यह फ़िल्म मैंने पहले पोस्ट-प्रोडक्शन चरण में बिना म्यूजिक, एफएक्स या डीआई के देखी थी। मुझे लगा कुछ छूट रहा है क्योंकि भावनाओं का वैसा ज्वार दिख नहीं रहा था। इसलिए, मैं बड़े पर्दे पर फ़िल्म देखने फिर गया और केवल तब मैं महसूस कर पाया की फ़िल्म क्या कहना चाहती है।
एक बार फिर स्पष्ट कर दूं, यह फ़िल्म की समीक्षा नहीं है। एक फिल्मकार होने के नाते दूसरे फिल्मकार के कार्य की समीक्षा करना मुझे पसंद नहीं है। हर फिल्मकार की अपनी सोच, भावनाएं, विचारधारा और कला की समझ होती है। हर फ़िल्म को उन दायरों में देखना चाहिए।
मैं खुश हूँ की श्रीराम (राघवन) अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकले और थ्रिलर से हटकर भावनाओं पर केंद्रित फ़िल्म बनाई। एक फिल्मकार को एक ही जॉनर में बार बार फ़िल्म बनाकर ख़ुद को टाइपकास्ट नहीं करना चाहिए, बशर्ते कि उसका मकसद सिर्फ़ पैसा कमाना, जो कि अपने आप में ग़लत नहीं है, न हो। एक फिल्मकार के लिए रचनात्मक रूप से थक जाने से बुरा कुछ नहीं है।
इक्कीस पर लौटें, फ़िल्म धर्मेंद्र की आख़िरी यादगार जैसी लगती है। वह इसके हकदार भी थे। पाजी अपने बालों की सफेदी दिखाने में झिझकते हैं लेकिन मैं इसकी अनदेखी करने को तैयार हूं। उनकी गर्मजोशी, उनकी आँखों में दुख और लोगों के लिए उनका प्यार स्पष्ट रूप से सामने आता है। वह एक निश्चल व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं, जो आज की तारीख़ में एक दुर्लभ गुण है और शायद यही कारण है कि लोग उनसे इतने गहरे जुड़ते थे।
बायोपिक होने के कारण फ़िल्म की कुछ सीमाएँ हैं। जल्द ही यह पता चलने पर की धरम पाजी के बेटे की कम उम्र में मौत हो जाएगी, कहानी किस दिशा में और कैसे जाएगी, अनुमान लगाना आसान हो जाता है। मैं इस अनिवार्यता से बँधा महसूस कर रहा था हालांकि यह फ़िल्म से ज़्यादा जीवनी की कहानी की प्रकृति है।
मुझे लगा संगीत थोड़ा और अच्छा हो सकता था। इसके बावजूद, इस तरह की फ़िल्म बनाने के लिए हिम्मत चाहिए जिसमें फ़ार्मूला या तमाशा न हो, उसके बावजूद दर्शकों के दिलों को छू ले। श्रीराम ने यह हिम्मत दिखायी है।
यह कोई फैंटेसी युद्ध फ़िल्म नहीं है। यह एक नास्टैल्जिया केंद्रित फ़िल्म है जिसका ट्रीटमेंट वास्तविकता के करीब है। उस अर्थ में इक्कीस युद्ध की फ़िल्म नहीं है। यह युद्ध-विरोधी फ़िल्म है जिसमें उन्मादी देशभक्ति नहीं है जिसे हम देखने के आदी हैं। फ़िल्म परिपक्व और शालीन है और आक्रामकता या बदले के बजाय संयम और मानवीयता के प्रति झुकाव रखती है।
मुझे जिस बात ने छुआ वह दुःख की प्रस्तुति थी। फ़िल्म दिखाती है की एक पिता अपने बेटे को खोने का ग़म ज़िंदगी भर उठाता है।इसने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया की क्या ऐसे ज़िंदगी भर के ग़म को देशभक्ति के नाम पर सही ठहराया जा सकता है। एक युवा सैनिक की मौत, जो अपने पीछे कभी ना भरने वाले घाव छोड़ जाये, को क्यों अक्सर त्रासदी के बजाय विरासत के रूप में क्यों देखा जाता है। फ़िल्म समाप्त होने के बहुत देर बाद भी यह विचार मेरे साथ बना रहा।
फ़िल्म ने मुझे यह भी सोचने पर मजबूर किया कि हमारे समाज में बलिदान का विचार किस आसमान तरीके से फैला हुआ है। राजनीतिक या कारोबारी पृष्ठभूमि के बच्चों को सेना में शामिल होते हम कम ही देखते हैं लेकिन यही वर्ग हैं जो बलिदान और देशभक्ति का महिमामंडन सबसे ज़्यादा ऊँची आवाज़ में करते हैं। यह असुविधाजनक सवाल हैं। इक्कीस जैसी फ़िल्मों के पास इनके जवाब नहीं भी हो सकते हैं लेकिन वह आपको ठहरने और सोचने पर मजबूरी करती हैं।
-संजीवन एस लाल
(संजीवन एस लाल फ़िल्मकार हैं और बबलगम जैसी फ़िल्म बना चुके हैं। यह टिप्पणी उनकी फेसबुक पोस्ट से साभार ली गई है। अंग्रेज़ी से अनुवाद महेश राजपूत।)