कॉलेज/ विश्वविद्यालयों सहित हर क्षेत्र को संघ के कब्जे से मुक्त करने का सर्वोत्तम उपाय है डाइवर्सिटी

बर्बरता में एटिला द हूण और चंगेज खां को बौना बनाने वाला विश्व का इकलौता समुदाय है भारत का सवर्ण समाज।

यदि यह जानने का प्रयास हो कि मानव जाति के हजारों साल के इतिहास में ऐसे कौन से समाज की इस धरा पर विद्यमानता रही है, जो अपने ही सहधर्मी बहुसंख्य लोगों को शक्ति के स्रोतों (आथिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) में रत्ती भर भी हिस्सेदार बनाने की मानसिकता से कभी पुष्ट नहीं रहा एवं जब-जब बहुसंख्य वंचितों को राज्य द्वारा कुछ अधिकारों से लैस करने का प्रयास हुआ,  उसने देश को एक रणभूमि में तब्दील कर दिया तो एक एकमात्र जिस समाज का नाम सामने आएगा, वह ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्यों से युक्त भारत का सवर्ण समाज होगा!

वास्तव में लाख प्रयास के बावजूद ऐसे किसी अन्य समाज का नाम नहीं ढूँढा जा सकता। जिसकी अपने ही सहधर्मियों को अधिकार- शून्य देखने की सवर्णों जैसी तीव्र चाह हो! यह समाज शुद्रातिशूद्रों के रूप में विद्यमान देश की 85 प्रतिशत आबादी के अधिकारों के इतना खिलाफ रहा कि उसे बहुसंख्य आबादी को अच्छा नाम रखने, शिक्षार्जन एवं मोक्ष के लिए आध्यात्मानुशीलन का अधिकार देना भी कभी गंवारा नहीं रहा।

दुनिया के इतिहास में सबसे क्रूर माने जाने वाले एटिला द हूण, चंगेज खां जैसे शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को अच्छा नाम रखने, शिक्षा ग्रहण करने एवं दुःख मोचन के लिए देवालयों में जाकर अपने भगवानों से प्रार्थना करने से कभी नहीं रोका। ऐसी बर्बरता का परिचय समग्र इतिहास में सिर्फ सवर्णों ने दिया।

अगर किसी ने अपने सहधर्मियों के साथ अतीत में ऐसा किया भी तो बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक आते-आते वे अपने पुरुखों के पापों का प्रायश्चित करने के लिए वंचित मानव समुदायों को अधिकारों से लैस करने लगे।

इसका बड़ा दृष्टान्त उस अमेरिका ने स्थापित किया, जहाँ के प्रभुवर्ग ने विगत 17 वीं सदी के शुरुआत से पशुवत इस्तेमाल हो रहे कालों को बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध (1967) से मानवीय अधिकारों से लैस करना शुरू किया और सदी के शेष होते अमेरिकी आरक्षण (डाइवर्सिटी) के जरिये सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों सहित, सप्लाई, डीलरशिप, फिल्म-टीवी इत्यादि समस्त क्षेत्रों में उन्हें संख्यानुपात में हिस्सेदार बनाया। ऐसा सिर्फ अमेरिका ही नहीं, इंग्लैंड, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि ने भी किया!

बीसवीं सदी में दूसरे देशों के प्रभु वर्ग से नहीं ली प्रेरणा       

अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि के विपरीत भारत के बिहार में जब 1978 में वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने  मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों के आधार पर सप्लाई, डीलरशिप नहीं,  सिर्फ सरकारी नौकरियों में 26% आरक्षण (पिछड़े वर्गों के लिए) लागू करने की घोषणा की, वहां के प्रभुवर्ग अर्थात सवर्ण जातियों (विशेषकर भूमिहार, राजपूत, कायस्थ) ने उनकी आरक्षण नीति के खिलाफ उग्र प्रदर्शन शुरू कर दिया।

विरोध के दौरान ‘कर्पूरी कर पूरा, छोड़ गद्दी उठा उस्तरा, बना दाढ़ी’ जैसे नारे लगाए गए। इस विरोध में संघ का तत्कालीन राजनीतिक संगठन जनसंघ भी शामिल रहा। आखिरकार सवर्णों ने 1979 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए कर्पूरी ठाकुर की सरकार को गिरा दिया! शुद्रातिशूद्रों के अधिकारों के विरुद्ध वह सवर्णों का आखिरी विरोध नहीं था: 1990 के दशक में 7 अगस्त ,1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें पिछड़ों को 27% आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी।

मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही बहुजनों के किसी भी प्रकार के मानवीय अधिकारों के खिलाफ सदैव उग्र रूप धारण करने वाले सवर्णों का आक्रोश फिर फट पड़ा। उनकी होनहार संतानों ने जहाँ आत्म-दाह से लेकर राष्ट्र की संपदा दाह का सिलसिला शुरू किया, वहीँ सवर्णों की चैम्पियन पार्टी भाजपा ने राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर, अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन छेड़ दिया, जिसके फलस्वरूप अपार संपदा और असंख्य लोगों की प्राणहानि  हुई!

अंततः सवर्णों और भाजपा के आरक्षण विरोधी आंदोलनों के फलस्वरूप 22 जनवरी, 2024 को राममंदिर निर्माण का कार्य पूरा हुआ: तब तक साधु-संतों के वेश में छिपे करोड़ों ब्राह्मणों, असंख्य सवर्ण लेखक-पत्रकारों, छात्र और उनके अभिभावकों के सौजन्य से देश आरक्षण विरोधी आग में जलता रहा!

इक्कीसवीं सदी में भी पूर्ववत है सवर्णों की बहुजन विरोधी सोच 

नई सदी में जब अश्वेत अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, जिसके समक्ष डीयू- जेएनयू की हैसियत प्राइमरी स्कुल जैसी है, में शिक्षा के समान अवसर का लाभ उठा रहे थे, तब 2006 में कांग्रेस सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रवेश में पिछड़ों के लिए आरक्षण की घोषणा की। उसके बाद दलित – पिछड़ों के किसी भी प्रकार के अधिकारों के खिलाफ सदा मुस्तैद रहने वाले सवर्णों ने देश को फिर युद्द क्षेत्र में तब्दील कर दिया।  

जब जुलाई, 2013 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने त्रि- स्तरीय आरक्षण की घोषणा की। तब उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की नई आरक्षण नीति के खिलाफ सवर्णों ने जो सड़कों पर उतर कर जो कुछ किया, उसे देखकर लोगों ने दातों तले अंगुली दबा ली। इस बार आरक्षित वर्ग के खिलाफ उनकी नफरत का यह आलम रहा कि उन्होंने यादव जाति से सम्बद्ध मानकर गायों और भैंसों को निर्ममता से पीटा तथा दूध-दही के बर्तनों को उडेलना शुरू किया।

यही नहीं भगवान् श्रीकृष्ण को यादव जाति का मानकर उनकी मूर्तियाँ तोड़ीं और सरेआम उनकी तस्वीरों को फाड़कर पैरों तले रौंदा।त्रि-स्तरीय  आरक्षण के पहले सवर्ण राजस्थान में एकाधिक बार गृह-युद्ध की स्थिति पैदा कर चुके थे और उसके बाद भी उन्होंने कई बार दलित-बहुजनों के खिलाफ जंगी मनोभाव लिए देश को अशांत कर दिया।

शुद्रातिशूद्रों के अधिकारों के खिलाफ उन्होंने बड़े पैमाने पर फिर एक बार गृह-युद्ध के हालात पैदा करने की शुरुआत तब की, जब 13 जनवरी, 2026  को यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने कॉलेज और विश्व विद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए नए समानता नियमों को अधिसूचित किया! 

यूजीसी के नए रेगुलेशन के पीछे : दो माएं

13 जनवरी, 2026 को अधिसूचित यूजीसी के नए रेगुलेशन के पीछे रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला और पायल तड़वी की मां आबेदा तड़वी की अहम भूमिका रही है। 2016 में रोहित वेमुला (हैदराबाद विश्वविद्यालय) और 2019 में पायल तड़वी (मुंबई) की आत्महत्या की घटनाओं के बाद, उनकी मांओं ने सुप्रीम कोर्ट में 2019 में याचिका दायर की थी, जिसमें भेदभाव विरोधी व्यवस्था की मांग की गई थी।

पिछले सात वर्षों से लगातार संघर्ष के माध्यम से, इन मांओं ने यूजीसी को नियम मजबूत करने के लिए विवश किया। सोशल मीडिया से प्राप्त जानकारी के मुताबिक इसकी कहानी शुरू होती है 2019 में, कोलंबिया यूनिवर्सिटी से लॉ में मास्टर्स डिग्री से सम्मानित दिशा वाडेकर से, जो  पायल तड़वी की माता अबेदा तड़वी और रोहित वेमुला की माता राधिका वेमुला की याचिका लेकर कोर्ट जाती हैं।

काफ़ी विचार विमर्श, तमाम रिसर्च का डेटा प्रस्तुत होता है, तमाम यूनिवर्सिटीज में हो रहे भेदभाव का डीप एनालिसिस होता है, 2023 में भारत सरकार राज्यसभा में कहती है कि 2019 से लेकर 2021 के बीच एससी-एसटी और ओबीसी के 98  बच्चों ने आत्महत्या की। यह हालात आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम  जैसे संस्थानों की है:  भेदभाव के मामलों में 118% की वृद्धि हुई!  विभिन्न रिसर्च तमाम एक्सपर्ट की राय लेने के बाद कोर्ट यूजीसी  को आदेश देता है नए रेगुलेशन को सख्ती से लागू करो!

ऐसा नहीं है कि यह रेगुलेशन पहले नहीं थे, यह रेगुलेशन 2012 से अस्तित्व में है, लेकिन यह सिर्फ़ पेपर पर थे उसके पीछे कारण था कि, शिकायतकर्ता केवल कॉलेज एडमिन के पास जा सकता था, एक सदस्य कमेटी ही सारे निर्णय लेती थी, ऐसे में कॉलेज एडमिन अपने इंस्टीट्यूशन की साख बचाने के लिए शिकायतों को अनदेखा कर देता थाऔर शिकायतकर्ता सुसाइड जैसे क़दम उठा लेता था।

नए नियमों में सिर्फ़ यह बदलाव हुआ है कि कमेटी में कॉलेज एडमिन के साथ साथ स्टैक होल्डर भी बैठेंगे, उसमें स्टूडेंट, प्रोफेसर, एक्सपर्टस, सभी वर्ग के प्रतिनिधि और भी कई लोग होंगे, अब कमेटी सिर्फ एक सदस्य वाली नहीं होगी, सभी का प्रतिनिधित्व होगा, प्रॉपर मॉनिटरिंग होगी, फैक्ट फाइंडिंग टीम होगी। यूजीसी  के नए नियम कोई क्रिमिनल लॉ नहीं है यह सिविल लॉ है, सभी समाज वर्गों पर लागू होता है, इन नियमों में ईडब्ल्यूएस (बामन बनिया सुवर्ण) कैटिगरी को भी शामिल किया गया है जो 2012 वाले रेगुलेशन में नहीं था!

मान लो किसी के साथ भेदभाव होता है वह शिकायत लेकर कमेटी के पास जाएगा। इस कमेटी में कई लोग होंगे, वह जांच करेंगे कि आरोप सही है या निराधार, आरोपी और शिकायतकर्ता को नोटिस जारी होंगे।  

दोनों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका मिलेगा, अगर शुरूआती जांच में झूठा पाया जाता है तो कमेटी शिकायत रिजेक्ट कर देगी, अगर आरोप सही भी साबित होते हैं तो किसी को जेल नहीं भेजा जाएगा, उनको समझाइश दी जाएगी, उनसे शपथ पत्र लिया जाएगा कि दोबारा ग़लती नहीं करेंगे, फ़िर भी अगर आरोपी नहीं मानता है तो उसे रेस्टिगेट का आदेश कमेटी दे सकती है, बस यहीं तक का प्रोसेस है।

बहरहाल जिस हिदायत के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए रेगुलेशन  पर रोक लगायी, उससे बहुजन छात्र और गुरुजनों को भारी निराशा हुई। उनकी निराशा में तब और वृद्धि हो गई जब वे देखे कि कोर्ट द्वारा यूजीसी के नए रेगुलेशन पर रोक लगने के बाद नीतीश कुमार, चिराग पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा, अनुप्रिया पटेल, ओम प्रकाश राजभर, संजय निषाद इत्यादि ने जहाँ पूरी तरह चुप्पी साध ली, वहीँ बसपा सुप्रीमो मायावती ने कोर्ट के निर्णय को उचित ठहराया। अखिलेश यादव का रवैया भी ढुलमुल रहा और वह भी मायावती की तरह कोर्ट के निर्णय का समर्थन करते दिखे।

अवश्य ही शिक्षा जगत से जुड़े कई लोगों ने स्टे के खिलाफ मुंह खोला।  यूजीसी के पूर्व चेयरमैन सुखदेव थोराट ने कहा, ‘जो नए नियमों के ख़िलाफ़ शिकायत कर रहे हैं, मेरा मानना है कि वो ग़लत हैं। मुझे लगता है कि वो आम तर्क ये दे रहे हैं कि उनके साथ भेदभाव होता है।

थोराट ने कहा, ‘उच्च जाति के लोग चाहते हैं कि उनके लिए भी प्रावधान हो क्योंकि ग़लत शिकायतें आएंगी। मुझे लगता है कि ये सब ग़लत है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उच्च जाति के कोई स्टूडेंट फ़िज़िकली डिसएबल हो और उसे प्रताड़ित किया जाता है तो ऐसा नहीं है कि नए नियमों में वो कवर नहीं होगा। वो भी कवर होगा।’

जाति और शिक्षा के मुद्दे पर व्यापक रूप से काम कर चुके समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर सतीश देशपांडे ने  कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई रोक ‘निराशाजनक’ है और यह ‘ग़लत संदेश’ देती है। 2026  के नियमों को लागू करने में समस्याएं तो आतीं। समाज की शक्ति संरचना के ख़िलाफ़ जाने वाले किसी भी क़दम के साथ ऐसा ही होता है। लेकिन इसका कोई तुक नहीं की उनके दुरुपयोग की संभावना, जो किसी भी क़ानून के साथ होती है, के कारण कोई क़ानून ही न हो।

उच्च जातियों की यह चिंता थी कि उनके साथ भेदभाव हो सकता है। हां, यह हो सकता है और कभी-कभार होता भी है। लेकिन हमें देखना चाहिए कि समाज में ऐसी घटनाओं का पलड़ा किस ओर झुका है। समाज में शक्ति समीकरण क्या हैं, यही हमें देखना होगा।’ कोर्ट के निर्णय और बहुजन नेताओं की चुप्पी से  हताश होकर बहुजन छात्रों और शिक्षकों ने यूजीसी के नए रेगुलेशन के समर्थन में सड़कों पर उतरने का मन बनाया और उतर भी गए।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक सवर्णों के मुकाबले बहुत ज्यादा संख्या में बहुजन छात्र और शिक्षक सड़कों पर उतर चुके हैं। विभिन्न शहरों से छात्र और शिक्षकों के आंदोलित होने की खबरे आ रही हैं।

बहुजनों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती: शक्ति के स्रोतों पर सवर्ण वर्चस्व              

बहरहाल यूजीसी की 2026 की नई समानता गाइडलाइंस के समर्थन में दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों के लाखों की तादाद में जो छात्र- गुरुजन बड़े आन्दोलन कर रहे हैं या आंदोलन की तैयारी में जुटे हैं, वे अपनी मांगों को विस्तार देने पर एक बार विचार कर लें। उनकी मुख्य मांगे हैं कैंपस में जातिवादी उत्पीड़न को रोकना और समावेशी माहौल बनाना; रोहित एक्ट  लागू करवाना, ताकि संस्थागत भेदभाव  पर रोक लगे एवं शिक्षकों की कमी को दूर करने के विशेष भर्ती अभियान चला कर आरक्षित पदों को भरना! 

निश्चय ही ये बड़ी मांगे हैं जिसके लिए लड़ना जरुरी है। लेकिन संघ प्रशिक्षित मोदी की नीतियों में दलित, आदिवासी ,पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाएं जिस स्टेज में  पहुंचा दिए गए हैं, उससे बाहर निकलने के लिए अवाम को दुनिया के विभिन्न अंचलों के शासकों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़नी पडी।

खुद इन्हीं हालातों में भारत के लोगों ने गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ और मंडेला के नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका में कालों ने गोरों के खिलाफ अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़ी। याद रहे सारी दुनिया में शासकों के खिलाफ गुलामों ने जो मुक्ति की लड़ाई लड़ी, वह मुख्यतः शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक- के अत्यंत असमान बंटवारे के कारण लड़नी पड़ी। शासक वह होता है, जिसका शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार होता है, जबकि गुलाम वे कहलाते हैं, जो शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत व वंचित  होते हैं।

भारत में अंग्रेजों और दक्षिण अफ्रीका में शक्ति के स्रोतों पर क्रमशः अंग्रेजों और गोरों का एकाधिकार था, जबकि गांधी और मंडेला के लोग उससे बहुत ही वंचित थे। दुनिया में जहाँ- जहाँ आजादी की लड़ाई लड़ी गई , वहां के गुलामों की स्थिति भारत और दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासियों जैसी ही रही। जिस स्थिति में गांधी को अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़नी पडी, प्रायः उसी स्थिति में आज का भारत पहुँच गया है।

स्मरण रहे जिस भाजपा का पितृ संगठन आरएसएस है, उसका जन्मकाल से चरम लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की घोषणा रहा है, ताकि उसमें कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था लागू कर शक्ति के समस्त स्रोत हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों) के मध्य वितरित किया जा सके।

पिछले ग्यारह सालों में संघ अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिये शक्ति के प्रायः 80-90 प्रतिशत स्रोत अपने चहेते वर्ग अर्थात सवर्णों के हाथों देने में सफल हो गया है,  जिसका  साक्ष्य वहन  करती है मई , 2024 में आई ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब- 2024’  की रिपोर्ट! 

उस रिपोर्ट में यह तथ्य उभर कर सामने आया था कि देश की संपत्ति में 89% हिस्सेदारी सामान्य वर्ग अर्थात सवर्णों की है, जबकि दलित-आदिवासी  समुदायों  की हिस्सेदारी मात्र 2.8 %. वहीं भारत के विशालतम समुदाय ओबीसी की देश की धन- संपदा में महज 9 % की हिस्सेदारी है। आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स संघ के चहेते सवर्ण वर्ग के नजर आएंगे।

मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकानें इन्हीं की हैं। चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज़्यादा गाड़ियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल प्राय इन्हीं के हैं। फिल्म और मनोरंजन पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्हीं का है।

संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है। मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं। न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के अपर कास्ट जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं नहीं है।

संघ के इसी चहेते वर्ग का कॉलेज/ यूनिवर्सिटियों के प्रशासनिक पदों, प्रोफ़ेसर और एसोसिएट प्रोफेसरों के पदों पर 80-90 % कब्ज़ा है।

मोदी की नीतियों से शक्ति के स्रोतों पर जिसकी स्थिति दलित, आदिवासी, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों से भी बदतर हुई है, वह है भारत की आधी आबादी यानी औरतें, जिनकी संख्या 70 करोड़ है। 2006  से वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की ओर से हर वर्ष प्रकाशित हो रही ग्लोबल जेंडर गैप की 2021 की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत के आधी आबादी की स्थिति हमारे पड़ोसी मुल्कों बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, चीन, म्यांमार, पकिस्तान इत्यादि से तो बदतर है ही, उसे आर्थिक रूप से भारत के पुरुषों की बराबरी में आने में 250 साल से ज़्यादा लगना है।

तो सारांश में देखा जाय तो साफ़ नजर आएगा कि आज के भारत में दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और आधी आबादी जितने न्यूनतम शक्ति के स्रोतों पर गुज़र-बसर करने के लिए विवश है, उससे बहुत बेहतर स्थिति उन देशों के अवाम की नहीं रही, जहां अतीत में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए! 

भारत के तमाम संस्थानों को अपने विचार के लोगों से भर दिया है आरएसएस ने      

आज संघ ने कॉलेज/यूनिवर्सिटी सहित तमाम संस्थाओं पर अपने लोगों को काबिज कर दिया है. हालही में न्यूयार्क टाइम्स ने अपनी एक  खोजपूर्ण  रिपोर्ट में बताया है कि कैसे आरएसएस  ने अपने 2500 से अधिक आनुषांगिक संगठनों के सहारे सेक्युलर भारत को हिन्दू फर्स्ट भारत मे बदलने का काम अंजाम दिया है। रिपोर्ट में स्थापित किया गया है कि संघ ने भारत के तमाम संस्थानों को अपने विचार के लोगों से भर दिया है।

राजनीति के साथ सेना, न्यायपालिका, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, अर्ध सैन्य बल, कारपोरेट, बिजनेस घरानों, शिक्षण संस्थानों यानी हर क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर इसकी ऐसी घुसपैठ हो चुकी है कि इससे  देश को निकाल पाना मुश्किल हो चुका है।न्यूयार्क टाइम्स ने संघ के विषय में जो कुछ  कहा है, वह बातें राहुल गांधी पिछले दो- तीन सालों से दोहरा रहे हैं।

वह कहते हैं, “आप देख सकते हो कि दलितों , आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के साथ क्या हो रहा है। इसने मुझे झकझोर दिया है कि वे हमारे देश के विभिन्न संस्थानों पर कब्ज़ा करने में कितने सफल हो गए हैं। प्रेस, न्यायपालिका, संसद और चुनाव आयोग सभी खतरे में हैं और किसी न किसी तरह नियंत्रित हैं!”

हाल ही में 9 दिसंबर को लोकसभा में चुनाव सुधार पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने फिर आरोप लगाया कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस का अगला कदम भारत के इंस्टीट्यूशन्स पर पूरी तरह कब्जा करना था। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि आरएसएस ने एक-एक करके निर्वाचन आयोग, ख़ुफ़िया एजेंसियों, जांच एजेंसियों, आयकर विभाग, विश्वविद्यालयों इत्यादि संस्थानों पर कब्जा शुरू कर दिया।

सब लोग जानते हैं विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति कैसे होती है! उन्होंने कहा है सबसे बड़ा एंटी- नेशनल काम जो आप कर सकते हैं, वह है वोट चोरी। वोट चोरी से बड़ा कोई एंटी- नेशनल काम नहीं है, क्योंकि जब आप वोट को ख़त्म करते हैं, आप इंडिया के आइडिया को ख़त्म करते हैं! लोकतान्त्रिक ढाँचे की पूरी ताकत वोट में निहित है। यदि आम नागरिक का वोट सुरक्षित नहीं रहा, तो लोकसभा, विधानसभा  या पंचायत किसी का भी कोई अर्थ नहीं रह जायेगा!

दलित बहुजनों की सबसे बड़ी ताकत बाबा साहेब आंबेडकर प्रदत वोट का अधिकार रही है। वोट के अधिकार के चलते ही राजनीतिक पार्टियाँ बहुजनों की कद्र करती थीं। मोदी सरकार ने केचुआ के सहयोग से एसआईआर के जरिये चुनाव प्रक्रिया को बेमानी बना दिया है।

सिर्फ डाइवर्सिटी के जोर से ही शिक्षा सहित हर संस्थान को संघ के कब्जे से मुक्त किया जा सकता है     

कुल मिलाकर आज दलित, आदिवासी, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं आधी आबादी से युक्त 90% से अधिक आबादी को उस स्टेज में जीना पड़ रहा है, जिस स्टेज में सारी दुनिया में वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उनका वाजिब हक़ दिलाने के लिए आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ी। लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि वंचित समुदायों के नेता अपने समाज की गुलामी और बदहाली से आँखे मूंदे राजनीति के पेशे के जोर से स्थापित अपना- अपना साम्राज्य बचाने में व्यस्त हैं।

ऐसे में 90% से अधिक वंचित आबादी की मुक्ति का भार बहुजन छात्र और गुरुजनों पर आन  पड़ा है और वे इसके निर्वहन के लिए लाखों की तादाद में सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हो रहे हैं। अतः एक ऐसे समय में जबकि लाखों शिक्षक और छात्र, बहुजन नेतृत्व के निकम्मेपन से आजिज आकर शैक्षणिक परिसरों में पसरे भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ने जा रहे हैं, इतिहास की जरुरत को देखते हुए उन्हें अपनी लड़ाई के एजेंडे को विस्तार देना जरुरी हो गया गया है।

शैक्षणिक परिसरों में भेदभाव के खात्मे के लिए जिसके खिलाफ वे कमर कस रहे हैं, वह दरअसल संघी विचारधारा है, जो यह मानती है कि दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यकों और महिलाओं का ज्ञानार्जन हिन्दू धर्म के खिलाफ एक अधर्म है। अधर्म मानकर ही वे तरह – तरह से हतोसाहित करते रहते हैं, जिससे आजिज आकार रोहित वेमुलाओं को सुसाइड वरण करना पड़ता है।

संघी विचारधारा के लोगों का कब्ज़ा शिक्षा के साथ –साथ  सेना , न्यायपालिका सहित सहित हर संस्थान पर हो गया है और तमाम संस्थाओं को उसके कब्जे से मुक्त किये बिना, नॉलेज सेक्टर को भेदभाव मुक्त नहीं किया जा सकता।

अतः जरुरत इस बात की है कि बहुजन छात्र और गुरुजन संघ विरोधी दलों के साथ मिलकर उसके कब्जे से सभी संस्थानों को मुक्त कराने की लड़ाई लड़ें। ऐसा करने पर शिक्षा जगत भी स्वतः उनकी लड़ाई के दायरे में आ जायेगा। लेकिन याद रहे 2500 से अधिक आनुषांगिक संगठनों से समृद्ध संघ का मुकाबला अकेले नहीं किया जा सकता: हमविचार लोगों और संगठनों को संगी बनाना पड़ेगा! 

अब अगर संघ के कब्जे से देश के संस्थानों को मुक्त करना है तो उन संस्थानों को सवर्ण वर्चस्व से मुक्त करना पड़ेगा क्योंकि संघ ने सभी संस्थानों में अपने हमविचार सवर्ण काबिज करा दिया है, जिनकी संख्या 80-90 % प्रतिशत होगी।

ऐसे में सभी संस्थानों को संघ के कब्जे से मुक्त करना है तो तो उसके चहेते वर्ग: सवर्णों को उनके संख्यानुपात पर रोकने से भिन्न कोई उपाय नहीं है.और संस्थानों में उनको उनकी संख्यानुपात पर रोकना है तो वहां सामाजिक (सोशल) और लैंगिक(जेंडर) विविधता (डाइवर्सिटी) लागू करने से बेहतर कोई उपाय ही नहीं! 

सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू होने पर प्रत्येक संस्थान  में सवर्ण स्त्री और पुरुषों को साढ़े सात – साढ़े सात  प्रतिशत करके  कुल 15- 20 %  अवसर मिलेगा : शेष अवसर दलित, आदिवासी , पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के स्त्री और पुरुषों में बंटने के मार्ग प्रशस्त हो जायेंगे। अतः डाइवर्सिटी के जोर से ही देश की संस्थाओं को संघ के कब्जे से मुक्त किया जा सकता है: कम से कम एक से 5 तक तो सर्वोत्तम उपाय डाइवर्सिटी ही नजर आती है, दूसरे उपायों की गिनती नम्बर 6 से शुरू होती है।

ऐसे में अगर लगता है कि डाइवर्सिटी के जोर से ही समस्त संस्थाओं को संघ के कब्जे से मुक्त किया जा सकता है तो बहुजन छात्र और गुरुजन शिक्षण संस्थानों के साथ राजनीति,  न्यायपालिका, सेना और पुलिस बल, ब्यूरोक्रेसी, निर्वाचन आयोग, ख़ुफ़िया एजेंसियों, जांच एजेंसियों, आयकर विभाग, मीडिया इत्यादि  में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने की मांग भी अपने लड़ाई के एजेंडे में शामिल करें! 

शैक्षणिक परिसरों में भेदभाव के खात्मे का सर्वोत्तम उपाय : एजुकेशन डाइवर्सिटी 

तमाम संस्थाओं को संघ के कब्जे से मुक्त करने के लिए यदि बहुजन छात्र और गुरुजन आगे बढ़ते हैं तो सबसे ज्यादा लाभ उन्हें शैक्षणिक परिसरों में पसरे भेदभाव के खात्मे के मोर्चे पर मिलेगा। सभी संस्थाओं में डाइवर्सिटी लागू  करने की मांग उठाने पर कॉलेज/ यूनिवर्सिटी में भी एजुकेशन डाइवर्सिटी की मांग उठेगी, जो जाति/ नस्ल आधारित भेदभाव ख़त्म करने में चमत्कार घटित कर देगी। वास्तव में शिक्षालयों में व्याप्त भेदभाव को ख़त्म करने में एजुकेशन डाइवर्सिटी से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता।

भेदभाव ख़त्म करने में कम से कम एक से 9 तक कारगर होगी एजुकेशन डाइवर्सिटी: दूसरे उपायों की शुरुआत दसवें नंबर से हो सकती है। एजुकेशन डाइवर्सिटी का मतलब शिक्षण संस्थानों में छात्रों के  प्रवेश, शिक्षकों की नियुक्ति एवं प्रशासनिक विभाग में  विभिन्न सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों का संख्यानुपात में प्रतिनिधित्व!

एजुकेशन डाइवर्सिटी के जरिये ही दुनिया के लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों में शिक्षा पर समूह विशेष के वर्चस्व को शेष कर सभी सामाजिक समूहों को अध्ययन-अध्यापन का न्यायोचित अवसर सुलभ कराया गया है। डाइवर्सिटी अर्थात विविधता नीति के जरिये ही तमाम सभ्यतर देशों में शिक्षा का प्रजातान्त्रिकरण मुमकिन हो पाया है।

अमेरिका में भूरि-भूरि नोबेल विजेता देने वाले हार्वर्ड विश्वविद्यालय से लेकर नासा जैसे सर्वाधिक हाई प्रोफाइल संस्थान तक सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू कर वहां के तमाम वंचित समूहों और महिलाओं को अध्ययन-अध्यापन का अवसर मुहैया कराते रहते है। अतः इसमें कोई शक नहीं कि डाइवर्सिटी के जरिये ही उच्च शिक्षा में भेदभाव का मुकम्मल खात्मा और दैविक अधिकारी वर्ग का वर्चस्व ध्वस्त किया जा सकता है।

ऐसे भेदभाव के खात्मे में एजुकेशन डाइवर्सिटी के प्रभावकारिता को देखते हुए सभी संस्थानों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करने की मांग युद्ध स्तर पर उठाने की जरुरत है, ऐसा बहुजन छात्र और गुरुजन खुद महसूस करेंगे और जिस दिन सभी संस्थानों में कायदे से डाइवर्सिटी लागू हो गई, उस दिन से  दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यकों और आधी आबादी को अपनी सच्ची आजादी का अहसास होने लगेगा! 

डाइवर्सिटी की लड़ाई जीतने के लिए कांग्रेस को बनाना होगा वर्ग –मित्र

बहरहाल बहुजन छात्र और गुरुजन अगर  डाइवर्सिटी की लड़ाई जीतना चाहते हैं तो इस लड़ाई में उन्हें अपने वर्ग मित्र की तलाश करनी पड़ेगी। स्मरण रहे कि दुनिया के महानतम समाज विज्ञानी मार्क्स ने कहा है कि दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। एक वर्ग वह है जिसका उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है अर्थात शक्ति के स्रोतों पर  कब्ज़ा है और दूसरा वह है जो शारीरिक श्रम पर निर्भर रहता है अर्थात शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत होकर श्रम पर जीवन बसर करने के लिए विवश रहता है।

प्रभुत्वशाली वर्ग अपने प्रभुत्व को बनाये रखने के लिए राज्य का इस्तेमाल करता है। जहाँ तक भारत का सवाल है यहां वर्ग –संघर्ष कर्म आधारित वर्ण- व्यस्था में क्रियाशील रहा, जिसमें शक्ति के समस्त स्रोतों पर सवर्णों का कब्ज़ा रहा और शुद्रातिशूद्र सर्वस्वहारा व शोषित के रूप में रहे।

चूँकि हिन्दू धर्म का प्राणाधार वर्ण-व्यवस्था में शुद्रातिशूद्रों और महिलाओं के लिए शक्ति के स्रोतों का भोग अधर्म रहा, इसलिए हिन्दू शासकों ने हजारों साल से देश को अधर्म से बचाए रखने के उद्देश्य से राज्य का इस्तेमाल कर  शुद्रातिशूद्र और महिलाओं को शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत कर, इनका जीवन नारकीय बनाये रखा।

अधर्म से बचाए रखने के लिए जब 21वीं सदी में हिंदुत्ववादी भाजपा सत्ता पर काबिज हुई, उसने राज्य का इस्तेमाल कर उन संस्थानों को बेचने में किया, जहां शुद्रातिशूद्र जॉब पाकर अधर्म की सृष्टि करते रहते रहे।

हिन्दू धर्म को अधर्म से बचाए रखने के लिए हिंदुत्ववादी मोदी सरकार ने जो नीतियाँ अख्तियार की उसके फलस्वरूप ही वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की 2024 की रिपोर्ट में दलित-आदिवासी जहाँ 2.8 % तो विशाल ओबीसी समाज 9% वेल्थ पर गुजर-बसर करता नजर आया, जबकि सवर्ण 89% धन-संपदा पर कब्ज़ा जमाये नजर आए।

अगर ग्लोबल जेंडर गैप की 2021 रिपोर्ट में भारतीय महिलाएं आर्थिक रूप से 250 सालों में पुरुषों की बराबरी पर पहुँचती दिखी तो उसके पीछे हिंदुत्ववादी सरकार का देश को अधर्म से बचाने लायक पालिसी का  ही हाथ रहा। हजारों सालों से राज्य द्वारा शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत किये गए शुद्रातिशूद्रों पर राज्य पहली बार 1947 के बाद कांग्रेस-राज में सदय हुआ। राज्य के सदय होने के बाद दलित, आदिवासी, पिछड़ों को उन पेशों को अपनाने का अधिकार मिला जो हजारों साल से हिन्दू धर्मशास्त्रों द्वारा सिर्फ सवर्णों के लिए निर्दिष्ट रहे!

कांग्रेस भी भाजपा की भांति सवर्णवादी पार्टी ही रही, किन्तु उसके राज में पंडित नेहरु ने जो स्कूल, कॉलेज, अस्पताल सहित असंख्य सरकारी उपक्रम खड़े किये, उनमें संविधान प्रदत आरक्षण के जोर से जॉब पाकर दलित, आदिवासी व अन्य वंचित वर्ग राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने लगे।

बाद में जब इंदिरा गांधी ने कोयला खदानों, जीवन वीमा, बैंकों इत्यादि का राष्ट्रीयकरण और राजीव गांधी ने कम्प्यूटर क्रांति की, वंचितों के लिए अपना जीवन बेहतर बनाने के और अवसर मुक्त हो गए! देखते ही देखते दलित – बहुजनों में एक मध्यम वर्ग का हुआ।इसी मध्यम वर्ग की संतानें आज वंचितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं: यूजीसी के नए रेगुलेशन की बहाली के लिए जो लाखों युवा मैदान में उतर रहे हैं, उनमें  अधिकांश ही कांग्रेस राज में विकसित मध्यम वर्ग की संतानें हैं! 

21वीं सदी में भी कांग्रेस अदा कर रही है वर्ग – मित्र की भूमिका     

बहरहाल आजादी के बाद वर्ग- मित्र की भूमिका रही कांग्रेस नई सदी में भी अपनी भूमिका नहीं भूली!

21वी सदी में अटल बिहारी वाजपेयी के आठ साल के शासन के बाद 2004 में देश की बागडोर कांग्रेस के डॉ.मनमोहन सिंह के हाथ में  आई और उन्होंने 10 सालों के अपने शासन में कभी भी अटल बिहारी वाजपेयी या आज के मोदी की भांति नवउदारीकरण को बहुजनों के खिलाफ हथियार नहीं बनाया: वह बराबर इसे मानवीय चेहरा देने के लिए प्रयासरत रहे।

2004 में सत्ता में आने के संग- संग विनिवेश पर अंकुश लगाने वाले मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में नवउदारवादी अर्थनीति से हुए विकास में दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यकों इत्यादि को वाजिब भागीदारी न मिलने को लेकर समय-समय पर चिंता ही जाहिर नहीं की, बल्कि विकास में वंचितों को वाजिब शेयर मिले इसके लिए अर्थशास्त्रियों के समक्ष रचनात्मक सोच का परिचय देने की अपील तक की।

डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही 2006 में उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रवेश में पिछड़ों को आरक्षण मिला, जिससे उच्च शिक्षा में उनके लिए सम्भावना के नए द्वार खुले। उन्हीं के राज में राजीव गांधी फेलोशिप की शुरुआत हुई, जिसके जरिए वंचित जातियों के लाखों युवाओं को कॉलेज और विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर बनने का अवसर मिला। डॉ. मनमोहन सिंह ने प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण लागू करवाने का जो प्रयास किया वैसा, अन्य कोई न कर सका।

उन्हीं के कार्यकाल में मनरेगा शुरू हुआ, जिसकी शक्ल आज मोदी सरकार ने बिगाड़ कर रख दी है और इसे पूर्व की भांति प्रभावी बनाने के लिए आज कांग्रेस सड़कों पर है। डॉ. मनमोहन सिंह के शासन में 2012 में पिछड़ों को पेट्रोल पंपों के आवंटन में 27 प्रतिशत आरक्षण मिला। चूँकि भारत का इतिहास आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास है, इस लिहाज से यदि भाजपा से कांग्रेस की तुलना करें तो मात्रात्मक फर्क नजर आएगा।

वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी के कार्यकाल तक आरक्षण पर यदि कुछ हुआ है तो सिर्फ और सिर्फ इसका खात्मा हुआ है: जोड़ा कुछ भी नहीं गया है।

इस मामले में कांग्रेस चाहे तो गर्व कर कर सकती है! जिस दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में यूजीसी का नया रेगुलेशन सामने आया है, उस दिग्विजय सिंह ने नई सदी में डाइवर्सिटी केन्द्रित भोपाल घोषणापत्र के जरिये सर्वव्यापी आरक्षण का एक ऐसा नया दरवाजा खोला जिसके कारण बहुजनों में नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों इत्यादि समस्त क्षेत्रों में आरक्षण की चाह पनपी, जिसके क्रांतिकारी परिणाम आने के लक्षण अब दिखने लगे हैं।

लेकिन मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह द्वारा शुरू की गयी सप्लायर डाइवर्सिटी को सत्ता में आते ही भाजपा की उमा भारती ने ख़त्म कर दिया। कुल मिलाकर मंडल उत्तरकाल में भाजपा से तुलना करने पर कांग्रेस की भूमिका बहुजनों के वर्ग मित्र के रूप में स्पष्ट नजर आती है! 

संघ के खिलाफ लड़ाई में राहुल गांघी को संगी बनाएं बहुजन छात्र और गुरुजन!  

1947 से ही बहुजनों के वर्ग मित्र की भूमिका अदा करने वाली कांग्रेस ने फरवरी 2023 में रायपुर में आयोजित अपने 85 वें अधिवेशन से अपना पूरी तरह कायांतरण कर, अब खुद को एक सामाजिक न्यायवादी दल के रूप में तब्दील कर लिया है, जिसका परिणाम 2024 के लोकसभा चुनाव में पाँच न्याय और 25 गारंटी और 300 वादों से युक्त न्याय-पत्र नामक घोषणापत्र के रूप में सामने आया!

5 अप्रैल, 2024  को जारी हुए कांग्रेस के घोषणापत्र की अनुगूँज पूरे देश में सुनाई पड़ी और चुनावी फिजा बदल गई। उसमें आरक्षण का 50 प्रतिशत दायरा तोड़ने, महिलाओं को नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण देने, अमेरिका की भांति ही भारत में डाइवर्सिटी कमीशन (विविधता आयोग) गठित करने, राष्ट्रव्यापी आर्थिक – सामाजिक जनगणना कराने, एससी, एसटी, ओबीसी के लिए आरक्षित सभी रिक्त पदों को एक साल मे भरने की बात थी।

इसके अलावा, सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में संविदा की जगह स्थायी नौकरी देने, एससी, एसटी वर्ग के ठेकेदारों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक खरीद का दायरा बढ़ाने, सामाजिक न्याय का संदेश फैलाने के लिए बहुजन समाज सुधारकों की जीवनी और उनके कार्यों को विद्यालयों के पाठ्यक्रम मे शामिल करने, शैक्षणिक परिसरों में पसरे भेदभाव को खत्म करने के लिए रोहित वेमुला अधिनियम बनाने सहित ढेरों ऐसी बातें थीं, जिससे चुनाव अभूतपूर्व रूप से सामाजिक न्याय पर केंद्रित हो गया।

केचुआ के सहारे मोदी किसी तरह हारते-हारते बचे! बहरहाल रायपुर अधिवेशन के बाद राहुल गांधी का आंधी- तूफान की भांति 2024 में सामाजिक न्याय के सबसे बड़े नायक और संविधान के संरक्षक के रुप में जो उदय हुआ, वह अस्थाई न होकर चिरस्थाई हो गया है, जिसका साक्ष्य उनके हर संबोधन में मिल रहा है!

पिछले दिनों उन्होंने देश के समक्ष सवाल उछाला था,’देश को चलाता कौन है? किसी भी देश को उसकी उत्पादक शक्ति चलाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर उत्पादक शक्ति देश को कुछ दे रही है: भोजन देती है; औजार देती है; ये इमारतें देती है तो उस शक्ति के खून – पसीने के लिए देश क्या देता हैं? मेरा लक्ष्य है हिन्दुस्तान में उस उत्पादक शक्ति को रिस्पेक्ट और हिस्सेदारी मिले!’

नव वर्ष में उन्होंने बहुत ही दृढ़ता के साथ कहा है ,’ हम आपके साथ हैं और मैं ऐसा दिन देखना चाहता जब हिन्दुस्तान की हर संस्था और हर सिस्टम में, लीडरशिप में दलित, आदिवासी और पिछड़े हों. मैं वह दिन देखना चाहता हूँ जब हिन्दुस्तान की टॉप 10 कंपनियों का  मालिक दलित, आदिवासी पिछड़े वर्ग से  हों और मैं उसके लिए लड़ रहा हूँ और लड़ता रहूँगा !’

इसी राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने बिहार विधानसभा चुनाव में 25 करोड़ तक के ठेकों में आरक्षण देने की घोषणा किया। ऐसे में बहुजन छात्र और गुरुजन यदि दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को असल आजादी का अहसास कराने के लिए कॉलेज , विश्वविद्यालयों सहित सभी संस्थानों को संघ के कब्जे से मुक्त कराने के लिए डाइवर्सिटी लागू करवाने की लड़ाई लड़ना चाहते हैं तो इस लड़ाई में न्याययोद्धा राहुल गांधी को साथ लेना सबसे जरुरी कदम होगा! बिना राहुल गांधी के देश को संघ के कब्जे से मुक्त करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती!

(लेखक डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)       

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