आखिर शंकराचार्य कौन तय करेगा? माघ मेले के नोटिस से उठा धर्म, सत्ता और संविधान का टकराव 

माघ मेले के बीच प्रयागराज मेला प्राधिकरण द्वारा जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को भेजा गया एक प्रशासनिक नोटिस अब देश के सबसे संवेदनशील सवालों में बदलता जा रहा है कि क्या भारत में धार्मिक परंपराओं के सर्वोच्च पद का फैसला सरकार और अदालत करेंगी या सदियों से चली आ रही सनातन व्यवस्था?

यह मामला अब केवल एक मेला-प्रशासन का नहीं रहा। यह सीधे उस रेखा तक पहुंच गया है, जहां धार्मिक स्वायत्तता और राज्य सत्ता आमने-सामने खड़ी दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस ने इसे “सनातन परंपरा का अपमान” बताते हुए योगी सरकार पर सीधा हमला बोला है, जबकि खुद शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने अभूतपूर्व शब्दों में प्रशासन को चुनौती दी है —“शंकराचार्य कोई सरकार, अदालत या राष्ट्रपति तय नहीं करता। शंकराचार्य को शंकराचार्य ही तय करते हैं।”

विवाद की शुरुआत उस वक्त हुई जब प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने माघ मेला क्षेत्र में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिविर, आयोजन और प्रचार-प्रसार को लेकर नोटिस जारी किया। नोटिस में इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मुकदमे और पूर्व आदेशों का हवाला देते हुए कहा गया कि ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद से जुड़ा विवाद अभी न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए इस “विवादित पद” के नाम पर किसी भी प्रकार के आयोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती। उल्लंघन की स्थिति में विधिक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई।

कागज पर यह एक नियमित प्रशासनिक कदम लगता है। लेकिन असल में इस एक पंक्ति — “विवादित पद” — ने पूरे सनातन जगत और राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया। 

नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बयान असाधारण रूप से तीखा था। उन्होंने कहा —“जब द्वारका और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य मुझे शंकराचार्य मानते हैं, तो प्रशासन कौन होता है यह तय करने वाला? क्या अब उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री या भारत का राष्ट्रपति तय करेगा कि शंकराचार्य कौन है?”

उन्होंने साफ किया कि शंकराचार्य की पहचान चार पीठों की परंपरा से तय होती है, न कि किसी सरकारी फाइल या अदालत के आदेश से। उनके मुताबिक, द्वारका और श्रृंगेरी पीठ का प्रत्यक्ष समर्थन उनके साथ है, जबकि पुरी पीठ की “मौन स्वीकृति” भी उन्हें प्राप्त है।“अगर कोई और ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य है, तो सामने आए, मुझसे बात करे,” — यह चुनौती भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से दी। इस बयान के साथ मामला अचानक धार्मिक विवाद से निकलकर राज्य बनाम परंपरा की बहस में बदल गया।

कांग्रेस ने इस मौके को तुरंत लपकते हुए बीजेपी सरकार पर दोहरे चरित्र का आरोप लगाया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि “एक तरफ भाजपा नेता सनातन धर्म के नाम पर राजनीति करते नहीं थकते, दूसरी तरफ जगद्गुरु शंकराचार्य को नोटिस भेजकर उनकी गरिमा पर हमला किया जा रहा है। यह सनातन परंपरा का सीधा अपमान है।”

कांग्रेस ने सरकार से औपचारिक स्पष्टीकरण की मांग की और सवाल उठाया कि क्या योगी सरकार अब तय करेगी कि कौन जगद्गुरु है और कौन नहीं। यह बयान ऐसे समय आया है जब बीजेपी खुद को राम मंदिर, काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर और प्रयागराज मेले के जरिए “सनातन की सबसे बड़ी संरक्षक” पार्टी के रूप में पेश करती रही है। 

वैसे प्रशासन का तर्क तकनीकी रूप से मजबूत दिखता है क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में ज्योतिष पीठ को लेकर विवाद लंबित है और पूर्व आदेशों में “विवादित विषय” से जुड़े प्रचार-प्रसार पर रोक का उल्लेख है। लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों के मुताबिक यहां एक बेहद नाजुक रेखा है।अदालत किसी संपत्ति, ट्रस्ट या अधिकार का फैसला कर सकती है।लेकिन क्या अदालत या प्रशासन यह तय कर सकता है कि कोई धार्मिक पदधारी वास्तव में उस पद का अधिकारी है या नहीं?

भारत का संविधान धार्मिक संस्थाओं को अपने आंतरिक मामलों में स्वायत्तता देता है। शंकराचार्य की नियुक्ति और मान्यता सदियों से पीठों की परंपरा के अनुसार होती रही है। राज्य का काम केवल कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था तक सीमित है।यहीं से यह मामला खतरनाक मोड़ लेता है, क्योंकि अगर आज प्रशासन “विवादित पद” कहकर शंकराचार्य को रोके, तो कल किसी और धर्मगुरु, महंत या पीठाधीश्वर की वैधता पर भी सवाल उठाया जा सकता है।

याद रहे आदि शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना की थी —बद्रीनाथ में ज्योतिष पीठ, द्वारका में शारदा पीठ, पुरी में गोवर्धन पीठ और श्रृंगेरी में श्रृंगेरी पीठ।परंपरा के अनुसार, किसी भी पीठ का शंकराचार्य वही माना जाता है जिसे अन्य पीठों के शंकराचार्य मान्यता दें।लेकिन ज्योतिष पीठ को लेकर वर्षों से विवाद चलता आ रहा है। अलग-अलग दावेदार, ट्रस्टों की लड़ाई, और अदालतों में मुकदमे — इस पूरे इतिहास ने प्रशासन को सावधान बना दिया है। मगर सवाल यह है कि सावधानी के नाम पर क्या धार्मिक पहचान पर रोक लगाई जा सकती है?

यह विवाद योगी सरकार और बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। एक तरफ सरकार ने प्रयागराज मेले को वैश्विक धार्मिक ब्रांड बनाने में भारी राजनीतिक पूंजी लगाई है। दूसरी तरफ उसी मेले में “जगद्गुरु की वैधता” पर सवाल उठना पार्टी की पूरी सनातन राजनीति को असहज स्थिति में डाल देता है। और इससे भी बड़ी बात यह है कि साल भर बाद यूपी में चुनाव भी होने हैं और बीजेपी को बड़ी संख्या में सनातनी, साध संतों का समर्थन भी मिलता रहा है। 

बीजेपी की मुश्किल यह है कि अगर वह प्रशासन के साथ खड़ी होती है, तो उस पर धर्माचार्यों के अपमान का आरोप लगेगा। और अगर वह शंकराचार्य के पक्ष में जाती है, तो अदालत और प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना का खतरा। यह वही जगह है जहां धर्म और सत्ता की राजनीति सबसे ज्यादा फिसलन भरी हो जाती है।

इस पूरे विवाद का केंद्रीय प्रश्न सीधा और गंभीर है। क्या राज्य धार्मिक पदों की वैधता तय कर सकता है? क्या अदालत के लंबित मुकदमे के नाम पर परंपरागत धार्मिक पहचान रोकी जा सकती है? और क्या सनातन के सर्वोच्च पद अब प्रशासनिक अनुमतियों पर निर्भर होंगे? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का एक वाक्य इस बहस का केंद्र बन गया है —“भारत के राष्ट्रपति को भी यह अधिकार नहीं कि वह तय करें कि शंकराचार्य कौन है।”

यह वाक्य केवल धार्मिक बयान नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की सीधी याद दिलाता है।

प्रयागराज मेला प्राधिकरण का यह नोटिस शायद प्रशासन की नजर में एक सामान्य कानूनी सावधानी रहा हो। लेकिन इसके असर ने यह साफ कर दिया है कि मामला एक संत, एक पीठ या एक मेले का नहीं है। यह मामला है धार्मिक स्वायत्तता बनाम राज्य नियंत्रण को लेकर, परंपरा बनाम फाइल और आस्था बनाम सत्ता का। अगर इस बहस को समय रहते संतुलन में नहीं रोका गया, तो यह केवल यूपी की राजनीति नहीं, बल्कि पूरे देश में धार्मिक संस्थाओं और सरकार के रिश्तों को नई बहस में धकेल सकता है।

और तब सवाल सिर्फ इतना नहीं रहेगा कि “शंकराचार्य कौन है?”बल्कि यह बन जाएगा कि “धर्म की आखिरी सीमा पर अब फैसला कौन करेगा — परंपरा या सरकार?”

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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