डेरेक ओ’ब्रायन का लेख : अनसेंसर्ड, मेरा नया स्तंभ जो प्रकाशित नहीं हो सका 

“समाचार वही है जो कोई कहीं दबाना चाहता है, बाक़ी सब विज्ञापन है।” – अल्फ्रेड हर्म्सवर्थ, डेली मेल और डेली मिरर के संस्थापक 

अब यह देखिए: दूषित पेयजल से मौतों के संबंध में एक स्पष्ट सवाल के जवाब में एक राज्य सरकार में एक मंत्री एक वरिष्ठ पत्रकार को बेहद अहंकारी जवाब देता है। पत्रकार क्लिप सोशल मीडिया में साझा करता है। मीडिया हाउस भी अपने आधिकारिक हैंडल से क्लिप साझा करता है। पत्रकार के साहस और कटिबद्धता के लिए उसे भरपूर समर्थन मिलता है। मीडिया हाउस सोशल मीडिया पोस्ट हटा देता है। 

ईमानदारी से कहें तो, मीडिया हाउस ने स्टोरी नहीं हटायी और न ही रिपोर्टर के ख़िलाफ़ कोई एक्शन लिया। और रिपोर्टर ने भी फॉलोअप स्टोरी की। लेकिन मीडिया के संदर्भ में क्या हुआ, इसे समझने के लिए यह आंकड़े देखिए। भारत में 900 निजी टीवी चैनल हैं, उनमें से आधे समाचार सेवा को समर्पित हैं। इक्कीस करोड़ घरों में टीवी सेट हैं। फिर सोशल मीडिया है, जो आबादी के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के लिए समाचार प्राप्ति का एक प्रमुख स्रोत बन चुका है।रायटर्स इंस्टिट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में दस में से सात लोग समाचार सामग्री ऑनलाइन प्राप्त करना पसंद करते हैं और उनमें से आधे सोशल मीडिया पर निर्भर करते हैं। 54 फ़ीसदी यूट्यूब पर, 48 फ़ीसदी व्हाट्सऐप पर और 35 फ़ीसदी फेसबुक पर समाचार देखते/पढ़ते हैं। इन संख्याओं से आप समझ सकते हैं की सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट डिलीट करने के क्या मायने हो सकते हैं। 

आइए, इस बात को साफ़-साफ़ कहते हैं। जब एक मीडिया हाउस एक वीडियो क्लिप अपने मीडिया हैंडल से डिलीट करता है तो यह आग बुझाने के लिए उस पर पानी डालने जैसा है। इससे सवाल उठता है: क्या संपादकीय स्वतंत्रता की कॉर्पोरेट मीडिया स्वामित्व की वेदी पर बलि दी जा रही है? जब शक्तिशाली समूह, जो कई सेक्टर में बड़े कारोबार संचालित करते हुए मीडिया कंपनियों में हिस्सेदार होते हैं तो क्या यह स्वाभाविक नहीं है कि वह अपने लिए कोई मुश्किल नहीं खड़ी करना चाहेंगे?

कुछ दिलचस्प आंकड़े देखें। 2024 में, समाचार चैनलों के चुनाव पूर्व समाचारों के विश्लेषण में पता चला कि आधे से ज़्यादा समाचार विपक्ष-विरोधी विषयों पर थे, 27 फ़ीसदी सरकार समर्थक विषयों पर और केवल 1 फ़ीसदी रोज़गार व शिक्षा जैसे ठोस मुद्दों पर। जैसा कि आपके इस स्तंभकार ने संसद में कहा था, “एक पुरानी जुलु कहावत है। मीडिया मालिकों के साथ समस्या यह है। मुँह में हड्डी के साथ कुत्ता भौंक नहीं सकता।”

विश्व प्रेस आज़ादी सूचकांक 2025 में भारत का नंबर 180 देशों में से 151 पर था। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के भारत प्रोफाइल में कहा गया था, “हर साल अपने कार्य के लिए औसत दो से तीन पत्रकारों के मारे जाने के साथ, भारत मीडिया के लिए सबसे खतरनाक देशों में से एक है। पत्रकार जो सरकार के प्रति आलोचनात्मक रूख रखते हैं, उन्हें अक्सर ऑनलाइन प्रताड़ना, धमकियों और शारीरिक हमलों के साथ-साथ आपराधिक मुकदमों तथा मनमानी गिरफ़्तारियों का भी सामना करना पड़ता है। वह पुलिस अधिकारियों से लेकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आपराधिक समूहों व भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों तक की हिंसा के शिकार हो सकते हैं।”

सेंट्रल हॉल (अब बंद हो चुका है) में अक्सर समाचार संस्थानों के लिए एजेंडा तय करने में सत्तारूढ़ पार्टी के प्रभाव के किस्से सुने जा सकते थे। दिवंगत अरुण जेटली का सेंस ऑफ़ ह्यूमर अनोखा था, इसलिए हम भी जब उन्हें प्लांटेशन मैनेजर (मीडिया में कथित रूप से भाजपा समर्थक समाचार प्लांट करने के लिए) कहते थे तो वह हंस देते थे और बटर टोस्ट और कॉफ़ी के दूसरे दौर का ऑर्डर दे देते।

यह हँसी का मामला नहीं है। यदि लोकतंत्र का चौथा खंभा समर्पण के लिए दबाया जाता है तो भारत में लोकतंत्र का मूल कमजोर हो जाएगा। 

पुनश्च : भारतीय मीडिया पर कोई भी टिप्पणी इस एक तथ्य के उल्लेख के बिना पूरी नहीं हो सकती: भारत के प्रधानमंत्री, जो अपने तीसरे कार्यकाल में हैं, का अभी प्रेस कांफ्रेंस करना बाक़ी है।

(सांसद, राज्यसभा में तृणमूल संसदीय दल नेता डेरेक ओ’ब्रायन का लेख उनकी वेबसाइट से साभार। अंग्रेज़ी से अनुवाद : महेश राजपूत। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)

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