केबीसी में दो ही लोग बता सके केंद्र के चार मंत्रियों के नाम और उनके मंत्रालय

अभी, 25 नवम्बर 2025 को “कौन बनेगा करोड़पति” में हॉट सीट के लिए चयन में प्रतिस्पर्धियों से “फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट” में सवाल पूछा गया। आठ प्रतिस्पर्धी बचे थे। सवाल यह था कि “अक्टूबर 2025 तक के संदर्भ में, इन मंत्रालयों को उनके प्रभारी मंत्री के अनुसार, इस क्रम में लगाएं: रेल, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, शिक्षा और ग्रामीण विकास।” विकल्प थे श्री शिवराज सिंह चौहान, श्री धर्मेन्द्र प्रधान, श्री हरदीप सिंह पुरी और श्री अश्विनी वैष्णव।

सवाल सुनते ही मुझे पहले लगा कि इस सवाल का उत्तर कोई नहीं दे पायेगा। फिर मैंने सोचा कि आखिर प्रतिस्पर्धियों में अंधभक्त भी तो होंगे, सो अपनी समझ में सुधार कर मैंने सोचा कि कम लोग ही इस सवाल का जवाब दे पायेंगे। मेरा अनुमान सही साबित हुआ। केवल दो लोगों — कविता परखे ने 3.52 सेकंड में और इमरान खान ने 6.84 सेकंड में इसके सही जवाब दिये भी, पर शेष 6 लोग इस सवाल का उत्तर देने में विफल रहे।

पंजाब के शिक्षा विभाग ने एक “क्विज” कार्यक्रम में हाल ही में यह सवाल पूछा था। पता नहीं इसका सबब क्या था, पर शायद यह “जनरल नॉलेज” की जांच करने के लिए पूछा गया था। केबीसी और ऐसे तमाम कार्यक्रम “जनरल नॉलेज” के नाम पर ही चल रहे हैं। घरों—परिवारों में भी इन्हें “जनरल नॉलेज” के नाम पर ही देखा—दिखाया जाता है और “ईयर बुक” के नाम पर बेची-पढ़ी जा रही तमाम किताबें इसी नाम पर चलती हैं।

पर यह बात अक्सर और अजाने भुला दी जाती है कि यह सब “जरनल इन्फार्मेशन” है, जिन्हें रटा और कंठाग्र किया जा सकता है। गो “इन्फार्मेशन” का अम्बार होने पर इनके गड्ड-मड्ड होने और कई “इन्फार्मेशन” के खो, बिला और धुंधला हो जाने का भी खतरा रहता है। दरअसल “जनरल नॉलेज” और “जनरल इन्फार्मेशन” में एक बारीक फर्क है। “नॉलेज” में “रीजनिंग” अंतर्भूत होता है। और “रीजनिंग” का मतलब दलीलें, तर्क, विवेक। दलीलें न हों, तर्क न हों, विवेक न हों, तो बुद्धि नहीं होती।

“इन्फार्मशन” में यह सब नहीं होता, इसलिए वह खालिस सूचनाएं हैं, उनका बुद्धि से कोई ताल्लुक नहीं है। “क्रैमिंग”का रट्टा—मास्टर होने का भी दलीलों से, तर्क से, विवेक से कोई ताल्लुक नहीं है।

ठीक-ठीक याद नहीं, पर 23-24 साल पहले की बात रही होगी। 23-24 साल पहले इसलिए कि तब मेरा बेटा भी 8-9 का तो था ही। “कौन बनेगा करोड़पति” की कोई शुरूआती कड़ी चल रही थी। “हॉट सीट” पर शायद 20-21 साल का एक प्रतिस्पर्धी था और सवाल-दर-सवाल के सही जवाब देकर वह लगातार जीतता जा रहा था, लाख, 2 लाख, 5 लाख, सीढ़ी पर लगातार चढ़ता हुआ। फॉर्मेट तब अलग था और प्रतिस्पर्धी संभवत: 25 लाख रुपये जीत चुका था। तभी अमिताभ बच्चन ने एक सवाल रखा।

सवाल यह था कि श्री मनमोहन सिंह, केंद्रीय वित्त मंत्री बनने से ठीक पहले किस पद पर आसीन थे और विकल्प थे — योजना आयोग के उपाध्यक्ष, रिजर्व बैंक के गवर्नर, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के वित्तीय सलाहकार। विकल्प यही चार थे, क्रम कुछ अलग रहा हो तो अब याद नहीं। प्रतिस्पर्धी अब तक अधिकतर सवालों के जवाब “जनरल इन्फार्मेशन” की अपनी कड़ी तैयारी और शेष प्रश्नों के उत्तर अपनी सहज—बुद्धि से, अपने विवेक से दे रहा था।

याद यह भी नहीं कि उसने कोई “लाइफलाइन” ली हो, पर यह तय था कि प्रतिस्पर्धी ने “जनरल इन्फार्मेशन” के जो रट्टा मारे थे, उनमें इस सवाल का जवाब शामिल नहीं था। और कम-से-कम इस प्रश्न का उत्तर विवेक से बाहर तो था ही।

मैंने अपने दोनों बच्चों को बुलाया। एक 8—9 वर्ष का, दूसरी 11—12 साल की। मैंने दोनों बच्चों से कहा कि अब इस प्रतिस्पर्धी का उत्तर गलत होगा या फिर वह “क्विट” करेगा। विवेक से तो इस सवाल का जवाब मिल नहीं सकता था, क्योंकि उत्तर सहज-बुद्धि को सिर के बल पर खड़ा कर देनेवाला था, “कॉमन सेंस” के बिल्कुल उलट। आप आम तौर पर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि उंचे पद पर आसीन रह चुका कोई व्यक्ति बाद में किसी छोटे और मामूली पद पर का भी विकल्प चुन सकता है।

खासकर श्री मनमोहन सिंह या वैसे किसी अन्य व्यक्ति से तो कतई नहीं। प्रतिस्पर्धी की तर्क-बुद्धि, उसका विवेक कैसे इस बात की गवाही दे पाता कि रिजर्व बैंक का गवर्नर, योजना आयोग का उपाध्यक्ष और पीएम का वित्त सलाहकार रहने के बाद कोई व्यक्ति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अपेक्षाकृत छोटे और कमतर पद पर काम करता होगा।

बहरहाल, हम 25 नवम्बर 2025 में केबीसी में “फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट” में पूछे गये सवाल पर लौटें। सवाल प्रकारान्तर से यही था कि श्री शिवराज सिंह चौहान, श्री धर्मेन्द्र प्रधान, श्री हरदीप सिंह पुरी और श्री अश्विनी वैष्णव केंद्रीय रेल, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, शिक्षा और ग्रामीण विकास मंत्रालयों में किन—किन के प्रभारी मंत्री हैं? हम इस तथ्य पर भी लौटें और इनके संभावित कारणों पर भी कि आखिर क्यों, बचे हुए आठ प्रतिस्पर्धियों में से केवल दो इस प्रश्न का जवाब दे सके।

यह सच है कि छात्रों ही नहीं, आम तौर पर जागरुक नागरिकों के लिए भी केबीसी के इस सवाल का जवाब आसान नहीं। उन रट्टा—मास्टरों के लिए भी नहीं, जिनके लिए दशक भर पहले ऐसे सवालों के जवाब देना चुटकियों का काम था। आज इस प्रश्न का उत्तर मुश्किल इसलिए है कि अव्वल तो साहेब की सरकार में मंत्रियों में से अधिकतर पूर्व—राजनयिक हैं। राजनीति से अधिकतर का कोई ताल्लुक नहीं है।

दूसरे कि दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों से वार्ता करनी हो, कुछ या अधिक देशों के किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन की बैठक या सम्मेलन में शिरकत करना हो, किसी ट्रेन को झंडी दिखाकर रवाना करना हो, किसी नगर निगम के भवन का उद्घाटन करना हो या किसी किताब का विमोचन करना हो, सबके लिए प्रधानमंत्री हैं या हद-से-हद गृहमंत्री। फोटो भी अधिकतर फोटोजीवी पीएम के।

अब ऐसे में जिद न हो या संघ लोक सेवा आयोग से लेकर केबीसी तक कोई प्रतियोगी परीक्षा न हो तो फिर केंद्र ही नहीं, डबल इंजन की किसी राज्य सरकार के भी मंत्रियों के नाम कैसे याद रहें।

(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply