“गणतंत्र दिवस हमारी स्वतंत्रता, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का सशक्त प्रतीक है। यह पर्व हमें एकजुट होकर राष्ट्र-निर्माण के संकल्प के साथ आगे बढ़ने की नई ऊर्जा और प्रेरणा देता है।” प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर एक संस्कृत सुभाषित भी साझा किया— “पारतन्त्र्याभिभूतस्य देशस्याभ्युदयः कुतः। अतः स्वातन्त्र्यमाप्तव्यमैक्यं स्वातन्त्र्यसाधनम्॥”
इस सुभाषित का आशय है कि जो राष्ट्र पराधीन है या अधिकारों से वंचित है, वह प्रगति नहीं कर सकता। इसलिए स्वतंत्रता और एकता को मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में अपनाकर ही राष्ट्र की प्रगति सुनिश्चित की जा सकती है। – नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री, 26 जनवरी 2026
“आज भारत में हिंदू धर्म और हिंदुओं की संवैधानिक अधीनता की 77वीं वर्षगांठ है। फिर भी बहुत-से भोले हिंदू अपनी ही अधीनता का उत्सव मनाते रहते हैं।” – नागेश्वर राव, पूर्व सीबीआई के अंतरिम निदेशक, 26 जनवरी 2026
सीबीआई के अंतरिम निदेशक रह चुके नागेश्वर राव के इस कथन पर न कोई हंगामा मचा, न ही उन्हें कोई देशद्रोही बता रहा है। न तो कोई शासन-प्रशासन उनसे पूछने पहुँचा और न ही उन पर कोई एफआईआर दर्ज हुई। जबकि नागेश्वर राव को डायरेक्टर पद पर रहते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक लाख रुपये का जुर्माना और पूरे दिन अदालत में बैठे रहने का दंड मिल चुका है। (स्रोत:Nageswara Rao: Furious SC makes ex-CBI chief ‘sit in a corner till court rises’ | India News – Times of India)
ट्विटर उनकी विवादित टिप्पणियाँ पहले भी हटा चुका है। उन पर भ्रष्टाचार जैसे मामलों के आरोप भी लग चुके हैं। (स्रोत: IPS Nageshwar Rao who lost his job as interim CBI chief had these corruption complaints Twitter takes down ex-IPS officer Nageswara Rao’s tweet on Swami Agnivesh)।
जहाँ एक तरफ वे गणतंत्र दिवस को ही मानने से इनकार करते हैं, वहीं दिल्ली आईआईटी में 16–18 जनवरी 2026 को हुए “जाति और नस्ल की आलोचनात्मक दर्शन-परंपरा” (Critical Philosophy of Caste and Race) सम्मेलन पर विवाद खड़ा करते हैं। लगता है कि नागेश्वर राव को समाज की हकीकत का अंदाज़ा नहीं है।
13 जनवरी को यूजीसी ने नए नियम जारी किए हैं, जिनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान और विकलांगता के आधार पर छात्र-छात्राओं के साथ भेदभाव न हो। नए नियमों के अनुसार अब चाहे सरकारी कॉलेज हो या निजी विश्वविद्यालय, हर जगह एक “इक्विटी सेल” बनाना ज़रूरी होगा। यह सेल एक तरह की अदालत की तरह काम करेगी। अगर किसी छात्र को लगता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है, तो वह यहाँ अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है।
समिति की सिफ़ारिश पर संस्थान को उस पर तुरंत कार्रवाई करनी होगी। यूजीसी को ये नए नियम इसलिए लाने पड़े हैं क्योंकि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव के कारण कई छात्रों को आत्महत्या करनी पड़ी है। यूजीसी के आँकड़े बताते हैं कि 2019–20 से 2023–24 के बीच पाँच सालों में भेदभाव की घटनाओं में 118 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
आज भी भारत में लोग जहाँ जातिगत भेदभाव के शिकार होते हैं, वहीं विकसित देशों में नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 24 जनवरी 2026 की सुबह अमेरिका के मिनियापोलिस शहर में 37 साल के व्यक्ति को इमिग्रेशन एजेंट्स द्वारा गोली मारकर हत्या करना हो या भारत में माब लीचिंग एक ही सिक्के दो पहलू हैं। अमेरिका में तीन हफ्तों के भीतर यह दूसरी घटना है।
अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा इस हत्या को जायज़ ठहराया जा रहा है और आईसीई (Immigration and Customs Enforcement) को देशभक्त बताया जा रहा है। मिनेसोटा के मेयर और गवर्नर को अहंकारी, घमंडी और विद्रोह भड़काने वाला कहा जा रहा है। इस तरह की नस्लीय कार्रवाइयों से अमेरिका में रह रहे भारतीय नागरिकों के भीतर भी भय का माहौल है।
भारत में नागेश्वर राव दिल्ली आईआईटी के डायरेक्टर को ट्वीट करके लिखते हैं— “मैं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग के अंतर्गत संचालित ‘क्रिटिकल फिलॉसफी ऑफ कास्ट एंड रेस’ (CPCR) नामक रिसर्च स्टडी ग्रुप की गतिविधियों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करने के लिए यह पत्र लिख रहा हूँ…
इन लगातार चल रही राष्ट्र-विरोधी और अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों के बावजूद, जो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे तत्वों की याद दिलाती हैं, आपके द्वारा न तो CPCR समूह को भंग करने की कोई कार्रवाई की गई और न ही ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगाई गई… संस्थान की प्रतिष्ठा की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और अपनी निष्कलंकता सिद्ध करने के लिए आपको तत्काल और कठोर कदम उठाने चाहिए, जिनमें शामिल हैं:
- CPCR रिसर्च स्टडी ग्रुप को भंग करना,
- उसके बैनर तले होने वाले किसी भी सम्मेलन, कार्यशाला या कार्यक्रम पर रोक लगाना,
- इस समूह से जुड़े संकाय सदस्यों और कर्मचारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक तथा अन्य उपयुक्त कार्रवाई शुरू करना,
- समूह के वित्तपोषण के स्रोतों और उससे जुड़े अन्य मामलों की गहन जाँच कराना।”
नागेश्वर राव केवल माँग ही नहीं कर रहे, वे डायरेक्टर पर दबाव डालने और डराने का भी काम कर रहे हैं— “यह तथ्य कि यह सम्मेलन आईआईटी दिल्ली के सीनेट हॉल में आयोजित किया गया, इस बात का संकेत है कि यह आपकी अनुमति और अनुमोदन से ही हुआ, जिससे आप इसके मौन संरक्षक (tacit patron) बनते हैं।”
वे जाँच समिति की रिपोर्ट आने से पहले ही इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि— “समिति वक्ताओं के चयन और इसी तरह के प्रक्रियागत मुद्दों तक खुद को सीमित रखती है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि असल मुद्दे से ध्यान हटाने और इन राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है।”
नागेश्वर राव का ट्वीट और उसके बाद की शिकायत दरअसल किसी एक सम्मेलन या किसी एक समूह के ख़िलाफ़ नहीं है। यह उस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जो मानती है कि जो कुछ भी असुविधाजनक है, वह देशद्रोही है; जो कुछ भी सवाल उठाता है, वह साज़िश है; और जो कुछ भी सत्ता की कथा से मेल नहीं खाता, वह “टुकड़े-टुकड़े गैंग” है। यही भाषा जेएनयू, जामिया, हैदराबाद, अलीगढ़ विश्वविद्यालय, फिल्मकारों, लेखकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ बार-बार इस्तेमाल की गई है।
राव दिल्ली आईआईटी को भी उसी नैरेटिव से देख रहे हैं। हंगरी के दार्शनिक जॉर्ज लुकाच ने लिखा है तर्क के विनाश से ही फ़ासीवाद यूरोप में आया। इसी का परिणाम रहा कि हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानशाह पैदा हुए। आज भारत में जेएनयू शट डाउन के स्लोगन दिए जाते है। तो दूसरी तरफ विश्वविद्यालयों में सामाजिक आंदोलनों, प्रतिरोध मार्च में भाग लेने से छात्रों पर कार्रवाई की जाती है।
मेडिकल कालेज बंद करने पर एक समूह द्वारा खुशियाँ मनाई जा रही हैं तो दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है। पिछड़े इलाकों के प्राइवेट स्कूल को इलीगल बोल कर प्रशासन द्वारा तोड़ दिया गया।
आज “राष्ट्र-विरोध” का मतलब यह नहीं रह गया है कि कोई देश को नुकसान पहुँचाने की साज़िश कर रहा है। अब इसका मतलब यह है— अगर आप जाति व्यवस्था की आलोचना करते हैं तो आप राष्ट्र-विरोधी हैं। अगर आप अल्पसंख्यकों पर हो रहे ज़ुल्म की बात करते हैं तो आप राष्ट्र-विरोधी हैं। अगर आप राज्य की नीतियों पर सवाल उठाते हैं तो आप राष्ट्र-विरोधी हैं। यानी राष्ट्र को अब एक राजनीतिक पार्टी और एक विचारधारा का पर्याय बना दिया गया है।
अकादमिक संस्थानों में सेमिनार और बहस नहीं होगी तो कहाँ होगी? सवाल यह नहीं है कि सेमिनार किसने आयोजित किया और उसमें वक्ता कौन थे, बल्कि सवाल यह है कि क्या आज भारत में विश्वविद्यालयों को यह अधिकार भी नहीं रह गया कि वे समाज की बुनियादी संरचनाओं पर बहस कर सकें?
अगर जाति और नस्ल पर बात करना “राष्ट्र-विरोध” है, तो फिर फुले, आंबेडकर, पेरियार और गांधी— सबको कटघरे में खड़ा करना पड़ेगा। जैसा कि इस सेमिनार के कॉन्सेप्ट नोट में भी लिखा है— ‘‘भारत की उन परंपराओं से सीखा जा सके और उनका उत्सव मनाया जा सके जिन्होंने सामाजिक असमानताओं और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया है जिनमें सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली योगदान उन सामाजिक समूहों के रहे हैं जो लंबे समय से इन सामाजिक बुराइयों का शिकार रहे हैं।
और हीनताबोध में ढाल देने वाली विषयता (subjectivation) की दीर्घकालिक ऐतिहासिक प्रक्रिया को बार-बार उत्पीड़ितों के विचारकों, समाज-सुधारकों और नेताओं के इंकारों, प्रतिरोधों और विद्रोहों ने तोड़ा है। उनके असंख्य प्रवाहों में से कुछ का ही उल्लेख करें तोः तुकाराम और रैदास जैसे संत-कवियों के काव्य-सामाजिक प्रयासों के बाद जोतीराव और सावित्रीबाई फुले तथा इयोथे थास के विद्वत्तापूर्ण और संस्थान-निर्माण के अभियान आए।
बी. आर. आंबेडकर, अय्यंकाली, मंगू राम, पेरियार, सहोदरन अय्यप्पन, जे. जे. एम. निकोल्स रॉय, लोंगरी आओ और अनेक अन्य दूरदर्शी व्यक्तित्वों के अकादमिक और राजनीतिक योगदानों ने इन समतावादी विरासतों को आगे बढ़ाया। आगे चलकर इन्हीं परंपराओं ने कांशीराम, दलित पैंथर्स, तर्कवादी आंदोलन जैसे संघर्षों का मार्ग प्रशस्त किया, और इनके साथ-साथ दलितों, आदिवासियों और ट्रांस-हिमालय क्षेत्र के मूलनिवासी लेखकों के जीवनानुभवों पर आधारित कथाओं और साहित्यिक हस्तक्षेपों की एक सशक्त धारा भी जुड़ी।
अगर एक अकादमिक चर्चा से राष्ट्र टूट सकता है, तो फिर वह राष्ट्र पहले से ही खोखला है। क्या भारत अब इतना कमज़ोर है कि वह अपने ही समाज पर सोच भी नहीं सकता? क्या विश्वविद्यालय की कल्पना इस बुनियाद पर टिकी होनी चाहिए कि वह अपने समाज, अपने इतिहास, अपनी संरचनाओं और अपनी हिंसाओं पर सेमिनार और तर्क-वितर्क न कर सके? जाति, नस्ल, वर्ग, पितृसत्ता, राज्य-हिंसा, पूँजी— ये सब ऐसे ही विषय हैं जिन पर चुप्पी समाज को सुरक्षित नहीं, बल्कि भीतर से सड़ा हुआ बनाती है।
“Critical Philosophy of Caste & Race” नाम ही यह बताने के लिए काफ़ी है कि यह संरचनात्मक असमानताओं की आलोचनात्मक जाँच का प्रयास है। लेकिन आज के भारत में “आलोचना” अपने आप में एक संदिग्ध गतिविधि बनती जा रही है।
यह सेमिनार डरबन सम्मेलन के 25 साल पूरे होने पर रखा गया था। इसलिए डरबन सम्मेलन के कुछ बिंदुओं को साझा करना ज़रूरी है— पीड़ितों को अक्सर लिंग, भाषा, धर्म, राजनैतिक व अन्य विचारों, सामाजिक मूल स्थान, सम्पत्ति, जन्म व अन्य दर्जों के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। रोज़गार, स्वास्थ्य, पुलिस कार्रवाई और शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले भेदभाव से निपटने के लिये उपायों का ख़ाका पेश किया गया है।
सदस्य देशों से मीडिया व इण्टरनेट पर नस्लीय घृणा को उकसावा दिये जाने से रोकने के लिये, नीतियाँ व कार्यक्रम तैयार करने का आग्रह किया है। राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक निर्णय-निर्धारण प्रक्रियाओं में पीड़ितों के लिये समान अवसर सुनिश्चित किये जाने और सकारात्मक ढंग से सहायता मुहैया कराए जाने के उपाय अपनाने का आहवान किया गया है।
भारत सरकार को विश्वविद्यालयों, सेमिनारों, लिखने पढ़ने की आजादी पर किसी तरह की रुकावट पैदा करने की जगह उसको और खोलना चाहिए। बहस-मुबाहिसा पर रोड़ा अटकाने वाले व्यक्तियों, संगठनों पर करवाई करने की जरूरत है। बहस-मुबाहिसा, तर्क-वितर्क वाली सामाज से ही हम एक आधुनिक भारत का निर्माण कर सकते हैं। सरकार ही नहीं नागरिक सामाज का भी कर्तव्य है की बहस-मुबाहिसा, तर्क-वितर्क में रुकावट पैदा करने वाली व्यक्तियों, संगठनों का प्रतिरोध करें।
अंत में मैं प्रधानमंत्री की बातों को आगे बढ़ाते हुए यही कहना चाहूँगा कि जब तक आप किसी को उसके अधिकारों से वंचित रखेंगे, तब तक वह देश प्रगति नहीं कर सकता। और अगर अकादमिक संस्थानों को खुलकर विचार रखने की आज़ादी नहीं होगी, तो न वह संस्था और न ही वह देश कभी उन्नति के रास्ते पर जा सकेगा।