उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के हरिहरपुर गांव में एक कच्चे घर के कमरे में दाखिल होते ही सबसे पहले एक चारपाई दिखाई देती है। चारपाई साधारण है, लेकिन उससे बंधी दो मोटी डोरियां ध्यान खींच लेती हैं। इन्हीं डोरियों से आठ साल की प्रिया को बांधकर रखा गया है। कमरे में न कोई खिलौना है, न किताब, न स्कूल बैग। दीवारों पर बच्चों की तस्वीरें भी नहीं हैं।
खेलने-कूदने और स्कूल जाने की उम्र में प्रिया जमीन पर बैठी रहती है। उसका कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है। पैर सूख चुके हैं। आंखें खुली रहती हैं, लेकिन सामने देख रही चीजों को पहचान नहीं पातीं।
प्रिया की मां शुभावती देवी जब डोरियां खोलती हैं, तो बच्ची उठने की कोशिश करती है। दो कदम चलते ही उसका संतुलन बिगड़ जाता है और वह जमीन पर गिर जाती है। सिर दीवार से टकराता है। शुभावती देवी तुरंत दौड़कर उसे संभालती हैं। प्रिया के शरीर पर चोटों के कई पुराने निशान हैं।
मां बताती हैं कि यह रोज की स्थिति है। बार-बार गिरने से बचाने के लिए ही उसे डोरियों से बांधकर रखना पड़ता है। शुभावती कहती हैं कि अगर बच्ची को न बांधा जाए तो वह अचानक उठने की कोशिश करती है और गंभीर रूप से घायल हो सकती है।
चारपाई के पास ही उसकी पांच साल की बहन परिधि बैठी है। वह भी डोरियों से बंधी हुई है। फर्क सिर्फ इतना है कि परिधि की आंखें अब भी अपनी मां को पहचान लेती हैं, लेकिन उसका शरीर भी उसका साथ नहीं देता। वह खुद से खड़ी नहीं हो सकती और चलना उसके लिए संभव नहीं है। दोनों बहनों की हालत लगभग एक जैसी है—एक का शरीर जवाब दे चुका है, दूसरी का शरीर धीरे-धीरे साथ छोड़ रहा है।
शुभावती देवी की आवाज भर्रा जाती है। वह बताती हैं, “दोनों बिल्कुल ठीक थीं। हंसती-खेलती थीं। पहले बड़ी को तेज बुखार आया। तीन-चार दिन में हालत बिगड़ गई। फिर कुछ महीनों बाद छोटी को भी बुखार आया। उसके बाद सब कुछ बदल गया।” वह आगे कहती हैं कि प्रिया और परिधि जन्म के पांच-छह महीने बाद तेज बुखार आने के बाद दिव्यांग हो गईं। दोनों के हाथ-पैर टेढ़े हो चुके हैं।
शुभावती बताती हैं कि एक बार प्रिया अचानक छत से कूद पड़ी थी। इसके बाद मजबूरी में उसे बांधकर रखना पड़ रहा है। “हमारे पास और कोई रास्ता नहीं बचा,” वह कहती हैं।
प्रिया और परिधि के पिता राजू चौहान गुजरात में मजदूरी करते हैं। बेटियों के इलाज के लिए उन्होंने अपनी जमा-पूंजी तक खर्च कर दी। परिवार ने कई निजी डॉक्टरों को दिखाया। हर बार यही भरोसा दिया गया कि लंबे इलाज से स्थिति में सुधार हो सकता है। पांच साल बीत जाने के बाद भी न तो बेटियों की हालत में कोई ठोस सुधार हुआ और न ही बीमारी की कोई स्पष्ट वजह सामने आई। शुभावती बताती हैं कि इलाज के लिए कर्ज भी लिया गया, लेकिन नतीजा शून्य रहा।
यह कहानी सिर्फ प्रिया और परिधि तक सीमित नहीं है। गाजीपुर जिले के हरिहरपुर, मनिहर, सदर, बहादीपुर, फतेहउल्लाहपुर, धारीकला, तारडीह, राठौली सराय, खुटहन, भौरहारा और बुढ़नपुर जैसे दर्जन भर गांवों में दर्जनों ऐसे घर हैं, जहां बच्चे बिस्तरों, कोनों या डोरियों से बंधे हुए हैं। इन गांवों में सामने आ रही बीमारी के लक्षण लगभग एक जैसे हैं और उसका असर भी एक जैसा दिखाई देता है।
कहीं 12 साल की बच्ची दीवार से टिकी बैठी है। कहीं 10 साल का बच्चा लगातार झटकों से कांप रहा है। किसी बच्चे को बोलने में परेशानी है, तो कोई चल नहीं पाता। कुछ बच्चों की आंखें सामने देखती हैं, लेकिन पहचानने की क्षमता खत्म हो चुकी है। अधिकांश मामलों में स्थिति एक जैसी बताई जाती है-पहले तेज बुखार, फिर झटके, और उसके बाद धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का खत्म हो जाना।
दो वक्त की रोटी या बच्चों का इलाज
बहादीपुर गांव की गायत्री देवी अपनी 18 साल की बेटी सलोनी की हालत बताते हुए खुद को रोक नहीं पातीं। आंखों में आंसू भर आते हैं और आवाज लड़खड़ा जाती है। वह बताती हैं कि सलोनी पांच साल की उम्र तक गांव के बच्चों के साथ खेलती थी और नियमित रूप से स्कूल जाती थी। घर से स्कूल तक का रास्ता उसे याद था। सब कुछ सामान्य था। फिर अचानक तेज बुखार आया और कुछ ही दिनों में उसकी जिंदगी की दिशा बदल गई।
बुखार के बाद सलोनी की पढ़ाई छूट गई। अब वह न ठीक से सुन पाती है और न ही समझ पाती है। बातचीत करना उसके लिए मुश्किल हो गया है। ज्यादातर समय वह घर के अंदर या बाहर चबूतरे पर चुपचाप बैठी रहती है।
गायत्री देवी बताती हैं कि उनकी दूसरी बेटी रमिता, जो अब 13 साल की है, उसे भी तीन साल की उम्र में इसी तरह का बुखार आया था। बुखार उतरने के बाद उसके हाथ-पैर टेढ़े होने लगे और कुछ ही समय में वह भी दिव्यांग हो गई। एक ही परिवार में दो बेटियों का इस तरह अक्षम हो जाना माता-पिता के लिए सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद भारी पड़ गया है। गायत्री देवी कहती हैं कि इलाज के लिए जो भी था, वह धीरे-धीरे खत्म होता चला गया।
आसपास के गांवों में ऐसी ही कहानियां बार-बार सामने आती हैं। सत्येंद्र चौहान की आठ साल की बेटी पूनम गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थी। सात-आठ महीने पहले उसे तेज बुखार आया। इलाज के दौरान वह कई दिनों तक बेहोश रही। जब होश आया तो वह अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकी। अब उसकी नानी उषा देवी उसे सहारा देकर घर के अंदर-बाहर ले जाती हैं। परिवार के लोग बताते हैं कि पहले जो बच्ची स्कूल जाने की जिद करती थी, अब उसे उठाकर बैठाना पड़ता है।
डेढ़ साल का अयाश ठीक से बैठ भी नहीं सकता। उसके माता-पिता बताते हैं कि जन्म के कुछ दिनों बाद आए बुखार के बाद से उसकी गर्दन लटकी रहती है। बच्चे को गोद में उठाए बिना उसका कोई काम नहीं हो पाता। परिवार का कहना है कि अयाश की देखभाल के कारण माता-पिता में से एक को हमेशा घर पर रहना पड़ता है। दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर परिवार के लिए यह स्थिति और मुश्किल हो जाती है।
हरिहरपुर गांव के पूनम, सलोनी, रगिता, राजू, सोनी, शिवम, राहुल और अक्षय जैसे कई बच्चे अब पूरी तरह अपने माता-पिता पर निर्भर हैं। परिजनों का कहना है कि सभी बच्चे जन्म के समय पूरी तरह स्वस्थ थे। किसी में कोई जन्मजात बीमारी नहीं थी। कुछ महीनों या वर्षों बाद अचानक तेज बुखार आया और उसके बाद हालात लगातार बिगड़ते चले गए। कई परिवार बताते हैं कि पहले बच्चों को झटके आने लगे और फिर धीरे-धीरे शरीर और दिमाग ने साथ छोड़ दिया।
हरिहरपुर, बहादीपुर और आसपास के गांवों में तमाम बच्चे और किशोर मानसिक और शारीरिक रूप से अक्षम हो चुके हैं। रहस्यमयी बुखार से प्रभावित परिवारों की कहानियां अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि लगभग एक जैसी हैं। कहीं खेलते-कूदते बच्चे अचानक बिस्तर पर आ गए, तो कहीं स्कूल जाने की उम्र में ही पढ़ाई हमेशा के लिए छूट गई। कई परिवारों के लिए यह सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी का बदल जाना है।
इलाज के लिए परिवारों ने हर संभव कोशिश की। किसी ने निजी अस्पतालों का रुख किया, किसी ने जिला अस्पताल का। कई परिवार बनारस गए, कुछ बीएचयू तक पहुंचे। इलाज में हजारों नहीं, बल्कि लाखों रुपये खर्च हो गए। इसके बावजूद न तो बच्चों की हालत में कोई स्थायी सुधार हुआ और न ही डॉक्टर बीमारी की कोई ठोस वजह बता पाए। कई परिवारों का कहना है कि हर अस्पताल में अलग-अलग दवाएं दी गईं, लेकिन बीमारी की जड़ तक कोई नहीं पहुंच सका।
रहस्यमयी बुखार से दिव्यांग हो चुके बच्चों के माता-पिता की आंखों में बेबसी साफ दिखाई देती है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि उनके बच्चे जन्म के समय पूरी तरह स्वस्थ थे। किसी को चार महीने की उम्र में, किसी को दो साल में तो किसी को पांच साल की उम्र में अचानक तेज बुखार आया। बुखार उतरने के बाद हालात और बिगड़ते चले गए। बच्चों को लगातार झटके आने लगे और कुछ ही समय में वे मानसिक और शारीरिक रूप से अक्षम हो गए। शरीर पर नियंत्रण न रहने के कारण कई माता-पिता अपने ही बच्चों को रस्सियों और जंजीरों से बांधकर रखने को मजबूर हैं, ताकि वे खुद को नुकसान न पहुंचा सकें।
इन गांवों में आमतौर पर पुरुष खेतों में मजदूरी करने चले जाते हैं और महिलाएं घर पर रहकर बच्चों की देखभाल करती हैं। कई परिवारों में हालात ऐसे हैं कि अगर दोनों माता-पिता काम पर चले जाएं तो बच्चों को बंद कमरे में छोड़ना पड़ता है। इलाज में परिवार अपनी जमा-पूंजी, जमीन खर्च कर चुके हैं। दिहाड़ी मजदूरी कर किसी तरह घर चलाने वाले इन परिवारों पर ऐसा संकट टूटा है कि वे हर दिन यह तय करने को मजबूर हैं—दो वक्त की रोटी का इंतजाम करें या फिर अपने बच्चों के इलाज के लिए पैसे जुटाएं।
इस पूरे मामले की भयावहता तब सामने आई, जब समाजसेवी सिद्धार्थ राय ने सितंबर 2025 से ‘एक मुट्ठी अनाज’ अभियान शुरू किया। सिद्धार्थ राय और उनकी टीम अब तक 42 गांवों में घर-घर जाकर एक मुट्ठी अनाज के बदले पूरे परिवार की जानकारी इकट्ठा कर चुकी है। किस परिवार में कितने लोग हैं, कौन बीमार है और किसे सरकारी योजनाओं का लाभ मिला और किसे नहीं-इन तमाम जानकारियों को दर्ज किया गया।
इसी दौरान उनकी टीम ने कई गांवों में रस्सियों और जंजीरों से बंधे बच्चे देखे। पीड़ित परिवारों से विस्तार से बातचीत के बाद बीमारी की भयावह तस्वीर सामने आई, जिसने पूरे इलाके की स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
शासन, जांच और जवाबदेही
गाजीपुर के गांवों में बच्चों के इस तरह दिव्यांग होने के मामले ने तब गंभीर मोड़ लिया, जब सामाजिक कार्यकर्ता सिद्धार्थ राय ने पूरे घटनाक्रम की जानकारी राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को पत्र लिखकर दी। पत्र में प्रभावित गांवों, बच्चों की संख्या, बीमारी के लक्षण और प्रशासनिक लापरवाही का विस्तार से उल्लेख किया गया।
राज्यपाल ने मामले को गंभीर मानते हुए जिलाधिकारी को विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम से जांच कराने के निर्देश दिए। इसके बाद राजभवन और शासन के हस्तक्षेप से स्वास्थ्य विभाग की गतिविधियां तेज हुईं और स्वास्थ्य टीमें गांवों तक पहुंचने लगीं। लंबे समय बाद पहली बार एंबुलेंस गांव-गांव घूमती नजर आईं।
मामले के तूल पकड़ने के बाद स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक ने प्रमुख सचिव और चिकित्सा स्वास्थ्य महानिदेशक से विस्तृत रिपोर्ट तलब की। मंत्री के हस्तक्षेप के बाद जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग सक्रिय दिखा। स्वास्थ्य विभाग की ओर से 11 गांवों में कैंप लगाकर जांच की गई। अब तक दिव्यांग हो चुके 10 बच्चों को मेडिकल कॉलेज और ट्रॉमा सेंटर ले जाकर विशेष जांच कराई गई है। बच्चों का ईसीजी किया गया और पैथोलॉजी जांच के लिए सैंपल लिए गए, ताकि बीमारी की वास्तविक वजह का पता लगाया जा सके।
प्रशासन के अनुसार बुखार के बाद झटके आना, मानसिक संतुलन बिगड़ना और शारीरिक अक्षमता के करीब 20 मामलों की सूची तैयार कर शासन को भेजी गई है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि यह संख्या वास्तविकता से बहुत कम है और प्रभावित बच्चों की तादाद सौ से अधिक है। कई परिवार अब भी सर्वे और जांच से बाहर हैं।
मामला सार्वजनिक होने के बाद प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही भी सामने आई। जिला पंचायत राज अधिकारी ने 11 ग्राम पंचायत अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा कि उन्होंने समय रहते प्रभावित गांवों का सर्वे क्यों नहीं कराया, वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना क्यों नहीं दी और पीड़ित परिवारों को केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ क्यों नहीं दिलाया। बाद में जिलाधिकारी अविनाश कुमार ने लापरवाही के आरोप में संबंधित 11 गांवों के ग्राम सचिवों को निलंबित कर दिया।
जिलाधिकारी अविनाश कुमार का कहना है कि अब तक करीब 40 बच्चों का इलाज बीएचयू में कराया गया है। प्रारंभिक जांच के आधार पर यह आशंका जताई जा रही है कि गर्भावस्था के दौरान बुखार आना या तेज वायरल फीवर इस स्थिति की एक वजह हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अब तक कोई स्पष्ट मेडिकल निष्कर्ष सामने नहीं आया है और सभी पीड़ितों के बेहतर इलाज की व्यवस्था की जा रही है।
इसी बीच एक और सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या इस बीमारी का संबंध इलाके के पर्यावरण और पानी से है? जिन गांवों में रहस्यमयी बीमारी सामने आई है, वे एक-दूसरे से सटे हुए हैं और करीब पांच किलोमीटर के दायरे में स्थित हैं। इसी इलाके में एक बड़ा एग्रो और एनर्जी प्लांट भी मौजूद है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्लांट से निकलने वाला केमिकल युक्त पानी नहर में छोड़ा जाता है, जिससे आसपास का भूजल प्रदूषित हो रहा है।
उनका कहना है कि वर्ष 2007 में प्लांट लगने के बाद से बुखार और शारीरिक अक्षमता के मामलों में इजाफा हुआ है।
ग्रामीण बताते हैं कि हर घर नल योजना के तहत गांवों में पाइपलाइन तो बिछा दी गई है, लेकिन नलों में पानी नहीं आता। मजबूरी में लोग हैंडपंप का पानी पीने को विवश हैं। आरोप है कि प्लांट में रोजाना बड़ी मात्रा में भूजल का उपयोग होता है और इस्तेमाल के बाद केमिकल युक्त पानी बाहर छोड़ दिया जाता है, जिससे जलस्रोत प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि जिला प्रशासन ने अभी तक इस संबंध में प्रदूषण की औपचारिक पुष्टि नहीं की है।
स्वास्थ्य विभाग इन आरोपों से इतर बीमारी के अन्य कारण गिना रहा है। गाजीपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एस.के. पांडेय का कहना है कि संदिग्ध बुखार के कारण सीधे तौर पर दिव्यांगता की पुष्टि नहीं हुई है। उनके मुताबिक कई मामलों में मानसिक और न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर पाए गए हैं। इसके पीछे आनुवांशिक कारण, जन्म के समय मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी, गर्भावस्था के दौरान बिना चिकित्सकीय परामर्श के प्रतिबंधित दवाओं का सेवन या मिर्गी जैसे रोग जिम्मेदार हो सकते हैं।
कुछ मामलों में इलाज समय पर न कराए जाने की बात भी सामने आई है।
शासन स्तर पर इस पूरे प्रकरण को गंभीर माना गया है। प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) अमित मोहन प्रसाद के अनुसार गाजीपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी से पूरी रिपोर्ट मांगी गई है और रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। प्रशासन ने प्रभावित बच्चों और उनकी बीमारियों से जुड़े आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया शुरू की है। साथ ही पीड़ित परिवारों के आयुष्मान कार्ड बनवाने और सरकारी इलाज से जोड़ने के निर्देश दिए गए हैं।
चिकित्सा स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. आर.पी.एस. सुमन का कहना है कि सभी मरीजों की जानकारी एकत्र कर रिपोर्ट तैयार की जा रही है और जांच पूरी होने के बाद आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
ये बीमारी नहीं, सिस्टम की नाकामी है
सामाजिक कार्यकर्ता सिद्धार्थ राय कहते हैं, “यह कोई अचानक पैदा हुई बीमारी नहीं है और न ही इसे सिर्फ मेडिकल इमरजेंसी कहकर टाला जा सकता है। यह पूरी तरह प्रशासनिक विफलता का नतीजा है। अगर समय रहते इन गांवों में सर्वे कराया जाता, बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जांच होती और शुरुआती लक्षणों पर इलाज शुरू किया जाता तो आज दर्जनों बच्चे इस हालत में नहीं होते।
कई मामलों में बुखार के बाद झटके आए, लेकिन न तो आशा कार्यकर्ताओं ने इसे गंभीरता से लिया, न ही स्वास्थ्य विभाग ने समय पर हस्तक्षेप किया। हमने गांव-गांव जाकर देखा कि बच्चे रस्सियों और जंजीरों से बंधे हुए हैं। यह किसी परिवार की क्रूरता नहीं, बल्कि सिस्टम की बेरुखी का नतीजा है। माता-पिता अपने बच्चों को बांधने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके पास न इलाज है, न सहारा और न कोई मार्गदर्शन। यह स्थिति बेहद शर्मनाक है।”
सिद्धार्थ यह भी कहते हैं, “इस पूरे मामले में प्रशासन की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। चाहे वह स्वास्थ्य विभाग हो, पंचायत स्तर के अधिकारी हों या प्रदूषण से जुड़े विभाग-अगर जांच में कोई भी घटक दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। सिर्फ निलंबन काफी नहीं है। यह बच्चों की जिंदगी का सवाल है। सबसे जरूरी बात यह है कि प्रशासन सिर्फ जांच और रिपोर्ट तक सीमित न रहे।
गांवों में साफ पानी, नियमित स्वास्थ्य जांच, गर्भवती महिलाओं की निगरानी और बच्चों के लिए न्यूरोलॉजिकल स्क्रीनिंग अनिवार्य की जाए। प्रभावित परिवारों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि भविष्य में उनके गांव का कोई भी बच्चा ऐसी रहस्यमय बीमारी की वजह से दिव्यांग नहीं होगा।”
एक्टिविस्ट डा.लेनिन कहते हैं, “गाजीपुर के इन गांवों में रहस्यमयी बुखार से प्रभावित परिवार इलाज, जांच और सरकारी मदद के इंतजार में हैं। उनके लिए सरकारी दावे और घोषणाएं तब तक अधूरी हैं, जब तक जमीनी स्तर पर ठोस इलाज, पुनर्वास और स्थायी सहायता नहीं मिलती। जिन बच्चों का बचपन बुखार ने छीन लिया, उनके माता-पिता आज भी इसी सवाल से जूझ रहे हैं कि क्या उन्हें समय रहते इंसाफ और इलाज मिल पाएगा या फिर यह पीड़ा यूं ही सालों तक उनके परिवारों के जीवन का हिस्सा बनी रहेगी?
सरकार को यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि यह मामला फाइलों में दबाकर खत्म नहीं किया जाएगा। जब तक हर पीड़ित बच्चे को इलाज, पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन का अधिकार नहीं मिलता, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी।”
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक है)