वेबसीरीज–1: नए समय का साहित्य

(मौजूदा समय में मनोरंजन और फिल्म की दुनिया में वेबसीरीज ने अपनी एक अलग ही पहचान कायम कर ली है। यह पर्दे पर आने वाली फिल्मों से अगर अधिक नहीं है तो उससे किसी भी रूप में कम भी नहीं है। ये जितनी पॉपुलर हैं उतनी ही गहराई भी लिए हुए हैं। असर के स्तर पर घर-घर टीवी, लैपटॉप और मोबाइल पर देखी जाने वाली यह विधा किसी भी दूसरे से ज्यादा मजबूत है। और कुछ लोग तो इसे साहित्य की एक नई विधा या फिर उसके विस्तार के तौर पर देख रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं पत्रकार सचिन श्रीवास्तव। भोपाल में रहने वाले सचिन ने इन्हीं वेबसीरीज के अलग-अलग पक्षों को लेकर कुछ लिखा है। उसको यहां किश्तों में दिया जा रहा है-संपादक)

कभी साहित्य कागज पर उतरता था। स्याही में डूबा हुआ—धीमी, गहरी कहानी धैर्य मांगती थी। अब वही साहित्य स्क्रीन पर सांस लेता है; एपिसोडों में, सीजनों में, और हर एपिसोड एक अध्याय की तरह हमारे समय की नस टटोलता है।

वेबसीरीज दरअसल कहानियां नहीं हैं। वे समय के दस्तावेज हैं। ये वह साहित्य हैं, जो पाठक नहीं, दर्शक से बात करता है, और दर्शक भी अब निष्क्रिय नहीं है। वह गवाह है, सह-अपराधी है, कभी जज, कभी अभियुक्त।

जहां उपन्यास रुकता था, वहां वेबसीरीज शुरू होती है। उपन्यास के पास भाषा थी, वेबसीरीज़ के पास दृश्य है। उपन्यास में पात्र बोलते थे, यहां वे चुप्पी से स्वीकार करते हैं। एक लंबे शॉट में किसी किरदार का खाली चेहरा— पूरा पैराग्राफ है। एक अचानक आया कट— अल्पविराम है। एक सीजन का अंत— वह त्रासदी का अध्याय है, जिसके बाद पाठक नहीं, दर्शक भी बदल जाता है।

यहां नायक अब उजला नहीं रहा है। पुराने लिखित साहित्य में नायक आदर्श होता था या कम से कम बनने की कोशिश करता था। नए समय का नायक संशय में जीता है। वह अपराध करता है और उसे तर्क देता है। वह सत्ता चाहता है और उसे नैतिकता कहता है। वह परिवार के लिए झूठ बोलता है और खुद को सही ठहराता है। यह नायक दरअसल हमारी ही परछाई है। थोड़ी ज्यादा ईमानदार, थोड़ी ज्यादा नंगी। 

वेबसीरीज का संसार असल में यथार्थ का अतिरंजन है। यह यथार्थ का फोटो नहीं, उसका एक्स-रे है। यह हमें बताती है कि राजनीति भाषणों में नहीं, कमरों में खेली जाती है। कि तकनीक सुविधा नहीं, निगरानी है। कि पैसा सिर्फ मुद्रा नहीं, चरित्र है।

वेबसीरीज लक्षणा में कहती है— यह कहानी है। व्यंजना में फुसफुसाती है— यह तुम्हारी ही कहानी है।

आप देखेंगे कि इन दिनों जो ज्यादातर वेबसीरीज दर्शकों को लुभा रही हैं, वे सत्ता, अपराध और नैतिकता के ईर्द गिर्द बुनी गई हैं, हालांकि यह त्रिकोण नहीं, जाल है। और इसीलिए यह नए समय का साहित्य है, जो सत्ता को देवता नहीं मानता। वह उसे एक बीमार व्यवस्था की तरह दिखाता है। जहां हर हाथ गंदा है, बस दागों की गहराई अलग-अलग है। यहां अपराध रोमांच नहीं, एक आर्थिक मजबूरी है। नैतिकता कोई नियम नहीं, एक सौदा है— जो हालात के हिसाब से बदला जाता है।

तो असल में भाषा बदली है, आत्मा नहीं। कहा जाता है— यह साहित्य नहीं, मनोरंजन है। पर यही तो हर नए साहित्य के साथ कहा गया था। नाटक को भी कभी हल्का कहा गया, उपन्यास को भी। आज वेबसीरीज उसी आरोप के कटघरे में है।

पर असल में यह वह साहित्य है जो लंबी सांस ले सकता है। जिसे किरदार को समझाने के लिए तीन सौ पन्ने नहीं, तीन सीजन मिल जाते हैं।

दर्शक ही अब नया पाठक है। अब पाठक अकेला नहीं पढ़ता। वह चर्चा करता है, विश्लेषण करता है, सोशल मीडिया पर बहस करता है। वह तय करता है कौन सही था, कौन गलत। वह कहानी का उपभोक्ता नहीं, उसका सह-निर्माता बन चुका है।

और इसीलिए यह साहित्य जरूरी है? क्योंकि यह हमें असहज करता है। क्योंकि यह साफ समाधान नहीं देता। क्योंकि यह कहता है— मैं आईना हूं। मुझे तोड़ सकते हो, चेहरा नहीं बदल सकते। यह नया साहित्य सांत्वना नहीं देता— सवाल छोड़ जाता है। और सवाल किसी भी समय की सबसे ईमानदार कविता होते हैं।

।।और अंत में।।

वेबसीरीज कोई क्षणिक फैशन नहीं। यह हमारे समय का सबसे जीवित साहित्य है। जो डरता नहीं, संकोच नहीं करता, और हमें वही दिखाता है जिससे हम नजर चुराते आए हैं। कागज से स्क्रीन तक का यह सफर साहित्य का पतन नहीं, उसका विकास है। क्योंकि हर युग अपनी भाषा चुनता है और यह युग वेबसीरीज में लिख रहा है।

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