जब से केंद्र सरकार द्वारा “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 (मनरेगा)” को समाप्त कर, इसकी जगह एक नया कानून “विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)” जिसका “शॉर्ट फार्म” वीबी जी राम जी है, जो दोनों सदनों में पास हो चुका है। तब से देश के मजदूर संगठनों और सामाजिक संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। इस नये कानून के तमाम पहलूओं और इस कानून के निहितार्थ पर देश भर में चर्चा छिड़ गई है।
कहना ना होगा कि जब से मोदी सरकार केंद्र की सत्ता में आई है, देश की बेरोज़गारी, महंगाई, भुखमरी आदि मूल समस्याओं से इतर केवल व्यवस्था में बदलाव करती रही है। इसी बदलाव का यह भी एक हिस्सा है जो इस बात का संकेत है कि यह बदलाव आगे चलकर कुछ और गुल खिलाने वाला है।
संभवतः मोदी सरकार द्वारा गांधी के नाम और चेहरे को राष्ट्रीय पटल से मिटाने का अगला कदम भी हो सकता है। मनरेगा योजना के इस कदम की सफलता के बाद सम्भवतः रुपयों पर से गांधी का चेहरा भी हटाया जा सके।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) हर परिवार को जॉब कार्ड के साथ 100 दिनों के काम की गारंटी देकर, गांवों में बेरोज़गारी, गरीबी और अचानक प्रवास जैसी समस्याओं को हल करने के उद्देश्य के साथ लाई गई थी।
साल 2006 में शुरू की गई यह मनरेगा योजना एक अधिकार-आधारित कानून है जो कानूनी रूप से अकुशल मजदूरों को काम करने का अधिकार देती है। यह योजना ग्रामीण भारत के किसी भी कामकाजी उम्र के व्यक्ति को बुनियादी आय प्रदान करती है, ख़ासकर जहां लोगों के पास काम के स्थाई अवसर नहीं होते हैं।
वहीं मनरेगा में महिलाओं और लैंगिक मुद्दों से संबंधित विषयों पर बात करें तो यह योजना लैंगिक समानता, सामाजिक ताक़त के समीकरण, आय पर नियंत्रण, कठिन परिश्रम, आने-जाने की आजादी के साथ ग्रामीण और घरेलू दोनों स्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता और सार्वजनिक नेतृत्व को आधार देती है। आंकड़े बताते हैं कि मनरेगा के अंतर्गत महिलाओं का श्रमबल में हिस्सा पूरे भारत में 57.43 प्रतिशत हैं और यह संख्या 2020-21 को छोड़कर लगातार बढ़ी है।
कहना ना होगा कि गांवों में मजदूर वर्गों का एक विशेष वर्ग जो सामाजिक स्तर पर पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और आदिवासी समुदाय से आता हैं। कभी बड़े व मंझले किसानों और सामाजिक दबंगों के रहमोकरम पर निर्भर हुआ करता था, यह वर्ग जब से मनरेगा योजना आई तब से स्वतंत्र व स्वैच्छिक रूप से अपनी आजीविका चलाता रहा। दूसरी तरफ इन परिवारों की महिलाएं भी मनरेगा योजना आने के बाद स्वतंत्र व स्वैच्छिक रूप से काम करने को उत्सुक रहीं।
उल्लेखनीय है कि मजदूर संगठन कई वर्षों से एक राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून की मांग करते रहे थे। इस मुद्दे को लेकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर राष्ट्रीय राजधानी तक के स्तर पर सार्वजनिक चर्चा की गई थी। ऐसे में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून के प्रारूप पर चर्चा हुई और जागरूक नागरिकों ने 1 सितम्बर 2004 को एक प्रारूप बनाया। जो 7 सितंबर 2005 को विधान द्वारा अधिनियमित किया गया।
हालांकि, इसे 2 फ़रवरी, 2006 को हरियाणा के महेंद्रगढ़ और सिरसा ज़िले की सभी ग्राम पंचायतों में शुरू किया गया था। जिसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के नाम से जाना जाता है। इसे 1 अप्रैल, 2008 तक पूरे देश में लागू कर दिया गया था।
बताना जरूरी हो जाता है कि देश के मेहनतकश वर्ग को कार्पोरेट पोषित सत्ता द्वारा पहले ही नयी चार श्रम संहिताएं लागू करने और संविधान विरोधी ‘नयी श्रमशक्ति नीति 2025’ पेश करने के बाद, अब केंद्र की मोदी सरकार “विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)” कानून के जरिये लगभग 30 करोड़ ग्रामीण मेहनतकश जनता से साल में न्यूनतम 100 दिन काम पाने का अधिकार छीन रही है।
बता दें कि अनुच्छेद 39(क) और अनुच्छेद 41 के अनुसार सभी नागरिकों के लिए सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना राज्य का कर्तव्य है।
यानी अनुच्छेद 39(क), भारतीय संविधान के राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है।
यह राज्य को निर्देश देता है कि वह सभी को जीविका के पर्याप्त साधन, धन और उत्पादन के साधनों का उचित वितरण, समान कार्य के लिए समान वेतन, कर्मचारियों के स्वास्थ्य की रक्षा, और बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसर प्रदान करने के लिए नीतियां बनाए, जिसमें अनुच्छेद 39क के तहत गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता देना भी शामिल है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 41 राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है, जो राज्य को अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, नागरिकों के लिए काम करने, शिक्षा पाने और बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी व विकलांगता जैसी स्थितियों में सार्वजनिक सहायता पाने के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करने का निर्देश देता है।
मनरेगा जैसी योजनाएं इसी अनुच्छेद के आलोक में बनाई गई हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में काम का अधिकार सुनिश्चित करती हैं।
आजादी के 58 साल बाद 2005 में यूपीए सरकार ने मनरेगा कानून पास किया जो रोजगार की पूरी गारंटी तो नहीं देता था, लेकिन यह मजदूरों की आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन था जिससे उन्हें काफी राहत मिल जाती थी।
लेकिन आज केंद्र की मोदी सरकार ने उसे खत्म करके नया कानून ले आई है। नये कानून में भले ही ग्रामीण अकुशल मजदूरों के लिए मनरेगा योजना के तहत साल में 100 दिनों के काम के दिनों को बढ़ाकर 125 दिन करने की बात कही गई है, लेकिन इसका मुख्य लक्ष्य मजदूरों के एक बड़े हिस्से को इस अधिकार से वंचित करना है।
दूसरी तरफ यह जानना जरूरी हो जाता है कि पिछले 11 सालों से केंद्र में बीजेपी की सरकार है और हम जब मनरेगा में ग्रामीणों को 100 दिन के काम का आकलन करते हैं तो जो तस्वीर उभरकर सामने आती है उससे साफ हो जाता है कि इन्हें 100 दिन तो नहीं, औसतन 50 दिन ही काम मिल सका है। इससे अलग, राज्य सरकारों को भी मनरेगा में अतिरिक्त 50 दिन काम देने की जिम्मेदारी थी, वह भी ठीक से पूरी नहीं हुई। इससे स्पष्ट है कि नए कानून में 125 दिन रोजगार देने की बात केवल दिवास्वप्न है, असल उद्देश्य मजदूरों के अधिकारों को छीन लेना है।
मनरेगा योजना की बात करें तो इसका मूल मंत्र था, जिसकी सार्वभौमिक गारंटी थी ग्रामीण क्षेत्र का कोई भी अकुशल मजदूर जो काम करने का इच्छुक है, को काम देना ही होगा। इस सार्वभौमिकता को खत्म करके, “विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)” रोजगार को केंद्र सरकार की इच्छा और निर्णयों पर निर्भर बनाया गया है।
इसके आलोक में अब केंद्र सरकार अधिसूचना जारी कर तय करेगी कि किन-किन ग्रामीण क्षेत्रों में काम दिया जाएगा और उसी आधार पर राज्य सरकारों को काम देने के लिए कहा जाएगा। यानी यह कानून ‘मांग-आधारित काम’ की गारंटी को पूरी तरह समाप्त कर देता है। पुराने कानून में जहां ग्राम-सभा के माध्यम से काम की योजना बनाने का अधिकार हासिल था, उसके विपरीत केंद्र सरकार अब इस कानून के ज़रिए अपनी पसंद के अनुसार मजदूरों की सूची तैयार करेगी।
बता दें कि केंद्र सरकार ने ग्रामीण भारत को तीन हिस्सों में विभाजित किया है। जिस हिस्से को वे “विकसित भारत” मानेंगे, वहां के ग्रामीण अकुशल मजदूरों को अब यह काम नहीं मिलेगा। बाकी क्षेत्रों में भी केंद्र सरकार की उक्त मर्जी से सूची तैयार की जाएगी। वहीं ग्राम सभा या पंचायतों के हाथ से इससे जुड़ी तमाम शक्तियां छीन ली गई हैं।
स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार काम निर्धारित करने में ग्राम सभा की जो संवैधानिक भूमिका थी, उसे हटाकर यह कानून एक केंद्रीकृत ढांचा खड़ा कर रहा है, जहां तकनीकी जटिलता और व्यापक निगरानी ही मुख्य विशेषता है।
बता दें मनरेगा के भीतर ही जबरन थोपी गई ‘आधार आधारित भुगतान प्रणाली’ (एबीपीएस) का अनुभव पहले ही इस तरह के केंद्रीकरण के भयानक परिणाम दिखा चुका है। लाखों ग्रामीण मजदूरों को लंबे समय तक मजदूरी न मिलना, आधार लिंक की समस्याओं के कारण जॉब कार्ड रद्द होना और तकनीकी त्रुटियों का शिकार होना अब आम बात हो गई थी और ग्रामीण मजदूर धीरे-धीरे मनरेगा के प्रति उदासीन होने लगे थे।
उसी वक्त यह साफ हो गया था कि केंद्र की मोदी सरकार मनरेगा योजना को समाप्त करने की ओर बढ़ रही है। रही सही कसर भी उस वक्त पूरी हो गई जब मोदी सरकार ने मनरेगा के फंड में कटौती करने लगी।
केंद्र की मोदी सरकार ने 2023-24 में हाजिरी के लिए एक मोबाइल एप-आधारित व्यवस्था नैशनल मोबाईल मोनिट्रिंग सिस्टम को अनिवार्य किया, जिससे मज़दूरों के काम और भुगतान के अधिकार के उल्लंघन के साथ-साथ व्यापक परेशानी होने लगी।
जब से मोदी सरकार सत्ता में आई मनरेगा को लगातार ऐसी तकनीकी जाल में फंसाया गया कि मज़दूरों के लिए पारदर्शिता न के बराबर हो गयी और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही भी ख़त्म हो गयी।
उस वक्त से ही लगने लगा था कि मोदी सरकार मनरेगा मज़दूरों को मनरेगा योजना से ही मोह भंग कर देना चाहती है।
अंततः मनरेगा कानून में मजदूरों को काम देने और मजदूरी देने की जो पूर्ण जिम्मेदारी केंद्र सरकार की थी, उसे बदल दिया गया है और अब राज्य सरकारों की नीति निर्धारण की शक्तियां छीन ली गई हैं। साथ ही इस परियोजना का वित्तीय बोझ योजनाबद्ध तरीके से राज्यों पर डाल दिया गया है। जबकि सभी निर्णय लेने की शक्ति केंद्र सरकार के पास रखी गई है। जिसमें केंद्र की कोई जवाबदेही भी नहीं होगी।
उल्लेखनीय है कि मनरेगा के माध्यम से ग्रामीण मेहनतकश आवाम में अपने अधिकारों के प्रति एक चेतना जागी थी और वे कुछ हद तक आत्मनिर्भर हुए थे। लेकिन नया कानून लागू होने पर ग्रामीण मेहनतकशों को फिर से मालिकों और धनी किसानों पर निर्भर होना पड़ेगा। इसके अलावा, कार्यस्थल पर मजदूरों के लिए आवश्यक सुविधाएं जैसे—पीने का पानी, टेंट, बच्चों के लिए बिस्कुट, दूध, खिलौने, पालना घर, मेडिकल किट और काम के औजारों के बारे में इस कानून में कोई बात नहीं की गई है।
अनुच्छेद 32 में सद्भावना से की गई कार्रवाई का जिक्र है जिसका अर्थ है –
जिला कार्यक्रम समन्वयक, कार्यक्रम अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ, जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 2 के खंड (28) के अर्थ में एक लोक सेवक है, या जिसे लोक सेवक माना जाता है, पर इस अधिनियम या इसके तहत बनाए गए नियमों या योजनाओं के तहत सद्भावना से किए गए या किए जाने के इरादे से किए गए किसी भी काम के संबंध में कोई मुकदमा, अभियोजन या अन्य कानूनी कार्यवाही नहीं की जाएगी।
कानून के उल्लंघन पर मात्र जुर्माना अधिकतम 10 हजार रुपए का प्रावधान है जबकि सजा कारावास की होनी चाहिए। यह पहले भी कमी थी मनरेगा में जुर्माना एक हजार रुपए था। यानी कर्मचारियों और अधिकारियों के मजदूर विरोधी रवैये, लापरवाही, लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी कठोर दंडात्मक कार्रवाई का भी उल्लेख नहीं है। यानी भ्रष्टाचार और लापरवाही का रास्ता पूरी तरह खुला रखा जा रहा है।
काम के दौरान मृत्यु होने पर मुआवजे या भत्ते का भी कोई प्रावधान नहीं रखा गया है।
अब वीबी-जीराम-जी में प्रस्तावित राज्य-वार ‘नॉर्मेटिव एलोकेशन’ नीति के तहत केंद्र सरकार राज्यों को फंड आवंटन के मामले में पूरी तरह से मनमानी शक्ति का उपयोग करेगी। जहां मनरेगा के तहत केंद्र और राज्य का खर्च अनुपात 90:10 था। यानी केंद्र सरकार 90 प्रतिशत रोजगार देती थी और राज्य सरकारों को 10 प्रतिशत देना होता था, वहीं नये कानून में केंद्र ने अपनी हिस्सेदारी घटाकर केवल 60 प्रतिशत कर दी है।
राज्यों को 40 प्रतिशत खर्च वहन करने के लिए मजबूर किया जाएगा और निर्धारित आवंटन से ऊपर के किसी भी अतिरिक्त खर्च का पूरा भार भी राज्यों को ही उठाना होगा।
“विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)” कानून, लाने का लब्बोलुआब यह है कि केंद्र सरकार पूंजीपतियों और कॉर्पोरेट्स को सस्ता श्रम उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सुनियोजित तरीके से मनरेगा को नष्ट कर चुकी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)