अमेरिका द्वारा वेनेजुएला की सामरिक घेरेबंदी के निहितार्थ

विश्व राजनीति में दक्षिण अमेरिका का भूगोल लंबे समय तक अपेक्षाकृत शांत और अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है, जिसे अमेरिका की विदेश-नीति की भाषा में “बैकयार्ड” कहा जाता है। किंतु बीते एक दशक में भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण, वैश्विक ऊर्जा संकट, चीन–रूस की बढ़ती भूमिका और अमेरिकी वर्चस्व की चुनौतियों ने इस पूरे क्षेत्र की सामरिक अहमियत को असाधारण रूप से बढ़ा दिया है। इसी संदर्भ में अमेरिका द्वारा वेनेजुएला की सामरिक घेरेबंदी को समझना आवश्यक हो जाता है।

वेनेजुएला केवल एक लैटिन अमेरिकी देश नहीं—वह दुनिया के सबसे बड़े सिद्ध तेल भंडार वाला राष्ट्र है। साथ ही, यह लंबे समय से अमेरिकी हेगेमनी को चुनौती देने वाली वाम-राष्ट्रवादी राजनीति का प्रतीक भी रहा है। इस कारण अमेरिका और वेनेजुएला के बीच संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक, सामरिक और भू-राजनीतिक आयामों में भी विस्तृत है।

ऐतिहासिक संदर्भ : अमेरिकी वर्चस्व और वेनेजुएला का प्रतिरोध:

20वीं सदी के आरंभ से ही अमेरिका ने लैटिन अमेरिका को अपने भू-राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखा है। “मोनरो डॉक्ट्रिन” और बाद में “रूज़वेल्ट कोरोलरी” ने इस नीति को संस्थागत रूप दिया।

वेनेजुएला इस व्यवस्था में दो कारणों से अमेरिका के लिए ‘विशेष’ रहा—

1. अत्यधिक तेल-सम्पदा, जिसके कारण उसके संसाधनों पर नियंत्रण अमेरिकी रणनीति का हिस्सा रहा।

2. वामपंथी राष्ट्रवाद, जिसने बार-बार अमेरिकी हस्तक्षेप का प्रतिरोध किया।

ह्यूगो शावेज़ (1999–2013) ने इस अमेरिकी प्रभाव को चुनौती दी और खुले तौर पर अमेरिका को साम्राज्यवादी ताकत कहा।

उनके बाद निकोलस मादुरो ने सत्ता सँभाली और अमेरिका के साथ संघर्ष और तीव्र हो गया।

अमेरिका ने शावेज़ और मादुरो दोनों सरकारों पर निम्न आरोप लगाए—

लोकतंत्र-विरोध, मानवाधिकार उल्लंघन, संसाधनों का दुरुपयोग, विपक्ष का दमन। जैसाकि अमेरिका हर उस देश पर लगाता है जो उसके पाले में नहीं आता। 

हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्य असहमति वेनेजुएला के ऊर्जा नियंत्रण और अमेरिकी विरोधी झुकाव को लेकर है।

सामरिक घेरेबंदी की रणनीति : अमेरिका क्या कर रहा है?

अमेरिका की वेनेजुएला को घेरने की रणनीति बहुआयामी है। यह केवल सैन्य तैनाती का प्रश्न नहीं—बल्कि आर्थिक, कूटनीतिक, सामरिक और मनोवैज्ञानिक दबाव का संयुक्त ढाँचा है।

(क) आर्थिक प्रतिबंध और तेल-नियंत्रण-

अमेरिका ने वेनेजुएला पर कठोर प्रतिबंध लगाए जैसे तेल निर्यात पर रोक, बैंकिंग लेनदेन बंद, सरकारी और सैन्य अधिकारियों पर व्यक्तिगत प्रतिबंध, अमेरिकी कंपनियों को सीआईटीजीओ (वेनेजुएला की अमेरिकी शाखा) के माध्यम से नियंत्रित करना। ये प्रतिबंध वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिए लगाए गए।

(ख) राजनीतिक अलगाव और विपक्ष को समर्थन

अमेरिका ने 2019 में विपक्षी नेता जुआन गुआइदो को अंतरराष्ट्रीय मंच पर “वैध राष्ट्रपति” के रूप में पेश किया। यह राजनीतिक घेरेबंदी का महत्वपूर्ण आयाम था। अमेरिका ने विपक्षी दलों को फंडिंग की और  अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में मादुरो सरकार का विरोध किया। ओएएस और ईयू में राजनयिक दबाव जैसी रणनीतियों का सहारा लिया।

(ग) सैन्य उपस्थिति और क्षेत्रीय गठबंधन-

अमेरिका ने कोलंबिया, गयाना और कैरेबियन में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई। कोलंबिया में सैन्य ठिकाने, कैरिबियन में नौसैनिक बेड़े,गयाना विवाद के दौरान सैन्य अभ्यास। यह सीधे-सीधे भू-सैन्य घेरेबंदी जैसा कदम था।

(घ) सूचना एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध –

अंतरराष्ट्रीय मीडिया के माध्यम से वेनेजुएला को एक “असफल राज्य” के रूप में प्रस्तुत करना भी अमेरिकी रणनीति का हिस्सा है। इससे आर्थिक प्रतिबंधों और राजनीतिक हस्तक्षेप को नैतिक वैधता मिलती है।

रूस–चीन की भूमिका और अमेरिका की बेचैनी:

वेनेजुएला में अमेरिका की कठोरता का एक बड़ा कारण यह भी है कि वह इस देश को रूस–चीन के रणनीतिक प्रभाव का केंद्र मानता है। चीन द्वारा भारी आर्थिक निवेश, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का विस्तार, तेल अवसंरचना में भागीदारी आदि से स्पष्टतः चीन वेनेजुएला के स्थायी आर्थिक साझेदार के रूप में उभरा।

रूस ने हथियारों की आपूर्ति की, सैन्य प्रशिक्षण दिया, तेल और गैस परियोजनाएँ स्थापित की।

अमेरिका-विरोधी रणनीतिक गठजोड़ : वेनेजुएला रूस की “अमेरिकी बैकयार्ड में मौजूदगी” का सबसे सशक्त बिंदु है। इस गठजोड़ के कारण अमेरिका को आशंका है कि—रूस कैरेबियन में सैन्य पहुँच बढ़ा सकता है, चीन ऊर्जा सम्पदा पर दीर्घकालिक पकड़ बना लेगा,अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र में बहुध्रुवीयता बढ़ जाएगी इसलिए सामरिक घेरेबंदी एक रक्षात्मक–आक्रामक अमेरिकी रणनीति बन गई है।

भू-राजनीतिक निहितार्थ : अमेरिका और विश्व-व्यवस्था पर प्रभाव

अमेरिका की इस नीति का प्रभाव केवल वेनेजुएला तक सीमित नहीं है। यह पूरे पश्चिमी गोलार्ध और वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करता है।

(क) लैटिन अमेरिका में अमेरिकी विरोध बढ़ता है।

बोलिविया, क्यूबा, निकारागुआ, चिली, अर्जेंटीना जैसे देशों में अमेरिका-विरोधी राजनीतिक लहर मजबूत हो रही है। वाम-सरकारों का पुनरुत्थान हुआ है। अमेरिका का “नेतृत्व” अब निर्विवाद नहीं रहा।

(ख) वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता-

वेनेजुएला का उत्पादन दबने से— तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, रूस–सऊदी–अमेरिका के बीच नए समीकरण, चीन के लिए ऊर्जा सुरक्षा की नई चुनौतियाँ। अमेरिका ऊर्जा को अपने भू-राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग कर रहा है।

(ग) बहुध्रुवीयता को गति-

अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण— वेनेजुएला ने रूसी वित्तीय प्रणाली अपनाई, चीन की वैकल्पिक भुगतान प्रणाली को बढ़ावा मिला,

डॉलर आधारित व्यापार पर निर्भरता कम हुई। यह सब विश्व-व्यवस्था के बहुध्रुवीय बनने की प्रक्रिया को तेज करता है।

वेनेजुएला की आंतरिक स्थिति पर प्रभाव

(क) आर्थिक संकट-

मुद्रा अवमूल्यन, तेल उत्पादन में भारी गिरावट, महँगाई और बेरोज़गारी, सामाजिक असंतोष। इन समस्याओं को अमेरिका प्रतिबंधों ने और जटिल बनाया।

(ख) राजनीतिक ध्रुवीकरण-

सरकार और विपक्ष के बीच टकराव, लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण, सैन्य पर अत्यधिक निर्भरता।

(ग) पलायन और मानवीय संकट-

60 लाख से अधिक लोग देश छोड़ चुके हैं। यह दक्षिण अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा मानव प्रवासन है।

अमेरिका के लिए जोखिम : सामरिक घेरेबंदी का उल्टा असर

अमेरिका की यह नीति हमेशा सफल नहीं मानी जाती। इसके कई प्रतिकूल परिणाम भी सामने आए हैं—

1. रूस–चीन को क्षेत्र में और गहरी जगह मिली।

2. लैटिन अमेरिकी देशों ने अमेरिकी हस्तक्षेप पर सवाल उठाए।

3. वेनेजुएला सरकार गिरने के बजाय और मजबूत हुई।

4. ओपीईसी + में वेनेजुएला की भूमिका पुनर्जीवित हुई।

5. अमेरिका के “लोकतंत्र” और “मानवाधिकार” के नैरेटिव पर विश्वस्तर पर अविश्वास बढ़ा।

इसलिए यह रणनीति अपने लक्ष्य पूरे करने में सीमित सफलता ही दिखाती है।

भविष्य के संकेत : क्या स्थिति बदलेगी?

(क) ऊर्जा-नीति में परिवर्तन-

वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण अमेरिका ने 2023–24 में वेनेजुएला पर कुछ प्रतिबंधों को ढील दी है।

इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका के लिए तेल अभी भी प्राथमिक है, पूर्ण घेराबंदी टिकाऊ नहीं, भू-राजनीतिक आवश्यकताएँ नीति बदल सकती हैं।

(ख) लैटिन अमेरिका में वाम-सरकारों का उदय-

वाम-सरकारों का समूह मजबूत हो रहा है, जो वेनेजुएला के समर्थन में खड़ा है।

(ग) रूस–चीन–लैटिन अमेरिका ‘नया त्रिकोण’-

यह त्रिकोण अमेरिका के एकध्रुवीय वर्चस्व को चुनौती देता रहेगा। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला की सामरिक घेरेबंदी केवल एक देश की नीति नहीं यह अमेरिकी प्रभाव, वैश्विक ऊर्जा, वैचारिक संघर्ष और बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था के बीच चल रही बड़ी लड़ाई का हिस्सा है।

इसके मुख्य निहितार्थ हैं—

लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभाव लगातार चुनौती में है। रूस–चीन की सामरिक उपस्थिति बढ़ रही है। ऊर्जा-सुरक्षा वैश्विक राजनीति को पुनर्गठन कर रही है। वेनेजुएला क्षेत्रीय प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभर रहा है। भू-राजनीति अब केवल सैन्य नहीं, आर्थिक और वैचारिक युद्धों का सम्मिश्रण है।

अमेरिका की यह घेरेबंदी अंततः विश्व को यह संकेत देती है कि लड़ाई केवल तेल की नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की है और इसमें वेनेजुएला एक छोटा देश होकर भी बड़े संघर्ष का केंद्र बन गया है।

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