अभी हाल ही में सम्पन्न बिहार विधानसभा चुनाव में साल में एक करोड़ रोजगार की गारंटी जैसे बड़े-बड़े वायदे करने वाली दो इंजन की सरकार को जीत मिली। जीत के तुरंत बाद केंद्र सरकार ने पहला हमला रोजगार पर ही बोला है। अब तक जारी मनरेगा योजना को एक तरह से खत्म करने के लिए सरकार ने नया विधेयक तैयार किया है।
जिस विधेयक के बारे में नोबेल पुरस्कार विजेता जोसेफ स्टिगलिट्ज ने कहा था, “मनरेगा भारत का एकमात्र सबसे बड़ा मौलिक कार्यक्रम है और पूरी दुनिया को इससे सीखना चाहिए।”
उस मनरेगा में सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यों द्रेज के अनुसार केवल नामांतरण नहीं किया जा रहा है, यह सुधार नहीं खात्मा है। इस समय 12 करोड़ से अधिक सक्रिय कामगार इस योजना के तहत रजिस्टर्ड हैं।
यह विडंबना है कि एक ऐसे दौर में जब देश में बेरोज़गारी रिकॉर्ड स्तर पर है, उधर ट्रंप की नीतियों से इसके भयावह ढंग से बढ़ने के आसार हैं और एआई से करोड़ों रोजगार खत्म होने की चर्चा हो रही है,उस समय मोदी सरकार ने ग्रामीण मजदूरों की रोजगार गारंटी योजना को खत्म करने का फैसला किया है।
वैसे सरकार का दावा है कि वह योजना को खत्म नहीं कर रही है बल्कि केवल नाम बदलने के साथ मजदूरों के पक्ष में कुछ सुधार कर रही है। मसलन 100 दिन की जगह 125 दिन की गारंटी। जब कि सच्चाई यह है कि अभी ही सरकार 100 दिन का रोजगार नहीं दे पा रही है। ऐसे में 125 दिन की गारंटी की बात मजदूरों के लिए लॉलीपॉप से अधिक कुछ नहीं है।
कहां तो जरूरत इस बात की थी कि मनरेगा की तर्ज पर शहरी बेरोज़गारी के लिए भी कानून बनाया जाता, काम के अधिकार को संवैधानिक मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाता और मनरेगा मजदूरों की मजदूरी बढ़ाई जाती ताकि उनके जीवन स्तर में सुधार होता। लेकिन यह सब करने के बजाय, मोदी सरकार उल्टी ही दिशा में चल पड़ी। उसने मौजूदा मनरेगा को ही खत्म करने की योजना बना डाली।
दरअसल 2014 के बाद संसद में मोदी ने अपने भाषण में इसका संकेत कर दिया था। हालांकि इसे कांग्रेस की भव्य असफलता का स्मारक बताते हुए उन्होंने इसे जारी रखने का ऐलान किया था।लेकिन वे इसे जारी रखते हुए भी खत्म करने का सही समय और अवसर का इंतजार करते रहे।
वैसे तो शेक्सपियर कह कर गए हैं कि नाम में क्या रखा है लेकिन मोदी सरकार ने जिस तरह महात्मा गांधी के नाम को योजना से हटाया है, यह गांधी जी के खिलाफ उसकी चिर संचित नफरत का ही नतीजा लगता है। यह सर्वविदित है कि संघ परिवार गांधी की उपस्थिति को अपने हिन्दू राष्ट्र के मिशन में सबसे बड़ी बाधा मानता रहा है।
मगर गांधी को भौतिक रूप से एलिमिनेट करने के बाद भी वे हिंदू मुस्लिम भाईचारे के सबसे बड़े प्रतीक बने हुए हैं, इसलिए सत्ता पर काबिज हिंदुत्व कॉर्पोरेट की फासीवादी ताकतें उन्हें बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं और उनका नामोनिशान मिटा देने पर आमादा हैं।
इसलिए योजना में से उनका नाम हटाकर उसमें जी राम जी लाया गया है। कहने की जरूरत नहीं कि गांधी को हटाने के लिए राम का नाम जोड़ने की कवायद की गई है। आखिर यहां भी मोदी धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल से बाज नहीं आए।
बहरहाल नाम बदलने के सवाल से अधिक महत्वपूर्ण है काम में बदलाव। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है योजना के लिए धन के बंटवारे का सवाल। अब तक योजना के लिए लगने वाले धन के 90% खर्च की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की थी और राज्य सरकारें 10% खर्च करती थीं। लेकिन अब नए प्रावधान के अनुसार कुल खर्च का मात्र 60% केंद्र खर्च करेगा और40% राज्य खर्च करेंगे।
जबकि वस्तुस्थिति यह है कि राज्य सरकारें पहले से ही लाखों करोड़ के कर्ज में डूबी हुई हैं। जाहिर है यह बोझ उनके लिये उठा पाना बेहद कठिन होगा, परिणामस्वरूप राज्य इसको लागू करने के प्रति अनुत्साहित होंगे, जिससे मजदूरों का ही अंततः नुकसान होगा।
दरअसल यह राज्यों और संघीय ढांचे पर सीधा कुठाराघात है। जीएसटी समेत तमाम टैक्स केंद्र सरकार के खजाने में ही जाता है। उसमें से भी राज्य का तय हिस्सा भेदभाव के साथ मुश्किल से ही मिल पाता है। ऐसी स्थिति में राज्यों के ऊपर बोझ बहुत बढ़ जाएगा। इसमें ग्राम पंचायतों की भी भूमिका कम हो जाएगी।
वैसे पूर्वोत्तर भारत,जम्मू कश्मीर, केंद्र शासित प्रदेशों को इस प्रावधान से अलग रखा गया है। इस अधिनियम के अनुसार केंद्र सरकार जहां आवश्यक समझती है, वहीं पैसे देगी। इस तरह यह कहा गया है कि खेती के मौसम में सरकार द्वारा पैसा देने से खेती के लिए मजदूर नहीं मिल पाते। इसका परिणाम मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी पर पड़ेगा क्योंकि योजना का काम बंद होने से मजदूरों की मोल भाव की क्षमता खत्म हो जाएगी।
कोविड की महामारी के दौरान शहर से गांव लौटे करोड़ों मजदूरों के लिए यह योजना जीवन रेखा साबित हुई थी। उस समय एक लाख ग्यारह हजार करोड़ का इस मद में आबंटन हुआ था। दरअसल इस नई योजना का वही हश्र होगा जो आदर्श प्रधानमंत्री ग्राम योजना का हुआ था जिसका अब लोगों को नाम भी याद नहीं है।
विपक्ष के संसद सदस्यों ने सड़क पर उतर कर इसका विरोध किया है। गौर तलब है कि मनरेगा चुनाव के समय बांटी जाने वाली रेवड़ी नहीं थी, यह सशक्तिकरण की दिशा में हासिल खेतिहर मजदूरों का संवैधानिक अधिकार था। यह तय है कि उस अधिकार को छीनकर समाज के सबसे गरीब तबकों के पेट पर लात मारने की भारी राजनीतिक कीमत मोदी और भाजपा को चुकानी पड़ेगी।
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)