इलाहाबाद विश्वविद्यालय का कैंपस हमेशा से अपने भीतर इतिहास, राजनीति, विद्रोह और कई अनकही कथाओं को समेटे चलता है। ये वही परिदृश्य है जहां एक ओर पुरातन भवन ज्ञान की विरासत को संभाले खड़े है, तो दूसरी ओर युवा ऊर्जा अपने नए सवालों के साथ उन्हें लगातार चुनौती देती रहती है। बीते दो दिनों में इस कैंपस ने जिस उठा-पटक को देखा, वह सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि छात्रों और प्रशासन के बीच विश्वास की दरार का खुला और जीवंत दस्तावेज़ है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की घटना की शुरुआत बहुत मामूली थी। इतनी मामूली कि शायद किसी दूसरे समय होती तो बीस मिनट की बातचीत में ख़त्म भी हो जाती। फैज़ अहमद ‘फैज़’ की स्मृति पर दिशा छात्र संगठन एक कविता पाठ करना चाहता था। इसके लिए छात्र अनुमति लेने चीफ प्रॉक्टर ऑफिस पहुंचे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में किसी कार्यक्रम के लिए अनुमति लेना सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन उस दिन यह सामान्य प्रक्रिया एक असामान्य विवाद में बदल गई।
छात्रों ने आरोप लगाया कि चीफ प्रॉक्टर प्रो. राकेश सिंह और सहायक चीफ प्रॉक्टर अतुल नारायण ने बदसूलकी की, धक्का-मुक्की की और गाली-गलौज की। कैंपस में घटनाएं हवा की तरह फैलती हैं और यह खबर सुनते ही माहौल गर्म हो गया।
विश्वविद्यालय प्रशासन की प्रतिक्रिया और अधिक चौंकाने वाली थी। विवाद के तुरंत बाद निधि, सौम्या और संजय आदि को निलंबित कर दिया गया। बस, यहीं से चिनगारी ने आग पकड़ ली। विश्वविद्यालय के अंदर के वातावरण को अगर आप करीब से जानते हैं, तो समझेंगे कि एक छोटे से आदेश में भी बड़े तूफ़ान की क्षमता होती है और इस बार भी वही हुआ। निलंबन की ख़बर ने पूरे परिसर को बेचैन कर दिया।
विश्वविद्यालय परिसर में हाथों में तख्तियां लिए छात्रों में कहीं जोश था, कहीं रोष, कहीं दृढ़ता और कहीं चुपचाप बैठी लड़कियां थीं जो अपनी आंखों में अलग किस्म का सवाल लिए धरना स्थल पर डटी थी। सबकी मांग यह थी कि छात्रों का निलंबन तत्काल वापस लिया जाए और चीफ प्रॉक्टर राकेश सिंह को हटाया जाए।
दोपहर तक पांच–छह छात्र भूख हड़ताल पर बैठ चुके थे। छात्रों की आंखों में भूख से अधिक थकान और चिंता दिख रही थी, लेकिन आवाज़ में एक अजीब दृढ़ता थी। पास खड़े एक छात्र ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक दिन की नहीं है… हमको सुना नहीं जाता है। चाहे कविता पढ़नी हो या सवाल पूछना हो, छात्रों को हमेशा डर, धमकी और अपमान झेलना पड़ता है।
दूसरी तरफ छात्र आंदोलन शुरू होते ही कैंपस में बड़ी संख्या में सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए। इस दौरान गलियारों में, पेड़ों की छाया में, कॉलेज भवनों की सीढ़ियों पर बैठे छात्र एक ही चर्चा कर रहे थे कि निलंबन, बदसलूकी और प्रशासन की ज़िद।
इस बीच दिशा, आइसा और अन्य संगठनों ने आंदोलन को संगठित किया। शाम होते-होते माहौल और गरम हो गया। रात लगभग नौ बजे एडीएम सिटी सत्यम मिश्रा, कुलसचिव प्रो. आशीष कुमार खरे, डीएसडब्ल्यू प्रो. एन.के. शुक्ला और पुलिस अधिकारियों की टीम विश्वविद्यालय कैंपस पहुंची। छात्रों से बातचीत शुरू हुई। प्रशासन और छात्रों के बीच तनाव के बावजूद बातचीत की गुंजाइश बनी रही।
करीब दो घंटे तक चली बातचीत के बाद प्रशासन ने आखिरकार छात्रों का निलंबन वापस लेने की घोषणा की। इन क्षणों में उनकी जीत उतनी ही वास्तविक थी, जितनी लंबी उनकी थकान। निलंबित छात्रों का भार जैसे उनके कंधों से उतर गया हो।
इसी बीच चीफ प्रॉक्टर प्रो. राकेश सिंह ने इस्तीफा भेज दिया। यह खबर आग की तरह फैल गई। छात्र, शिक्षक-हर कोई इसे लेकर चर्चा करने लगा। पता चला कि वे निलंबन वापस लेने के फैसले से बेहद नाराज़ थे। उन्होंने कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव को व्यक्तिगत रूप से पत्र भेजा। इसी बीच प्रो. के.एन. उत्तम को कार्यवाहक चीफ प्रॉक्टर नियुक्त कर दिया गया है।
आइसा के प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार ने घटना का सिलसिलेवार जिक्र करते हुए बताया कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जब भी कोई कार्यक्रम होता है, उससे पहले परमिशन लेनी पड़ती है। सौम्या जब परमिशन लेने गईं, तो उनके साथ बद्तमीजी की गई और उसके बाद चार छात्रों को निलंबित कर दिया गया। उन्हें जातिसूचक गालियां दी गईं, उनके साथ मारपीट हुई और फिर उन्हें निलंबित कर दिया गया। यही नहीं उन्हें देशद्रोही और नक्सली तक कहा गया।
मनीष का यह भी कहना था कि पहले भी ऐसे मामले हो चुके हैं और जांच कमेटियां भी बैठ चुकी हैं, लेकिन आज तक कोई नतीजा नहीं निकला। इस बार छात्रों की मांग थी कि प्रो.राकेश सिंह को पद से हटाया जाए और सभी निलंबन वापस लिए जाएं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने दबाव में आकर बिना शर्त निलंबन वापस ले लिया और परिसर में पीने का पानी साफ न होने की शिकायत पर उचित व्यवस्था करने का आश्वासन भी दिया।
छात्र संगठनों ने इसे अपनी जीत करार दिया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विश्वविद्यालयों में संवाद की गुंजाइश घटती जा रही है। जहां सवाल पूछने की जरूरत थी, वहां सज़ाएं दी गईं। जहां कविता पढ़ने की इच्छा थी, वहां निलंबन थमा दिया गया। छात्रों का कहना है कि यह सिर्फ प्रशासनिक संवेदनहीनता का मामला नहीं, बल्कि उन संस्थाओं के भविष्य पर भी प्रश्न है, जहां शिक्षा के साथ स्वतंत्र सोच की भी पढ़ाई होनी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक बात साफ है कि विश्वविद्यालय में किसी एक आदेश से चुप्पी नहीं लाई जा सकती। यहां छात्र सिर्फ रोल नंबर नहीं हैं, वे इस परिसर की धड़कन हैं। निलंबन वापसी और चीफ प्रॉक्टर का इस्तीफा, दोनों घटनाएं दिखाती हैं कि छात्र एकजुट हों तो किसी भी प्रशासनिक ढांचे को झुकाना नामुमकिन नहीं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की इस लड़ाई में जीत सिर्फ चार छात्रों की नहीं, बल्कि पूरे परिसर की थी। यह एक संदेश भी था कि चाहे जितना दबाव हो, विचारों की मिट्टी को दबाया नहीं जा सकता।
आइसा के प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार कहते हैं कि यह आंदोलन सिर्फ छात्रों की जीत नहीं है, बल्कि पूरे इलाहाबाद विश्वविद्यालय की विचार-परंपरा की जीत है। छात्रों ने एक बार फिर दिखा दिया कि चाहे कितना भी दबाव हो, आवाज़ दबती नहीं और यदि दबाई जाए, तो वह और बुलंद होकर लौटती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का इतिहास ऐसी ही आवाज़ों से बना है और आने वाले समय में भी यही आवाज़ें इस विश्वविद्यालय की पहचान रहेंगी।
इस घटना से क्या गया संदेश?
– छात्रों की एकजुटता प्रशासनिक ढांचों को झुका सकती है।
– विश्वविद्यालयों में संवाद को दबाने की कोशिशें अंततः विफल होती हैं।
– अत्यधिक कड़ाई, अनुशासन के नाम पर दमन और छात्रों के प्रति दुर्व्यवहार अब पहले जैसा स्वीकार्य नहीं है।
– विश्वविद्यालय लोकतंत्र की पहली पाठशाला है। यहां तानाशाही मॉडल टिक नहीं सकता।
(आराधना पांडेय स्वतंत्र पत्रकार हैं)