चैनल-चैनल में इमरान खान की खबरें हैं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की कारगुजारियों की, पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को जेल में रखने, सैकड़ों दिन से उन्हें अपनी पार्टी के नेताओं, वकीलों और अपनी बहन तक से नहीं मिलने देने, उन्हें मरणांतक यातनाएं देने, उन्हें पागल घोषित करने, उन्हें पाकिस्तान का काला पानी कही जाने वाली जेल में शिफ्ट करने और प्रकारांतर से पड़ोसी देश के लोकतंत्र-विरोधी होने की खबरें हैं।
पाकिस्तान में सेना का अगली सीट पर होना लगभग नियम है, पिछले 78 साल से, चाहे प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर भुट्टो, नवाज शरीफ, जफरुल्ला खान जमाली, शौकत अजीज, शाहबाज शरीफ कोई भी रहे हों। और 1956 से हुए 17 राष्ट्रपतियों में से करीब एक चौथाई तो सेना से ही रहे हैं। राष्ट्रपतियों के 69 सालों में से 30 साल जनरल अयूब खान, जनरल याहिया खान, जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ ने बिताये। अयूब खान और परवेज मुशर्रफ तो अपने राष्ट्रपतित्व काल के उत्तरार्द्ध में कहने को लोकतांत्रिक तरीके से चुने भी गये थे।
इमरान खान तो अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी नहीं हैं। पहले कभी थे, जैसे हमारे देश में जवाहरलाल नेहरु थे, जो इतना कुछ गलत कर गये कि दशक भर से साहेब की, उनके चाणक्य की सरकार लगी है उन्हें ठीक करने, उन्हें दुरुस्त करने में। इंदिरा गांधी पीएम थीं, इसलिए कि नेहरु की बेटी थीं। मनमोहन सिंह थे, तो इसलिए थे कि इंदिरा गांधी के बेटे ने इटली से ब्याह कर उसे लाया था और अपने प्रधानमंत्री-पति के मारे जाने के बाद सोनिया गांधी को सत्ता, प्रकारान्तर से ही सही, अपने पास रखनी थी।
इसे ही ‘परिवारवाद’ कहते हैं। परिवारवाद का मतलब ‘नेहरु—इंदिरा—राजीव—राहुल’ है, ‘पीयूष गोयल—धर्मेंद्र प्रधान—ज्योतिरादित्य सिंधिया—मेनका गांधी और वरुण गांधी—पंकज सिंह—दीया कुमारी—ज्योति मिर्धा—दुष्यंत सिंह—अनुराग ठाकुर—विजय गोयल—प्रवेश वर्मा—बांसुरी स्वराज—हरीश खुराना—पूनम महाजन—राव इंद्रजीत सिंह—नवीन जिंदल—पंकजा मुंडे और प्रीतम मुंडे—नितिन नवीन—सम्राट चौधरी—सिद्धार्थनाथ सिंह—रीता बहुगुणा जोशी—सुरेंद्र पटवा—आकाश विजयवर्गीय—भरत पटेल—शुभेंदु अधिकारी—आदि—आदि—आदि’ को नहीं। आदि-आदि इसलिए कि केंद्र या राज्यों में मुख्यमंत्री-मंत्री रहे, प्रदेश अध्यक्षों, संसद या विधानसभा-विधान परिषद सदस्य रहे साहेब और उनके चाणक्य की ‘प्राइवेट लिमिटेड पार्टी’ के प्रमुख नेताओं के नजदीकी रिश्तेदारों के नामोल्लेख का मतलब होगा सैकड़ों नामों का उल्लेख।
प्रसंगवश गृहमंत्री अमित शाह के पुत्र जय शाह अंतर्राष्ट्रीय और भारत के क्रिकेटिंग प्रतिष्ठान आईसीसी और बीसीसीआई के प्रमुख और दिवंगत वित्तमंत्री अरुण जेटली के पुत्र रोहन जेटली दिल्ली एवं जिला क्रिकेट एसोसियेशन के अध्यक्ष हैं। ध्यान रहे कि इसे भी परिवारवाद नहीं कहते और अकारण नहीं कि पीएम, उनके चाणक्य और कई अन्य प्रमुख नेता भी गाहे—बगाहे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, द्रमुक तथा अन्य विपक्षी दलों पर परिवारवाद का आरोप लगाते रहे हैं। और लोकतांत्रिक चुनावों में तीन बार पीएम बनीं ‘परिवारवादी कांग्रेस’ की इंदिरा गांधी ने 1975 में संवैधानिक आपातकाल भी लगाया था, यद्यपि लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के बाद मार्च 1977 में श्रीमती गांधी ने चुनावों की घोषणा कर दी थी।
उस चुनाव में इंदिरा गांधी की पार्टी बुरी तरह पराजित हुई थी, यद्यपि कमाल यह है कि कुख्यात आपातकाल के बाद भी छठी लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस को 154 सीटों पर जीत मिली थी, जो 2014 में पार्टी को मिली सीटों से 110 और 2019 के चुनावों में मिली सीटों से 102 सीटें अधिक थीं। वैसे तब न तो सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन की प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यों की चयन समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता के साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने का आदेश दिया था, न केन्द्र सरकार ने मुख्य न्यायाधीश की जगह पीएम द्वारा नामजद, उनके मंत्रिमंडल के ही एक मंत्री को शामिल कर मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन, हर बार अपनी पसंद से करने की विधायी व्यवस्था की थी।
अजीब यह भी है कि इमरजेंसी लगाने से ठीक पहले, 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लोकसभा में इंदिरा गांधी की सदस्यता इस आधार पर खारिज कर दी थी कि उनके ओएसडी यशपाल कपूर ने, गो 13 जनवरी 1971 को ही इस्तीफा दे दिया था, पर 25 जनवरी 1971 को इस्तीफा मंजूरी से पहले उन्होंने इंदिरा गांधी के लिए चुनाव प्रचार किया था। और रायबरेली के जिला मजिस्ट्रेट, एस.पी. और उत्तर प्रदेश के गृह सचिव ने चुनाव-प्रचार स्थल की घेराबंदी की थी, मंच बनाया था, लाउडस्पीकर लगाया था और न्यायालय ने जन-प्रतिनिधित्व कानून 1951 के तहत इंदिरा गांधी को इस सबके लिए ‘भ्रष्ट आचरण’ का दोषी पाया था। अजीब इसलिए कि उस जन—प्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन तो कई बार किये गये, 2014 से पहले भी
और पिछले एक दशक में भी, पर ‘भ्रष्ट आचरण’ संबंधी प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं किये जाने के बाद भी अब वह सब ‘भ्रष्ट आचरण’ नहीं माना जाता और उन आरोपों पर तो छोड़िये, आचरण संहिता के लागू रहते सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टियां अब मतदाताओं के खातों में हजारों रुपये तक डालने लगी है। अब इस सबके लिए पीएम और उनके चहेतों की सदस्यता खारिज नहीं होती। सर्वशक्तिमान होने और केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि हर तरह के विरोधियों को डराने—धमकाने के लिए भी अब आपातकाल लगाने की कोई जरूरत ही नहीं।
आपातकाल में तो राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाला गया था, हर आम—ओ—खास को नहीं, विरोध कर रहे अधिकारियों पर सरकार के तमाम प्रतिष्ठान नहीं छोड़ दिये गये थे। इंदिरा गाांधी के दौर में एक देवकांत बरुआ होता था, अब अनेक हैं। अब सरकार ही, उसके मुखिया ही राष्ट्र हैं। उनका विरोध ही राष्ट्रद्रोह है। इन हालातों में इंदिरा गांधी की तरह कोई आखिर क्यों आपातकाल की घोषणा करने की मूर्खता करे?
रूस ने इसकी घोषणा नहीं की, इजरायल ने भी नहीं। पर पिछले साल फरवरी में ही रूस के विपक्षी नेता नेवेल्नी की मौत/हत्या की बात किसे याद है? फलस्तीनी अस्पतालों और शिशुओं तक पर इजरायल के दैनंदिन के हमले तो अब भी जारी हैं, पर इनकी भी किन्हें परवाह है? ये सब भी अतीत हो चली हैं, वैसे ही जैसे जल्द ही देश भूल जायेगा कि लोकसभा में चुनाव सुधारों पर चर्चा में विपक्ष के नेता ने तीन सवाल उठाये थे कि आखिर चुनाव आयुक्तों की चयन-कमेटी में देश के मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर केंद्र के ही एक मंत्री को नामजद करने का विधायी प्रावधान क्यों किया गया, कि मुख्य और अन्य चुनाव आयुक्तों को किसी भी तरह के आपराधिक मामले से मुक्ति देने का कानून बना देने और चुनावों की वीडियो रिकार्डिंग साल भर की बजाय केवल 45 दिनों में डिलीट कर देने की चुनाव आयोग की व्यवस्था का सबब क्या था? गाजा में तुरंत, बिना शर्त और दीर्घकालिक शांति के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मतदान में भारत के ‘एब्स्टेंशन’ के बावजूद इजरायल से और बेंजामिन नेतन्याहू से हमारे रिश्ते कैसे हैं, यह किससे छिपा है? और पुतिन से भी? बल्कि वह तो अभी—अभी भारत का दौरा कर, लौटे हैं।
हमारा मीडिया ये सारे सवाल नहीं उठायेगा। अब तो खबरों का ऐसा टोटा भी नहीं कि हर चैनल को केवल बरेली, झुमरीतलैया, अमरोली, ककतोआ, फ्रांस में हरतोल, इटली में जकतो, रूस में विलितोवा, ब्राजील में बोलोग्ना, अजरबैजान, जर्मनी, भूमध्य सागर जैसी जानी—अजानी जगहों में बाढ, सूखा जैसी छोटी—बड़ी प्राकृतिक आपदाएं ही नहीं, बड़ी—छोटी नदियों में किसी छोटे—बड़े व्यक्ति के अकेले या किसी के साथ, समूह में डूब जाने या डूबते—डूबते बच जाने, किसी हमले में उसके मारे जाने या पैर, हाथ, पीठ, गला या कोई और अंग—भंग हो जाने, मतलब मरते—मरते बच जाने, शराबी शिक्षक ने बच्चों को पढ़ाये फिल्मी गाने, बुजुर्ग के पत्थर मारने पर सांड ने उसे पटका, श्रीभूमि, असम में हिन्दू रीति—रिवाज से कुत्ते का अंतिम संस्कार, वीडियो वायरल या देश-विदेश में किसी छोटी-बड़ी दुर्घटना में ही किन्हीं व्यक्तियों के मामूली या गंभीर रूप से घायल हो जाने या मारे जाने की ही खबरों का आसरा हो।
भले समाचार बुलेटिन 3 मिनट में 20 या 7 मिनट में 100 खबरों की हो। पड़ोसी पाकिस्तान की, उसके अलोकतांत्रिक होने की, वहां सेना-प्रमुख के सर्वशक्तिमान होने और सत्ता के हर अंग के, उसकी धुन पर थिरक उठने का समाचार हो तो फिर क्या कहने! हर बुलेटिन में 10/12/15 राजनीतिक खबरों के ‘सेग्मेंट’ को साहेब की विदेश—यात्राओं या चुनाव-यात्राओं या उद्घाटनों—झंड़ी दिखानों, घोषणाओं, भाषणांशों आदि या साहेब के किसी चहेते, या उनके चहेते के चहेते केंद्रीय या प्रादेशिक मंत्री के वक्तव्यों और कभी—कभार एल.ओ.पी. या किसी अन्य विपक्षी नेता या विपक्ष की किसी पार्टी की कुछेक भर्तस्नाई समाचारों से भरने की कोई जहमत ही नहीं।
इमरान खान हैं तो मजे हो गए हैं गोदी मीडिया के। उस पर एक तरफ जनरल आसिम मुनीर के ‘डार्क हंट’ की खबरें हैं, इमरान की बहनों पर ‘केमिकल अटैक’ की और इमरान की राजनीतिक पार्टी पी.टी.आई. के कार्यकर्ताओं—समर्थकों पर ‘वाटर कैनन’ की खबरें हैं। जनरल मुनीर के हाथ से मुल्क के फिसलने की भी खबर है। और दूसरी तरफ, हमारे ‘गोदी’ पर इमरान खान की दोनों बहनों से बातचीत है, इंग्लैंड से इमरान खान के दोनों बेटों — कासिम और सुलेमान खान — के इंटरव्यू हैं, 2023 से जेल में बंद इमरान की पत्नी जेमिमा गोल्डस्मिथ के आरोप हैं। अडियाला जेल के बाहर इमरान समर्थकों की लगातार बढ़ती जा रही भीड़ है, उनके नारे हैं — जेल के ताले टूटेंगे.., हम जुल्म मिटाने आये हैं..। यहां तक कि भारत के, खासकर गोदी चैनलों में दूसरे कारणों से कुख्यात ‘हम क्या मांगते? आजादी।’
बस, इस नारे पर, यह नारा लगाने वालों — कन्हैया कुमार, उमर खालिद और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों पर तमाम ‘गोदी’ की कम—ज्यादा आक्रामकता नहीं थी।
(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)