अमेरिकी साम्राज्यवाद का अगला निशाना ग्रीनलैंड? आर्कटिक में शक्ति, संसाधन और संकेतों की राजनीति

अमेरिकी साम्राज्यवाद आज पुराने ढर्रे पर नहीं चलता। न सीधे कब्ज़ा, न औपनिवेशिक शासन। इसकी भाषा बदली है, तरीके बदले हैं। सैन्य ठिकाने, आर्थिक निर्भरता, राजनीतिक दबाव और सांस्कृतिक असर इसके औज़ार हैं। शीत युद्ध के बाद अमेरिका ने खुद को नियम-आधारित विश्व व्यवस्था का संरक्षक बताकर दुनिया भर में दख़ल को वैध ठहराया, लेकिन व्यवहार में यह व्यवस्था अक्सर उसी के हितों के हिसाब से ढाली गई।

लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व और अब आर्कटिक तक, एक ही सोच बार-बार झलकती है कि रणनीतिक भूभाग, संसाधन और मार्ग वैश्विक सुरक्षा के नाम पर उसके प्रभाव क्षेत्र में होने चाहिए।

इसी पृष्ठभूमि में वेनेज़ुएला के बाद एक और विवाद उभर रहा है ग्रीनलैंड का। केटी मिलर, जो राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल में माइक पेन्स की संचार निदेशक रह चुकी हैं और दूसरे कार्यकाल में डीओजीई की सलाहकार हैं, ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक तस्वीर साझा की। तस्वीर में ग्रीनलैंड अमेरिकी झंडे के सितारों और धारियों से ढका था, और उस पर सिर्फ एक शब्द लिखा था, “सून” (जल्द ही)।

यह पोस्ट अमेरिका की वेनेज़ुएला में सैन्य कार्रवाई के कुछ ही घंटों बाद आई। वॉशिंगटन में अटकलें तेज़ हो गईं और इस इशारे को विस्तारवादी मंशा से जोड़कर देखा जाने लगा।

यह विवाद किसी एक पोस्ट या किसी एक द्वीप तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वह पुरानी सोच दिखाई देती है जिसमें भूगोल को शक्ति और सुरक्षा के चश्मे से देखा जाता है। ग्रीनलैंड आज दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में है। जलवायु परिवर्तन यहां की बर्फ को पिघला रहा है, संसाधनों तक पहुंच आसान हो रही है और सैन्य रणनीतियां नए सिरे से गढ़ी जा रही हैं। ऐसे में ‘ग्रीनलैंड अगला?’ जैसे संकेतों को मज़ाक कहकर टालना आसान नहीं रह जाता।

केटी मिलर की पहचान यहां और अहम हो जाती है क्योंकि वे व्हाइट हाउस के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर की पत्नी भी हैं और रिपब्लिकन राजनीति में जानी-पहचानी मीडिया शख्सियत हैं। बिना किसी स्पष्टीकरण के डाली गई एक तस्वीर और एक शब्द ने यही सवाल खड़ा किया कि क्या यह निजी राय थी या किसी गहरी सोच का संकेत।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों की प्रतिक्रिया तीखी रही। डेनमार्क ने साफ कहा कि उसकी क्षेत्रीय एकता का सम्मान किया जाना चाहिए और ग्रीनलैंड न बिकाऊ है, न किसी के कब्ज़े की चीज़। ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार ने इसे गैर सम्मानजनक बताते हुए कहा कि उनका भविष्य किसी सोशल मीडिया पोस्ट से तय नहीं होगा। 

अमेरिका की ग्रीनलैंड में दिलचस्पी नई नहीं है। 1946 में औपचारिक प्रस्ताव आया था, जिसे डेनमार्क ने खारिज कर दिया। 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे फिर से सार्वजनिक रूप से उठाया। तब इतना तनाव पैदा हुआ कि डेनमार्क ने एक प्रस्तावित आधिकारिक दौरा तक रद्द कर दिया। आज भी दोनों देशों के बीच रक्षा समझौता है, जिसके तहत अमेरिकी सैन्य मौजूदगी संभव है, लेकिन यह किसी तरह का संप्रभु नियंत्रण नहीं देता।

ग्रीनलैंड की अहमियत तीन स्तरों पर समझी जा सकती है। पहला, सैन्य और रणनीतिक। आर्कटिक में अमेरिका, रूस और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। यहां स्थित थुले एयर बेस अमेरिकी मिसाइल चेतावनी प्रणाली का अहम हिस्सा है और शीत युद्ध से ही रणनीतिक नक्शे पर दर्ज है।

दूसरा, प्राकृतिक संसाधन। बर्फ के पिघलने के साथ दुर्लभ खनिज, यूरेनियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स तक पहुंच आसान हो रही है, जो भविष्य की तकनीक और हथियार प्रणालियों के लिए जरूरी हैं। तीसरा, नए समुद्री रास्ते। आर्कटिक में बर्फ कम होने से यूरोप और एशिया के बीच जहाज़ी मार्ग छोटे हो सकते हैं, जिससे वैश्विक व्यापार की दिशा बदलने की क्षमता पैदा होती है।

अंतरराष्ट्रीय कानून इस मामले में साफ है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत किसी क्षेत्र की संप्रभुता को बल या दबाव से नहीं बदला जा सकता। ग्रीनलैंड को आंतरिक स्वशासन प्राप्त है, जबकि विदेश नीति और रक्षा डेनमार्क के पास हैं। किसी भी तरह का बदलाव केवल वहां के लोगों की सहमति से ही संभव है। आत्मनिर्णय का सिद्धांत यहां निर्णायक है।

इस पूरे विवाद की खास बात यह है कि यह किसी आधिकारिक नीति दस्तावेज़ से नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक पोस्ट से पैदा हुआ। लेकिन आज की राजनीति में प्रतीक हल्के नहीं होते। वे सहयोगी देशों में अविश्वास पैदा करते हैं, छोटे क्षेत्रों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हैं और वैश्विक मंच पर किसी देश की छवि को प्रभावित करते हैं।

आख़िरकार, असली सवाल ग्रीनलैंड से बड़ा है। यह आर्कटिक के भविष्य का सवाल है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बर्फ हटाता जाएगा, वैसे-वैसे महाशक्तियों की दिलचस्पी और दबाव बढ़ेंगे। ग्रीनलैंड इस भू-राजनीतिक शतरंज की सबसे नाज़ुक बिसात है। आज अंतरराष्ट्रीय कानून उसके पक्ष में खड़ा है, लेकिन आने वाले समय में बयान तेज़ होंगे और “सून” जैसे शब्द बार-बार लौटेंगे।

यह बहस याद दिलाती है कि इक्कीसवीं सदी में भी भूगोल, संसाधन और शक्ति की राजनीति जीवित है। फर्क बस इतना है कि अब युद्ध से पहले संकेत आते हैं। नक्शों के रूप में, पोस्टों के रूप में और शब्दों के रूप में। सीमाएं अब सिर्फ कागज़ पर नहीं खिसकतीं, वे प्रतीकों के ज़रिये भी दबाव में लाई जाती हैं। ग्रीनलैंड का सवाल इसलिए अहम है क्योंकि यह तय करेगा कि आर्कटिक सहयोग का क्षेत्र बनेगा या शक्ति प्रदर्शन का नया मैदान।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं।)

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