वाराणसी में इन दिनों दालमंडी ‘गली’ को ‘सड़क’ बनाने की सनक में जो कुछ भी हो रहा है, वह सिर्फ ईंट-पत्थर का ढहना नहीं है। यह उन यादों का टूटना है, जिनमें शहर की आत्मा का ताप बसता था। दालमंडी और उसके आसपास की गलियां पीढ़ियों से जिस जीवन को संभालती आई थीं, आज वही जीवन असहाय खड़ा है।
धर्म और अध्यात्म की नगरी कही जाने वाली काशी में जब बुलडोज़र की पहली आवाज़ गूंजी तो वह सिर्फ दीवारों को नहीं, बल्कि उन स्मृतियों को भी हिला गई जिन पर यह शहर टिका है।
‘गली, गाली और पान’ की पहचान वाले वाराणसी की वे संकरी, जीवंत और सदियों पुरानी गलियां अचानक बदलने लगीं। इन गलियों में सिर्फ लोग नहीं रहते थे। इनके भीतर शहर की धड़कनें धड़कती थीं। आज उन्हीं धड़कनों पर हथौड़ों की चोट है। इसलिए लोग सड़क पर उतर आए। किसी को घर उजड़ने का डर था, किसी को दुकान टूटते ही अपनी पहचान खो जाने का भय।
वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) ने दालमंडी को मॉडल सड़क के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। इस परियोजना का शिलान्यास इसी वर्ष अगस्त में प्रधानमंत्री और वाराणसी से सांसद नरेंद्र मोदी ने किया था। राज्य सरकार की ओर से इसके लिए 215 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। दालमंडी काशी विश्वनाथ मंदिर से मात्र सौ मीटर की दूरी पर है।
गेट नंबर चार के ठीक सामने स्थित यह स्थान केवल भौगोलिक महत्व नहीं रखता, बल्कि उन भावनात्मक स्मृतियों का केंद्र भी है जो बनारस की परंपरा को सांस देती आई हैं।
गली को चौड़ा करने के लिए 187 मकानों को ढहाने के लिए चिह्नित किया गया है और उनके मालिकों के लिए लगभग 191 करोड़ रुपये का मुआवजा बांटने का निर्णय लिया है। कुछ ने मुआवजा लेकर भवनों को तोड़ने की अनुमति दे दी है। लेकिन अधिकांश लोग आज भी तोड़फोड़ और गली को सड़क बनाने के विरोध में अड़े हुए हैं। उनके विरोध के पीछे कोई राजनीतिक शोर नहीं, बल्कि वह गहरी पीड़ा है जो अपनी जड़ें कटते देखती है।
करीब 650 मीटर लंबी इस गली में सैकड़ों दुकानें और घर हैं। मुस्लिम बहुल यह इलाका सदियों से वाराणसी के थोक बाजार की धुरी रहा है। खासकर साड़ियों और शादी के परिधानों की दुनिया का केंद्र। यहां व्यापार सिर्फ सौदेबाजी नहीं था, यह एक सांस्कृतिक संवाद था जिसमें ग्राहक और दुकानदार के बीच विश्वास, अपनापन और परंपरा की गंध शामिल रहती थी।
दुकानें तिराहे नहीं थीं, वे जीवन के छोटे-छोटे मंदिर थीं। इसलिए विरोध में सिर्फ रोज़गार का डर नहीं, बल्कि वह सांस्कृतिक पहचान भी है जिसे नई जगह ले जाकर बसाया नहीं जा सकता।
सबसे बड़ी पीड़ा उन किराएदारों की है जिनकी दुकानें पीढ़ियों से हैं, पर मुआवजे का अधिकार उनके पास नहीं। दुकानें टूटेंगी, तो वे जीविका से भी हाथ धोएंगे और वह प्रतिष्ठा भी खो देंगे जो वर्षों की मेहनत से बनी है। उनके लिए दुकान सिर्फ दीवारें नहीं, उनकी मेहनत का प्रमाण पत्र थी।
वाराणसी विकास प्राधिकरण के सचिव डॉक्टर वेदप्रकाश मिश्र का कहना है कि सभी शिकायतों को सुनने और समाधान की कोशिशें की जा रही हैं। वे बताते हैं कि दालमंडी में 12 अवैध भवनों के खिलाफ पहले ही नोटिस जारी हुए थे और ध्वस्तीकरण से पूर्व सभी को सूचित भी किया गया था।
मुनादी कराई गई, नोटिस चस्पा किए गए और 14 नवंबर तक समय दिया गया। प्रशासन का दावा है कि प्रक्रिया विधिसम्मत है, पर लोगों के मन में संदेह अभी भी उतना ही गहरा है जितने पुराने मंदिरों के पेंदे।
दालमंडी परियोजना 215 करोड़ रुपये की है। 181 भवनों को नोटिस मिला है। 650 मीटर लंबी और 60 फीट चौड़ी सड़क बनाई जानी है। 30 फीट सड़क और दोनों ओर 15 फीट फुटपाथ। उद्देश्य है कि विश्वनाथ मंदिर तक एक सुव्यवस्थित मार्ग बने, भीड़ नियंत्रित हो और एक टूरिस्ट कॉरिडोर साकार हो।
लेकिन इस आधुनिकीकरण की कीमत वही चुका रहा है जिसने सदियों से परंपरा को ढोया है। दुनिया भर के तमाम विदेशी सैलानी यहां की गलियों को देखने ही बनारस आते रहे हैं और अब इन ऐतिहासिक गलियों के वजूद को मिटाया जा रहा है।
कुछ दिन पहले जब वीडीए की टीम ध्वस्तीकरण के लिए पहुंची, तो महिलाओं के विरोध के कारण वापस लौटना पड़ा। कई लोगों पर सरकारी कार्य में बाधा डालने सहित अन्य धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए। कई लोग गिरफ्तार भी किए गए। प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई का विरोध सिर्फ नाराज़गी नहीं, अस्तित्व की लड़ाई है।
दुकानदार सरफराज बताते हैं कि प्रशासन से कई दौर की बातचीत हो चुकी है, पर प्रशासन उन्हें शहर से बाहर बसाने का सुझाव दे रहा है। दुकानदारों की मांग है कि पुनर्वास दालमंडी के आसपास ही हो। सरफराज कहते हैं, “हम शहरी सीमा से बाहर नहीं जाएंगे। पहले हमें कहीं बसाया जाए, उसके बाद ध्वस्तीकरण हो। जब तक ऐसा नहीं होता, कार्रवाई रोकी जाए।”
कुछ दिन पहले दालमंडी के कई दुकानदार समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिले और उन्होंने इस परियोजना को संकीर्ण सोच बताया। साथ ही यह भी कहा कि सरकार लोगों को डरा-धमकाकर उनका व्यापार खत्म करना चाहती है। किसी की जीविका छीनने का अधिकार सरकार को किसने दिया?
संस्कृति बनाम विकास की लड़ाई
दालमंडी आज नए बहस के बीच खड़ी है। कांग्रेस और सपा दोनों ही दलमंडी की 650 मीटर लंबी सड़क को 17 मीटर चौड़ा करने और वैश्विक तीर्थयात्रियों की काशी विश्वनाथ धाम तक पहुंच बेहतर करने हेतु बनाए जा रहे 224 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध कर रहे हैं।
कुल 187 इमारतों को अधिग्रहित/खरीदने की प्रक्रिया प्रस्तावित है। कई व्यापारियों के साथ सपा नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने लखनऊ में सपा प्रमुख से मुलाक़ात की, जिन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि व्यापारियों को परेशान न किया जाए।
वाराणसी में चल रहे चौड़ीकरण अभियान पर अब सवाल उठने लगे हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस तोड़फोड़ अभियान को राजनीतिक बताया है और तुरंत इसे रोकने की अपील की है। शुक्रवार को उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र में इस तरह की कार्रवाई स्थानीय लोगों में “फूट डालो, राज करो” जैसी स्थिति पैदा कर रही है और यह विरासत संरक्षण के नाम पर चलाया जा रहा एक राजनीतिक खेल है।
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दालमंडी भेजा और बाद में 21 नवंबर 2025 को लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में उन्होंने मीडिया से कहा, “यह चौड़ीकरण इतिहास या विरासत बचाने के लिए नहीं है। यह राजनीतिक विध्वंस है। यही इनकी राजनीति है। हमने सोचा था कि बनारस को क्योटो बनाया जाएगा।”
उन्होंने आगे कहा कि वाराणसी की दालमंडी के व्यापारियों पर भाजपा सरकार ने संकट खड़ा कर दिया है। उनकी दुकानों को तोड़ा जा रहा है-यह सीधा अन्याय है। यह न तो विरासत बचाने की योजना है, न इतिहास संरक्षण की। यह साफ राजनीतिक तोड़फोड़ है। जिस बाज़ार से भाजपा चुनाव हारी, आज उसी बाज़ार के व्यापारियों को परेशान किया जा रहा है। भाजपा अपनी राजनीतिक योजनाओं को पूरा करने के लिए ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति अपना रही है।
उन्होंने अधिकारियों को भी चेताया, “जो अधिकारी यह कार्रवाई कर रहे हैं, उन्हें सोचना चाहिए। हर चीज़ दर्ज हो रही है-कुछ हमारे द्वारा, कुछ प्रकृति द्वारा। आप सिर्फ दर्द दे रहे हैं, लोगों का नुकसान कर रहे हैं। हम कहना चाहते हैं कि यह विश्वप्रसिद्ध पर्यटन स्थल और धरोहर क्षेत्र बिना किसी तोड़फोड़ के भी संरक्षित किया जा सकता है। इसे बचाने की ज़रूरत है, मिटाने की नहीं।”
अखिलेश ने प्रभावित लोगों की व्यथा को सामने रखते हुए कहा, “हमारे मुख्यमंत्री सिंगापुर में स्पेन खोज रहे थे तो उनसे और क्या कहा जाए? दालमंडी के लोगों को दाल की तरह मत कूट डालिए। आप चाहे दुकान कहीं और दे दें, पर ग्राहक और बाजार की पहचान कहां से लाएंगे? भाजपा के लोग नकारात्मक और संकीर्ण सोच वाले हैं। चौड़ीकरण की बात कर रहे हैं, लेकिन यह चौड़ीकरण नहीं। इनकी संकीर्ण राजनीति की साज़िश है।”
उन्होंने नैतिकता पर भी सवाल उठाया और कहा, “किस अधिकार से किसी का रोज़गार छीना जा रहा है? अधिकारियों के ज़रिए यह अहंकार दिखाया जा रहा है। हर दिन यह सरकार जनता का भरोसा खोती जा रही है। आज यूपी में जितनी मेट्रो चल रही हैं या बन रही हैं, वह समाजवादी सरकार की देन है। वाराणसी में मेट्रो के लिए डीपीआर भी हमने ही बनाई थी। भाजपा ने बनारस के विकास को रोक दिया है।”
अखिलेश यादव ने दर्द भरे अंदाज़ में कहा, “दालमंडी जैसा बाजार एक-दो दिन में नहीं बनता। पीढ़ियां बीत जाती हैं एक दुकान को खड़ा करने में, कारोबार को जमाने में। लेकिन उसे तोड़ने में एक पल भी नहीं लगता। भाजपा सरकार दुकानों को मिटाना चाहती है। मुआवज़े में कहीं दुकान मिल भी जाए, लेकिन ग्राहक और बाजार की पहचान वापस नहीं मिलती। भाजपा व्यापार और व्यापारियों के खिलाफ खड़ी है। चौड़ीकरण के नाम पर संकुचित सोच की साज़िश रची जा रही है।
“दुनिया के कई देशों ने अपनी ऐतिहासिक धरोहर को बचाए रखते हुए विकास किया है। यहां दालमंडी की ऐतिहासिक गली उजाड़ी जा रही है। हम व्यापारियों की सुरक्षा, सम्मान और संरक्षण की मांग करते हैं,” उन्होंने कहा।
अंत में अखिलेश यादव ने तीखा पलटवार किया, “भाजपा की अन्याय और दमन की राजनीति ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी। नौ साल में इस सरकार ने कोई काम नहीं किया। किसानों से लेकर नौजवानों, व्यापारियों से लेकर आम जनता तक सभी के साथ अन्याय हुआ है। उनके अधिकार छीने गए, सरकारी संपत्तियां बेची गईं। लेकिन मैं भरोसा दिलाता हूं-यह अन्याय हमेशा नहीं चलेगा, भाजपा ज्यादा दिन नहीं टिकेगी।”
वाराणसी प्रशासन की बढ़ती चुनौती
इस बीच, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स ने मानवाधिकार आयोग में याचिका दायर की है, जिसमें दालमंडी चौड़ीकरण की प्रक्रिया को सीधे-सीधे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया गया है। आयोग ने याचिका को गंभीरता से लेते हुए वाराणसी के जिलाधिकारी को नोटिस जारी किया है। इसका मतलब साफ़ है-अब प्रशासन को यह बताना ही होगा कि विकास की इस प्रक्रिया में कानून, पुनर्वास और मानवीय गरिमा का कितना पालन हो रहा है।

शिकायत का केंद्र उन हजारों छोटे दुकानदारों की पीड़ा है, जिनके जीवन की पूंजी दालमंडी की दुकानों में लगी है। इन दुकानदारों ने अपनी दुकानें किराए पर लेने के लिए कई साल पहले भारी-भरकम रकम ‘पगड़ी’ के तौर पर अदा की थी। इसी पगड़ी से पीढ़ियों ने अपना कारोबार खड़ा किया, घर चलाया, बच्चों को पढ़ाया।
लेकिन अब, जब चौड़ीकरण की गिनती शुरू हुई, तो मकान मालिकों को तो मुआवज़े का रास्ता मिला, पर किरायेदारों को एक रुपया तक नहीं। यह असमानता सिर्फ आर्थिक नहीं-यह उनकी आजीविका और सम्मान दोनों पर गहरी चोट है।
याचिका में यह भी गंभीर आरोप है कि चौड़ीकरण का विरोध करने वालों को प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। कई लोग बताते हैं कि उन्हें धमकियां, दबाव और लगातार असुरक्षा महसूस हो रही है। दालमंडी की तंग गलियों में गूँजती ये आवाज़ें अब आयोग के दरवाज़े तक पहुंच चुकी हैं।
अब जिलाधिकारी को मानवाधिकार आयोग के सामने एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी और बताना होगा कि भूमि अधिग्रहण कानून का कितना पालन हुआ? किरायेदारों के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए? क्या पुनर्वास की कोई पारदर्शी योजना है? चौड़ीकरण किस आधार पर तय किया गया?
ये सभी सवाल अब प्रशासन पर भारी पड़ने वाले हैं। अब विकास की इस योजना की कसौटी सिर्फ इंच और किलोमीटर नहीं, बल्कि इंसानी ज़िंदगी, हक़, गरिमा और न्याय भी होंगे। दालमंडी के हजारों दुकानदारों के लिए यह हस्तक्षेप एक उम्मीद का दरवाज़ा भी है।
ढहती हवेलियों में बुझ रही बनारसियत
बनारस का दालमंडी इलाका सिर्फ व्यापार का केंद्र नहीं था। वह इस ऐतिहासिक शहर की मिट्टी में घुली उस विरासत का हिस्सा था जिसने इस शहर को अपनी अलग पहचान दी। यहां की सड़कों पर चलते हुए सदियों की थाप सुनाई देती थी। व्यापार की चहल-पहल के बीच भी एक सांस्कृतिक स्पंदन हमेशा धड़कता रहा, क्योंकि यह इलाका सिर्फ लेन-देन का बाजार नहीं था। यह कला और इतिहास की एक जीवित पांडुलिपि थी।
वाराणसी की संस्कृति को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार विनय मौर्य बताते हैं, “ये पूर्वांचल में दाल की सबसे बड़ी मंडी थी जहां विभिन्न किस्म की दालों का थोक में व्यापार होता था। पूर्वांचल के बड़े व्यापारी यहां आते थे और कई दिनों तक रहते थे।
उसी दौरान यहां तवायफों के कोठे भी बने और देखते ही देखते यह इलाका घुंघरुओं की आवाज और नृत्य संगीत से झंकृत होने लगा। बनारस के संगीत घरानों को इन कोठों ने एक बड़ा मजबूत आधार भी दिया जहां दादरा, ठुमरी, कजरी, चैती जैसी गायकी निकली।”
“जब रातें लंबी होती थीं और गलियों से होकर गुजरता कोई भी राहगीर उन कोठों से उठती स्वर-लहरियों के सहारे मानो किसी दूसरी दुनिया में पहुंच जाता था। दालमंडी का यह हरमोनियम और घुंघरुओं का संगम बनारस की मीठी बोली की तरह ही सहज और अंतरंग था। वहां की गूंज में वह रियाज़ था जिसका सपना बड़े-बड़े फनकार भी देखते थे। यह स्थान केवल मनोरंजन का केंद्र नहीं था, बल्कि वह गुरुकुल था जहां कला सीखने और उसे साधने की तपस्या होती थी।”
साल 1986 में बनारस घराने के प्रसिद्ध तबला वादक पंडित किशन महाराज ने सन्मार्ग में लिखा था, “संगीत की जननी है काशी।” उनके शब्दों में बसी काशी की आत्मा, उसके हर नुक्कड़ और गलियों की गूंज में मौजूद है। किशन महाराज ने बताया कि मुगलों के दौर से पहले भी दालमंडी एक जीवंत बाजार के रूप में विकसित हो चुकी थी। 16वीं सदी तक यह बाजार पूरी तरह फेमस हो चुका था। यह वही दालमंडी थी, जिसने बनारस के संगीत घरानों को पल्लवित किया।
डॉ. मोतीचंद, जो कभी प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम, मुंबई के डायरेक्टर रहे, अपनी किताब “काशी का इतिहास” में लिखते हैं कि बनारस के रईस यहां दालों का कारोबार करते थे और शाम होते-होते मनोरंजन की महफिलें सजती थीं। भांड़ मंडलियां रईसों का मनोरंजन, नाच-गाने से करतीं। मुगलों की आखिरी पीढ़ी के दौर में यह मंडी पास के विश्वेश्वरगंज में शिफ्ट हुई और दालमंडी में गायक, नर्तक और कलाकार बस गए।
लेखक विश्वनाथ मुखर्जी अपनी किताब “बना रहे बनारस” में लिखते हैं कि 18वीं सदी के आसपास यहां संगीत की साधना होती थी। रईस शाम के समय कान में इत्र, सफेद बनारसी पोशाक, मुंह में पान और हाथ में पीकदान लिए, दालमंडी में संगीत का आनंद लेते। उस वक्त बनारसी लोग पान फेंककर गली गंदा नहीं करते थे।
यहीं से सितारा देवी, बागेश्वरी देवी जैसी हस्तियां फली-फूलीं। 18-19वीं सदी में दालमंडी में तवायफों का बसना आम हो गया। कुछ ही दशकों में हर कोने में अलग-अलग रागों की महफिलें लगने लगीं।
व्यापारी नेता एवं दालमंडी में चश्मे के थोक कारोबारी बदरुद्दीन अहमद बताते हैं कि 70 के दशक में दालमंडी की तवायफें शिवदासपुर में बस गईं। आधुनिक हिंदी के अगुवा भारतेंदु हरिश्चंद्र भी दालमंडी की नर्तकी मल्लिका के दीवाने थे।
तौकीबाई, हुस्नाबाई, जद्दनबाई, जानकीबाई, गौहरजान, रसूलनबाई, सिद्धेश्वरी देवी, विद्याधरी-ये नाम आज भी बनारस की गलियों की धड़कन हैं। बिस्मिल्लाह खां की शहनाई आज भी सराय हड़हा की हवेली में रियाज कर रही है। खां साहब मानते थे कि जिस तरह की गायकी कोठों में होती थी, वह कहीं और नहीं मिल सकती।
बदरुद्दीन यह भी कहते हैं, “दालमंडी ने फिल्म और संगीत की दुनिया को भी प्रेरित किया। राजकपूर की ‘राम तेरी गंगा मैली’ में कोठों का दृश्य इन्हीं गलियों से लिया गया। यह वही गलियां हैं, जहां ठुमरी, पूरबी, शहनाई और सारंगी की धुनें हर शाम गूंजती थीं।
उस्ताद विलायत खान ने कहा था, “बनारस, संगीत की खराद मशीन है, यहां फनकार घिसाई होकर संवरता है। रसूलन बाई के मुजरे का जलवा कहानियों में जिया जाता है, “फूलगेंदवा न मारो, लागत जोबनवा में चोट।” मन्ना डे ने भी इसे गाया। ठुमरी की महारानी गिरिजा देवी ने दादरा, चैती, कजरी, टप्पा, होरी और छोटा ख्याल में संगीत का कमाल दिखाया। लोग उन्हें प्यार से ‘अप्पा जी’ कहते थे।”
लच्छू महाराज, बनारस घराने के मशहूर तबलावादक, अपने कोठे में घंटों रियाज करते। 71 साल की उम्र में भी उनकी थाप बेजोड़ थी। उनके भाई वैभव सिंह बताते हैं कि रियाज में कमरे में सिर्फ मोमबत्ती जलती और पंखा बंद रहता। दालमंडी की गलियों में तबला की थाप, ठुमरी और शास्त्रीय गायन का जादू अब यादों में बसा है। जो कभी बनारस के संगीत घरानों की पहचान थी, आज वह बाजार और व्यस्त गलियों में बदल चुकी है।
आज भी गूंजती हैं इतिहास की सांसें
सुबह का बनारस जब अपनी पहली नीली सांस भरता है, दालमंडी की गलियां तब भी किसी बूढ़े गवैए की तरह धीमे-धीमे करवट लेती हैं। लाल बलुआ पत्थर से बनी इन दीवारों पर समय ने कितनी उंगलियां फेरी हैं, कितनी दास्तानें टांकी हैं-कोई ठीक-ठीक गिन नहीं सकता। पत्थरों की जुड़ाई में छिपी सुर्खी और चूने की सुगंध आज भी हवा में रची हुई मिल जाती है, जैसे समय ने खुद इन दीवारों पर कफनी ओढ़ी हो और यहीं टिककर बैठ गया हो।
बनारस के एक्टिविस्ट एवं पूर्व पार्षद अजित सिंह कहते हैं, “बनारस की उम्र तीन हजार साल से भी ज़्यादा है और अगर बनारस समय का पुराना गायक है तो दालमंडी उसकी वही गली है जहां आवाज़ पहली बार सुर पकड़ती है। यहां हर मोड़ पर इतिहास किसी बिछड़ी हुई धुन की तरह लौट आता है।
दालमंडी में पहले कला थी, देह नहीं। राग था, रागिनियां थीं, हुस्न था, लेकिन उसका सौदा कोई नहीं करता था। यहां कलाकार बसते थे, खरीदार नहीं। धीरे-धीरे यह गली एक ऐसी पाठशाला बन गई जहां से सितारा देवी, बागेश्वरी देवी, जद्दनबाई, गौहरजान, रसूलनबाई, गिरिजा देवी जैसी आवाज़ें निकलकर देश के बड़े-बड़े मंचों पर गूंजीं।”
अजित बताते हैं, “दालमंडी की कोठियों में लगी शाम की महफ़िलें इतनी असरदार थीं कि खुद बिस्मिल्लाह खां कहते थे कि अगर कोठे न होते, तो कई सुर दुनिया तक पहुंच ही नहीं पाते। आज जब कोई दालमंडी में कदम रखता है तो एक अजीब-सी खामोशी उसे घेर लेती है।
मोबाइल दुकानों, ब्राइडल वेयर, कॉस्मेटिक्स और चमकते शोरूमों की भीड़ में जाकर वह पुराना संगीत जैसे किसी पुराने संदूक में बंद पड़ा मिलता है। न वह हंसते दरवाज़े हैं, न झूमती झालरें, न वक़्त को रोक लेने वाली महफ़िलें। जब कभी किसी दुकान के भीतर से “इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा” जैसी कोई पुरानी धुन रिसकर बाहर आती है, तो लगता है दालमंडी अब भी पूरी तरह बूढ़ी नहीं हुई-वह सिर्फ चुप है, थकी हुई है, मगर ज़िंदा है।”
दालमंडी की हवा में आज भी बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की झनकार टंगी मिल जाती है। सराय हड़हा की उन्हीं तंग सीढ़ियों पर चढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि पुरानी चौकी पर रखी उनकी शहनाई अब भी सांस ले रही है, जैसे रियाज़ अधूरा छूट गया हो और हर शाम उसे पूरा करने की बेचैनी समाई हो।
दालमंडी की अनसुनी दास्तान
इतिहासकारों के मुताबिक, दालमंडी वही गली है जहां कभी तवायफ धनेसरीबाई ने स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद को अंग्रेजों से छुपाया था। वही जगह जहां रसूलनबाई ने प्रण लिया था कि देश आज़ाद होने तक गहने नहीं पहनेंगी। वही कोठे जहां देशभक्ति के गीत गाए जाते थे और अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ़ योजनाएं बनती थीं।
अगस्त 1920 से फरवरी 1922-असहयोग आंदोलन पूरे देश में उफान पर था। गांधी देश के कोने-कोने में जा रहे थे, लोगों को जोड़ रहे थे। इसी दौरान उनकी राह दालमंडी से भी गुज़री।
उस समय दालमंडी की तवायफें ‘तवायफ सभा’ बनाकर स्वतंत्रता आंदोलन को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग दे रही थीं। जब मुलाक़ात हुई, तो उन्होंने राष्ट्रपिता से कहा, “बापू, इस लड़ाई में हमारा हिस्सा भी जोड़ लीजिए। हम आर्थिक मदद देना चाहती हैं।” लेकिन गांधी ने उनके प्रस्ताव को नैतिकता का हवाला देकर स्वीकार नहीं किया।
वरिष्ठ पत्रकार राजीव सिंह बताते हैं, “गांधी की इस अस्वीकृति ने दालमंडी की तवायफों को भीतर तक आहत कर दिया। रोने-धोने या शोर-शराबे की जगह उन्होंने विरोध का रास्ता भी ‘अदा’ और ‘अंदाज़’ में चुना। उन्होंने अपने तानपुरे, सारंगी, तबले और अन्य सारे वाद्ययंत्र गंगा में प्रवाहित कर दिए। इसके बाद वे अपने कोठों पर बैठकर चरखा चलाने लगीं। सूत काततीं, भरतीं, और उसी से आंदोलन का समर्थन करती रहीं।”
स्थानीय दुकानदार रमेश वर्मा बताते हैं, “हमारे बाबा बताते थे कि कई क्रांतिकारी इन तवायफों के कोठों पर शरण लेते थे। ये तवायफें अपने कोठों की कमाई का पैसा आजादी की लड़ाई में मदद करने के लिए भी देती थीं। इन तवायफों में धनेशरी बाई, राजेश्वरी बाई, गौहर जान जैसे नाम शामिल हैं।
इन नामों के पीछे सिर्फ कलाकार नहीं, वे महिलाएं थीं जिनमें देशभक्ति का वही तेज चमकता था जो किसी भी रणभूमि में दिखाई देता है। उनके घुंघरुओं की रुनझुन में संगीत के साथ-साथ स्वतंत्रता की पुकार भी थी। उन्होंने जिस उदारता और जज्बे से क्रांतिकारियों को सहारा दिया, वह इस इलाके की आत्मा का ऐसा अध्याय बन गया जिसे मिटाया नहीं जा सकता।”
वाराणसी की दालमंडी इन दिनों इतिहास के एक और मोड़ पर खड़ी है। प्रशासनिक कार्रवाई रोज़ बदल रही है। चेहरे वही हैं, लेकिन बाज़ार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कुछ ही दिनों में दालमंडी अपने नए रूप में सामने आएगी, लेकिन उसके भीतर दफ्न कहानियां आज भी उतनी ही जिंदा हैं। इन कहानियों में एक नाम बार-बार उभरकर आता है-महात्मा गांधी और दालमंडी की तवायफें।
स्थानीय कारोबारी नदीम कहते हैं, “यह वही दालमंडी है, जो केवल व्यापार या भीड़ का इलाका भर नहीं था। यह तहजीब का इलाका था, कला की प्रयोगशाला था और संगीत की छाया में पलने वाली पीढ़ियों का घर था। दालमंडी के कारोबारी दिलशाद अहमद करते हैं, “दालमंडी जल्द ही बदलकर एक नए रूप में सामने आएगी, लेकिन इसके भीतर छुपा इतिहास, वो रूठना, वो तानपुरों का गंगा में बह जाना-ये सब इस शहर की नसों में हमेशा धड़कता रहेगा।”
दालमंडी गली को सड़क में परिवर्तित किए जाने का स्थानीय लोग कड़ा विरोध कर रहे हैं।
चंदौली के सांसद वीरेंद्र सिंह कहते हैं, “बनारस की इस जीवित संस्कृति को संरक्षित करने की बजाय सरकार विकास के नाम पर उसे विध्वंस के रास्ते पर धकेल रही है। दालमंडी की तंग गलियों में छिपे ये सांस्कृतिक अध्याय सिर्फ इमारतें नहीं, शहर की आत्मा थे। इन्हें गिराना सिर्फ ईंटों को गिराना नहीं, बल्कि उस इतिहास को मिटाना है जो बनारस को बनारस बनाता है। विकास तो होना चाहिए, लेकिन विकास ऐसा नहीं होना चाहिए जो हमारी जड़ों को उखाड़ दे।“
वाराणसी विकास प्राधिकरण इन दिनों विश्वनाथ धाम के पास मुस्लिम बहुल दालमंडी इलाके में उन संरचनाओं को तोड़ने में जुटा जिन्हें ‘अवैध’ घोषित किया गया था। यह तोड़फोड़ 224 करोड़ रुपये की उस परियोजना का हिस्सा है जिसके तहत 17.5 मीटर चौड़ी सड़क बनाकर मंदिर तक पहुंच आसान बनानी है।
दूसरी ओर, दालमंडी के लोगों का दर्द यह है कि यह सिर्फ एक चौड़ीकरण परियोजना नहीं। एक पूरे समुदाय की चिंता, असुरक्षा और संघर्ष की कहानी है, जिसका अंत अभी लिखा जाना बाकी है।
क्यों नहीं टूटनी चाहिए दालमंडी ?
दालमंडी गली सिर्फ ईंट-पत्थरों से नहीं बनी थी। यहां कला सांस लेती थी, विरह सुर बनकर बहता था, और मोहब्बत दुनिया को भुला देने का हौसला देती थी।
यही वह ठौर है जहां गौहर जान का इश्क़ पनपा-वही गौहर जान जिसे महलों की चाह न थी, बस कचौड़ी गली के मोड़ पर खड़े असलम को एक झलक देख लेना ही उसका मुकम्मल प्रेम था। कोई वादा नहीं, कोई खत नहीं-बस दीदार की ख़ामोश तड़प। इश्क़ का वह मासूम रूप, जो आज की दुनिया में शायद किसी कहानी की तरह ही बचा है।
दालमंडी कोई आम गली नहीं; यह समय की तहों में दबी इबारत है, जहां मोहब्बत भी दास्तान है, संगीत भी इबादत, और संघर्ष भी विरासत। यहां से गुजरते हुए ऐसा लगता है जैसे किसी जीवंत संग्रहालय में कदम रख दिया हो-हर मोड़ कोई राग छेड़ देता है, हर दहलीज़ कोई किस्सा सुनाती है।
दरअसल, दालमंडी गली संगीत का मंदिर थी। यहां आवाज़ें पूजा बन जाती थीं और प्रेम-एक तपस्या। घुंघरुओं की झंकार मोक्ष की पुकार बन जाती थी। यही वह दुनिया थी जहां सुरों की रानी गौहर जान ने अपने इश्क़ को विरह में बदलते देखा।
आज भले ही यह गली अपने पुराने शबाब से दूर हो चुकी हो, लेकिन इसके सन्नाटे में अब भी वे सुर गूंजते हैं जो कभी ठुमरी, दादरा, कजरी और ग़ज़ल की महफिलों में जीवन पाते थे। यही वह जगह थी जहां सूरज ढले बिना रियाज़ पूरा नहीं होता था और सांझ होती नहीं कि महफिलें सज जाती थीं। यहां जन्मीं उन अनगिनत गुमनाम आवाज़ों की रूहें आज भी बनारस की हवाओं में घुली हैं, जिन्हें मंच भले न मिला, मगर जिनकी तानें अब भी शहर की आत्मा में गूंजती हैं।
लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने अपनी पुस्तक ‘चंदन किवाड़’ में इस प्रेम कथा को जिस गहराई से रचा है, वह साहित्य नहीं, इतिहास का संगीत है। दालमंडी की यह चमकती–धड़कती दुनिया कलाकारों, उस्तादों और महफिलों के उत्थान-पतन की ऐसी दास्तानों से भरी है, जिन्हें सुनकर लगता है कि कलाकारों की किस्मतें भले अलग हों, दर्द और तड़प सबकी एक ही रही। मुस्कुराते चेहरों के पीछे अनगिनत चीखें, तालियों के पीछे अनकही उदासियां-सब कुछ।
यहीं रहती थीं बनारस वाली गौहर जान…, वह नहीं जिन्हें कलकत्ता की पहली रिकॉर्डिंग कलाकार के रूप में जाना जाता है, बल्कि वह गौहर जो रोज़ शाम पालकी से निकलकर कचौड़ी गली में खड़े असलम को एक मुस्कान दे देती थीं और आगे बढ़ जाती थीं। बस इतना ही उनका इश्क़ था-न कोई दावा, न कोई लौटने का वादा।
असलम एक क्रांतिकारी था और एक दिन अचानक गायब। अंग्रेजों ने मिर्ज़ापुर में पकड़ा और फांसी पर चढ़ा दिया। गौहर टूट गईं। उनकी पीड़ा सुर बनकर फूट पड़ी, “मिर्ज़ापुर कइला गुलज़ार हो, कचौड़ी गली सून कइला बलमु…“
यह सिर्फ कजरी नहीं-एक प्रेमिका की चीख है। एक तवायफ की तड़प, एक कलाकार की आत्मा की हवेली। जब बालकृष्ण कलाकार इसे बजाते थे, तो खुद भीग पड़ते, क्योंकि वे जानते थे यह राग नहीं, एक समाधि है। मालिनी कहती हैं, “जब मैं इसे गाती हूं तो हर सुर में गौहर की हूक, हर ताल में असलम की अधूरी मुस्कुराहट उतर आती है। आंखें बंद हों तो ऐसा लगता है कि वही कचौड़ी गली, वही दालमंडी, वही इंतज़ार-सब मेरे सामने खड़े हैं।”
थरथरा रही दालमंडी की आत्मा
काशी विश्वनाथ धाम के सुंदरीकरण ने भले ही कुछ स्थानों को चमका दिया हो, पर उस चमक में दालमंडी का स्वर मिटने लगा है। यह वह बाजार था जहां खरीद-बिक्री से ज़्यादा पहचान और रिश्ते सांस लेते थे। ईद की सेवइयों की खुशबू, होली के रंग, मुहर्रम के मातमी गीत, दीपावली की उजास। सब यहां एक साथ झिलमिलाते थे।

अब वही गलियां किसी अनकहे डर की तरह खामोश हैं। दालमंडी की आत्मा थरथरा रही है। जहां कभी तबले की थाप पर हवेलियां झिलमिलाती थीं, जहां कभी सुरों की बारात उतरती थी, वहां अब खामोशी धूल की परत ओढ़े बैठी है।
रसूलनबाई का कोठा जला, लेकिन उनकी ठुमरी नहीं बुझी। विद्याधरी बाई की आवाज़ें आज भी हवा में घुली हैं। दालमंडी टूटी हुई पहचान की गाथा है। जहां ईंटें नहीं, भावनाएं गिराई जा रही हैं। जहां व्यापार नहीं, विरासत को उजड़ा जा रहा है। त्योहारों की साज-सज्जा भले आज भी बिकती हो, पर दालमंडी खुद सज नहीं पाती।
वसीम अंसारी कहते हैं, “त्योहार अब सामान बेचने का बहाना रह गए हैं, पहले वो हमारे भीतर उतरते थे। दालमंडी को मिटाना सिर्फ एक गली को मिटाना नहीं-यह बनारस की धड़कन रोक देना है। यह मोहब्बत, तहज़ीब, संस्कृति और सह-अस्तित्व की हत्या है-धीरे, चुपचाप। दालमंडी में जब बुल्डोज़र बढ़ता है तो लगता है कि गौहर फिर अपने रेशमी आंचल में चेहरा छुपाकर रो पड़ी हो। आज दालमंडी रो रही है-इसकी दीवारों पर लिखे लाल निशान ज़ख्म हैं।”
बनारस के पत्रकार ऋषि झिंगरन कहते हैं, “बनारस में एक पूरी तहज़ीब दर्द से कराह रही है। लेकिन बनारस के लोग चुप हैं।ठीक वैसे ही जैसे कारिडोर के निर्माण के समय बनारस की ऐतिहासिक गलियों का वजूद मिटाया जा रहा था। दालमंडी को बचाना किसी धर्म की लड़ाई नहीं, यह भावनाओं की लड़ाई है। संवाद की लड़ाई है। सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई है।
हमें तय करना है कि हम बनारस को वह बनारस मानते हैं जो गलियों में जीता था या वह बनारस चाहेंगे जो नक्शों में चमकता हो पर आत्मा खो चुका हो।”
“सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इश्क़ मिटाया जा सकता है? क्या सदियों का रियाज़ बुल्डोज़र की आवाज़ में दब सकता है? शायद नहीं, क्योंकि जहां दर्द होता है, वहीं से इतिहास जन्म लेता है और दालमंडी अब इतिहास बनने की दहलीज़ पर खड़ी है। हर बनारसी की आंखों में एक चुभन है-क्या विकास का मतलब मिटाना है? क्या शहर की आत्मा को कुचलकर ही काशी सुंदर बनेगी?”
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)