मुख्य न्यायाधीश की भावना से अलग है वास्तविकता

महा प्रसाद

मुख्य न्यायाधीश द्वारा यह कहा जाना कि वे सबसे गरीब और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के लिए आधी रात तक अदालत में बैठ सकते हैं, सुनने में आश्वस्त करने वाला लगता है, लेकिन जब इस विचार को वास्तविक न्यायिक ढांचे की पूरी यात्रा में रखा जाता है, तो कई ऐसे पहलू सामने आते हैं जो इस भावनात्मक घोषणा की प्रभावशीलता पर बुनियादी प्रश्न खड़े कर देते हैं।

न्यायिक प्रक्रिया की शुरुआत ट्रायल कोर्ट से होती है, जहाँ गरीब व्यक्ति के मुकदमे अक्सर वर्षों तक लंबित पड़े रहते हैं। इसी प्राथमिक स्तर पर ही उसकी आर्थिक क्षमता, सामाजिक स्थिति और कानूनी संसाधनों की कमी उसे कमजोर बना देती है।

अगर किसी तरह वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मामला आगे बढ़ता भी है, तो हाई कोर्ट की सीढ़ी उतनी ही कठिन दिखाई देती है—खर्च अधिक, प्रक्रिया जटिल और प्रतीक्षा और भी लंबी। इस यात्रा में व्यक्ति अक्सर हताश हो जाता है और न्याय की राह में ही टूटने लगता है।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने की संभावना तो वैसे ही बहुत सीमित है, क्योंकि यह स्तर आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों के लिए लगभग पहुंच से दूर बन चुका है। अनेक मामलों में विशेषज्ञ वकीलों की फीस, लंबी तारीखें, तकनीकी औपचारिकताएँ और अपील की महंगी प्रकृति के कारण वही लोग शीर्ष अदालत तक पहुँच पाते हैं जिनके पास पर्याप्त साधन हैं।

ऐसे में यह सहज सवाल उठता है कि आधी रात तक अदालतें खुलने का लाभ वास्तव में किस वर्ग तक पहुँच पाएगा, जब उस वर्ग तक पहुँचने की मूल सीढ़ियाँ ही गरीब व्यक्ति के लिए लगभग बंद हैं।

न्यायिक प्रक्रिया की यही लंबी खिंचती अवधि—बीस–बीस वर्षों तक चलने वाले ट्रायल, फिर अपील, फिर विशेष अनुमति याचिका—सबसे गरीब व्यक्ति के लिए न्याय को उपलब्ध कराने से पहले ही उसकी सहनशक्ति खत्म कर देती है। न्याय की देरी ही उसके लिए सबसे बड़ी सज़ा बन जाती है। इसलिए केवल देर रात अदालत खोल देने से न्याय सुलभ नहीं होता, क्योंकि सुलभता का प्रश्न अदालत के समय से अधिक पूरी प्रणाली की संरचना से जुड़ा है।

यदि वास्तव में अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक न्याय पहुँचाना उद्देश्य है, तो सबसे पहले न्यायालयों में लंबित मुकदमों को कम करना, ट्रायल की गति तेज करना, विधिक सहायता को प्रभावी और व्यवहारिक बनाना, और न्यायिक प्रक्रियाओं को सरल और सस्ता बनाना आवश्यक है। डिजिटल साधनों से पहुँच बढ़ाना भी तभी उपयोगी है जब व्यक्ति मूलतः न्यायिक प्रक्रिया में प्रवेश कर पाए। इन बुनियादी सुधारों के बिना केवल प्रतीकात्मक कदम वास्तविक न्याय नहीं देते।

और एक बात जो इस पूरे विमर्श में अत्यंत महत्वपूर्ण है—यदि एक सर्वेक्षण यह दिखा दे कि सुप्रीम कोर्ट में आने वाले मामलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का प्रतिशत कितना नगण्य है, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि न्यायिक ढांचा किसे अधिक अवसर देता है और कौन सबसे अंत में छूट जाता है। ऐसे तथ्य स्वयं यह निर्धारित कर देंगे कि रात में अदालतें खुलने से लाभ किस तक पहुँचता है और किस तक नहीं।

इस समूची पृष्ठभूमि में मुख्य न्यायाधीश की भावना जितनी संवेदनशील लगती है, वास्तविकता उतनी ही अलग दिखाई देती है। न्याय की राह में खड़ी बुनियादी रुकावटें जस की तस हैं, और जब तक यह ढांचा गरीब और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के अनुकूल नहीं बनता, तब तक अदालतों का देर रात खुलना भी उसी वर्ग को अधिक सुविधा देगा जिसके पास पहले से संसाधन हैं, जबकि जिन्हें वास्तव में न्याय की ज़रूरत है, वे शुरुआत की सीढ़ियाँ ही पार नहीं कर पाते।

(महा प्रसाद की टिप्पणी उनकी फेसबुक पोस्ट से साभार। महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।

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