उत्तर प्रदेश में गंगा से सटे गांवों में एक ऐसा ख़तरा चुपचाप फैल रहा है जिसकी न कोई तेज़ गंध है, न कोई फ़ौरन दिखने वाला रंग। यह आर्सेनिक है-एक धीमा, अदृश्य ज़हर जो रोज़मर्रा के पानी के साथ अनजाने ही लाखों लोगों के शरीर में उतर रहा है और उन्हें भीतर से तोड़ रहा है। यह ज़हर अचानक हमला नहीं करता, बल्कि सालों तक इंसान के साथ रहता है। उसकी त्वचा, हड्डियों और सांसों में पैठ बनाता हुआ और फिर बीमारी की शक्ल में सामने आता है।
पूर्वांचल के कई ज़िलों में यह संकट अब साफ़ दिखने लगा है, लेकिन गाज़ीपुर, बलिया, चंदौली और बनारस इसकी सबसे गहरी मार झेल रहे हैं। गाज़ीपुर ज़िले का करकटपुर गांव इस त्रासदी की एक ज़िंदा तस्वीर है-ऐसी तस्वीर, जिसे देखने के लिए किसी आपदा की नहीं, सिर्फ़ थोड़ी संवेदना की ज़रूरत है। यहां के लोग जो कभी खेतों में हंसी के साथ पसीना बहाते थे, आज उसी पानी के कारण ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं जिसे वे कभी जीवन का आधार मानते थे।
करकटपुर की 55 वर्षीय बिजेंद्री देवी इस दर्द की एक आवाज़ हैं। उनके सीने पर उभरे लाल चकत्ते और दाने किसी एलर्जी का नहीं, बल्कि ज़हर के लंबे असर का निशान हैं। उनकी आंखों में आज भी वह बीता हुआ वक़्त तैर आता है जब वो मज़बूत क़दमों से खेतों में काम करती थीं, घर संभालती थीं और ज़िंदगी से भरी रहती थीं।
आज हालात यह हैं कि हर क़दम दर्द से भरा है और हर सांस बोझिल। वह थकी हुई आवाज़ में कहती हैं, “इलाज बहुत कराया, लेकिन कुछ फ़ायदा नहीं हुआ। अब तो बस मन को दिलासा देने के लिए इलाज चल रहा है। जानती हूं। ये सब उसी पानी की वजह से है, जो हम बरसों से पीते आए हैं।”
पूर्वांचल के गांवों में यह सिर्फ़ एक महिला की कहानी नहीं है। यह उस पानी की कहानी है जो प्यास तो बुझाता है, लेकिन धीरे-धीरे ज़िंदगी छीन लेता है। बिजेंद्री देवी के पति 63 वर्षीय हरिलाल खुद भी बीमारी के साये में जी रहे हैं। हार्निया से पीड़ित हरिलाल के हाथों और सीने पर आर्सेनिक के निशान साफ़ दिखते हैं। गले के नीचे लाल चकत्ते और हथेलियों में गहरी दरारें। पांच बच्चों का यह परिवार भी ज़हर से अछूता नहीं है।
हरिलाल बताते हैं कि इसी गांव के सीताराम, ऋषिकेश और रमेश्वर आर्सेनिकजनित बीमारियों के चलते जवानी में ही दम तोड़ चुके हैं। उनकी झुकी गर्दन और सूनी आंखें गवाही देती हैं कि यह बीमारी सिर्फ़ बदन को नहीं, हौसले को भी तोड़ देती है। वह कहते हैं, “दस साल पहले मैं अखाड़े में कुश्ती लड़ता था। आज चलना मुश्किल है। ये सब उसी पानी की देन है जो हमने बचपन से पिया।”
करकटपुर में परचून की दुकान चलाने वाली 40 वर्षीया राधिका देवी की तकलीफ़ भी कुछ अलग नहीं है। हाथ-पैरों में निकलती फुंसियां, न भरने वाले घाव और लगातार बना रहने वाला दर्द उनकी रोज़मर्रा की सच्चाई है। वह कहती हैं, “शादी होकर यहां आई तो बिल्कुल ठीक थी। करकटपुर के पानी ने शरीर को खा लिया-चुपचाप। कभी सोचा नहीं था कि पानी भी ज़िंदगी तबाह कर सकता है। हमारे पास इतने पैसे नहीं कि हम आरओ वाटर खरीद सकें। हैंडपंप का पानी कुछ देर में ही माड़ जैसा हो जाता है।”
यह दर्द सिर्फ़ बिजेंद्री या राधिका का नहीं है। यह करकटपुर के सैकड़ों लोगों की सामूहिक चीख है, जो सालों से आर्सेनिक को घूंट-घूंट पी रहे हैं। कभी यहां डीप बोरिंग कर ट्यूबवेल लगाने की कोशिश हुई, लेकिन सरकारी अमला बोरवेल पर ढक्कन लगाकर चला गया। आज उस ढक्कन पर उपले पाथे जाते हैं। जिस जगह ट्यूबवेल बनना था, वहीं दलितों और मल्लाहों की बस्ती है। उम्मीद की आख़िरी लौ भी अब टिमटिमाने लगी है।
60 वर्षीय राधिका, सीमा देवी और 40 वर्षीय रीता देवी की हथेलियां पीली पड़ चुकी हैं। 45 वर्षीय सुरेश चौधरी मोतीलाल, 52 वर्षीय सौदागर चौधरी और उनके बच्चे-सब आर्सेनिकजनित बीमारियों की गिरफ्त में हैं। गांव के लोग कहते हैं, “अगर एक ट्यूबवेल लग जाए तो शायद ज़िंदगी बच जाए।” लेकिन यह ‘शायद’ ही उनकी नियति बन गया है। साल 2022 में 25 वर्षीय वीरेंद्र की कैंसर से मौत ने गांव को और डराया।

ज़िंदगी के हाथों में उभरते चकत्ते
धरम्मरपुर ग्राम पंचायत से जुड़ा करकटपुर गांव पिछले कुछ महीने से ओवरहेड टैंक से जलापूर्ति होने के कारण थोड़ी राहत महसूस कर रहा है। लेकिन यह राहत कब तक बनी रहेगी, कोई नहीं जानता। 46 वर्षीय सुरेश चौधरी की पत्नी लक्ष्मीना देवी आशा कार्यकर्ता हैं। उनके चार बच्चे-पूजा, नेहा, धनंजय और मृत्युंजय-भी इस जहरीले पानी का प्रभाव झेल रहे हैं।
लक्ष्मीना बताती हैं, “हमारे गांव में कुछ महीने से सरकारी नल से पानी मिल रहा है, लेकिन जब पाइपलाइन टूट जाती है तो फिर हैंडपंप का ही सहारा लेना पड़ता है। हमारे बच्चे अभी भी आर्सेनिकजनित चकत्तों से परेशान हैं।”
धरम्मरपुर ग्राम पंचायत से जुड़ा है करकटपुर। पिछले साल यहां सरकारी नल से ओवरहेड टैंक से पानी की सप्लाई शुरू हुई, लेकिन बलवंतपुर, हंसराजपुर, सिवाना और टेढ़वा पुरवा में हर कोई आर्सेनिकयुक्त पानी ही इस्तेमाल कर रहा है।
धरम्मरपुर ग्राम पंचायत के पूर्व प्रधान भीम सिंह यादव बताते हैं, “करीब 20 साल से हम इस समस्या से जूझ रहे हैं। यहां करीब 300 इंडिया मार्का हैंडपंप लगे हैं, लेकिन अधिकतर हैंडपंप आर्सेनिक युक्त पानी ही उगल रहे हैं। जब मीडिया ने यह मामला उठाया तो 20-22 हैंडपंपों की डीप बोरिंग कराई गई, लेकिन बाकी को वैसे ही छोड़ दिया गया। हमें लगता है कि सरकार इस समस्या को लेकर कतई गंभीर नहीं है। हमारी ग्राम पंचायत में केवल एक पानी की टंकी है, जो पूरे गांव के लिए नाकाफी है। इस पूरे इलाके में चर्मरोग और गैस आम बीमारी बन चुकी है। क़रीब 30 से 40 फ़ीसदी लोग इसकी गिरफ़्त में हैं।”
करीब 12 हजार की आबादी वाली धरम्मरपुर ग्राम पंचायत के पूर्व प्रधान भीम सिंह यादव यह भी कहते हैं, “धरम्मरपुर के बुजुर्गों की हड्डियां कमजोर हो रही हैं, युवाओं की त्वचा पर भयानक धब्बे उभर रहे हैं और बच्चों की सेहत लगातार गिरती जा रही है। इस जहर का इलाज सिर्फ स्वच्छ पानी है, लेकिन यह पानी यहां रहने वालों के लिए दुर्लभ होता जा रहा है। सरकार की लापरवाही और प्रशासन की अनदेखी के बीच धरम्मरपुर, करकटपुर और आसपास के गांवों में जिंदगी हर रोज़ एक नई जंग लड़ रही है।”
पूर्व ग्राम प्रधान भीम की आवाज़ में अब ग़ुस्सा कम और थकान ज़्यादा है। वह कहते हैं, “जहां सिर्फ़ हैंडपंप ही सहारा हैं और पीने के पानी का कोई दूसरा इंतज़ाम नहीं, वहां शायद ही कोई ऐसा बदन बचा हो जिस पर लाल चकत्ते न उभरे हों। किसी के हाथों में खुले ज़ख़्म हैं, किसी की हथेलियां फट चुकी हैं।” वह पानी की हक़ीक़त बयान करते हुए कहते हैं कि एक लोटा पानी बर्तन में रख दीजिए, कुछ देर में चावल के माड़ जैसा हो जाता है।”
भीम यह भी बताते हैं कि पहले लोग बीमारी की जड़ नहीं समझ पाते थे कि आर्सेनिक क्या है? इस अजनबी नाम से कोई वाक़िफ़ नहीं था। जागरूकता के अभाव में ज़हर धीरे-धीरे लोगों की रगों में उतरता गया। सिर्फ़ धरम्मरपुर नहीं, गंगा के किनारे बसे आसपास के तमाम गांव इसकी चपेट में हैं। गंगा हमारे गांव में मुड़ती है, इसलिए यहां आर्सेनिक का जमाव ज़्यादा होता है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, गाज़ीपुर ज़िले के करंडा ब्लॉक के कई गांवों में पानी अब जीवन नहीं, ख़तरा बन चुका है। धर्मपुर ग्राम पंचायत के करकटपुर गांव में जल में आर्सेनिक की मात्रा 100 पीपीबी से ज़्यादा पाई गई है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ सुरक्षित सीमा 10 पीपीबी है।
बलवंतपुर और कोटिया में हालात और भयावह हैं, जहां यह मात्रा 500 पीपीबी तक दर्ज की गई। नया पुरवा और धर्मपुर की मुख्य बस्ती में आंकड़े डराने वाले हैं। यहां पानी में आर्सेनिक 800 से 1000 पीपीबी तक पाया गया है। टेढ़वा गांव की तस्वीर भी इससे अलग नहीं है। क़रीब 12 हज़ार लोग ऐसे पानी को पीने को मजबूर हैं, जो हर घूंट के साथ सेहत को खोखला कर रहा है।
इन गांवों में ज़हर अचानक नहीं फैला। यह वर्षों की अनदेखी का नतीजा है। कुएं, नल, हैंडपंप-सब दूषित हो चुके हैं। बुज़ुर्गों की हड्डियां कमज़ोर पड़ रही हैं, युवाओं की त्वचा पर डरावने धब्बे उभर आए हैं और बच्चों की सेहत दिन-ब-दिन ढलती जा रही है। हर दिन लोग जानते-बूझते ज़हर पी रहे हैं, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
गाज़ीपुर के सामाजिक कार्यकर्ता एवं भूगर्भ जिला प्रबंधन समिति के विशेषज्ञ सदस्य उमेश श्रीवास्तव कहते हैं, “करकटपुर के लोग जीने की उम्मीद तो रखते हैं, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि यह दूषित पानी उनकी जिंदगी के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। गांव की हालत यह है कि नल, हैंडपंप, सब कुछ आर्सेनिक से संक्रमित हो चुका है। पानी का विकल्प नहीं होने की वजह से लोग मजबूरी में वही पानी पीने के लिए विवश हैं।”
वह कहते हैं, “अगर जल्द ही सरकार इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं करती, तो करकटपुर के लोग अपनी जिंदगी को धीरे-धीरे खत्म होते देखेंगे। वे जानते हैं कि इस पानी में छिपा जहर उनकी सेहत को हमेशा के लिए खराब कर सकता है, लेकिन कोई और रास्ता नहीं है। यह उन सभी के लिए एक असहनीय सच्चाई बन चुकी है, जो हर रोज़ आर्सेनिक से संक्रमित पानी पीने को मजबूर हैं।”
उमेश बताते हैं, “करंडा, भांवरकोल, मोहम्दाबाद और बाराचवर ब्लॉक के कई गांव इस समस्या से गंभीर रूप से प्रभावित हैं, लेकिन आज तक अनेक क्षेत्रों में न तो समुचित सर्वे कराया गया है और न ही उन्हें आधिकारिक रूप से आर्सेनिक प्रभावित घोषित किया गया है। ग्रामीणों के पास स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल का कोई ठोस विकल्प उपलब्ध नहीं है।
यह संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और अवैज्ञानिक जल प्रबंधन नीति का परिणाम है। यदि समय रहते हैंडपंप बोरिंग पर नियंत्रण, वैज्ञानिक जल परीक्षण और वैकल्पिक जल स्रोतों की व्यवस्था नहीं की गई, तो आने वाले समय में गाज़ीपुर के अन्य इलाके भी इस गंभीर संकट की चपेट में आ जाएंगे।”
“भूगर्भ जिला प्रबंधन समिति की बैठकों का नियमित आयोजन नहीं हो रहा है और कई बार सूचना समय पर नहीं दी जाती, जिससे यह महत्वपूर्ण समिति केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। आर्सेनिक प्रभावित गांवों में तत्काल वैज्ञानिक जल परीक्षण कराया जाए, अंधाधुंध हैंडपंप बोरिंग पर रोक लगाई जाए, आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों को अधिसूचित किया जाए, आर्सेनिक मुक्त पेयजल की व्यवस्था की जाए और स्वास्थ्य विभाग द्वारा विशेष जांच एवं उपचार शिविर लगाए जाएं।”
करकटपुर गांव के सैकड़ों लोग इस जहर का शिकार हो चुके हैं। यहां लोगों की आंखों में अब कोई उम्मीद नहीं बची। वे जानते हैं कि कभी भी आर्सेनिक का जहर उनकी जिंदगी को पूरी तरह से तबाह कर सकता है, लेकिन उनके पास इस समस्या से लड़ने का कोई उपाय नहीं है।
करकटपुर में बीमारी अचानक नहीं आई। यह सालों की अनदेखी का नतीजा है। यहां पानी सिर्फ़ प्यास नहीं बुझाता, बल्कि हर दिन थोड़ा-थोड़ा जीवन छीन लेता है। यह गांव आज भी इंतज़ार में है-साफ़ पानी के और शायद इंसाफ़ के भी।
खतरे में 2.34 करोड़ लोगों की जिंदगी
नई दिल्ली स्थित टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के शोधकर्ता डॉ. चंदर कुमार सिंह के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भूजल में आर्सेनिक की उच्च मात्रा गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती है।
विशेष रूप से बलिया, गोरखपुर, गाजीपुर, फैजाबाद और देवरिया जैसे जिलों में स्थिति चिंताजनक है।
इस अध्ययन के तहत, शोधकर्ताओं ने विशेष किट की मदद से भूजल के नमूनों का परीक्षण किया और प्रयोगशाला परीक्षणों से आंकड़ों की वैधता की पुष्टि की। शोधकर्ता डॉ. चंदर कुमार सिंह और उनकी शोध छात्र सोनल बिंदल ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में भूजल नमूनों का विश्लेषण किया। उन्होंने एक विशेष किट की मदद से आर्सेनिक की उपस्थिति की जांच की और फिर इन आंकड़ों की पुष्टि प्रयोगशाला में की गई।
इसके बाद उन्नत कंप्यूटर मॉडलिंग तकनीकों का उपयोग कर प्रभावित क्षेत्रों का मानचित्र तैयार किया गया। इस अध्ययन में 20 प्रमुख मापदंडों को ध्यान में रखा गया, जिनमें भौगोलिक स्थिति, जलकूपों की गहराई, मिट्टी की रासायनिक एवं जैविक संरचना, वाष्पन, भूमि की ढलान, नदी से दूरी, बहाव क्षेत्र और स्थलाकृति शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश की लगभग 78 फ़ीसदी आबादी गांवों में रहती है और उनका जीवन पूरी तरह से भूजल पर निर्भर करता है। शहरों में जहां पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति होती है, वहीं ग्रामीण इलाकों में लोग हैंडपंप और कुओं का पानी पीने को मजबूर हैं। यह पानी धीरे-धीरे उनके शरीर में ज़हर घोल रहा है और उन्हें गंभीर बीमारियों की ओर धकेल रहा है। हालांकि सरकार ने इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए कई योजनाएं बनाई है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी व्यापक प्रयास की जरूरत है।
भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि उत्तर प्रदेश के 40 जिलों के भूजल में आर्सेनिक का स्तर सामान्य से अधिक है। अध्ययन के अनुसार, राज्य के उत्तर-पूर्वी जिलों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई गई है। विशेष रूप से गंगा, राप्ती और घाघरा नदियों के मैदानी क्षेत्र इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं।
बलिया, गोरखपुर, गाजीपुर, बाराबंकी, गोंडा, फैजाबाद और लखीमपुर खीरी जैसे जिले आर्सेनिक प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित हैं, जबकि शाहजहांपुर, उन्नाव, चंदौली, वाराणसी, प्रतापगढ़, कुशीनगर, मऊ, बलरामपुर, देवरिया और सिद्धार्थनगर के भूजल में आर्सेनिक का स्तर मध्यम दर्जे का पाया गया है।
उत्तर प्रदेश की लगभग 78 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, जो पीने, सिंचाई, भोजन पकाने और अन्य घरेलू जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है। ग्रामीण इलाकों में पाइपलाइन जल आपूर्ति की उपलब्धता सीमित होने के कारण, वहां के निवासियों पर आर्सेनिक का प्रभाव अधिक पड़ रहा है। सिंचाई के लिए उपयोग होने वाले आर्सेनिक युक्त जल से फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं, जिससे यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
उत्तर प्रदेश की लगभग 78 फ़ीसदी आबादी गांवों में रहती है और अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है। जब यही जल ज़हर बन जाए, तो बीमारी धीरे-धीरे पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लेती है। यह संकट सिर्फ़ पानी का नहीं है-यह नीतियों, प्राथमिकताओं और संवेदनाओं की भी कड़ी परीक्षा है। करकटपुर और उसके जैसे सैकड़ों गांव आज भी इंतज़ार में हैं-साफ़ पानी के लिए और उस दिन के जब ज़िंदगी ज़हर से आज़ाद होगी।
डॉ. चंदर ने चेतावनी दी है कि बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर, फैजाबाद और देवरिया जैसे जिलों में सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है।
वह कहते हैं, “आर्सेनिक प्रदूषित पानी के लंबे समय तक उपयोग से त्वचा संबंधी रोग और कैंसर, फेफड़े और मूत्राशय का कैंसर, हृदय और रक्त संचार प्रणाली से जुड़ी समस्याएं, गर्भपात और शिशु मृत्यु दर में वृद्धि, बच्चों के बौद्धिक विकास में बाधा समेत कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आर्सेनिक प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुका है, जिससे लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं। सरकार को चाहिए कि आर्सेनिकयुक्त पानी के सेवन से बड़े पैमाने पर हैंडपंप और ट्यूबवेल के पानी की नियमित जांच करनी चाहिए।”
करोड़ों लोगों पर मंडरा रहा खतरा
पूर्वांचल में पानी में तेजी से घुल रहे आर्सेनिक पर पश्चिम बंगाल स्थित जादवपुर विश्वविद्यालय के पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. तारित चौधरी ने भी गहन पड़ताल की है। डॉ चौधरी ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के उन सभी जिलों में आर्सेनिक की स्थिति की पड़ताल की है जो नदियों के किनारे बसे हैं। उन्होंने अपनी शोध रिपोर्ट में साफतौर पर चेताया है कि अगर प्रभावी रणनीति न अपनाई गई तो आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रदूषण देश में गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
डॉ चौधरी पिछले 25 वर्षों से पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों में आर्सेनिक को लेकर किये जा रहे अध्ययनों में शामिल रहे हैं। उनके अनुसार 1989 में पहली बार इस समस्या की पहचान की गई थी, जिसके बाद से इसके प्रदूषण में वृद्धि हुई है। वह कहते हैं कि भागीरथी नदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर स्थित पश्चिम बंगाल के नौ जिले आर्सेनिक से अत्यधिक प्रभावित हैं, जबकि उत्तरी बंगाल के पांच जिले आर्सेनिक से मामूली रूप से दूषित हैं।
जर्नल ग्राउंडवाटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में डॉक्टर रॉय चौधरी और उनकी टीम ने पाया कि रोजाना आर्सेनिक दूषित आहार का सेवन बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे पैदा कर सकता है। इस अध्ययन के मुताबिक आर्सेनिक विषाक्तता भविष्य में कैंसर का कारण बन सकती है। इतना ही नहीं मवेशियों और फिर उनके माध्यम से इंसानों और पर्यावरण को प्रभावित कर सकती है।
डा.चौधरी ने दूषित भूजल के निरंतर उपयोग के पीछे घनी आबादी, अज्ञानता और गरीबी को कारण माना है। ऐसे में इससे बचने के स्थाई समाधान के रूप में उन्होंने वर्षा जल संचयन और सतह के जल के उपचार जैसे वैकल्पिक तरीकों का सुझाव दिया है।
उन्होंने आगे जानकारी दी कि देश के इस हिस्से में आर्सेनिक प्रदूषण विशुद्ध रूप से भूगर्भीय है। उनके अनुसार आर्सेनिक का खतरा केवल पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह समस्या उत्तर प्रदेश में कानपुर-इलाहाबाद, वहीं उत्तराखंड, बिहार और झारखंड सहित कई राज्यों में है।
रिसर्च से पता चला है कि, “गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाक़ों वाले छह भारतीय राज्यों में करीब 7.04 करोड़ लोगों पर आर्सेनिक का खतरा मंडरा रहा है, जहां भूजल में आर्सेनिक की मात्रा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से भी ज्यादा है। पता चला है कि भारत-गंगा के बाढ़ के मैदानों के निचले हिस्सों मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, भारत और बांग्लादेश को आर्सेनिक-प्रदूषण के हॉटस्पॉट के रूप में चिन्हित किया गया है।”
डा.चौधरी और उनके सहयोगियों द्वारा किए एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि पश्चिम बंगाल में एक आर्सेनिक प्रभावित गाय या बैल के दैनिक आहार में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य की तुलना में 4.56 गुणा ज्यादा थी। इसी तरह आर्सेनिक प्रदूषण की चपेट में आने वाली बकरियों के दैनिक आहार में सामान्य की तुलना में 3.65 गुणा अधिक आर्सेनिक था।
शोध में गाय के दूध, उबले अंडों की जर्दी और सफेदी, जिगर और मांस जैसे पशु प्रोटीन में काफी मात्रा में आर्सेनिक पाया गया है। पता चला है कि फास्फोरसरीन यूनिट्स की उपस्थिति के कारण गाय के दूध में ज्यादातर आर्सेनिक, कैसिइन (83 फीसदी) में जमा होता है।
डा. चौधरी बताते हैं कि, “पहले आर्सेनिक और फ्लोराइड केवल पीने के पानी के रूप में भूजल के उपयोग से इंसानों में पहुंच रहा है। लेकिन अब ये दोनों दूषित पदार्थ पीने के पानी के साथ-साथ, खाद्य श्रृंखला के जरिए, विशेष तौर पर गर्मी के मौसम में इंसानों के शरीर में पहुंच रहे हैं। उनके अनुसार इसके लिए कृषि और मवेशियों के लिए इस दूषित भूजल का किया जा रहा उपयोग जिम्मेवार है।”
रिसर्च के मुताबिक जहां इस क्षेत्र में नियमित रूप से उपभोग किए जाने वाले खाद्य पदार्थों के हिसाब से देखें तो जहां पीने के पानी से स्वास्थ्य के लिए आर्सेनिक का जोखिम सबसे ज्यादा था। वहीं इसके बाद चावल, गाय का दूध, चिकन, अंडा और फिर मांस का नंबर आता है। वहीं शोध के मुताबिक इस क्षेत्र में बच्चों की तुलना में वयस्कों में कहीं ज्यादा जोखिम दर्ज किया गया है।
शोध रिपोर्ट के मुताबिक, खाद्य पदार्थों से गंभीर कैंसर का खतरा उतना नहीं है लेकिन इसके बावजूद पशुओं से मिलने वाले प्रोटीन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि मवेशियों के लिए तत्काल सतही जल की व्यवस्था की जानी चाहिए। वहीं आर्सेनिक के गंभीर खतरे से उबरने के लिए प्रभावित इंसानी आबादी के लिए आर्सेनिक मुक्त पेयजल और पोषक तत्वों की उचित खुराक का अनिवार्य रूप से प्रबंध किया जाना चाहिए।
उनके अनुसार चिंता की बात धान में आर्सेनिक का पाया जाना है, जोकि भारत की मुख्य खाद्यान्न फसल है। उनके मुताबिक आज हम जो कुछ खाते हैं चाहे वो चावल, दालें या सब्जियां हो वो आर्सेनिक और फ्लोराइड से दूषित हो चुकी हैं। आर्सेनिक और फ्लोराइड दोनों हमारे शरीर की आंतरिक प्रणाली को प्रभावित करते हैं।
सरकारी आंकड़ों और स्वतंत्र शोधकर्ताओं की रिपोर्टों के अनुसार, यह समस्या सरकारी दावों से कहीं अधिक भयावह है। पटना के महावीर कैंसर संस्थान के शोध प्रमुख डॉ. अशोक कुमार घोष के अनुसार, ” साल 1970 के दशक से भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण जलस्रोतों की रासायनिक संरचना में बदलाव आया, जिससे आर्सिनोपायराइट खनिज आयनिक रूप में परिवर्तित होकर पानी में घुलने लगा। यह वही तत्व है जो हिमालय से बहकर आने वाली नदियों में मौजूद था, लेकिन पहले पानी में नहीं घुलता था।”
डॉ. अरुण कुमार, जो कई वर्षों से आर्सेनिकोसिस प्रभावित क्षेत्रों पर शोध कर रहे हैं। वह बताते हैं, “हमारी फील्ड रिसर्च में पाया गया है कि प्रभावित क्षेत्रों में कई लोग 500 पीपीबी से अधिक आर्सेनिक युक्त पानी का सेवन कर रहे हैं, जबकि सुरक्षित सीमा 10 पीपीबी है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक 10 व्यक्तियों में से 1 को कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है।”
केंद्र सरकार ने कुछ साल पहले संसद में स्वीकार किया है कि देश के 21 राज्यों के 150 जिलों में आर्सेनिक की समस्या व्याप्त है। उत्तर प्रदेश के 75 में से 28 जिले और बिहार के 38 में से 22 जिले इससे प्रभावित हैं। हालांकि, जमीनी रिपोर्ट्स इंगित करती हैं कि स्थिति सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक गंभीर है। वर्ल्ड वाटर क्वालिटी इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 122 देशों में 120वीं है और यहां का 70 फीसदी पानी प्रदूषित है।
देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के 25 जिलों के भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा कई गुना अधिक पाई गई है। यह खुलासा उत्तर प्रदेश वाटर एंड सेनिटेशन मिशन द्वारा एक आरटीआई के जवाब में हुआ है। पीने के पानी में मानक से अधिक फ्लोराइड और आर्सेनिक पाए जाने से गंभीर बीमारियों के खतरे बढ़ गए हैं। जियोग्राफिकल क्वालिटी टेस्टिंग सर्वे रिपोर्ट की भयावहता को देखते हुए इसे पोर्टल के माध्यम से सार्वजनिक किया जाना था, लेकिन आज तक ऐसा नहीं किया गया।
केंद्र सरकार ने पीने के पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2015-16 में 150 करोड़ रुपये की धनराशि वाटर एंड सेनिटेशन मिशन को दी थी, ताकि उत्तर प्रदेश के सभी गांवों, कस्बों और शहरों के पेयजल स्रोतों की जियोग्राफिकल क्वालिटी टेस्टिंग कराई जाए और इसकी रिपोर्ट को पोर्टल पर सार्वजनिक किया जाए।
वाटर एंड सेनिटेशन मिशन, उत्तर प्रदेश ने इस कार्य के लिए दो एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी, जिनमें से एक थी एडीसीसी इंफोकेड प्राइवेट लिमिटेड, नागपुर। इन एजेंसियों ने अपनी सर्वे रिपोर्ट की हार्ड कॉपी सभी जिलों के मुख्य विकास अधिकारियों को सौंपी। रिपोर्ट के अनुसार, 25 जिलों में आर्सेनिक की मात्रा मानक से अधिक पाई गई। रिपोर्ट का 60 प्रतिशत सत्यापन जिला स्तर पर किया जाना था, लेकिन अधिकांश जनपदों में यह रिपोर्ट आज भी अलमारियों में बंद पड़ी है।
इस रिपोर्ट को राज्य पेयजल एवं स्वच्छता मिशन को सॉफ्ट कॉपी के माध्यम से पोर्टल पर अपलोड करना था, लेकिन वह पोर्टल अब तक तैयार नहीं हो सका।
प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस सूचना को शिकायत मानते हुए इसे मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर निस्तारण के लिए भेज दिया।शिकायत को संदर्भ संख्या 6000190107115 दी गई, लेकिन तीन महीने बाद बिना समुचित जांच के इसे कानपुर नगर से निस्तारित दिखा दिया गया। केंद्र सरकार ने सर्वेक्षण शुरू होने से पहले ही निर्देश दिया था कि इसकी हार्ड और सॉफ्ट कॉपी सभी जिलों के जिला विकास अधिकारियों को दी जाए, ताकि वे अपने स्तर पर कारगर उपाय कर सकें।
रिपोर्ट के मुताबिक, अलीगढ़, आजमगढ़, बहराइच, बलिया, बाराबंकी, देवरिया, फैजाबाद, गाजीपुर, गोंडा, गोरखपुर, जौनपुर, झांसी, ज्योतिबा फुले नगर, कुशीनगर, लखीमपुर खीरी, लखनऊ, महाराजगंज, मथुरा, मिर्जापुर, पीलीभीत, संत कबीरनगर, शाहजहांपुर, सिद्धार्थनगर, सीतापुर और उन्नाव आर्सेनिक से प्रभावित हैं।
बावजूद इसके, वाटर एंड सेनिटेशन मिशन ने इस गंभीर स्थिति का समुचित आकलन नहीं किया, जिससे प्रभावित बस्तियों में रहने वाले नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभावों की अनदेखी हुई। रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में 707 जगह आर्सेनिक प्रभावित हैं, जिनमें से 164 निवास स्थान ऐसे हैं जहां अब तक पाइप वाटर नहीं पहुंच पाया है।
राज्य में 44 बस्तियों में दिसंबर 2020 तक पाइप लाइन से पानी पहुंचाया जाना था और हैंडपंपों को हटाया जाना था, लेकिन आर्सेनिक प्रदूषित बस्तियों में हैंडपंपों को हटाने का काम अब तक पूरा नहीं हुआ है।
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश की 84 प्रतिशत आबादी को सुरक्षित पेयजल आपूर्ति नहीं मिल रही है, जबकि 90 प्रतिशत पेयजल भूमिगत स्रोतों से प्राप्त किया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश की 84 प्रतिशत जनसंख्या को अब भी घरों में नलों के जरिए सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। 90 प्रतिशत लोग पीने का पानी हैंडपंप या सबमर्सिबल पंप से प्राप्त कर रहे हैं। अत्यधिक जल दोहन के कारण भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिससे पानी में आर्सेनिक और अन्य विषैले तत्वों की मात्रा बढ़ रही है।
बढ़ रहा कैंसर व हृदय रोगों का खतरा
इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर इमरजेंसी मेडिसिन की क्लिनिकल प्रैक्टिस कमेटी की अध्यक्ष, डॉ. तामोरिश कोले के अनुसार, ” आर्सेनिक, जो अपने विषैले गुणों के लिए जाना जाता है, शरीर में धीरे-धीरे जमा होता है और समय के साथ हृदय सहित कई अंगों को प्रभावित करता है। आर्सेनिक ऑक्सीडेटिव तनाव, सूजन और एंडोथेलियल डिसफंक्शन को बढ़ावा देकर एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनियों में रुकावट) को बढ़ा सकता है, जिससे हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में सतर्क निगरानी, सख्त विनियमन और व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल की आवश्यकता है।”
एक संसदीय समिति ने भी केंद्र सरकार को आर्सेनिक और अन्य भारी धातुओं के भूजल और पेयजल में बढ़ते प्रदूषण के प्रति सचेत किया है। बिहार के नवादा संसदीय क्षेत्र के भाजपा सांसद विवेक ठाकुर की अध्यक्षता वाली इस समिति ने चेतावनी दी थी कि आर्सेनिक संदूषण प्रभावित क्षेत्रों में कैंसर, त्वचा रोग, हृदय रोग और मधुमेह जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ावा दे रहा है। जल शोध और अनुसंधान को बढ़ावा देने की जरूरत समिति ने प्रभावित क्षेत्रों में भूजल और पेयजल से आर्सेनिक, फ्लोराइड और अन्य भारी धातुओं को हटाने के लिए व्यापक अनुसंधान की आवश्यकता पर जोर दिया।
आईआईटी खड़गपुर के नए अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत के कुल भू-भाग के क़रीब 20 प्रतिशत में आर्सेनिक का स्तर जहरीला है और देश की 25 करोड़ से अधिक आबादी इस खतरे का सामना कर रही है। अध्ययन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुमान प्रणाली का उपयोग किया गया। यह अध्ययन “साइंस ऑफ द टोटल एनवायरोन्मेंट” जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
अध्ययन के नतीजों से संकेत मिलता है कि पूरे देश में आर्सेनिक स्तर के नमूने एकत्र करने के लिए अधिक जोरशोर से प्रयास करने की आवश्यकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, आर्सेनिक एक अत्यधिक जहरीला तत्व है, जिसकी लंबे समय तक उपस्थिति कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है।
अध्ययन में पाया गया कि भूजल में अत्यधिक आर्सेनिक की मात्रा वाले राज्यों में पंजाब (92%), बिहार (70%), पश्चिम बंगाल (69%), असम (48%), हरियाणा (43%), उत्तर प्रदेश (28%) और गुजरात (24%) शामिल हैं। आईआईटी खड़गपुर के एसोसिएट प्रोफेसर अभिजीत मुखर्जी के अनुसार, “भारत में भूजल में आर्सेनिक की अधिकता के कारण 25 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हो सकते हैं।”
अध्ययन दल ने सरकार के जल जीवन मिशन के तहत 27 लाख क्षेत्र मापन का उपयोग किया, जिससे स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति में सहायता मिलेगी।
क्या कर रही सरकार?
भारत सरकार ने आर्सेनिक प्रदूषण से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। सतत विकास लक्ष्यों के तहत वर्ष 2030 तक सभी नागरिकों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा, जल जीवन मिशन के अंतर्गत वर्ष 2024 तक ग्रामीण भारत के प्रत्येक घर में पाइपलाइन के माध्यम से स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल पहुंचाने की योजना बनाई गई थी। हालांकि यह योजना आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रभावित इलाकों में शुद्ध जल पहुंचाने में कामयाब नहीं हो सकी है।
केंद्र और राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद आर्सेनिक प्रदूषण की समस्या पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है और इसके समाधान के लिए ठोस रणनीति अपनाने की जरूरत है। बनारस के एक्टिविस्ट डॉ. लेनिन कहते हैं, “आर्सेनिक विषाक्तता से स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से कैंसर, त्वचा संबंधी रोग, हृदय रोग, मधुमेह और संज्ञानात्मक विकास से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
विशेष रूप से गर्भावस्था और बाल्यावस्था में इसके प्रभाव अधिक हानिकारक होते हैं, क्योंकि यह मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकता है और युवाओं में मृत्यु दर को बढ़ा सकता है।
डा.लेनिन यह भी कहते हैं, “आर्सेनिक विषाक्तता को चिकित्सा विज्ञान में ‘आर्सेनिकोसिस’ कहा जाता है, जिसमें शरीर में आर्सेनिक के लगातार जमा होने के कारण विभिन्न प्रकार की विकलांगताएं उत्पन्न हो सकती हैं और स्थिति गंभीर होने पर मृत्यु भी हो सकती है।
आर्सेनिक का खाद्य शृंखला में प्रवेश एक गंभीर स्वास्थ्य संकट है, जिससे निपटने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। सरकार, वैज्ञानिक समुदाय और आम जनता—सभी को मिलकर इस समस्या के समाधान के लिए प्रयास करने होंगे। आर्सेनिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति विकसित करनी होंगी, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस विषैले तत्व के प्रभाव से सुरक्षित रह सकें।”
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)