बिहार विधानसभा चुनाव बीत चुका है। एनडीए की बड़ी जीत और महागठबंधन की हार के बाद नीतीश कुमार रिकॉर्ड दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। लेकिन एक सवाल का उत्तर देश की जनता तलाशने की कोशिश कर रही है कि क्या इस चुनाव में कोई ‘खेल’ हो गया? बिहार से ज्यादा देश के अन्य राज्यों के लोग इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश कर रहे हैं।
चुनाव परिणाम आने के बाद से ही राजनीतिक दलों के नेता अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं। कोई ‘वोट चोरी’ और महिला मतदाताओं को प्रलोभन देकर चुनाव में वोट जुटाने का आरोप लगा रहा है तो कोई इस जीत को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कामकाज और करिश्मे से जोड़कर देख रहा है।
मीडिया, सोशल मीडिया पर भी लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं। एनडीए के नेता और समर्थक सरकार के काम-काज और सरकार पर लोगों के विश्वास की जीत बता रहे हैं तो वहीं महागठबंधन के अधिकतर नेता और उनके समर्थकों का समूह अपने तर्क देकर यह बताने की कोशिश में लगा हुआ है कि चुनाव में ‘बेईमानी’ हो गई। बिहार विधानसभा चुनाव में ‘खेल’ हो जाने की चर्चा अभी भी जोरों पर है।
चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए ने शानदार प्रदर्शन किया वहीं तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा महागठबंधन बुरी तरह फ्लॉप हो गया। तेजस्वी के नेतृत्व में इससे पहले 2020 में भी महागठबंधन चुनाव हार चुका है।
बावजूद इसके महागठबंधन ने अपने चेहरे और संगठनात्मक ढांचे में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं किया जिसका प्रभाव चुनाव में जमीन पर दिखाई दे। जहाँ महागठबंधन पिछले चुनाव में था, वहीं से उसने इस चुनाव की भी शुरुआत कर दी। विचारधारा की जगह महागठबंधन ने चेहरे को प्राथमिकता दी। वो भी उस तेजस्वी यादव के चेहरे को जिनके नेतृत्व में महागठबंधन अब तक कोई चुनाव जीत नहीं पाया है।
पिछले विधानसभा चुनाव से अब तक महागठबंधन ने अपने राजनीतिक समीकरणों को दुरुस्त करने के लिए सिर्फ एक बदलाव किया जो दिखाई देता है – वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी को अपने साथ जोड़ लिया। मुकेश सहनी को साधना और उन्हें उपमुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करना एक अच्छा कदम था लेकिन नामांकन के आखिरी तक महागठबंधन में उहापोह की स्थिति बनी रहने के कारण संभवतः वे अपना प्रभाव नहीं दिखा सके।
गठबंधन के दलों में जैसी आपसी सहमति की आवश्यकता होती है, वैसी सहमति महागठबंधन में बन नहीं पाई। यही कारण था कि महागठबंधन में फ्रेंडली फाइट भी हुई। सवाल यह है कि जब ‘फाइट’ करनी ही थी तो ‘फ्रेंड’ होने या गठबंधन करने का दिखावा ही क्यों किया गया?
‘खेल’ की बात करने से पहले महागठबंधन के नेताओं और समर्थकों को इस सवाल का जवाब तलाशना चाहिए कि महागठबंधन में हुई ‘फ्रेंडली फाइट’ क्या इस हार के लिए तनिक भी जिम्मेदार नहीं है? क्या महागठबंधन में हुई फ्रेंडली फाइट ने पूरे बिहार भर में वोटरों को दुविधा में नहीं डाला होगा? क्या फ्रेंडली फाइट महागठबंधन में शामिल दलों के गैर-जिम्मेदाराना होने, उनमें आपसी तालमेल न होने, आन्तरिक बिखराव और कमजोरी को दर्शाता नहीं है?
वैशाली, कहलगाँव, नरकटियागंज, सुल्तानगंज, बछवारा, राजापाकर, बेलदौर, बिहार शरीफ, गौराबौराम जैसी सीटों पर फ्रेंडली फाइट नहीं होती तो क्या परिणामों में कोई बदलाव दिखाई नहीं देता? सवाल ये है कि महागठबंधन ने कितनी गंभीरता के साथ यह चुनाव लड़ा?
बसपा और एआईएमआईएम ने चुनाव में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इनके उम्मीदवारों को कई सीटों पर अच्छे वोट मिले। बसपा एक सीट तो एआईएमआईएम ने पाँच सीटों पर कामयाबी हासिल की। पिछले चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ था।
एनडीए को हराने के लिए महागठबंधन अगर गंभीर था तो क्या उसे इन दलों को अपने साथ लाने के लिए काम नहीं करना चाहिए था? अगर साथ आने की परिस्थिति नहीं बन सकी तो वहाँ जनता के बीच में सक्रियता बढ़ाकर एनडीए के विरोधी वोटरों को अपने पक्ष में लाने की मजबूत कोशिश ही कर लेनी चाहिए थी लेकिन महागठबंधन ने इन दोनों मोर्चों पर शिथिलता बरती।
इसके उलट एनडीए ने पिछले विधानसभा चुनाव से सबक लेकर इस बार जो मास्टरस्ट्रोक खेला, वह था वैचारिक रूप से एक-दूसरे से बहुत अलग दिखने वाली पार्टियों हिन्दूवादी राजनीति करने वाली बीजेपी, समाजवाद और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर राजनीति करने वाली नीतीश कुमार की जदयू, उपेन्द्र कुशवाहा की आरएलएम, चिराग पासवान की लोजपा (आर), और जीतन राम माँझी की हम – सबको एक मंच पर लाना।
ऐसा करके एनडीए ने बिहार के जातीय समीकरण को पूरी तरह अपने पक्ष में मोड़ दिया। हर वर्ग को यह विश्वास दिलाना कि “यह गठबंधन भागीदारी के लिए भी है”। सवर्ण, पिछड़ा, अति-पिछड़ा, दलित, महादलित – हर तबके को यह सन्देश गया कि इस गठबंधन में उसकी भागीदारी है, उसका प्रतिनिधित्व है, उसकी अनदेखी नहीं हो रही। ‘सबकी भागीदारी’ वाला यही परसेप्शन एनडीए का सबसे बड़ा हथियार बना।
बीजेपी ने अपने कोर वोटर सवर्ण जातियों (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य) को भरपूर तवज्जो दी। जेडीयू ने पिछड़ा और अति-पिछड़ा (गैर-यादव) ईबीसी समुदाय पर अपना फोकस रखा। साथ ही चार मुस्लिम उम्मीदवारों को भी टिकट दिया। चिराग पासवान की लोजपा (आर) ने अनुसूचित जाति को प्राथमिकता दी। जीतन राम माँझी और उपेन्द्र कुशवाहा को ज्यादा सीटें तो नहीं मिलीं पर वे गठबंधन में रहकर अपने समर्थकों को हिस्सेदारी का सन्देश देने में कामयाब हो गए।
याद कीजिए 2020 का विधानसभा चुनाव। उस समय उपेन्द्र कुशवाहा ने बसपा और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ अलग मोर्चा बनाया था, जिससे जदयू का परम्परागत लव-कुश वोट (कुर्मी-कुशवाहा) बुरी तरह बिखर गया था। चिराग पासवान ने तो खुलेआम नीतीश कुमार के खिलाफ बगावत का झण्डा बुलन्द कर रखा था, और उनका अलग लड़ना एनडीए खासकर जदयू के लिए सबसे बड़ा डैमेज था।
नतीजा? एनडीए चुनाव तो जीत गया, पर बहुत कम अन्तर से लेकिन 2025 के चुनाव में एनडीए की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। हर वर्ग को लगा – “हमारा भी कोई है इस गठबंधन में”। यही भावनात्मक जुड़ाव और प्रतिनिधित्व का परसेप्शन एनडीए को मिली बढ़त का सबसे बड़ा कारण बना।
बिहार में पिछले कुछ दिनों की राजनीति और चुनावी नतीजों पर अगर नजर डालें तो पाएँगे कि राज्य में तीन दल ऐसे हैं जो संगठन और जनसमर्थन के लिहाज से मजबूत स्थिति में हैं – जदयू, आरजेडी और बीजेपी। ऐसे में अगर इन तीनों में से कोई दो दल आपस में मिलकर चुनाव लड़ें और अपना बेस वोट एक-दूसरे को ट्रान्सफर कराने में सफल हो जाएँ तो स्वाभाविक है कि इन तीनों में से जो दो मजबूत दल आपस में मिलकर लड़ेंगे, चुनाव में उनकी जीत की सम्भावना बढ़ जाएगी।
महागठबंधन में प्रमुख दल आरजेडी के साथ कांग्रेस थी जो बिहार में संगठन और जनसमर्थन के लिहाज से बेहद कमजोर स्थिति में है। वाम दलों का भी कमोबेश वैसा ही हाल है। महागठबंधन के प्रमुख आधार वाले आरजेडी के समर्थक और कार्यकर्ता उत्साही तो हैं लेकिन जमीन पर लोगों को जोड़ने और अपनी बात समझाने से ज्यादा हल्ले, हुड़दंग और ‘भैया जीत रहे हैं’ की रट लगाने से ज्यादा कुछ करते हुए दिखाई नहीं देते।
हर चुनाव से पहले अति-आत्मविश्वास के साथ वे ‘एक चेहरे’ पर चुनाव जीतना चाहते हैं। यह अति-आत्मविश्वास उनके लिए हर बार घातक बन जाता है।
विचारधारा के मामले में उनके नेताओं के साथ ही समर्थकों में भी भारी कन्फ्यूजन है। नेताओं और समर्थकों की प्रतिबद्धता पार्टी की विचारधारा यानी ‘समाजवाद लाने या समतामूलक समाज बनाने’ के प्रति कम दिखाई देती है। उनकी प्राथमिकता एक ‘चेहरे’ को सत्ता में लाने भर की ही दिखाई देती है। वे इसके लिए ही जूझते हुए दिखाई देते हैं।
अक्सर देखा जा रहा है कि क्षेत्रीय दल अपने कार्यकर्ताओं को वैचारिक ट्रेनिंग देने, प्रशिक्षित करने पर कोई काम नहीं कर रहे हैं। जनता के बीच उपस्थिति, पार्टी के लिए कार्यक्रम, संगठन के लिए कर्तव्यनिष्ठा, आन्तरिक अनुशासन आदि के मामले में आरजेडी आपको क्या बीजेपी से मुकाबला करने की स्थिति में दिखाई देती है?
एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि राष्ट्रीय जनता दल में कौन-कौन से ऐसे नेता हैं जो अपने विधानसभा या जिले से बाहर अपना प्रभाव रखते हों? जो पार्टी को अपने निर्वाचन क्षेत्र के बाहर भी अपने प्रभाव से कुछ वोट दिला सकें? लालू यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी प्रसाद यादव, मीसा भारती, रोहिणी यादव, कुछ दिन पहले तक तेज प्रताप यादव भी – यह सब एक परिवार से जुड़े हैं और इनका समर्थक वर्ग भी लगभग एक ही है।
अब्दुल बारी सिद्दीकी, जगदानन्द सिंह, मंगलनी लाल मण्डल, रामचन्द्र पूर्वे, ओसामा सहाब यह राजद के वे नेता हैं जो थोड़ा प्रभाव डाल सकते थे। पर ये सभी तेजस्वी यादव या फिर उनके परिवार के अन्य सदस्यों की छाया के अन्दर ही सिमट कर-सिकुड़ कर रह जाते हैं। चुनाव में राजद ने इन नेताओं का कितना और कैसे इस्तेमाल किया है? इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
आरजेडी सहित तमाम क्षेत्रीय पार्टियों में परिवारों के अलावा निर्वाचन क्षेत्रों से बाहर प्रभाव रखने लायक नेता क्यों नहीं उभर पाए? सिर्फ एक चेहरे या परिवार पर ही निर्भरता क्यों? यह प्रश्न हमेशा विचारणीय रहेगा।
चुनाव में महागठबंधन के लिए सबसे बड़े और एकमात्र कैंपेनर तेजस्वी यादव ही रहे, राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी ने अपेक्षाकृत कम सभाएँ कीं। तेजस्वी यादव को समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का साथ जरूर मिला। अखिलेश यादव ने बिहार में अपनी पार्टी के सिम्बल पर किसी को मैदान में उतारे बिना ही महागठबंधन के उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया।
आरजेडी की तरह कांग्रेस पार्टी भी पूरी तरह राहुल गाँधी पर ही केन्द्रित है। उनकी छत्रछाया से निकलने के लिए कोई कोशिश नहीं हो रही है, बिहार में उसका कोई स्थानीय प्रभावशाली चेहरा नहीं है। ऐसा कोई नेता नहीं है जो अपने दम पर कुछ वोटों को प्रभावित कर सके। ये पार्टियाँ जातीय समीकरणों पर यानी की सोशल इंजीनियरिंग पर तो काम ही नहीं करती !
वहीं एनडीए में शामिल बीजेपी के पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे के साथ राज्यों में प्रभाव रखने वाले लोग भी हैं। साधन-संसाधन होने के साथ ही इस वक्त बीजेपी के पास नेताओं की भी बहुत लम्बी फौज है। हर तरह के नेता हैं जो अलग-अलग जाति, क्षेत्र, समुदाय से आते हैं और उनका अपना-अपना प्रभाव भी है। खास बात यह है कि बीजेपी ने उन्हें अपने अन्दर से ही उभारा है। और उनका सही इस्तेमाल कैसे करना है? यह बीजेपी को पता है। उ
सने बिहार के चुनावी रण में सबको उतार दिया था – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान, धर्मेन्द्र प्रधान, नितिन गडकरी, हिमंता बिस्वा सरमा, देवेन्द्र फडणवीस, नायब सिंह सैनी, मोहन यादव, योगी आदित्यनाथ, पुष्कर सिंह धामी, रेखा गुप्ता, केशव प्रसाद मौर्य, विनोद तावड़े, विष्णुदेव साय, भूपेन्द्र पटेल, भजनलाल शर्मा से लगायत कई नाम – सबका अलग-अलग विधानसभाओं में जरूरत के अनुसार इस्तेमाल।
पूरे देश में आज के वक्त जातीय समूहों की अपनी-अपनी अलग राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। बिहार और यूपी में तो यह महत्वाकांक्षा थोड़ी ज्यादा ही है। हर जाति अपने लिए ‘राजनीतिक न्याय’ चाहती है। अब सबको जातिगत प्रतिनिधित्व ही नहीं, जातिगत नेतृत्व भी चाहिए।
एनडीए ने इन महत्वाकांक्षाओं को पहचाना, बहुत चतुराई से सोशल इंजीनियरिंग पर काम किया। जैसा बीजेपी लगभग हर चुनाव में करती है। बिलकुल प्रोफेशनल तरीके और गम्भीरता के साथ चुनाव में उतरा। मांग और आवश्यकता के अनुसार खुद में बदलाव किया।
राजनीतिक क्षेत्र में सत्ता से वञ्चित समूहों का उभार करना, उन्हें ताकत देना, सत्ता तक पहुँचाना भी सामाजिक न्याय है, इसे आज के वक्त में किसी भी पार्टी को नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए। आपको इतना तो याद रखना ही होगा कि भागीदारी के नाम पर चुनाव से तत्काल पहले सिर्फ टिकट दे देने भर से काम नहीं चलेगा। पार्टी-संगठन में प्रभावी कौन है? पॉवर किसके पास है? आजकल का वोटर यह भी देखता है तब वोट करता है।
महागठबंधन अपनी कमियों को स्वीकारने और सुधारने की बजाय हर बार वोट चोरी या खेल हो जाने की बात को ही हवा दे रहा है। लगातार चुनावी हार के बाद क्या महागठबंधन के दलों, खासकर आरजेडी और कांग्रेस को आत्ममंथन करने की जरूरत नहीं है? चुनाव हारने पर हर बार ईवीएम में गड़बड़ी या वोट चोरी का आरोप लगाने से अच्छा होगा कि पार्टियाँ कभी ईमानदारी से आत्ममंथन भी करें। चेहरा बदलने की जरूरत लगे तो उस पर भी गम्भीरता से विचार करें।
राजनीति में जिद विचारधारा को मजबूत करने और उस पर टिके रहने की होनी चाहिए, न कि किसी एक चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने की। यह बात और भी जरूरी हो जाती है जब आप खुद को समाजवादी कहते हैं। सिर्फ बात मत करिए, समाजवाद लाइए भी और वह समाजवाद हर जगह दिखे भी – पार्टी के संगठन से लेकर सरकार तक और नेताओं को दी जाने वाली ताकत के बँटवारे में भी। प्रगतिशील होना तो समाजवाद का मूल लक्षण है। फिर आप एक व्यक्ति को बनाने की जिद क्यों पाले बैठे हैं?
आप जनता पर एक चेहरा क्यों थोपना चाहते हैं? चेहरा पसन्द नहीं आ रहा तो उसे बदलने में हिचकिचाहट क्यों? आपका नेतृत्व सबको जोड़ नहीं पा रहा तो किसी और को आगे करिए जो लोगों को जोड़ सके, लोगों का विश्वास जीत सके। लोकतन्त्र में लोगों का विश्वास जीतना ही सबसे बड़ी काबिलियत होती है न? आप नहीं जीत पा रहे हैं तो असल कारणों पर बात करिए, कमियों को स्वीकारिए। सिर्फ आरोप न लगाइए। सिर्फ आरोप लगाते रहे तो आपके पास कुछ नहीं बचेगा।
(अजय कुमार कुशवाहा राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, उत्तर प्रदेश के पूर्व प्रदेश संयोजक हैं।)