ट्रंप के टैरिफ की मार : अमेरिकी सेना का बैज बनाने की बनारस की कला चली गई पाकिस्तान!

माज़िद अली की आखों में ग़म और हताशा का मिश्रित अक्स साफ़ झलक रहा था। बनारस की धूप से तपती गलियों में वह अपने पुराने कारख़ाने के बीच खड़े थे, जहां कभी ज़िंदादिली और मेहनत की आवाज़ें गूंजती थीं। यह वही कारख़ाना था जो वर्षों से अमेरिकी सेना के बैज तैयार करता आया था। यहां की हर सिलाई, हर धागा, हर नक़्क़ाशी बनारस की कला और कारीगरी का जीता-जागता प्रतीक थी। मगर माजिद अली के कारखाने की गूंज अब ख़ामोश होने लगी है।

जानते हैं क्यों? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए भारी-भरकम टैरिफ के चलते अमेरिकी सेना का बैज बनाने की दशकों पुरानी कला अब पाकिस्तान चली गई है।

ट्रंप ने जब से भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया है तब से बनारस के परंपरागत बैज उद्योग की धड़कन थम गई है। यह वही शहर है जहां कभी कारीगरों की सूक्ष्म मेहनत और बारीक कौशल से तैयार अमेरिकी सैन्य बैजों की मांग विश्व में होती थी जो अब इसी विरासत के बोझ तले दब गया है। भारी-भरकम टैक्स और अचानक आर्थिक बाधाओं के चलते अमेरिकी ऑर्डर ठप हो गए। अमेरिकी कारोबारी अपने देश के सेना का बैज बनवाने के लिए बनारस के बजाय पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की फैक्ट्रियों की ओर रुख करने लगे।

अमेरिकी बैज बनाने के फनकार माजिद अली बताते हैं कि बनारसी कारीगरी की हूबहू नकल करते हुए पाकिस्तान में वही बैज बनने लगे हैं। बैज बनाने की वो कला जो कभी बनारस की गलियों और कारीगरों के पसीने से सजी होती थी। सिर्फ अमेरिका ही नहीं, दुनिया के कोनों-कोनों तक पहुंचती थी। अब बनारसी कारीगर सिर्फ़ यादों में ही अपने हाथों की मेहनत को देख सकते हैं, जबकि उनके बनाए हुये बैज की चमक कहीं और खिल रही है।

माज़िद कहते हैं, “हम सिर्फ़ कारोबार ही नहीं, अपनी पहचान भी खो रहे हैं। हमारी विरासत अब कहीं और बिक रही है। हमारा हर बैज, हर डिज़ाइन अब पाकिस्तान की फैक्ट्रियों में बनने लगा है। वही बैज जो कभी बनारस से दुनिया भर में जाता था।”

बनारस में पहले अमेरिकी बैज बनाने वाले जरदोजी कला के करीब 4,500 से 5,000  फनकार हुआ करते थे। उनके हाथों की मेहनत न केवल परिवार का सहारा थी, बल्कि पीढ़ियों की विरासत का प्रतीक भी। अब मुश्किल से 200 कारीगर बचे हैं। उनमें से भी कई मजबूरी में खाड़ी देशों की ओर चले गए हैं। कुछ ने काम छोड़ दिया है और जो बचे हैं वे सिर्फ़ अपनी विरासत बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

शिवाला की गली में कदम रखते ही बीते समय की महक महसूस होती है। माजिद अली के कारखाने की दीवारों पर चूने की पुरानी परतें झर रही हैं और हल्की सीलन की गंध हर कोने में फैली है। संकरी कोठरी में कुछ लोग कारचोप पर बैज पर कढ़ाई कर रहे थे। उनके हाथों की हरकतें मशीनी थीं, लेकिन आंखों में सूनापन था।

परिवारों पर असर

63 वर्षीय माज़िद ने बताया, “हमारे दादा हाफ़िज़ वाहिद अली के जमाने से यह इंब्रायडरी का काम चला आ रहा है। बैज बनाने की कला ब्रिटिशकाल में खूब फली-फूली। मेरे पिता सैयद शाहिद अली ने इसे आगे बढ़ाया, लेकिन अब विरासत बचाना कठिन हो गया है।”

माज़िद के कारखाने में जमी धूल, पुरानी अलमारियां और टेप रिकॉर्डर बीते कल की गवाही देते हैं। माज़िद ने हल्की मुस्कान के साथ दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए कहा, “पहले यहां बोर्ड टंगा था ‘न्यू गोल्डेन इंब्रायडरी वर्क्स-शिवाला, वाराणसी’ जो अब गिर गया है। हमारा घर कैसे चलता है, यह हमारा दिल जानता है? हमारे काम की कीमत अब इतनी कम है कि गुजारा मुश्किल है।”

माज़िद अली के तीन बेटे हैं। बड़ा बेटा राहिल दुबई में फैशन डिजाइनर है, जबकि आदिल और सुऐब प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं। माज़िद कहते हैं, “हमने अपने बच्चों को अमेरिका बैज बनाने का हुनर नहीं सिखाया, क्योंकि भविष्य अंधकार में था। पहले कलाकारों को अनुदान मिलता था और अब केवल जीएसटी का बोझ है।”

माज़िद की आंखों में आंसू और ग़म के साथ जिंदा रह जाने की ललक भी है। वो कहते हैं, “हम हार नहीं मानेंगे। यह कला, यह विरासत कहीं न कहीं जिंदा रहेगी। लेकिन सच कहूं तो हर दिन यह दर्द बढ़ता जा रहा है कि एक ज़माना था, जब बनारस ही विश्व का केंद्र था। हम कोशिश करेंगे कि यह कला कहीं न कहीं जिंदा रहे।”

रफ़ीक़ अहमद जो करीब तीस वर्षों से इस पेशे में हैं। वो बताते हैं, “हमारा हुनर अब पाकिस्तान और यूरोप की कुछ फैक्ट्रियों में बिक रहा है। हमारे हाथों का काम अब किसी और के हाथों में है। यह सिर्फ़ आर्थिक नुकसान नहीं, हमारी पहचान का ह्रास है।”

रफीक यह भी बताते हैं कि पाकिस्तान में अमेरिकी बैज बनाने के हमारे पुश्तैनी धंधे को इसलिए छीन लिया क्योंकि अमेरिका के इशारे पर वहां रातो-रात बड़े पैमाने पर कारखाने खुल गए। पाकिस्तान सरकार निर्यात उद्योग को खुलकर सहारा दे रही है। वहां बिजली सस्ती है, टैक्स में छूट है और लॉजिस्टिक सपोर्ट है। बनारस में बैज बनाने का ज़्यादातर काम घरों में होता रहा। यही इसकी खूबसूरती थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई।

बनारस के बैज उद्योग की यह कहानी केवल आर्थिक नुकसान का नहीं है। यह कला, संस्कृति और पहचान को छीनने वाला भी है। यह एक ऐसा उद्योग था जिसने दशकों तक बनारस की गलियों और मुहल्लों में जिंदादिली, उत्साह और मेहनत का जादू बिखेरा। अब वही गलियां ख़ामोश हैं। बच्चों की पढ़ाई, परिवार का पालन-पोषण और सम्मान अब मुश्किल से चल पा रहा है। “हमारी मेहनत अब यादों में बसी है। हर सुबह उठकर धागे और धातु को संभालना व्यर्थ सा लगता है।”

खामोश हैं बनारस की गलियां

19वीं सदी में बनारस में बैज बनाने की कला का जलवा पूरे विश्व में था। तब करीब 50,000 मुस्लिम फनकार जरदोजी के काम काम में लगे हुए थे। मौजदा समय में मुश्किल से 60-70 कारीगर ही अपने हुनर को दिखा रहे हैं। बनारसी बैज जैसी नाजुक कारीगरी और सूक्ष्म डिज़ाइन दुनिया में कहीं नहीं मिलती। मगर आज यह उद्योग इतना कमजोर हो गया है कि रोज़ी-रोटी चलाना भी मुश्किल हो गया है।

एक कारीगर दिनभर में मुश्किल से एक-डेढ़ बैज बना पाता है और मेहनताना दो-तीन सौ रुपये जो पहले परिवार का पेट भरने के लिए पर्याप्त था, लेकिन अब गुजारे के लिए कम पड़ता है। इस छोटे से कारखाने की खामोशी और बीते कल की यादें यह इशारा कर रही थीं कि एक दौर अपने अंतिम पड़ाव पर है। बनारस की गलियां अब मौन हैं। वो गलियां जहां कभी बुनकरों की आवाज़ें गूंजती थी। उनके उत्साह और समर्पण के गीत सुनाई देते थे। माज़िद अली जैसे कुछ बचे लोग यादों के सहारे जी रहे हैं।

माज़िद अली के कारखाने में काम कर रहे 55 वर्षीय मोहम्मद रिजवान ने कहा, “मैं दस साल की उम्र से यह काम कर रहा हूं। पहले बड़े-बड़े ऑर्डर मिलते थे, अब सिर्फ लोकल काम बचा है। उसी से किसी तरह परिवार चल रहा है।”

रिजवान बताते हैं, “अगर दो-ढाई सौ रुपये का काम मिल जाए तो खुद को खुशकिस्मत समझते हैं। लेकिन हारी-बीमारी का खर्चा सिर पर आ जाए तो कलेजा मुंह को आने लगता है। कुछ साल पहले तक भदैनी मुहल्ले में करीब तीन सौ लोग जरदोज़ी का काम करते थे, अब मुश्किल से आठ-दस फनकार बचे हैं। बनारस की गलियों में फैली यह कला धीरे-धीरे सिमट रही है और इसके साथ ही खत्म हो रही हैं उन हाथों की कहानियां, जिन्होंने कभी इस शहर को अपने हुनर से रोशन किया।”

दम तोड़ रही पारंपरिक कला

भदैनी के बाद मछोदरी क्षेत्र की तंग और ऊबड़-खाबड़ गलियों से होते हुए हम अमेरिकी बैज बाने वाले कारीगरों से मिलने छित्तनपुरा पहुंचे। एक कारखाने का दरवाज़ा खटखटाते ही भीतर मौजूद हर चेहरे पर संघर्ष की लकीरें साफ़ दिखीं। यहीं हमारी मुलाक़ात महबूब अंसारी से हुई जो वर्षों से ज़रदोज़ी से बैज और अन्य कलात्मक वस्तुएं बना रहे हैं।

महबूब कहते हैं, “मैं दशकों से इस पेशे में हूं। साल 1943 से बनारस में जरदोजी से बैज बनाने का पारंपरिक कारोबार चला आ रहा है। मेरे दादा-परदादाओं ने इस कला को ज़िंदा रखा, लेकिन अब मशीनीकरण के चलते यह काम धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है। नई पीढ़ी कड़ी मेहनत और कम आमदनी के कारण इसमें दिलचस्पी नहीं लेती। नतीजतन कारीगरों की संख्या घटती जा रही है।”

वे आगे कहते हैं, “समय के साथ हर कला ने खुद को आधुनिक दौर के अनुरूप ढालने की कोशिश की, लेकिन ज़रदोज़ी वक्त के थपेड़ों के आगे कमज़ोर पड़ गई। अगर इसे बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वह दिन दूर नहीं जब यह कला सिर्फ़ किताबों में पढ़ने या कहानियों में सुनने तक सिमट जाएगी। सच यह है कि यह कला पूरी तरह मुस्लिम कारीगरों के प्रयासों से ही जिंदा है। अगर यह समुदाय पीछे हटा तो यह कला हमेशा के लिए मिट जाएगी।”

छित्तनपुरा के प्रसिद्ध ज़रदोज़ी कारीगर हेशामुद्दीन अंसारी अपने उत्पाद विदेशों में निर्यात करते हैं। वे बताते हैं, “हम दशकों से ज़रदोज़ी से बैज बनाने के व्यवसाय में हैं। हमारी फर्म हाथ से बने ज़रदोज़ी उत्पाद निर्यात करती है। यह हमारा पारिवारिक कारोबार है। हम पुलिस, सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए बैज और वाइज़र बनाते हैं।”

हेशामुद्दीन यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, चीन, हांगकांग और रूस सहित कई देशों में उत्पाद भेजते हैं। कहते हैं, “रूस की सैन्य वर्दियों और बैजों पर भी हमने कढ़ाई की है। फैशन इंडस्ट्री में भी हमारी कला ने जगह बनाई है। डॉल्सन और पोलो जैसी बड़ी कंपनियों के लिए हमने जैकेट, ब्लेज़र और जींस पर काम किया है। महामारी ने काम को प्रभावित किया। अमेरिकी टैरिफ ने हमारे हुनर का दिवाला ही पीट दिया।”

अंसारी बताते हैं कि, “बनारस में पहले यह उद्योग बड़ा था और बड़े ऑर्डर मिलते थे। अब प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है और सस्ती कीमतों पर माल बनाने वाली नई कंपनियां आ गई हैं, जिससे काम प्रभावित हुआ है। बनारस में अब लगभग 40 परिवार ही इस पेशे से जुड़े हैं। यह घरेलू उद्योग है जहां पुरुष-महिलाएं मिलकर काम करते हैं। मेहनत ज़्यादा और आमदनी सीमित होने के कारण नई पीढ़ी इसमें कम रुचि ले रही है।”

“सरकार की ओर से कोई विशेष सहयोग नहीं मिलता, जो कारीगरों को प्रोत्साहित करे। बैज बनाने की प्रक्रिया भी जटिल है। ज़री सूरत और दिल्ली से आती है। कई चरणों से गुजरकर बैज तैयार होते हैं। महीन और मोटी-दोनों तरह की ज़री बनाने में चांदी, सोना और अन्य धातुओं का उपयोग होता है। आज चीन मशीनों से ज़रदोज़ी बनाता है, जबकि हम हाथ से सूक्ष्म कढ़ाई करते हैं। मशीन-निर्मित और हस्तनिर्मित बैज में ज़मीन-आसमान का अंतर है।

दिलचस्प यह है कि चीन मशीन से ज़रदोज़ी करने के बावजूद अमेरिका हमें ही ऑर्डर भेजता था, लेकिन ट्रंप की जिद ने हमारे हुनर को पाकिस्तान की ओर जाने पर मजबूर कर दिया।”

हेशामुद्दीन आगे कहते हैं, “हमारे साथ कई कारीगर वर्षों से जुड़े हैं और उनकी रोज़ी-रोटी इसी पर निर्भर है। हम लगातार इस कला को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। हमें लगता है कि सरकार थोड़ा ध्यान दे तो यह पेशा कभी खत्म नहीं होगा। यह पारंपरिक शिल्प है और इसके लिए बाज़ार हमेशा रहेगा। अमेरिका में भले ही हमारे उत्पाद नहीं बिक पा रहे हैं, लेकिन हम खाड़ी देशों के अलावा यूके में अपने उत्पादों को निर्यात कर रहे हैं। हमारे हुनर की चीन में भी डिमांड है। इसलिए हम इसे जीवित रखने के प्रयास जारी रखे हुए हैं।”

बनारस के पठानी टोला की तंग गलियों में आज भी ज़रदोज़ी का काम होता दिखता है। यहां के कारीगरों से बातचीत में सामने आया कि बढ़ती महंगाई, कम मज़दूरी और सरकारी “उपेक्षा” इस कला को धीरे-धीरे खत्म कर रही है। इन गलियों में रहने वाले बुज़ुर्ग कारीगर इज़हार कहते हैं, “हमने बचपन से यह हुनर सीखा-सुई-धागों से रेशम को सजाना, लेकिन मुनाफ़ा न होने के कारण नई पीढ़ी इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहती।”

इजहार बताते हैं, “कम कमाई के कारण युवा इसमें नहीं आते। जो कभी ज़रदोज़ी के उस्ताद थे वो आज रिक्शा चला रहे हैं अथवा उन्होंने चाय-पान की दुकानें खोल ली हैं। कई फनकार रोज़गार की तलाश में दूसरे शहरों में दिहाड़ी मज़दूर बन गए हैं। अब मुश्किल से 50-60 कारीगर ही बचे हैं।”

ज़ेरदोज़ी कारीगर मोहम्मद साक़िर कहते हैं, “हम बचपन से यह काम करते आ रहे हैं, लेकिन अब परिवार पालना मुश्किल हो गया है। पहले लागत निकल जाती थी। अब मुनाफ़ा इतना कम है कि बच्चों को स्कूल भेजना भी कठिन है।”

सरकार की कथित उदासीनता ने कारीगरों की पीड़ा और बढ़ा दी है। पहले इस शिल्प के लिए सरकारी सहायता मिलती थी, लेकिन अब वह कथित तौर पर समाप्त हो चुकी है। किसी तरह की सब्सिडी या सहयोग न मिलने से कारीगर हताश हैं।

कारोबारियों का कहना है कि पहले अमेरिका जैसे देशों से बड़े-बड़े ऑर्डर आते थे, लेकिन युद्ध और आर्थिक अस्थिरता के डिमांड नहीं के बराबर रह गई है। हमारे उत्पादों की मांग आज भी है, लेकिन कारीगर कम रह गए हैं। नए कारीगर तैयार नहीं हो रहे और पुराने या तो उम्रदराज़ हो चुके हैं या दूसरा काम करने को मजबूर हैं।

चौहट्टा के आफताब के पास एक कारचोब है। आफताब और उनके साथ कुछ कारीगर जरदोजी का काम कर रहे थे। लेकिन लॉकडाउन के कारण सभी काम अचानक ठप्प हो गया। कारचोब के मालिक और दूसरों के कारचोब पर काम करने वाले कारीगरों के पास कोई काम नहीं है।

कोयला बाजार के शाहिद जमाल बैनर का डिज़ाइन बनाते हैं। ये डिज़ाइन वह जरदोजी का काम करने वालों को देते हैं। कारीगर इस पर जरदोजी का काम करते हैं। जमाल को ऑर्डर विदेशी ग्राहकों से मिलता है। उनके अधिकांश ग्राहक इंग्लैंड, जर्मनी और बेल्जियम के हैं। लॉकडाउन से पहले वे महीने में 10000-15000 रुपए कमाते थे। अब वे मुश्किल से 2000-4000 रुपए कमा पाते हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त ऑर्डर नहीं मिल रहा है।

गनी ने कहा कि हम जिस काम में हैं वह लगातार संकट में पड़ता जा रहा है। नए-नए ढर्रे चल रहे हैं। कब यह भी बंद हो जाए पता नहीं। लॉकडाउन के दौरान हम कैसे जिए इसे क्या बताएं। कोई सरकारी योजना नहीं है। यहाँ तक कि बाज़ार में इसकी डिमांड भी घट रही है। अभी दो-ढाई से ज्यादा काम नहीं हो पाता। कोई पूंजी नहीं है। यह कारचोब और कमरा है। अपना हुनर है लेकिन उसकी कीमत लगातार घट रही है।

शाहिद समझाते हैं ‘काम पूरा करके भेज देते हैं लेकिन पेमेंट दो या तीन महीने बाद ही होता है। उनका काम 10-15 दिन में पूरा हो जाता है, उसके बाद सामान को ग्राहक तक पहुँचने में और 10-15 दिन का समय लगता है और उसके बाद पेमेंट होता है। इसके कारण उन्हें आर्थिक परेशानी होती है। शाहिद को लगता है कि सरकार को हमारी कोई फिक्र नहीं है।

चौहट्टा के आफताब के पास एक कारचोब है। आफताब और उनके साथ कुछ कारीगर जरदोजी का काम कर रहे थे। लेकिन लॉकडाउन के कारण सभी काम अचानक ठप्प हो गया। कारचोब के मालिक और दूसरों के कारचोब पर काम करने वाले कारीगरों के पास कोई काम नहीं है।

कोयला बाजार के शाहिद जमाल बैनर का डिज़ाइन बनाते हैं। ये डिज़ाइन वह जरदोजी का काम करने वालों को देते हैं। कारीगर इस पर जरदोजी का काम करते हैं। जमाल को ऑर्डर विदेशी ग्राहकों से मिलता है। उनके अधिकांश ग्राहक इंग्लैंड, जर्मनी और बेल्जियम के हैं। लॉकडाउन से पहले वे महीने में 10000-15000 रुपए कमाते थे। अब वे मुश्किल से 2000-4000 रुपए कमा पाते हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त ऑर्डर नहीं मिल रहा है।

गनी ने कहा कि हम जिस काम में हैं वह लगातार संकट में पड़ता जा रहा है। नए-नए ढर्रे चल रहे हैं। कब यह भी बंद हो जाए पता नहीं। लॉकडाउन के दौरान हम कैसे जिए इसे क्या बताएं। कोई सरकारी योजना नहीं है। यहाँ तक कि बाज़ार में इसकी डिमांड भी घट रही है। अभी दो-ढाई से ज्यादा काम नहीं हो पाता। कोई पूंजी नहीं है। यह कारचोब और कमरा है। अपना हुनर है लेकिन उसकी कीमत लगातार घट रही है।

शाहिद समझाते हैं ‘काम पूरा करके भेज देते हैं लेकिन पेमेंट दो या तीन महीने बाद ही होता है। उनका काम 10-15 दिन में पूरा हो जाता है, उसके बाद सामान को ग्राहक तक पहुँचने में और 10-15 दिन का समय लगता है और उसके बाद पेमेंट होता है। इसके कारण उन्हें आर्थिक परेशानी होती है। शाहिद को लगता है कि सरकार को हमारी कोई फिक्र नहीं है।

शिवाले में अभी जिंदा है कारीगरी

शिवाला के इलाके में कई छोटे-छोटे कारखाने में मिले जो एक कमरे में चल रहे थे। एक कमरे में लगे तीन कारचोब पर नौजवान कारीगर कढ़ाई कर रहे थे। यह सलवार का कपड़ा था और इसमें साधारण धागे से कढ़ाई हो रही थी। रियाज नामक कारीगर ने बताया कि वह बीस साल से यह काम कर रहे हैं। उनके साथ दूसरे कारचोब पर काम कर रहे सनी को यह काम करते पंद्रह साल हो चुके हैं। दोनों ने बताया कि यह हल्का काम है। इसमें ही गुजारा हो जाता है। भारी काम नहीं आता है।

काम से जुड़ी बहुत सी बातों पर उन्होंने कोई तवज्जो नहीं दी बल्कि यह बताया कि अधिक बारीक जानकारी के लिए हमें शिवाला के बड़े कारीगरों से मिलना पड़ेगा।

दम तो़ड़ रही बनारस की शाही कला

ज़री ज़रदोज़ी एक पारंपरिक कढ़ाई की कला है, जिसमें सोने और चांदी के धागों का उपयोग करके वस्त्रों पर सुंदर डिज़ाइन बनाए जाते हैं। इस कला का उद्गम प्राचीन फारस (वर्तमान ईरान) में हुआ, जहां से यह भारत में आई। ‘ज़री’ शब्द का अर्थ सोना है, जबकि ‘ज़रदोज़ी’ का अर्थ है सोने के धागों से कढ़ाई करना।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, ज़री और ज़रदोज़ी कढ़ाई का प्रचलन भारत में प्राचीन काल से रहा है। मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल (16वीं सदी) में इस कला को विशेष प्रोत्साहन मिला, जिससे यह शाही परिधानों और सजावटी वस्त्रों का अभिन्न हिस्सा बन गई। हालांकि, औरंगज़ेब के शासनकाल में इस कला में गिरावट आई, लेकिन बाद में इसे फिर से पुनर्जीवित किया गया।

बनारस की डिज़ाइन स्थानीय कला, संस्कृति और परंपराओं से प्रेरित होती हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्ध विरासत को दर्शाती हैं। ज़रदोज़ी की डिज़ाइन बनाने की कला अनूठी है। सबसे पहले मक्खन कागज पर पेंसिल से डिज़ाइन तैयार किया जाता है, फिर सुई की मदद से डिज़ाइन की रूपरेखा पर छोटे छेद किए जाते हैं।

मक्खन कागज को कपड़े पर रखकर, केरोसिन और रंग के मिश्रण को कपड़े के टुकड़े से थपथपाकर डिज़ाइन को कपड़े पर स्थानांतरित किया जाता है। कपड़े को ‘अड्डा’ नामक लकड़ी के फ्रेम पर कसकर बांधा जाता है। फिर कारीगर लंबे सुई और धागे की मदद से डिज़ाइन पर कढ़ाई शुरू करते हैं, जिसमें मोती, सिक्विन और पत्थरों का भी उपयोग किया जाता है।

हालांकि, पारंपरिक तकनीकों की समय और श्रम-साध्य प्रकृति के कारण, उत्पादन में कमी आई है। इस चुनौती से निपटने के लिए, नए कारीगरों को प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि वे अधिक समय-कुशल तकनीकों का उपयोग कर सकें, जिससे इस सुंदर कला का संरक्षण और संवर्धन हो सके। बनारस की ज़री ज़रदोज़ी कला भारतीय सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो अपनी सुंदरता और शिल्प कौशल के लिए विश्वभर में प्रशंसित है।

विलुप्त होने की कगार पर कला

समय के साथ हर कला ने खुद को नए स्वरूप में ढाला, लेकिन बनारस की जरदोजी कला धीरे-धीरे विलुप्त होने की ओर बढ़ रही है। यह हम नहीं, बल्कि जरदोजी से जुड़े कारीगर खुद कह रहे हैं। उनका मानना है कि अगर इस कला पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब बनारस में कभी जरी-जरदोजी का काम हुआ करता था, यह सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगा।

जरदोजी के हालातों को समझने के लिए हमने बनारस के पठानीटोला इलाके का दौरा किया। यहां की तंग गलियों में जरदोजी का काम करने वाले कारीगर रहते हैं। बातचीत में उन्होंने बताया कि अब मुनाफा उतना नहीं होता, जिससे घर चलाना मुश्किल हो गया है। एक कारीगर ने कहा, “हर कला को सरकार से सहयोग मिला, लेकिन जरदोजियों को भुला दिया गया। आज जब कोई और रास्ता नहीं बचता, तो जरदोज कोई दूसरा काम करने को मजबूर हो जाता है।”

जरदोज बताते हैं कि पहले इस पेशे में करीब 2000 कारीगर थे, लेकिन आज मुश्किल से 100 से भी कम बचे हैं। नई पीढ़ी इस काम में नहीं आना चाहती क्योंकि इसमें मेहनत अधिक और आमदनी कम है। एक युवा कारीगर ने कहा, “हमारे पिता और दादा इसी पेशे में थे, लेकिन अब हम इसमें भविष्य नहीं देखते। मजबूरी में ही कुछ लोग इसे कर रहे हैं।”

करीब 15 साल से इस काम में लगे इजहार बताते हैं, “13 साल की उम्र में यह काम शुरू किया था। पहले ठीक था, लेकिन अब महंगाई बढ़ गई है। मजदूरी कम मिलती है, इसलिए जीवनयापन कठिन हो गया है। इसीलिए बहुत से लोग ऑटो चला रहे हैं या कोई और काम कर रहे हैं।”

जरदोजी के व्यापारी मोहम्मद सागीर बताते हैं, “इस कला में नए कारीगर नहीं जुड़ रहे हैं। पुराने कारीगरों में से कुछ का निधन हो गया, कुछ ने काम बदल लिया। अब मुश्किल से 80 लोग ही इस पेशे में बचे हैं। कुछ कारीगर ऑटो रिक्शा चला रहे हैं, कुछ ने चाय की दुकान खोल ली, और कुछ दूसरे शहरों में पलायन कर चुके हैं। अहमदाबाद जैसे शहरों में जरदोजी कारीगरों की मांग है।”

समय के साथ हर कला ने खुद को नए स्वरूप में ढाला, लेकिन बनारस की जरदोजी कला धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही है। यह हम नहीं, बल्कि जरदोजी से जुड़े कारीगर खुद कह रहे हैं। उनका मानना है कि अगर इस कला पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब बनारस में कभी जरी-जरदोजी का काम हुआ करता था, यह सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगा।

जरदोजी के हालातों को समझने के लिए हमने बनारस के पठानीटोला इलाके का दौरा किया। यहां की तंग गलियों में जरदोजी का काम करने वाले कारीगर रहते हैं। बातचीत में उन्होंने बताया कि अब मुनाफा उतना नहीं होता, जिससे घर चलाना मुश्किल हो गया है। एक कारीगर ने कहा, “हर कला को सरकार से सहयोग मिला, लेकिन जरदोजियों को भुला दिया गया। आज जब कोई और रास्ता नहीं बचता, तो जरदोज कोई दूसरा काम करने को मजबूर हो जाता है।”

धूमिल हो रही जरदोजी की चमक

वाराणसी के लल्लापुरा मोहल्ले की तंग गलियों में कुशल कारीगर पीढ़ियों से जरदोजी कढ़ाई का काम कर रहे हैं। यह शिल्प दुनिया भर में प्रसिद्ध है। ये कारीगर बिल्ले, प्रतीक और वस्त्र तैयार करते हैं, जिनका उपयोग विदेशी गणमान्य व्यक्तियों, सैन्य अधिकारियों और प्रमुख धार्मिक हस्तियों द्वारा किया जाता है। वे ज़री (सोने और चांदी के धागे) और रेशम जैसी बारीक सामग्रियों का उपयोग कर अंतरराष्ट्रीय फैशन हाउस के कस्टम ऑर्डर भी पूरा करते हैं।

बनारस के एक कारीगर आफताफ ने बताया, “बनारसी जरदोजी को जीआई टैग मिला है। हमारे काम को ‘बारदोजी’ कहा जाता है। यह हमारे परिवार का तीसरी पीढ़ी का व्यवसाय है। मैं 15 वर्षों से इस शिल्प में लगा हूं। मेरे पिता और दादा भी यही काम करते थे, यह हमारे लिए सदी पुराना पेशा है। बनारस की जरदोजी की मांग बढ़ रही तभी अमेरिका ने टैरिफ लगा दिया। “

कारीगर शाह नवाज आलम बताते हैं कि वे जरदोजी के लिए ज़री और धातु के काम सहित विभिन्न तकनीकों का उपयोग करते हैं। वे कहते हैं, ” हम सोने और चांदी का काम भी करते हैं, जिसमें 10 ग्राम सामग्री में दो ग्राम सोने और चांदी का उपयोग किया जाता है। जरदोजी पूरी तरह से हाथ से की जाने वाली कला है। वाराणसी के कुशल कारीगर इस शिल्प में विशेष विशेषज्ञता रखते हैं। पूरे शहर में अब कुछ ही कारीगर परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। कारीगर सोने, चांदी और पीतल का उपयोग कर बारीकी से कढ़ाई करते हैं।”

कारीगर मोहम्मद रिजवान बताते हैं कि ‘जरी’ सोने, चांदी और पीतल का मिश्रण है। उन्होंने कहा कि एक बैच को तैयार करने में करीब बारह घंटे लगते हैं। वे बताते हैं, “हम यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों के लिए जरदोजी के बैच तैयार करते थे, लेकिन यह काम पाकिस्तान शिफ्ट हो गया है और हमारी कला की लय टूटती जा रही है।”

कला क्यों दम तोड़ रही है?

फ़ारसी में ‘स्वर्ण कढ़ाई’ अर्थ रखने वाली ज़रदोज़ी भारत और पाकिस्तान में प्रचलित एक विशिष्ट कढ़ाई कला है। मुग़ल काल, विशेषकर सम्राट अकबर के समय, यह अपने शिखर पर पहुंची। शाही संरक्षण की कमी और औद्योगिकीकरण के प्रभाव से इसका पतन शुरू हुआ। वाराणसी अपनी पारंपरिक रेशमी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। भले ही ज़रदोज़ी यहां की मूल परंपरा न रही हो, लेकिन समय के साथ कारीगरों ने इसे अपनाया और आज यह बनारसी साड़ियों, सूट, ड्रेस मटेरियल, परदे और कुशन कवरों पर दिखती है।

ज़रदोज़ी में धैर्य और बारीक कारीगरी की ज़रूरत होती है। इसे कम उम्र में सीखा जाता है। इसी वजह से बच्चे और महिलाएं इस पेशे से जुड़े रहते हैं। इस शिल्प से जुड़े अधिकांश कारीगर मुस्लिम समुदाय से आते हैं और यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। कढ़ाई में ‘करछोप’ की भूमिका अहम होती है जो धागों को सीधा रखने और बुनाई को आसान बनाता है।

बनारसी ज़रदोज़ी पर शोध करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता प्रज्ञा सिंह बताती हैं, “पहले ज़री शुद्ध सोने-चांदी से बनती थी। साड़ी पुरानी होने पर उसे जलाकर कीमती धातु निकाली जा सकती थी। लेकिन 1977 में चांदी की कीमत बढ़ने से असली ज़री बहुत महंगी हो गई। इससे बनारसी साड़ियों की कीमत बढ़ी और बिक्री घटने लगी।”

प्रज्ञा आगे कहती हैं कि जब लगा कि असली ज़री शायद पूरी तरह गायब हो जाएगी तब 1988-89 के आसपास भारतीय अभिजात वर्ग और कुछ विदेशी ग्राहकों ने बनारसी साड़ियों में असली ज़री की मांग की। कुछ चुनिंदा परिवारों को असली सोने-चांदी की ज़री बनाने का हुनर आता था उन्होंने इस मांग को पूरा किया। आज भी विशेष ऑर्डरों के लिए कुछ बुनकर असली ज़री का उपयोग करते हैं। सीमित सही, लेकिन परंपरा किसी तरह जीवित है।

साल 2007 के एक सर्वे के अनुसार, वाराणसी में लगभग 5,255 छोटे-बड़े हथकरघा यूनिट थे जो साड़ी ब्रोकेड, ज़रदोज़ी, ज़री धातु, गुलाबी मीनाकारी, कुंदनकारी, आभूषण, पत्थर कटाई, कांच चित्रकला, मोती, कालीन, वॉल हैंगिंग और मुकुट जैसे उत्पाद बनाते थे। पहले इन उद्योगों में लगभग 20 लाख लोग कार्यरत थे और करीब 7,500 करोड़ रुपये का कारोबार होता था। इनमें से लगभग 2,300 यूनिटें पूरी तरह बंद हो चुकी हैं और बाकी बंद होने की कगार पर हैं। हस्तनिर्मित ज़रदोज़ी कला भी इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है।

हैंडलूम आर्टिज़न्स राइट्स फ़ोरम से जुड़े इदरीस अंसारी कहते हैं, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्षों से वाराणसी के सांसद हैं, लेकिन यह कहते हुए दुख होता है कि ज़रदोज़ी कारीगरों और बुनकरों के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। पूर्वी उत्तर प्रदेश भर के कारीगर इस शिल्प को छोड़कर रोज़गार की तलाश में पलायन करने को मजबूर हुए हैं।”

इदरीस अंसारी बताते हैं कि हाल के दिनों में सोने-चांद के दाम आसमान छूने लगे हैं। पीली धातु की महंगाई की सर्वाधिक मार जरदोजी कला पर पड़ी है। यह संकट अचानक नहीं आया। यह धीरे-धीरे बना। पहले असली ज़री महँगी हुई, फिर मशीन से बने उत्पाद आए, फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ी और अंत में टैरिफ ने आख़िरी धक्का दिया। हर मोड़ पर अगर नीतिगत हस्तक्षेप होता तो शायद हालात इतने बदतर नहीं होते।

जब से ट्रंप ने भारत के शिल्प उत्पादों पर जब से 50 फीसदी टैरिफ लगाया है, बनारस की कढ़ाई की लौ अब एक धीमी सी फड़फड़ाती बाती बन गई है। कारीगरों की आवाज़ में कसक है, “अगर केंद्र और राज्य सरकार ने अभी कदम नहीं उठाए तो यह कौशल हमारे साथ ही खत्म हो जाएगा। ये कला अगली पीढ़ियों तक कभी नहीं पहुंच पाएगी।”

इदरीश अंसारी बताते हैं कि विदेशी टैरिफ और सरकारी उदासीनता के कारण उद्योग लगभग बंदी की कगार पर पहुंच चुका है। जिन कंपनियों को पहले बनारस से कार्य मिलता था, वे अब पाकिस्तान सहित अन्य देशों से सामान लेने लगी हैं। कारण के रूप में कारीगर बताते हैं कि पाकिस्तान सरकार वहां कारीगरों और उद्योग को बड़े स्तर पर सहायता प्रदान कर रही है, जबकि भारत में इस दिशा में ठोस प्रयास नहीं हो रहे।

बनारस में कुछ साल पहले तक अमेरिका की सेना, ब्रिटेन की पुलिस और विभिन्न देशों के सैन्य विभागों के बैज, वर्दी चिन्ह और झंडे बनारस में तैयार होते थे। पिछले दो सालों में स्थिति पलट गई। कई कारीगर मजबूर होकर अन्य व्यवसायों में चले गए हैं या खाड़ी देशों का रुख कर चुके हैं। जो लोग बचे हैं, वे परिवार के खर्चों से जूझ रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई से लेकर रोजमर्रा की जरूरतें तक पूरा करना मुश्किल हो रहा है। यदि केंद्र और राज्य सरकार इस उद्योग को संरक्षित करने और कारीगरों को राहत देने के लिए कदम नहीं उठाती तो यह पारंपरिक कला पूरी तरह खत्म हो सकती है।

बनारस में करछोप अब भी रखे हैं। सुइयां अब भी मौजूद हैं। हुनर अभी पूरी तरह मरा नहीं है। लेकिन अमेरिकी सेना का बैज बनाने वाले हुनरमंद सांस रोककर बैठे हैं। वो इस इंतज़ार में हैं कि शायद कोई फैसला, कोई नीति, कोई सहारा उसे फिर से ज़िंदा कर दे। अगर यह इंतज़ार लंबा हुआ, तो हो सकता है कि अगली पीढ़ी इन सुइयों को सिर्फ़ दीवार पर टंगी हुई याद की तरह देखे। यही डर इन गलियों में सबसे गहरा है।

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)

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