क्या भारत-ईयू व्यापार समझौता भारत के लिए नुकसानदेह सौदा है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड द्वारा भारत के प्रति अपनाये गये आक्रामक व्यापारिक रूख की पृष्ठभूमि में 27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के ज़ाहिरा तौर पर अतिरिक्त भू-राजनीतिक अर्थ निहित हैं।

केवल भारत के व्यापार के विस्तार के दृष्टिकोण से भी, मोदी सरकार द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि यह समझौता ईयू में भारतीय उत्पादों की बाज़ार तक पहुँच को उल्लेखनीय रूप से बेहतर बनाएगा, क्योंकि इस एफ़टीए के तहत भारत से ईयू में होने वाले 96.6% आयातों पर शुल्क समाप्त या कम किए जाने की उम्मीद है, और भारत ईयू से भारत में होने वाले 90% निर्यातों पर शुल्क समाप्त कर देगा। 

यह सौदा कितना निष्पक्ष है? क्या इस समझौते के कारण भारत की आत्मनिर्भरता या स्वावलंबन पर कुछ असर पड़ा है? आइए इस सौदे की विस्तार से समीक्षा करें।

भारत इस बात पर अपनी पीठ थपथपाता है कि उसने अपनी खींची हुई लाल रेखाओं का अतिक्रमण नहीं किया और कृषि व डेयरी को एफ़टीए के दायरे में नहीं लाया—वे क्षेत्र जो यूरोपीय संघ के आयात के समक्ष विशेष रूप से कमज़ोर हैं। अतः, संरक्षण अब केवल कुछ चुनिन्दा क्षेत्रों तक सीमित रह गया है, वह भी मुख्यतः किसानों को अलग-थलग न करने जैसे राजनीतिक कारणों से।

तो क्या इसका मतलब यह है कि अन्य सभी भारतीय वस्तुएँ और सेवाएँ यूरोपीय संघ के सभी देशों से आने वाली समान वस्तुओं और सेवाओं के मुकाबले प्रतिस्पर्धी हैं? या फिर अर्थव्यवस्था के अन्य प्रमुख क्षेत्रों में भारतीय निर्माताओं के पास कोई शुल्क-सुरक्षा नहीं होगी और वे यूरोपीय संघ से आने वाले सस्ते आयात के कारण नुकसान उठाएँगे? और अधिक जानकारी के लिए, इस सौदे की विस्तार से समीक्षा करते हैं।

भारतीय किसानों और डेयरी क्षेत्र के लिए सुरक्षा का मिथक

मोदी सरकार का दावा है कि भारत के संवेदनशील कृषि और डेयरी क्षेत्रों को एफ़टीए से बचाकर संरक्षित किया गया है। इस दावे में कितनी सच्चाई है? इस खोखले दावे को ख़ुद यूरोपीय संघ के अधिकारियों ने ख़ारिज कर दिया है। यूरोपीय आयोग ने कृषि-खाद्य निर्यात के लिए यूरोपीय संघ को मिली बेहतर पहुँच पर एक तथ्य-पत्र जारी किया है।

जहाँ एक ओर भारतीय अधिकारी इस समझौते के विवरण को जारी करने में हिचक रहे हैं, वहीं इस समझौते के अगले दिन ही जारी कर दिये गये यूरोपीय आयोग के तथ्य-पत्र के अनुसार वनस्पति खाद्य तेल पर लगा आयात शुल्क मौजूदा 45% से घटाकर 0% कर दिया गया है। भारत ने कीवी और नाशपाती जैसे फलों पर भी आयात शुल्क मौजूदा 33% से घटाकर 10% कर दिया है। फलों के जूस पर आयात शुल्क 55% से घटाकर 0% कर दिया गया है।

सबसे बुरा यह है कि यूरोपीय संघ से आयातित प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों—जैसे ब्रेड, पेस्ट्री, बिस्कुट, पास्ता, चॉकलेट और पालतू पशुओं का भोजन आदि—पर भारत में लगने वाला आयात शुल्क 50% से घटाकर 0% कर दिया गया है। इसके अलावा, भेड़ के माँस पर शुल्क 33% से घटाकर 0% कर दिया गया है। सॉसेज और अन्य माँस उत्पादों पर आयात शुल्क 110% से घटाकर 50% कर दिया गया है।

वाइन पर शुल्क विभिन्न ब्राण्डों के लिए 150% से घटाकर 20–30% कर दिया गया है, अन्य मादक पेयों पर 150% से घटाकर 40% और बीयर पर 110% से घटाकर 50% कर दिया गया है। केवल यूरोपीय खाद्यान्नों पर भारत द्वारा कोई आयात शुल्क नहीं लगाया गया है, लेकिन भारत चावल और गेहूं के शीर्ष निर्यातकों में से एक है और इनका आयात नहीं करता, इसलिए यूरोपीय खाद्यान्नों पर शुल्क लगाने का प्रश्न ही नहीं उठता।

अतः, केवल खाद्यान्नों और कुछ चुनिन्दा अन्य कृषि उत्पादों पर शुल्क नहीं है, जबकि प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों जैसे सभी कृषि-खाद्य उत्पादों पर शुल्क में भारी कटौती की जाएगी। भारत के पशुपालक, फल उत्पादक और तिलहन उगाने वाले किसान यूरोपीय संघ से सस्ते आयात के कारण गम्भीर संकट का शिकार हो जाएंगे। ऐसे हास्यास्पद समझौते के बाद भी, भारतीय नेताओं में यह दुस्साहस है कि वे इस मुक्त व्यापार समझौते को भारतीय किसानों की सुरक्षा के रूप में पेश कर रहे हैं।

भारतीय एमएसएमई पर प्रतिकूल प्रभाव

इसी तरह यह दावा किया जा रहा है कि भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते से भारतीय एमएसएमई के लिए निर्यात के अवसरों का बड़े पैमाने पर विस्तार होगा। लेकिन व्यवहार में, यूरोपीय संघ से सस्ते सामानों की भारतीय बाजार में बाढ़ के मुक़ाबले, ईयू बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने और प्रवेश करने के लिए भारतीय एमएसएमई को ईयू के कड़े तकनीकी, पर्यावरणीय और सुरक्षा मानकों का सामना करना पड़ेगा।

ज़ाहिरा तौर पर भारतीय एमएसएमई को खुद को आधुनिक बनाने के लिए अधिक निवेश करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, और इस दौड़ में केवल एक छोटा सा प्रतिशत ही सफल हो पाएगा, जबकि उनमें से एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाएगा। जहाँ भी भारतीय आयात सस्ते होते हैं, यूरोपीय संघ वहाँ स्वच्छता और सुरक्षा से जुड़े कड़े ईयू मानकों जैसे ग़ैर-शुल्क बाधाओं (नॉन-टैरिफ बैरियर्स) को खड़ा करके या मनमाने गुणवत्ता नियंत्रण लागू करने के अधिकार का उपयोग करके उन्हें रोक देता है।

ऐसे व्यापार समझौते की क्या क़ीमत है, जो ग़ैर-शुल्क बाधाओं के मसलों को बिल्कुल भी सम्बोधित नहीं करता?

भारत–ईयू द्विपक्षीय व्यापार की कुल स्थिति

2025 में यूरोपीय संघ से भारत का कुल आयात 60.7 अरब डॉलर था और 2025 में ही यूरोपीय संघ को भारत का कुल निर्यात 75.9 अरब डॉलर रहा। यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर लगाये गये अमेरिकी प्रतिबन्धों के चलते रूस से लगभग 15 अरब डॉलर मूल्य के पेट्रोलियम उत्पाद भारत के माध्यम से भेजे गये। यदि इस राशि को हटा दिया जाए, तो भारत और ईयू द्वारा एक-दूसरे को किये गये निर्यात लगभग बराबर थे।

लेकिन शुल्क कटौती से होने वाले लाभ सभी प्रमुख क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच समान रूप से वितरित नहीं होंगे। एफ़टीए के तहत भारत में ईयू की ऑटोमोबाइल पर शुल्क को लगभग 110% से घटाकर 10% किये जाने से भारतीय उच्च मध्यम वर्ग द्वारा विदेशी कारों के आयात में भारी वृद्धि हो सकती है। इससे भारतीय घरेलू ऑटोमोबाइल उद्योग को गम्भीर चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

भारत द्वारा की गयी इस भारी शुल्क कटौती का मुख्य असर तमिलनाडु, हरियाणा और गुजरात पर पड़ेगा, जहाँ ऑटो उद्योग के केन्द्र है। इस कठोर कदम को उठाने से पहले इन राज्यों की सरकारों से कोई परामर्श नहीं किया गया।

मौजूदा समय में, भारत में निर्मित ऑटोमोबाइल पर 18% (छोटी कारों के लिए) से 28% (बड़ी और लग्ज़री कारों के लिए) तक जीएसटी लागू है। सरकार की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि आयातित कारों पर भारी शुल्क कटौती के प्रभाव को कम करने के लिए ऑटोमोबाइल पर जीएसटी घटाया जाएगा।

आयातित कारों पर यह भारी शुल्क कटौती भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए घातक चोट के समान है, लेकिन शायद मोदी का मानना है कि मर्सिडीज-बेंज जैसी कारें सस्ते दामों में चला सकने से भारतीय मध्यम वर्ग में खुशी की लहर होगी! इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि इस कारण ऑटोमोबाइल उद्योग में कार्यरत लाखों मज़दूरों की नौकरी चली जाएगी! इस क़दम से मोदी सरकार की वर्गीय प्राथमिकताएँ स्पष्ट रूप से नज़र आ जाती है।

यूरोपीय संघ में शुल्क में कमी या कुछ क्षेत्रों में शून्यशुल्क भारत के लिए ज़्यादा उपयोगी नहीं होगी। उदाहरण के लिए, वर्तमान में यूरोपीय संघ भारतीय प्लांटेशन उत्पादों पर लगभग 3.5% का शुल्क लगाता है, और इसमें मामूली कमी भारतीय प्लांटेशन उत्पादकों के निर्यात में बड़े विस्तार को प्रेरित नहीं कर सकती।

मिली-जुली राजनीतिक प्रतिक्रिया

सीपीआई(एम) व अन्य वामपंथी पार्टियों ने भारत–ईयू एफ़टीए की निन्दा की है। परन्तु मुख्य विपक्षी दल, कांग्रेस, संदिग्ध रूप से हल्की सतर्कता बरत रही है। भारत–ईयू एफ़टीए पर टिप्पणी करते हुए कांग्रेस प्रवक्ता तारिक अनवर ने कहा, “यदि एफ़टीए व्यापार और निवेश को बढ़ाता है, तो यह स्वागत योग्य है।” एफ़टीए को सिरे से ख़ारिज़ नहीं किया गया है। लगता है राहुल गांधी ने मोदी से महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप्पी साधे रखने की कला सीख ली है!

इस समझौते के हस्ताक्षर के कुछ ही दिनों बाद संसद का सत्र शुरू हुआ और विपक्ष को इस एफ़टीए पर चर्चा की माँग उठानी चाहिए थी, क्योंकि यह लाखों किसानों और छोटे व्यवसायों की आजीविका को बर्बाद कर देगा। लेकिन विपक्ष ने इस पर ज़ोर नहीं दिया।

मोदी सरकार हालांकि इससे बच नहीं सकती। जैसा कि 1992 के डबल्यूटीओ समझौते के मामले में हुआ था, जब भारतीय किसान बाजार में सस्ते आयात से होने वाली प्रतिस्पर्धा और अपने उत्पादों की क़ीमतों व आय में तेज़ गिरावट का सामना करेंगे, तो वे फिर से दिल्ली को घेरकर धरना देने के लिए तैयार हो जाएंगे।

भारतीय जनता के सामने एफ़टीए के आसन्न प्रभाव की सच्ची तस्वीर पेश करने के बजाय, भारत का बेहया बुर्जुआ मीडिया इस बात का जश्न मना रहा है कि इस समझौते की वजह से स्कॉच व्हिस्की उनके लिए सस्ती हो जाएगी! संपादकीय यह भी तर्क देते हैं कि किसी भी व्यापार समझौते में देन-लेन दोनों ही शामिल होता है और एफ़टीए भारत के लिए अन्ततः लाभदायक सिद्ध होगा।

लेकिन सच्चाई यह है कि व्यापार भले ही बढ़ जाए, इसका कुल परिणाम भारत के लिए नुकसानदायक ही होगा। एक मार्क्सवादी विश्लेषण इसे पर्याप्त स्पष्टता दे देगा।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विश्लेषण की मार्क्सवादी समझ

निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले, आइए अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर मार्क्सवादी सैद्धांतिक दृष्टिकोण की मूल अवस्थिति को रेखांकित करते हैं। मार्क्सवादी विद्वानों ने बहुत पहले ही यह स्थापित कर दिया था कि भले ही एक विकसित पूँजीवादी देश और एक विकासशील देश के बीच व्यापार निष्पक्ष प्रतीत हो और माल तथा सेवाओं का लेन-देन उनके अंतरराष्ट्रीय बाज़ार मूल्यों पर पर हो, इसके बावजूद विकासशील देशों में उत्पादित मूल्य बड़ी मात्रा में विकसित देशों की ओर स्थानांतरित हो जाता है।

सबसे पहले मार्क्सवादी विद्वान आर्घिरी एमानुएल ने 1969 में अपनी पुस्तक अनइक्वल एक्सचेंज : ए स्टडी ऑफ़ इंपीरियलिज्म ऑफ़ ट्रेड में इस प्रक्रिया के लिए ‘असमान विनिमय’ शब्द का प्रयोग किया था।

इस किताब में उन्होंने समझाया कि विकासशील देशों में मज़दूरी विकसित देशों की तुलना में काफ़ी कम होती है, और मज़दूरी की इस असमानता के परिणामस्वरूप, किसी उत्पाद को तैयार करने में ग़रीब देशों के श्रमिकों द्वारा किये गये निश्चित घण्टों के श्रम को अमीर देशों को उस उत्पाद के बदले में दिया जा सकता है, जिसे बनाने में उनके द्वारा कम श्रम घण्टे ख़र्च हुए हों।

दूसरे शब्दों में, उत्पादकता में अन्तर के दृष्टिकोण से, भले ही उत्पादों का आदान-प्रदान वर्तमान बाज़ार मूल्यों के अनुसार निष्पक्ष रूप से किया जाये, कम-मज़दूरी वाले देश में उत्पन्न मूल्यों का एक हिस्सा उच्च-मज़दूरी वाले विकसित देश की ओर स्थानांतरित हो जाता है।

सीधे औपनिवेशिक शोषण के माध्यम से होने वाले लूट की तुलना में, यह असमान विनिमय के माध्यम से होने वाला मूल्य-स्थानांतरण अधिक छिपा हुआ और सूक्ष्म होता है और यह तब भी होता है जब बराबर मूल्य वाले वस्तुओं का आदान-प्रदान किया जाता है। दूसरे शब्दों में, पूँजी की जैविक संरचना में अन्तर के कारण, सम्पत्ति विकासशील देशों से विकसित देशों की ओर बहती है।

दूसरे शब्दों में कहें तो, विकसित और विकासशील देशों के बीच व्यापार की शर्तों के अनुसार, विकसित देशों द्वारा सामान्यतः निर्यात किए जाने वाले उच्च-तकनीकी उत्पादों की क़ीमतें विकासशील देशों द्वारा निर्यात किये जाने वाले प्राथमिक वस्तुओं या कम उत्पादकता वाले विनिर्मित वस्तुओं की क़ीमतों की तुलना में अधिक होती हैं, और यह मूल्य असमानता विकासशील देशों से विकसित देशों की ओर मूल्य का स्थानांतरण करती है।

आर्घिरी एमानुएल के इस वैचारिक सिद्धान्त को अन्य मार्क्सवादी विद्वानों ने और विस्तृत किया; आंद्रे गुंडर फ्रैंक, जिन्होंने लैटिन अमेरिका के संदर्भ में अपनी निर्भरता और अविकास के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया; समीर अमीन, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर संचय और असमान विकास पर अपने सिद्धान्त का विकास किया; और बाद में इम्मानुएल वालेरस्टीन, जिन्होंने वैश्विक प्रणाली का सिद्धान्त दिया, जिसमें पूँजीवादी कोर प्राक-पूँजीवादी या अर्ध-पूँजीवादी परिधियों का शोषण करता है।

ये सभी सिद्धान्त आर्घिरी एमानुएल के असमान विनिमय’ के विचार पर आधारित थे।

इस सैद्धान्तिक अवलोकन के साथ, आइए भारत और यूरोपीय संघ के बीच होने वाले व्यापार को नियंत्रित काटने वाले उत्पादकता के अन्तर की वर्तमान स्थिति की ओर रुख करें।

उत्पादकता में अन्तर की बढ़ती खाई

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों में उत्पादकता के बीच अत्यन्त महत्वपूर्ण अन्तर हैं जो प्रौद्योगिकी, पूँजी के आधिक्य (मार्क्सवादी शब्दावली में पूँजी की जैविक संरचना में अंतर), उत्पादन के पैमाने तथा श्रम कौशल में भिन्नताओं से उत्पन्न होते हैं। ये सभी कारक प्रति श्रमिक उत्पादकता को तय करते हैं।

आइए यूरोपीय संघ और भारत के विनिर्माण क्षेत्रों पर नज़र डालें। यूरोपीय संघ में पूँजी की प्रधानता, स्वचालन और प्रौद्योगिकी अपनाये जाने के कारण में विनिर्माण बेहद उन्नत स्तर पर है। बेहतर अवसंरचना, कुशल श्रमबल और नवाचार के कारण प्रति श्रमिक उत्पादकता वहाँ अपेक्षाकृत अधिक है। इसके विपरीत, भारत में विनिर्माण उत्पादकता कम है, क्योंकि यहाँ श्रम-प्रधान प्रक्रियाओं पर अधिक निर्भरता, स्वचालन का सीमित उपयोग और अपेक्षाकृत कम डिजिटलकरण देखने को मिलता है।

अतः, यूरोपीय संघ में कुल श्रम उत्पादकता (प्रति श्रमिक जीडीपी) भारत की तुलना में कई गुना अधिक है। उच्च तकनीकी स्तर के कारण ईयू में पूँजी की उत्पादकता या कुल कारक उत्पादकता भी कई गुना ज़्यादा है। 

उत्पादकता में यह अन्तर — चाहे विनिर्माण हो, आईटी क्षेत्र या सेवाओं में हों — इस बात का द्योतक हैं कि भारतीय विनिर्माताओं को ईयू से सस्ते आयातों से प्रतिस्पर्धा करने में गम्भीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसी प्रकार, कृषि और डेयरी क्षेत्र में भी प्रति हेक्टेयर तथा प्रति श्रमिक उत्पादकता ईयू में कहीं अधिक है, और इसलिए किसानों को यह डर है कि ईयू अपने सस्ते कृषि उत्पाद का यहाँ ढेर लगा सकता है।

ईयू का कुल अनुसंधान एवं विकास पर व्यय भारत की तुलना में कहीं अधिक है। इसी तरह, आईटी क्षेत्र में भी ईयू में प्रति श्रमिक उत्पादन 80,000 से 1,00,000 यूरो के बीच है, जबकि भारत में प्रति श्रमिक प्रति वर्ष औसत उत्पादन 30,000 से 40,000 यूरो है। यह बिल्कुल साफ़ है कि भारतीय श्रमिकों के सस्ते श्रम से बने उत्पादों के साथ होने वाले व्यापार से अंततः किसे फ़ायदा होगा।

अनिश्चितता अब भी बनी हुई है

भू-राजनीतिक परिदृश्य के विकास को लेकर बनी अनिश्चितता का ही फल है कि भारतईयू मुक्त व्यापार समझौते का भविष्य भी अधर में लटका हुआ है। ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर बलपूर्वक कब्ज़ा करने की धमकी दी थी, और फ्रांस तथा जर्मनी ने डेनमार्क के तहत उसके नियंत्रण को बनाए रखने और उसकी रक्षा के लिए ग्रीनलैंड में सैनिक तैनात कर दिये।

इस प्रकार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दौर में पहली बार, साम्राज्यवाद के दो प्रमुख केन्द्रोंअमेरिका और ईयूके बीच सैन्य संघर्ष की सम्भावना हक़ीक़त में तब्दील होती नज़र आई। यहाँ तक कि वे अनेक वामपंथी सिद्धान्तकार भी, जो यह तर्क दिया करते थे कि लेनिन का यह कथन कि साम्राज्यवाद का अर्थ युद्ध हैअब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है, और जो यह दावा करते थे कि साम्राज्यवाद ने रूप बदल लिया है तथा दुनिया के प्रमुख लोकतंत्रों के बीच युद्ध की सम्भावना ख़त्म हो चुकी है, अब ग़लत साबित होते नज़र आ रहे हैं।

ट्रम्प ने भले ही सामरिक तौर पर अपनी धमकी वापस ले ली हो, लेकिन उनके नेतृत्व में अमेरिका और ईयू के बीच प्रतिस्पर्धा नये आयाम ग्रहण कर रही है।

ट्रम्प इस बात से नाराज़ हैं कि ईयू यूक्रेन में अमेरिका-प्रायोजित शान्ति समझौते में बाधा डालते हुए स्पॉइलरकी भूमिका निभा रहा है, जबकि ईयू को यह आशंका है कि यूरोप के खिलाफ़ अमेरिकारूस की कोई सांठगांठ हो सकती है; परन्तु वह अमेरिका के समर्थन के बिना रूस से अपनी रक्षा भी नहीं कर सकता।

ऐसे जटिल और बड़े भू-राजनीतिक दांव-पेंचों के बीच, ट्रम्प भारत को न केवल रूसी कच्चे तेल के आयात के लिए, बल्कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को टालते हुए प्रतिद्वंद्वी ईयू  के साथ व्यापार समझौता करने के लिए भी सज़ा दे सकते हैं। संभवतः भारतईयू एफ़टीए को लेकर मोदी का विजयोल्लास है अल्पकालिक ही साबित हो।

(बी सिवरामन शोधकर्ता और लेखक हैं। अनुवाद : वृषाली श्रुति।)

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