गाजियाबाद के एक बहुमंजिला अपार्टमेंट से तीन बच्चियों ने कूदकर आत्महत्या कर ली। यह भयावह खबर सिर्फ उनके मां और पिता के लिए नहीं है। यह उन सभी लोगों के लिए है जिनके बच्चे आज के दौर में बड़े हो रहे हैं। जिन बच्चियों ने अपनी आभासी दुनिया के लिए जान दे दी उनकी उमर महज 12, 14 और 16 साल थी। अखबार और खबरों में खूब लिखा जा रहा है कि वे कोरियन ड्रामा देखने की लत में थीं। क्या इन दावों को मान लिया जाए? क्या ये ‘लत’ नाम की कोई बीमारी होती है? इसका अनुवाद किस तरह से किया जाए? क्या इन्हें ‘आदत’ का पर्यायवाची मान लिया जाए?
ये बच्चियां जिस परिवार से आती हैं उसमें उसके पिता ने दो शादियां कर रखी हैं। दूसरी शादी अपनी ही पत्नी की बहन से की, क्योंकि उसे ‘बच्चा’ चाहिए था। जो खबर छपी है उसके अनुसार परिवार तनावों के बीच से गुजर रहा था और भारी कर्जे से लदा हुआ था। अकेलेपन की शिकार इस परिवार में बच्चियों का पालन-पोषण चल रहा था। खुद परिवार ने ही उन्हें मोबाईल फोन पर ‘कोरियन ड्रामा’ उपलब्ध करवाया।
इन बच्चियों की दुनिया इसी ड्रामे इर्दगिर्द बनने लगी। मोबाईल से बनने वाली इसी दुनिया का नाम ‘ओरेंज इकाॅनामी’ दिया गया है जो इस बार के बजट में चर्चा में आ गया। इस ओरेंज दुनिया का असर इन बच्चियों पर इतना गहरा था कि उन्हें स्कूली शिक्षा में मन लगना बंद हो गया। वे कक्षाओं में फेल होने लगी।
इन बच्चियों को जब उनकी बनी आभासी दुनिया से दूर किया जाने लगा, मोबाईल जो इस आभासी दुनिया की ओर ले जाने का माध्यम था, छीन लेने का प्रयास किया गया तब इन बच्चियों की दुनिया बिखरने लगी। उन्होंने लिखा: ‘‘क्या हमें इस दुनिया में रहना चाहिए जहां आप पीटते हो? नहीं, मौत ही बेहतर है, ….विवाह की बातों से हम तनाव में हैं। हम कोरियन लोगों को प्यार और पसंद करते हैं, और भारतीय पुरूषों से विवाह कभी स्वीकार नहीं कर सकते।’’ यह इंडियन एक्सप्रेस की खबर में उल्लेख किया गया है जो उनके अंतिम पत्र में लिखा गया है।
तब सवाल तो है कि हम कैसी दुनिया बना रहे हैं और हमारे बच्चे किस दुनिया में रह रहे हैं। गाजियाबाद के एक अपार्टमेंट में मोबाईल के माध्यम से इन बच्चियों ने कोरिया की दुनिया में रहना शुरू कर दिया था। इन बच्चियों को कोरिया की हकीकत कोरिया देश से नहीं, इस मोबाईल से बने कोरिया देश से मिल रही है। इस तरह की आभासी दुनिया से होने वाली यह त्रासदी पहली नहीं है, ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। सवाल यही है कि इससे हम सीख क्या रहे हैं?
पूरी दुनिया में बच्चों को इस मोबाइल की दुनिया पर चलने वाले विभिन्न ऐप और साइट से दूर रखने का नियम बनाया जा रहा है तब भारत में इस पर विचार करने की बजाय ‘ओरेंज इकाॅनामी’ की अवधारणा को परोसा जा रहा है। इस इकाॅनामी का आधार क्या है? आइडिया और क्रिएटिवीटी। इसके रूप क्या होते हैं? विजुअल्स और इसके इफेक्ट, गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स, फैशन, टूरिज्म, काॅमिक्स आदि और डिजिटल कटेंट।
यह सेवा क्षेत्र को विकसित करने में सहयोगी भूमिका निभाएगा इस बार के बजट में इसे एवीजीसी अर्थात एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और काॅमिक्स का नाम दिया गया है। इसके लिए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ क्रिएटिव टेक्नोलाॅजी, मुंबई के सहयोग से 15000 स्कूलों और 500 कालेजों में छात्रों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। अलगे चार सालों में कुल 20 लाख प्रोफेसनल्स की जरूरत को ध्यान में रखकर इस दिशा में कदम उठाएं जाएंगे।
इस दिशा में बजट का प्रावधान किया गया और इसी आधार पर नौकरियों का वादा भी किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि इससे मौलिक अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने में मदद मिलेगी।
‘ओरेंज इकाॅनोमी’ अर्थात सतरंगी दुनिया पर चलने वाली अर्थव्यवस्था। अब यह हमारे बजट के प्रावधान का हिस्सा है। भयावह गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, बाजार की अस्थिरता, कर्ज और सामाजिक असुरक्षा से भरे अपने देश में जिस सतरंगी अर्थव्यवस्था की बात की जा रही है, रील बनाकर पैसा कमाने का दावा किया जा रहा है उसकी दुनिया एक अथाह तकलीफों से गुजर रही है।
खुद इस बार के ही आर्थिक सर्वेक्षण में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे- 2015-16 के हवाले से बताया गया है कि इस बीमारी की चिकित्सा में 70 प्रतिशत से 92 प्रतिशत तक गैप है। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि सामान्य तौर पर भारत में चिकित्सा की स्थिति बद से बदतर होती चली गई है और फिलहाल इस बजट में भी कोई उल्लेखनीय व्यवस्था नहीं दिख रही है।
भारत की शिक्षा व्यवस्था का हाल साक्षरता के आंकड़ों के भरोसे छोड़ दिया गया है। महामारी के समय में शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह से डिजिटल मीडिया की घुसपैठ हुई उसने पूरी संरचना को लगातार तबाही की ओर ठेल दिया है। ऑनलाइन क्लासेज के नाम पर एक सामानान्तर दुनिया का निर्माण हुआ है जिसका सारा नियंत्रण डिजिटल कंपनियों ने अपने हाथ में ले रखा है।
यही कंपनियां इस दुनिया के महत्व को इतना बढ़ाचढ़ाकर पेश कर रही हैं जिससे बच्चे तो क्या, खुद मां और पिता भी प्रभावित हैं। डिजिटल शिक्षा की फिसलन कब पूरे परिवार को अपने गिरफ्त में ले लेगी, कहना मुश्किल है। रील्स, एक ऐसी ही दुनिया है जहां से प्रसिद्धि और पैसे की भूख को पूरा करने की होड़ सी लग गई है। पूरा परिवार एक छोटे से कैमरे और डिजिटल माध्यम पर नाच रहा है। यह देखना, सिर्फ देखना भर नहीं है, यह अपने समाज की त्रासदियों का एक गवाह बनना भी है।
आज हम अक्सर रील्स देखते हैं, मोबाइल स्क्रीन पर खुद बोलते हैं या दूसरों को बोलते हुए सुनते हैं। हम अक्सर ज्ञानबर्धन कर रहे होते हैं या मनोरंजन कर रहे होते हैं। ऑनलाइन मीटिंगों में खूब बोलते हैं और फिर उसे सोशल मीडिया पर डाल देते हैं और इसके बाद इस पर आने वाले व्यू की गिनती करते हैं। कभी खुश होते हैं और कभी निराश। जबकि दूसरी ओर फासीवादी जमीन पर उतर कर किसी को पीटकर मार डालते हैं और कभी आतंक का माहौल बनाते हैं।
इसी माहौल में हम अचानक एक दीपक को जमीन पर खड़े होकर बोलते हुए सुनते हैं तब सबसे पहले हम उसे इसी डिजिटल दुनिया का हीरो बना देते हैं। लेकिन, जमीन की हकीकत से नावाकिफ बने रहते हैं। यह हम जानबूझकर करते हैं या इस डिजिटल दुनिया ने हमें ऐसा कर देने की ओर ठेल दिया है, इसे बड़ी शिद्दत के साथ समझने की जरूरत है।
(अंजनी कुमार टिप्पणीकार और एक्टिविस्ट हैं।)