उत्तरदायित्व का विकल्प या उसका स्थगन?

भारतीय लोकतंत्र में प्रशासनिक उत्तरदायित्व की अवधारणा संविधान द्वारा प्रत्याभूत मूल्यों—उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और विधि के शासन—पर आधारित मानी जाती है। सिद्धांततः किसी भी प्रशासनिक विफलता, चाहे वह सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी दुर्घटना हो, मानवाधिकार उल्लंघन हो या संस्थागत लापरवाही, के बाद त्वरित, निष्पक्ष और दंडात्मक कार्रवाई अपेक्षित होती है।

किंतु व्यवहार में, भारतीय प्रशासन ने उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करने के बजाय उसे प्रबंधित करने की एक स्थायी प्रक्रिया विकसित कर ली है। इस प्रक्रिया का सबसे प्रभावी उपकरण बन चुकी है—जाँच समिति या विशेष जाँच दल (एसआईटी)।

किसी भी बड़ी प्रशासनिक या सामाजिक त्रासदी के बाद राज्य की प्रतिक्रिया लगभग पूर्वानुमेय होती है। सार्वजनिक मंचों पर ‘कड़ी कार्रवाई’ के आश्वासन दिए जाते हैं और तत्क्षण जाँच समिति या एसआईटी के गठन की घोषणा कर दी जाती है। यह क्षण वस्तुतः समस्या के समाधान की शुरुआत नहीं, बल्कि उसके स्थगन का संकेत होता है।

जाँच की अवधि स्वयं एक राजनीतिक रणनीति में बदल जाती है—जनाक्रोश को समय के साथ ठंडा करने, मीडिया विमर्श को अन्य विषयों की ओर मोड़ने और पीड़ित पक्ष को मानसिक तथा विधिक थकान की स्थिति में पहुँचाने की रणनीति।

जाँच रिपोर्टों की भाषा इस पूरी प्रक्रिया का केंद्रीय तत्व है। ‘प्रक्रियागत त्रुटि’, ‘संस्थागत सीमाएँ’, ‘प्रणालीगत जटिलता’ और ‘सामूहिक उत्तरदायित्व’ जैसे शब्द व्यक्तिगत निर्णयों और स्पष्ट चूकों को एक अमूर्त संरचना में विलीन कर देते हैं। परिणामस्वरूप, किसी विशिष्ट अधिकारी या विभाग की जवाबदेही तय करना लगभग असंभव हो जाता है। जाँच प्रक्रिया न्याय का मार्ग प्रशस्त करने के बजाय उसे तकनीकी भाषा और संस्थागत अस्पष्टता में अवरुद्ध कर देती है।

यह प्रवृत्ति किसी एक राज्य या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में घटित घटनाओं के बाद प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं की समानता इस बात की ओर संकेत करती है कि समस्या व्यक्तियों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति की है। यह संस्कृति प्रशासनिक विफलता को नैतिक या पेशेवर अपराध के रूप में नहीं, बल्कि एक असुविधा के रूप में देखती है, जिसे समय और प्रक्रियाओं के माध्यम से प्रबंधित किया जा सकता है।

आधुनिक शासन-व्यवस्था में तथ्य-संग्रह और कारण-विश्लेषण के लिए जाँच अनिवार्य है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब जाँच समितियाँ दंडात्मक कार्रवाई के विकल्प के रूप में कार्य करने लगती हैं। अनेक मामलों में अधिकारी पद से हटाए जाते हैं, किंतु यह हटाना स्थायी दंड नहीं, बल्कि अस्थायी प्रशासनिक पुनर्विन्यास भर होता है। कुछ ही समय बाद वही अधिकारी समान या अधिक प्रतिष्ठित पदों पर पुनः नियुक्त कर दिए जाते हैं।

इंदौर दूषित जल कांड में नगर निगम आयुक्त पद से हटाए गए आईएएस अधिकारी दिलीप यादव को मात्र सोलह दिनों में मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम का प्रबंध संचालक नियुक्त किया जाना, या छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड में 23 बच्चों की मृत्यु के बाद हटाए गए ड्रग कंट्रोलर दिनेश कुमार मौर्य को शीघ्र ही अपर सचिव बनाए जाना—ये घटनाएँ अपवाद नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम हैं, जहाँ विफलता दंड नहीं, बल्कि पुनर्वास का आधार बन जाती है।

यह स्थिति ‘नैतिक जोखिम’ को जन्म देती है। जब यह सुनिश्चित हो जाए कि गंभीर लापरवाही के बावजूद व्यक्तिगत दंड नहीं होगा, तब सतर्कता, पेशेवर ईमानदारी और मानवीय संवेदना वैकल्पिक गुण बन जाते हैं। निर्णयकर्ता जानते हैं कि अधिकतम दंड कुछ समय के लिए पद से हटना है—जिसके बाद पुनः प्रतिष्ठित नियुक्ति मिलनी तय है।

ग्रेटर नोएडा में 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मृत्यु इस प्रशासनिक संस्कृति का ताज़ा उदाहरण है। प्रशासन और पीड़ित पक्ष के बीच परस्पर विरोधी दावे हैं। प्रशासन का कहना है कि गहरे और पानी से भरे गड्ढे में उतरना जोखिमपूर्ण था, जबकि प्रत्यक्षदर्शियों और परिजनों का आरोप है कि प्रारंभिक घंटों में तत्परता दिखाई जाती तो जान बचाई जा सकती थी। यह विवाद केवल तकनीकी कठिनाइयों का नहीं, बल्कि प्रशासनिक तैयारी और उत्तरदायित्व का है।

आधुनिक शहरी परिदृश्य में, जहाँ खुले गड्ढे और निर्माणाधीन परियोजनाएँ सामान्य हैं, आपदा-प्रबंधन संसाधनों का अभाव स्वयं एक गंभीर विफलता है।

निष्कर्षतः, भारतीय प्रशासनिक प्रणाली में जाँच समितियाँ और एसआईटी धीरे-धीरे न्याय के साधन के बजाय समय-प्रबंधन और उत्तरदायित्व-स्थगन के उपकरण बनती जा रही हैं। जब तक जाँच प्रक्रियाओं को स्पष्ट दंडात्मक परिणामों से नहीं जोड़ा जाएगा और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व को संरचनात्मक भाषा की आड़ में छिपाने की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगेगी, तब तक प्रत्येक त्रासदी के बाद वही आश्वासन, वही प्रक्रियाएँ और वही निष्फल परिणाम दोहराए जाते रहेंगे।

ऐसे में लोकतंत्र में उत्तरदायित्व एक व्यवहारिक यथार्थ नहीं, बल्कि मात्र एक सैद्धांतिक आदर्श बनकर रह जाएगा।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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