ये तो मोदी-योगी के खिलाफ हैं…

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद ने जिस तरह से बीजेपी के सत्तारूढ़ हलकों और साधु-संतों की बिरादरी को उद्वेलित कर रखा है, वह दिलचस्प है। हालांकि है यह सनातन बिरादरी का आंतरिक मामला ही। फिर भी, यह विवाद बताता है कि लोकतांत्रिक मूल्य और धर्मनिरपेक्ष चेतना जैसे हर नागरिक के लिए, वैसे ही इस खेमे के लिए भी जरूरी होती है, भले ही आम तौर पर वह इसे महसूस न करे।

कथित हिंदू चेतना या सनातन परंपरा का चाहे जितना भी ढोल पीट लिया जाए, उससे सत्ता का मूल चरित्र नहीं बदलता। सत्ता अगर हिंदू चेतना के बल पर मिली है तो सत्तासीन लोग स्वाभाविक ही उसका बाजा बजाएंगे। लेकिन वे सत्ता के बल पर बनी अपनी सर्वोच्चता को लेकर किसी तरह का समझौता नहीं करेंगे। अगर सत्तारूढ़ नेता को इसी हिंदू चेतना के नाम पर चुनौती दी गई तो भी वह चुनौती देने वालों की ऐसी-तैसी करने में पीछे नहीं रहेगा।

यही बात साबित हो रही है शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े मौजूदा विवाद से। अविमुक्तेश्वरानंद गोहत्या रोकने की मांग और मंदिरों को तोड़े जाने के आरोपों के जरिए दरअसल मौजूदा हिंदूवादी निजाम को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। वे प्रधानमंत्री मोदी, आरएसएस प्रमुख भागवत और यूपी के मुख्यमंत्री योगी के खिलाफ लगातार बयान दे रहे हैं।

अयोध्या के राममंदिर में प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई में हुए प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का उन्होंने यह कहकर विरोध किया कि अधूरे बने मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा धर्म विरुद्ध है। काशी में मंदिर तोड़े जाने के अभियान की भर्त्सना करते हुए उन्होंने उसे औरंगजेबी कृत्य तक बता दिया।

वैसे, हिंदू धर्माचार्यों और संत-महात्माओं का एक खेमा शुरू से आरएसएस की अगुआई में चले हिंदुत्ववादी अभियान का विरोध करता रहा है। लेकिन पहले की बात अलग थी। अब मोदी-योगी राज में किसी संत-महात्मा-धर्माचार्य को उनके खिलाफ बोलने की इजाजत नहीं है। पिछले एक दशक से ज्यादा समय से संतों की पूरी गोलबंदी दिख रही है। वे आरएसएस-बीजेपी की अगुआई को स्वीकार कर चुके हैं।

उसके खिलाफ बोलने वाले शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद उस पूरे खेमे में इस दौर की इकलौती आवाज रहे हैं। उनके खिलाफ भृकुटियां तो तनती रही हैं, लेकिन उन्हें सबक सिखाने का बीड़ा उठाया योगी ने। संगम तट पर उनके साथ पुलिस-प्रशासन ने जैसा सलूक किया, वह राज्य की सर्वोच्च सत्ता की मर्जी के बगैर नहीं हो सकता था।

इस ‘डंडात्मक कार्रवाई’ के बाद उनकी मौखिक लानत-मलामत का अभियान शुरू हुआ। योगी खेमे के साधु-संन्यासी शंकराचार्य को विरोधी दलों का एजेंट, देश विरोधी ताकतों का सिरमौर वगैरह तो बता ही रहे थे, खुद योगी ने इशारों- इशारों में उन्हें कालनेमि तक बता डाला। कालनेमि संन्यासी वेशधारी एक राक्षस था।

यह मामला आगे क्या मोड़ लेता है, यह देखना होगा। वैसे बीच-बचाव की कोशिशें शुरू हो गई हैं तो उम्मीद की जा सकती है कि तात्कालिक तौर पर ही सही, लेकिन शांति स्थापना का कोई न कोई फार्मूला निकाल लिया जाएगा।

गौर करने की बात यह है कि सत्ता चाहे किसी भी धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर हासिल की जाए, वह अपने आगे सबको तुच्छ समझती है। इसलिए उस पर अंकुश बनाए रखना जरूरी होता है। यह अंकुश लोकतांत्रिक चेतना का ही हो सकता है। अगर एक धर्म की सर्वोच्चता मान ली जाए तो भी समय-समय पर उस धर्म की व्याख्या के क्रम में मतभेद उभरते रहेंगे। उन मतभेदों को कैसे दूर किया जाएगा, अगर स्वस्थ, लोकतांत्रिक बहस की परंपरा जीवंत न रहे?

हर सवाल का जवाब आप शासक या नेता का मुंह देखकर ढूंढ़ना चाहेंगे तो वही होगा जो मौजूदा विवाद में देखने को मिला। शंकराचार्य के खिलाफ सबसे बड़ा आरोप यही लगा और लगता रहा कि वे मोदी और योगी के खिलाफ हैं। यह सवाल नाम के लिए भी नहीं उठा कि क्या वे धर्म के खिलाफ हैं, क्या उनकी बातें शास्त्रों के विरुद्ध हैं?

यह भी कथित हिंदू राष्ट्र के दावों की असलियत बताने के लिए काफी है। लेकिन धर्म के नाम पर सत्ता का नशा कर रहे लोगों का इन बातों से कोई वास्ता नहीं होता। सोचने की जरूरत उन लोगों को है, जिन्हें वास्तव में देश, समाज और धर्म की चिंता है।

(प्रणव प्रियदर्शी की टिप्पणी उनकी फेसबुक पोस्ट से साभार)

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