पिछले दो दिन साहित्योत्सवों और कैंसिल कल्चर को लेकर मेरी आँखें देने वाले रहे हैं। इन दिनों यह एक रिवाज़ जैसा बन गया है कि वक्ताओं को बुलाओ, फिर ‘अपत्याशित और दुर्भाग्यपूर्ण हालात’ का हवाला देकर कार्यक्रम रद्द कर दो। अफ़सोस कि, यह दुनिया भर में रिवाज़ जैसा बन रहा है जहाँ “दूसरों” को सुनने को नैतिकता व मूल्यों के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत रूप से नापा जाता है।
मैं 35 सालों से अधिक समय से पत्रकार और लेखक हूँ। मेरी प्रकाशित किताब है “द फ़ीयर्ड : कन्वर्सेशंस विद 11 पोलिटिकल प्रिजनर्स”। किताब यादगार तरीके से लांच की गई। मेरी किताब में आपातकाल से लेकर अब तक 11 राजनीतिक कैदियों के साक्षात्कार थे। यह देश भर के जेलों, जिनमें तिहाड़ से लेकर मणिपुर और हमारे महाराष्ट्र के जेल शामिल हैं, से निकली भयावह कहानियाँ हैं।
इन साक्षात्कारों में आईआईएम के एल्यूमनस और प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बड़े भी हैं। वह भीमा कोरेगांव मामले के 16 आरोपियों में शामिल हैं और इस समय जमानत पर बाहर हैं। मेरी किताब प्रकाशित होने के बाद, उनकी किताब “द सेल एंड सोल” प्रकाशित हुई।
हम दोनों को काला घोड़ा कला उत्सव 2026 के आयोजकों ने “इंकार्सरेटेड : टेल्स फ्रॉम बिहाइंड द बार्स” पैनल पर वक्ताओं के रूप में बुलाया। संचालन नरेश फ़र्नांडीज़ करने वाले थे जो स्क्रॉल समाचार पोर्टल के संपादक और संस्थापक हैं। मैं इस चर्चा को लेकर उत्सुक थी और ख़ासकर यह विषय चुने जाने को लेकर खुश थी।
मेरी किताब को बेहद संवेदनशील और अच्छी समीक्षाएँ मिली हैं, यह हर इंटरव्यू देने वाले व्यक्ति के शब्दों में, मेरी व्याख्या के बिना, लिखी गई थी। अलावा इसके, मैंने कैदियों के कुछ परिजनों से भी बात की। जो कभी जेल नहीं गए हैं या जिनके परिवार का कोई सदस्य जेल नहीं गया है, क़ैद के मनोवैज्ञानिक पहलुओं या मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह नहीं समझ सकता।मैं खुश थी कि मुझे उत्सव में इसके बारे में बोलने का मौक़ा दिया गया था।
अफ़सोस, 3 फ़रवरी 2026 की आधी रात के थोड़ी ही देर बाद, पहिया घूमने लगा। मुझे पता नहीं था कि दक्षिणपंथी ट्रोल हमारी पीठ पीछे अभियान चला रहे हैं कि इस सत्र को पटरी से उतारा जा सके।
पहले कुछ पृष्ठभूमि : 8 जनवरी 2018 को पुणे के एक कारोबारी और दक्षिणपंथी विचारधारा के कट्टर समर्थक तुषार दामगुड़े ने 31 दिसंबर 2017 को पुणे में ब्राह्मणों का गढ़ माने जाने वाले शनिवारवाडा में हुई एल्गार परिषद के वक्ताओं और आयोजकों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज करायी। एक जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़की थी और दामगुड़े की प्राथमिकी का इस्तेमाल देश भर से कथित माओवादी समर्थकों की गिरफ्तारी के लिए किया गया।
मामले में 16 आरोपियों में प्रो तेलतुम्बड़े, वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, प्रो शोमा सेन, कवि वरवर राव, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी, लेखक और पत्रकार गौतम नवलखा, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, प्रो रोमा विल्सन, प्रो हैनी बाबू, दलित कार्यकर्ता सुधीर धवले, सागर गोरखे, रमेश गायचोर, ज्योति जगताप, महेश राउत और एक्टिविस्ट गोंसालविस शामिल थे।
कड़े गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) अधिनियम, 1967 के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों ने लंबी जेल भुगती। 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी की 2021 में जेल अधिकारियों व भाजपा-नीत सरकार की लापरवाही से मौत हो गई। बाक़ियों को जमानत मिल चुकी है लेकिन वकील सुरेंद्र गाडलिंग अब भी जेल में हैं।
अर्बन एलीट के लिए जेल का यह अँधेरा अब तक अनकहा विषय था।
जहाँ तक मेरी जानकारी है, शुरुआती वर्षों बाद दामगुड़े मामले में सक्रिय नहीं रहे लेकिन वह और अन्य दक्षिणपंथी ट्रोल अपने विरोधियों को निशाना बनाने और अधिकारियों पर उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए दबाव डालने के लिए ऑनलाइन रूप से सक्रिय हैं ही।
दामगुड़े और एक और ट्रोल शेफाली वैद्य, जो शोधकर्ता और मीडिया पर्सन होने का दावा करती हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से साहित्यिक उत्सवों के बारे में अल्प जानकारी रखती हैं, ने अपनी बेरोजगार ट्रोल सेना के साथ मुंबई पुलिस पर कार्रवाई के लिए इस तरह दबाव डाला।
3 फ़रवरी की आधी रात के थोड़ी ही देर बाद, हमारा कार्यक्रम रद्द होने के बारे में मुझे व्हाट्सऐप पर संदेश मिला। मुझे इससे संबंधित सारे सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का आदेश दिया गया कि अन्यथा समूचा कला महोत्सव पटरी से उतर जाएगा। मैं स्तब्ध रह गई। मेरी त्वरित प्रतिक्रिया थी, यह क्या है!
4 फ़रवरी की सुबह तस्वीर स्पष्ट हुई। दक्षिणपंथी ट्रोल, जिनमें से कुछ मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के करीबी हैं, ने सुनिश्चित किया कि कोलाबा पुलिस और शीर्ष अधिकारी महोत्सव से यह सत्र रद्द करवायें। मुंबई पुलिस, बेस्ट और मुंबई महानगरपालिका महोत्सव के सहयोगी और पार्टनर हैं।
हमने पोस्ट हटाए, स्क्रॉल ने सबसे पहले यह समाचार प्रकाशित किया। मैं व्यथित थी और सोशल मीडिया पर मैंने भड़ास निकाली। मज़ेदार बात है कि महोत्सव के निदेशक ने इस पोस्ट पर एतराज किया और एक स्रोत के ज़रिए हटाने को कहा। मेरे सूत्र से पूछा गया कि मैंने यह पोस्ट क्यों डाली जो कार्यक्रम रद्द करने पर ध्यान खींच रही है।
मैं पहले ही निराश थी लेकिन इसने मुझे सोचने पर मजबूर किया। आयोजक इतने डरे हुए क्यों हैं? मैं एक पत्रकार हूँ और यदि मुझे लगता है कि लोगों तक सूचना पहुँचनी चाहिए, जो मीडिया का भारतीय संविधान के अनुसार प्रमुख कर्तव्य भी है, तो मैंने चर्चा सत्र के रद्द होने का समाचार नेटवर्क ऑफ़ वूमेन इन मीडिया, इंडिया, के साथ साझा किया, जिसकी मैं सदस्य हूँ। अचानक सत्र के रद्द किए जाने ने मुझे कुछ सवाल उठाने पर भी मजबूर किया है: कला, पत्रकारिता, लेखन क्या है यदि यह कुछ हलचल नहीं मचाता और सामाजिक बदलाव नहीं लाता?
एक पत्रकार होने के नाते, मैं अधिकारियों के प्रति जवाबदेह नहीं हूँ। मेरे अनुभव के अनुसार, अधिकांश लोग पुलिस और जेल से डरते हैं। कई बार, उन्हें यह भी नहीं पता होता कि कौन सा क़ैदी दोषी है और वह दोषी कैदियों और विचाराधीन कैदियों में अन्तर नहीं कर पाते। मैं ऐसे विषयों पर बोलना चाहती थी।
सत्र रद्द करने को लेकर छपी खबरों में, हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक खबर में कोलाबा पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी का बयान ईमानदार लगा। उसने कहा, “चूंकि चर्चा विवादास्पद मुद्दों पर और सरकार के ख़िलाफ़ थी, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने कार्यक्रम की अनुमति न देने का निर्णय किया। कला महोत्सव के आयोजकों को इसकी सूचना दी गई।”
दूसरा जो मुद्दा मैं उठाना चाहती हूँ वह आयोजकों के रूख का और जिस अंदाज़ में कार्यक्रम रद्द किया गया, उसका। कला और साहित्य के उत्सव का मतलब क्या रह जाता है जब आप हमारे समाज में यथा स्थिति बनाए रखना चाहते हैं? हम एक विविध और असमान समाज हैं और हम अपनी विविधता में एकता में गर्व करते हुए बड़े हुए हैं। और यहाँ हममें जरा भी सब्र या हिम्मत नहीं है अलग और विरोधी विचारों को प्रस्तुत करने का।
आयोजकों से मेरा सवाल है कि कला और लेखन का उद्देश्य और अर्थ ही क्या यदि यह सवाल न करे तो? उन्हें मेरी सलाह है अब से सिर्फ़ इंस्टॉलेशन रखें। विरोध, आलोचना करने देना लोकतांत्रिक है और हो सकता है कि कुछ लोग आते और कार्यक्रम बंद करने को कहते, लेकिन पुलिस के दबाव में आ जाने ने तो कला और साहित्य के उद्देश्य को ही पिचका दिया।
अब रद्द करने की संस्कृति का मुद्दा लें। यह प्रचलन शैक्षणिक संस्थानों से लेकर कॉर्पोरेट ऑफिस और अब साहित्य उत्सवों तक में बढ़ा है। हम अक्सर चर्चा सत्रों, व्याख्यानों के दक्षिणपंथी ट्रोल के दबाव में रद्द होने की खबरें पढ़ते हैं। लोग डर और खामोशी की संस्कृति में रहने को मजबूर किए जा रहे हैं। वह कार्यक्रम की योजना बनाते हैं, प्रचार करते हैं, निमंत्रण भेजते हैं और फिर कार्यक्रम रद्द कर देते हैं। यह वक्ताओं के लिए असम्मानजनक है।

मैंने अपनी प्रस्तुति के लिए शोध और तैयारी के लिए मेहनत की। जेलों और विचाराधीन कैदियों पर आंकड़े जुटाए। विचाराधीन कैदियों की रिहाई को लेकर न्यायिक विफलता के बारे में न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने के बाद बात करते हैं। वह कहते हैं कि जेल विचाराधीन कैदियों से भरे पड़े हैं और राज्य का पैसा खर्च होता है। वह लेकिन यह नहीं बताते कि यह जेलों में सड़ रहे लोगों के मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है। कितने नागरिक इस मुद्दे के बारे में जानते हैं?
आम लोगों को जाने दें, कितने पत्रकार जानते हैं कि केंद्र सरकार में हमारे गृह मंत्रालय के पास ताज़ा आंकड़े नहीं थे जब राज्यसभा में विचाराधीन कैदियों पर सवाल का जवाब दिया गया। यह हमारे देश की त्रासदी ही है कि हमें जानकारी के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी)
दिसंबर 2021 – 36,828 क़ैदी
एवरेज ऑक्यूपेंसी रेट 149%
विचाराधीन कैदियों की संख्या : 86%
विचाराधीन कैदियों की बड़ी संख्या के कारण : प्रिजनर्स स्टेटिस्टिक्स रिपोर्ट ऑफ़ इंडिया
जमानत कानून की जानकारी का अभाव
गुणवत्तापूर्ण विधिक सहायता सेवाओं की कमी
जमानत की वित्तीय प्रणाली
कानूनी मुकदमों में देरी
न्यायपालिका की विफलता
4 दिसंबर 2024 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यसभा में जेलों के बारे में दिसंबर 2022 (2024 तक के नहीं) तक के आंकड़े दिए:
महाराष्ट्र
कुल क़ैदी – 41,070
विचाराधीन क़ैदी – 32,883
दोषियों की संख्या : 64% वृद्धि
केवल 2022 में दोषियों की संख्या में 8.59% वृद्धि हुई
महाराष्ट्र जेलों में विचाराधीन कैदियों में सबसे ज़्यादा दूसरे राज्यों से हैं – 5263
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण : 2024 तक
कुल क़ैदी – 41,784
विचाराधीन क़ैदी – 34,085
कुल प्रतिशत – 81.6
मुझे लगता है कि यह मेरी बुनियादी ज़िम्मेदारी है कि लोगों को बताऊँ कि अपने वक्तव्य में मैं यह जानकारी साझा करना चाहती थी। हमसे यह मौक़ा छीना गया। इस कैंसिल कल्चर के कई गहरे स्तर हैं। यह हमारे समाज में जाति व्यवस्था को भी दिखाता है।अतीत में ब्राह्मणों ने शिक्षा और ज्ञान पर क़ब्ज़ा किया हुआ था। उन्होंने कभी पिछड़ी जातियों को शिक्षित होने, सवाल करने और समाज बदलने की अनुमति नहीं दी। आज यह जानकारी के बारे में हो रहा है।
इसका नियंत्रण ब्राह्मणों, दक्षिणपंथी विचारधारा को मानने वालों के पास है, जो इस पर नियंत्रण रखते हैं की किस तरह की जानकारी साझा की जाए, उस पर चर्चा की जाए और स्वीकार की जाए।
हर किसी को विरोध करने का अधिकार है लेकिन पहले जानकार बनिये और फिर विरोध कीजिये। जब आप जानकारी के अधिकार से वंचित करते हैं तो यह संविधान द्वारा प्रदत्त हमारे मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
अब सरकार से सवाल करने के बारे में, यह अलोकतांत्रिक, देश-द्रोही या असंवैधानिक कैसे है? फिर, मेरी किताब में अलग अलग समय अलग अलग सरकारों और राजनीतिक दलों के शासन में राजनीतिक कैदियों से बातचीत की गई है, सरकार चाहे कांग्रेस की हो, कम्युनिस्टों की या भाजपा की। तो फिर हम वर्तमान सरकार से सवाल क्यों नहीं कर सकते हैं? यह सबसे पवित्र कैसे?
अब मैं आख़िरी बिंदु पर आती हूँ जो मुझे सबसे ज़्यादा गुस्सा दिलाता है। यह दक्षिणपंथी ट्रोल जो कुछ जानते नहीं हैं, पर मुझे “अर्बन नक्सल” जैसे नामों से पुकारते हैं, इन पर मुकदमा होना चाहिए। सवाल पूछना मेरा काम है। मैंने ऐसा पेशा चुना है जो हमें सवाल पूछने के लिए ही भुगतान करता है।
अब मैं इन ट्रोल से पूछती हूँ, तुम मुझसे और उस जानकारी से, जो मैं साझा करने वाली थी, इतना डरते क्यों हो? और तुम इतनी कम जानकारी क्यों रखते हो? मैं यहाँ किसीको खुश करने या किसी का प्रचार करने के लिए नहीं हूँ। एक बात तय है कि किसी को मुझे कोई लेबल लगाने, “अर्बन नक्सल” करार देने का अधिकार नहीं है। वास्तव में तो यह संघी ट्रोल हैं जो समाज और देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं।
मेरे लिए यह पूरा अनुभव इस मायने में दिलचस्प रहा कि कैसे अलग अलग हितधारकों ने प्रतिक्रिया दी और मुंबई के नागरिकों को उनके जानकारी के अधिकार से वंचित किया।
मुझे नहीं पता था कि पुलिस “द फ़ीयर्ड” के बारे में लिखने से डरती है! उम्मीद है कि लोग उनके विभिन्न दावों और बयानों, जो उन्होंने मीडिया को दिए हैं, की हकीकत देख पाएंगे।
(नीता कोल्हटकर का लेख फ्री स्पीच कलेक्टिव से साभार। अनुवाद : महेश राजपूत। मूल अंग्रेज़ी लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)