अब तो यह स्थापित सत्य हो गया है कि भारत देश अपनी तमाम पुरातन गर्वित पहचान खोकर सचमुच 26 मई 2014 को ही स्वतंत्र हुआ जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए थे। उन्होंने अपनी मातृ संस्था, आईटी सेल, अंधभक्त सेना, गोदी मीडिया, रीढ़हीन अधिकारियों, आधारहीन, विचारहीन तथा अवसरवादी नेताओं, जहरीले धार्मिक प्रचारकों, मनोरंजन की दुनिया के दोगलेपन के पोषकों के सहयोग से इस देश की तमाम स्थापित मान्यताओं को दरकिनार कर नया इतिहास लिखने की सनक को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया।
जिस प्राचीन भारत की पहचान महान सहिष्णुता की रही, विविधता में एकता की गौरवशाली थाती रही, गंगा जमुना की तहजीब रही, जहां हिन्दू धर्म की विशाल हृदयता में सभी पंथ सम्मानपूर्वक समाहित रहे, जहां भारतीयता की पहचान ही देशवासी को पूर्णता देती रही, जहां धर्म अपनी कमजोरियों को स्वीकारते हुए उसे सुधारते रहे, जहां धर्म खुलकर वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहित करते रहे, जहां सभी सम्प्रदाय अपनी मान्यताओं को पूरी आजादी से मनाते हुए उसकी अच्छाइयों को विभिन्न वर्गों में बेरोकटोक प्रसारित करते रहे, देश की मुख्यधारा में सभी धर्म, पंथ, भाषा, बोली, संस्कृति, पहनावा, लोकसंगीत, लोकगायन, समाहित रहीं, आज हमारी यह सारी महान मान्यताएं बर्बरता से मिटाई जा रही हैं।
प्राचीनकाल से भारत की पहचान किसी एक नाम से कभी नहीं रही, समाज के उत्थान के लिए किए गए अविस्मरणीय कार्यों में सभी के योगदानों को इतिहास में पर्याप्त स्थान देकर भारतीयता की स्थाई पहचान को रेखांकित करते हुए देश इस मुकाम तक पहुंचा।
महान पौराणिक काल, सिंधु घाटी सभ्यता, हड़प्पा काल, नालंदा तथा तक्षशिला के महान शैक्षणिक संस्थानों के साथ ही, समाज सुधारकों, आज़ादी के लिए संघर्ष करने और कुर्बानी देने वाले अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों, कार्यकर्ताओं से लेकर नेताओं, सैनिकों, कलाकारों, खिलाड़ियों आदि अनगिनत हीरों से भारत देश का मुकुट सजा है।
प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज में शास्त्रार्थ, मतभिन्नता, तर्क वितर्क, अस्वीकार्यता को महत्व दिया गया है, इन्हीं खूबियों ने समाज को समय के साथ अपने में अनेक बदलावों को अंगीकृत करने प्रेरित किया और भारतीय समाज आधुनिक, प्रगतिशील समाज की पहचान के साथ वैश्विक पटल पर अपनी चमक बिखेरता रहा। विश्व समुदाय ने भारत को अलग मुकाम दिया। अपने इसी ओहरे के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के जलवे बिखरते रहे। आज उसी पहचान पर संकटों के गहरे बादल छाए हैं।
आरएसएस की विचारधारा से ओतप्रोत उसके प्रचारक नरेंद्र मोदी अपने सत्तारूढ़ होते ही भारत की इस महान विरासत, पहचान को मिटाने के एजेंडे पर जुट गए। आज समाज के प्रत्येक तबके में अलगाव, कटुता, संदेह, नफरत हद दर्जे तक बढ़ गई है। सत्ता पर अपनी कठोर पकड़ हेतु हर वह हथकंडे अपनाए जा रहे जो अंततः देश और समाज को खोखला कर रहे हैं। सत्ता ने देश में ऐसे हालात बना दिए हैं जहां समाज के हर तबके को स्वयं से अपनी पहचान देनी पड़ रही है।
आज नागरिक को ही सिद्ध करना है कि वह इस देश का ही नागरिक है अन्यथा सरकार उसे घुसपैठिया मान लेगी। देश के मतदाता को ही सिद्ध करना है कि वह सचमुच मतदाता है अन्यथा सरकार उसे फर्जी वोटर मान लेगी। किसान अगर अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ सड़कों पर आए तो उन्हें खालिस्तानी, नकली किसान मान लिया जाएगा।
मुस्लिम अगर अपनी मांगों के लिए सड़क पर आए तो उन्हें देशद्रोही, पाकिस्तानी कहा जाएगा। छात्र छात्राएं अपनी मांगों को लेकर सामने आए तो उन्हें टुकड़े-टुकड़े गैंग का मान लिया जाएगा। शहरी वर्ग अगर सरकार की नीतियों के विरोध में सामने आया तो उसे अर्बन नक्सली बताया जाएगा। जंगलों में रहने वाले धरतीपुत्रों को सरकार के इशारों पर चलना पड़ेगा अन्यथा उसे कोर नक्सली बताकर मार दिया जाएगा। जो सरकार की झूठी महिमा नहीं करेगा उसे मेनस्ट्रीम मीडिया से बेदखल कर दिया जाएगा।
सरकार ने समाज के हर वर्ग की आवाज़ को ऐसे ही दमित करने का उपक्रम चलाया हुआ है।
आज सरकार द्वारा घुटन भरे माहौल को इस स्तर तक पहुंचा दिया गया है कि वह किसी भी नागरिक को गिरफ्तार कर उसे ही अपनी बेगुनाही साबित करने को कहती है भीमा कोरेगांव के प्रताड़ित, संजीव भट्ट, उमर खालिद, शरजील इमाम, सोनम वांगचुक, अमिताभ ठाकुर, आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। सरकार के समर्थक किसी भी चौराहे में खड़े होकर किसी से भी उसकी देशभक्ति साबित करने कह रहे, मनमाफ़िक जवाब नहीं मिलने पर बुरी तरह से पीटा जा रहा।
अल्पसंख्यक साबित करें कि उनकी इबादतगाह किसी मंदिर के एवज पर नहीं बनी है अन्यथा बुलडोजर तैयार है। शासन, प्रशासन की शह पर इनके हौसले इतने बुलंद हैं अब तो ये हिंदू धर्म के सर्वोच्च धार्मिक प्रतिष्ठित शंकराचार्य जी को ही यह कहकर ललकार रहे कि वे स्वयं ही सिद्ध करें कि वो शंकराचार्य हैं, यह इनके बौद्धिक पतन की पराकाष्ठा है।
सरकार भी पूरी बेशर्मी से अपने चेहते उद्योगपति को सारे संसाधन सौंपने हेतु वनों,पहाड़ों, नदियों के नए पैमाने तय कर रही है ताकि जनता के यह सभी नैसर्गिक संसाधनों को आसानी से उन्हें सौंपा जा सके।
संघ की विचारधारा देश और समाज को विभाजित करने की रही है, उसने न देश की स्वतंत्रता में रत्ती भर योगदान दिया है और न ही भारत के नवनिर्माण में कोई भूमिका निभाई है, इसलिए उससे किसी शुचिता की अपेक्षा स्वयं से ही बेमानी होगी। उसने अपनी स्थापना से ही केवल एक लक्ष्य को केंद्रित कर अपनी यात्रा शुरू की, वह कि येनकेन प्रकारेण इस महान देश की सत्ता को हथियाना और इसे मनुस्मृति के आधार पर चलाना तथा माधव सदाशिव गोलवलकर के सपनों का भारत बनाना।
इनके सपनों के भारत से किसी भी सभ्य समाज का दिल दहल जाएगा। जहां भयंकर भेदभाव, छुआछूत है, जहां अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है, जहां वैज्ञानिक सोच के लिए कोई स्थान नहीं है, जहां लोकतांत्रिक मूल्यों का कोई स्थान नहीं है, उस भारत में भविष्य नहीं अतीत है, क्योंकि इस विचारधारा के पास भविष्य की कोई ठोस प्रगतिशील समझ है ही नहीं इसलिए अतीत के झूठे दंभ को नागरिकों में परोसकर अपनी सत्ता को जारी रखना एकमेव ध्येय है।
संघी सरकारों के मोहरे बने बुद्धिहीन अंधभक्त इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि दुनिया उनकी जाहिलता को देख रही है जबकि सारी दुनिया इसे बारीकी से देख रही उसे इन्हें सत्ता द्वारा पोषित करने की भी जानकारी है, यही वजह है कि हमारा देश न केवल अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अनवरत पिछड़ता जा रहा बल्कि अपमानित भी हो रहा है। पिछले बारह वर्षों में हमारा देश विकास के सभी मापदंडों पर पिछड़ता जा रहा है।
मेरा मानना है कि यह महान देश अभी भी बौद्धिक रूप से विकसित लोगों को खूब पैदा कर रहा है, जरूरत केवल इन सभी के एकजुट होने की है। पिछले सवा दशक के हमारे सफर ने हमें वैश्विक स्पर्धा में पिछले पायदान में पहुंचा दिया है। देश के जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम सभी का परम दायित्व है कि हम राष्ट्र के समग्र विकास में सक्रिय भागीदार बनें चाहे किसी भी पंथ से हों या किसी भी क्षेत्र में सक्रिय हों, समय की यही पुकार है कि यह गौरवशाली देश अपना वर्तमान तथा भविष्य संभाल ले।
अपनी आने वाली पीढ़ी के जवाबदेह भी हम ही हैं। एक बात हर देशवासी भलीभांति समझ ले इस सरकार की अगुवाई में किसी भी सकारात्मक बदलाव या विकास की कोई गुंजाइश नहीं है, इसके शासनकाल में देश का चहुंमुखी पतन ही निश्चित है।
यह हर देशवासी के लिए चेतावनी काल है कि किसी विचारधारा में कैद होकर मानसिक, शारीरिक, आर्थिक गुलाम बनने की बजाए उसकी गलत नितियों के खिलाफ खड़े होकर आवाज बुलंद करो, यही आपका गर्वित इतिहास है। अभी भी सच्चाई से मुंह मोड़कर सरकार के झूठे प्रपंचों को समर्थन देने वालों का इतिहास काले पन्नों पर दर्ज होगा।
(परमजीत बॉबी सलूजा लेखक और टिप्पणीकार हैं।)