंत रेड्डी सरकार ने जीओ यानि सरकारी आदेश के जरिए तेलंगाना स्थानीय निकायों में 42 फीसदी सीटें ओबीसी के लिए आरक्षित कीं और तेलंगाना उच्च न्यायालय ने 9 अक्टूबर के निर्णय पर रोक लगा दी। रेवंत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर को उच्च न्यायालय का स्थगन आदेश हटाने से मना कर दिया।
ओबीसी रेवंत से खफा हैं कि उन्होंने संविधान की नौवीं सूची में शामिल टिकाऊ विधेयक के बजाय ओबीसी के लिए आरक्षण सरकारी आदेश के जरिए लाया। 136 ओबीसी की संयुक्त कृति समिति ने 18 अक्टूबर को एक सफल बंद का आयोजन किया। 2024 के तेलंगाना जाति सर्वेक्षण के अनुसार तेलंगाना में ओबीसी 56.33 फीसदी हैं। उनका छिटकना रेवंत रेड्डी के लिए भारी पड़ सकता है।
भाजपा वापसी करती दिखाई दे रही है। पार्टी ने मार्च में हुए चुनाव में 3 म्यूनिसिपल सीटों में से दो सीटें जीत लीं। भाजपा धनी लोगों में माओवादियों को हुए नुकसान और मनोबल गिरने से आत्मसमर्पण की शृंखला का श्रेय ले रही है। स्थानीय निकाय चुनाव 31 अक्टूबर से शुरू हुए। नवंबर में हुए जुबली हिल्स उपचुनाव हालांकि काँग्रेस ने जीत लिया है पर यह देखना होगा कि निकट भविष्य में पार्टी सत्तारोधी लहर का सामना कैसे करेगी।
(बी सिवरामन के लेख का दूसरा और अंतिम भाग। अनुवाद : महेश राजपूत)