समृद्धि यात्रा से क्या संदेश दे रहे नीतीश कुमार?

विपक्ष की ओर से पिछले साल 2025 में फैलाई गईं अफवाहें—कि नीतीश कुमार बीमार हैं, भाजपा उन्हें सीएम का चेहरा नहीं बनाएगी, बिहार के मतदाता उन्हें चुनेंगे ही नहीं—सब बेकार साबित हुईं। चुनावी जीत के बाद भी ये नैरेटिव थमे नहीं। अब 2026 की शुरुआत में रिटायरमेंट की बातें जोर पकड़ रही हैं। लेकिन नीतीश कुमार अलग ही मूड में हैं। चुनाव के दौरान दिए जवाबों के बाद अब वे बड़े स्तर पर जमीनी स्तर पर उतर रहे हैं।

कड़ाके की ठंड और कनकनी के बावजूद यात्रा का ऐलान

पूरे बिहार में कनकनी से लोग परेशान हैं। बच्चों के स्कूल भले खुल रहे हैं, लेकिन बुजुर्गों को घर से निकलने से बचने की सलाह बिहार सरकार ने जारी की है। अगले हफ्ते से 10 दिनों के अंदर बारिश की भी आशंका है। ठंड में फिलहाल राहत के आसार नजर नहीं आ रहे। ऐसे में नीतीश कुमार ने अपनी अगली यात्रा का शेड्यूल जारी कर दिया है। 16 जनवरी को नेपाल सीमा से सटे पश्चिम चंपारण से उनकी ‘समृद्धि यात्रा’ शुरू होगी। 17 जनवरी को वे पूर्वी चंपारण पहुंचेंगे।

भारत रत्न की मांग से जदयू में हड़कंप; पार्टी ने क्यों तोड़ा नाता?

जदयू के पूर्व सांसद और राजनीतिक सलाहकार केसी त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग की। 10 जनवरी को केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा, “भारत रत्न नीतीश कुमार। ये शब्द सुनने में कितना अच्छा लगेगा न। हमें पूरा भरोसा है कि अपने फैसले से सबको चौंका देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ‘भारत रत्न’ से नवाजेंगे और एक बार फिर सबको चौंका देंगे।”

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी नीतीश को भारत रत्न के काबिल बताया। उन्होंने कहा, “हालांकि यह किसी की मांग या आग्रह से संभव नहीं है। इस सर्वोच्च सम्मान को देने की बाकायदा प्रक्रिया है।” नीतीश के नाम पर भारत रत्न की मांग कोई नई नहीं, लेकिन इस बार मामला गर्म हो गया। सीनियर लीडर केसी त्यागी की बात दोहराने पर जदयू अचानक असहज हो गई। पार्टी ने सफाई दी और यहां तक कि उनसे नाता तोड़ने की बातें होने लगीं।

मुश्किलों के बावजूद नीतीश क्यों बने हुए प्रासंगिक?

नीतीश कुमार के सार्वजनिक भाषणों का रिकॉर्ड देखें तो वे आत्मविश्वास से भरे और अच्छी हिंदी बोलने वाले नेता लगते थे। लेकिन 2025 चुनाव में बढ़ती उम्र का असर साफ दिखा। मीडिया से दूरी, मंचों पर हाव-भाव पर सवाल उठे। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव उन्हें “अचेत मुख्यमंत्री” कहते रहे। फिर भी 2025 चुनाव नतीजों ने सारा नैरेटिव बदल दिया।

सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा की सक्रियता के बावजूद नीतीश की यह यात्रा भाजपा के लिए परेशानी बन गई है। हिंदी पट्टी का इकलौता सूबा बिहार वहां है जहां भाजपा न कभी सरकार बना पाई, न ही उसका मुख्यमंत्री बन सका। छोटे मोदी कहे जाने वाले सुशील मोदी से शुरू हुई यह परंपरा तारकिशोर प्रसाद, रेणु देवी, वीके सिन्हा और सम्राट चौधरी तक चल रही है। लेकिन भाजपा की दाल यहां अकेले कभी नहीं गलती।

(राहुल गौरव पटना (बिहार) से पत्रकार हैं।)

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