ग्राउंड रिपोर्ट : गंगा में क्रूज पर्यटन और फ्रेट कॉरिडोर के बीच पिस रहा चंदौली-बनारस का मल्लाह समुदाय

ताहिरपुर–मिल्कीपुर–राल्हूपुर (वाराणसी–चंदौली सीमा)

सुबह की हल्की धूप गंगा के पानी पर चमक रही है। घाटों पर बंधी लकड़ी की नावें खामोश खड़ी हैं। जाल सूख रहे हैं और चप्पुओं पर धूल जमी है। नाविक किनारे बैठकर गंगा को देख रहे हैं-जैसे उससे कोई जवाब मांग रहे हों। वही गंगा, जिसने सदियों से यूपी के चंदौली जिले के ताहिरपुर, मिल्कीपुर और राल्हूपुर को जीवन दिया, आज विकास की बड़ी योजनाओं के बीच ये गांव एक नए संघर्ष की गवाह बन रहे हैं।

वाराणसी में क्रूज पर्यटन और रामनगर मल्टीमॉडल टर्मिनल से जुड़े फ्रेट कॉरिडोर की योजनाओं ने गंगा किनारे बसे मल्लाहों, किसानों और बुनकरों की जिंदगी को असमंजस में डाल दिया है। यह कहानी सिर्फ एक परियोजना की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जिनकी जमीन, आजीविका और पहचान दांव पर लगी है।

चंदौली जिले के ताहिरपुर और मिल्कीपुर गांवों में इन दिनों डर और गुस्से का माहौल है। लगभग 100 एकड़ जमीन को फ्रेट विलेज के लिए ज़मीन अधिग्रहित किए जाने की प्रक्रिया ने यहां के किसानों और मछुआरों की नींद उड़ा दी है। फ्रेट विलेज के लिए जिन गांवों में जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है, वहां की गलियों में यही चर्चा है, “कब अफसर आएंगे?”, “कब खंभे गाड़े जाएंगे?”, “कब बुलडोजर चलेगा?”

ताहिरपुर के 43 वर्षीय बृजेश साहनी का चेहरा तनाव से भरा है। वह कहते हैं, “हमारी करीब 20 बिस्वा जमीन फ्रेट विलेज में जा रही है। जब बंदरगाह बना था, तब लगा था कि रोजगार मिलेगा,  जहाज चलेंगे और काम बढ़ेगा। गंगा में जहाज चल ही नहीं पाए। अब अफसर आते हैं, अल्टीमेटम देते हैं और चले जाते हैं। जाते-जाते बुलडोजर की धमकी भी दे जाते हैं।” बृजेश की आवाज में गुस्सा कम और बेबसी ज्यादा है। उनके लिए जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार की जिंदगी है।

“घर-खेत छोड़ने का फरमान”

ताहिरपुर और मिल्कीपुर की जमीनें कभी बंजर मानी जाती थीं। गांव वालों के मुताबिक, दशकों पहले यह इलाका कुश, बबूल और झाड़ियों से भरा था। मल्लाहों और किसानों ने कड़ी मेहनत से इन जमीनों को समतल किया, सिंचाई के साधन बनाए और फिर यहां धान, गेहूं, चना, सरसों, आलू, टमाटर जैसी फसलें उगाईं। मल्लाह समुदाय का आरोप है कि जिन जमीनों को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा और उपजाऊ बनाया, अब उसे कारपोरेट घरानों को कौड़ियों के दाम पर देने के लिए वहां से उन्हें खदेड़ा जा रहा है।

48 वर्षीय शीतल प्रसाद साहनी बताते हैं, “मेरे पास सिर्फ 15 बिस्वा जमीन है। उसी से और गंगा की मछलियों से 12 लोगों का परिवार चलता है। सरकार कहती है कि जमीन बंजर है। अगर बंजर थी तो इतने सालों से हम इसमें फसल कैसे उगा रहे थे?” उनकी चिंता सिर्फ आज की नहीं, आने वाली पीढ़ियों की है। वह कहते हैं, “हमारी पूरी सामाजिक और आर्थिक विरासत छीनकर पूंजीपतियों को देने की तैयारी है।”

ताहिरपुर और मिल्कीपुर के ग्रामीणों का आरोप है कि जमीन का मुआवजा बेहद कम तय किया गया है। ये दोनों गांव भले ही चंदौली जिले में आते हों, लेकिन वे बनारस के शहरी विस्तार क्षेत्र से सटे हैं। इसके बावजूद मुआवजा चंदौली के कम सर्किल रेट पर दिया जा रहा है। बालचरण, जो दलित बस्ती में रहते हैं, कहते हैं, “हमारी बस्ती से सटा राल्हूपुर गांव है। वहां दस कदम दूर जमीन 30 लाख रुपये बिस्वा बिक रही है। हमारी जमीनें सरकार कौड़ियों के भाव लेना चाहती है। दोनों जमीनें अगल-बगल हैं, लेकिन जिले का नाम बदलते ही कीमत चौथाई भी नहीं बचती।”

यह विरोधाभास किसानों को सबसे ज्यादा खल रहा है। उनका कहना है कि जो मुआवजा दिया जा रहा है, उसमें न नई जमीन खरीदी जा सकती है और न ही ढंग का घर बनाया जा सकता है। ताहिरपुर की दलित बस्ती में डर ज्यादा गहरा है। यहां के लोग पहले से ही सीमित संसाधनों में जी रहे हैं। बालचरण कहते हैं, “हमारी कई पीढ़ियां यहीं मर-खप गईं। जिंदगी में कभी रंग नहीं आया। अगर हमारा इकलौता घर चला गया तो हम कहां जाएंगे?”

इसी बस्ती की 32 वर्षीय अनीता की आंखों में आंसू हैं। वह कहती हैं, “हमारे चार बच्चे हैं। पति मजदूरी करते हैं। जमीन छिन गई तो बच्चों को क्या खिलाएंगे? हम गंगा से दूर हो गए तो मछली कैसे पकड़ेंगे?” बेबी, जिनके पति ऑटो रिक्शा चलाते हैं, गुस्से में कहती हैं, “सरकार हमारे सवालों का जवाब दे। अगर जमीन लेनी है तो हमारी कब्रें भी खुदवा दे। हम जान दे देंगे, लेकिन अपनी जमीन नहीं देंगे।”

मल्लाह समुदाय की सिकुड़ती आजीविका

मिल्कीपुर के पूर्व प्रधान भाईराम साहनी इस पूरी योजना को ही सवालों के घेरे में रखते हैं। वह कहते हैं, “जब गंगा में जहाज चलाने के लिए पानी ही नहीं, तो फ्रेट विलेज क्यों? हमारी जमीनें कौड़ियों के दाम लेकर उद्योगपतियों को क्यों दी जा रही हैं?” वे कहते हैं कि बंदरगाह का दंश गांव पहले ही झेल चुका है और अब फ्रेट विलेज के नाम पर उजाड़ने की तैयारी है।

भाईराम साहनी ने मल्लाहों की जबरिया घेरी जा रही जमीनों को बचाने के लिए विरोध किया तो पुलिस प्रशासन ने उन्हें पीटा और गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। कुछ दिनों पहले ही यह घटना घटी। वह कहते हैं, “हम मां गंगा के गोद में पले-बढ़े हैं। गंगा हमारी मां है। मां का व्यापार नहीं किया जा सकता।”

भाई राम साहनी का दर्द बहुत ज्यादा है। वह कहते हैं, “वाराणसी में क्रूज पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है। चमचमाते क्रूज, वीआईपी जेटी और सुरक्षा के नाम पर बढ़ती पाबंदियां-इन सबका असर सीधे मल्लाह समुदाय पर पड़ा है। पारंपरिक नावों को कई घाटों पर जाने से रोका जा रहा है। कुछ जगहों पर सवारी बैठाने पर भी सवाल उठते हैं। बुजुर्ग नाविक बताते हैं कि पहले दिनभर में जितनी कमाई हो जाती थी, अब कई दिन में भी नहीं होती। क्रूज के आगे हमारी नावें क्या हैं? हमें धीरे-धीरे गंगा से भी बेदखल किया जा रहा है।”

युवा मल्लाह रोजगार की तलाश में शहर छोड़ने या दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं। महिलाएं कहती हैं कि घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। ड्रेजिंग और बड़े जहाजों के संचालन से गंगा के प्राकृतिक बहाव पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय मछुआरों का कहना है कि मछलियों की संख्या पहले से कम हो रही है। तेल, कचरा और शोर प्रदूषण से नदी की जैव विविधता पर खतरा बढ़ा है। काशी की सांस्कृतिक पहचान भी दांव पर है। सदियों से छोटी नावें, घाटों की आरती और नदी से जुड़ा सहज जीवन यहां की आत्मा रहा है। बड़े जहाज और व्यावसायिक पर्यटन इस स्वरूप को बदल रहे हैं।

मिट्टी से जुड़ी सांसों की दास्तान

विकास की चमकदार शब्दावली के बीच कुछ आवाज़ें ऐसी भी हैं, जिनमें भय, असुरक्षा और अपने अस्तित्व को बचाने की छटपटाहट साफ़ सुनाई देती है। चंदौली जिले की पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर (मुगलसराय) तहसील के ताहिरपुर गांव में इन दिनों यही बेचैनी पसरी हुई है। खेतों की मेड़ों पर खड़ी फसलें जैसे हर गुजरती हवा के साथ यह सवाल दोहराती हैं कि क्या ये ज़मीन अब अपनी नहीं रहेगी?

43 वर्षीया छाया देवी के चेहरे पर वही चिंता है, जो गांव की दूसरी महिलाओं की आंखों में उतर आई है। वे धीमी पर दृढ़ आवाज़ में कहती हैं, “हम किसी भी हालत में अपनी जमीन फ्रेट विलेज के लिए बंदरगाह वालों को नहीं देंगे। अगर हमारी जमीन चली गई तो हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। हमारे पास घर की जमीन के अलावा कुछ और नहीं है।”

उनके शब्दों में सिर्फ़ एक महिला का भय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से इस मिट्टी में रची-बसी स्मृतियों की पीड़ा झलकती है। यह ज़मीन उनके लिए महज़ संपत्ति नहीं, बल्कि रिश्तों, परंपराओं और जीवन के भरोसे का आधार है।

छाया देवी बताती हैं कि ताहिरपुर में अधिकांश लोग मल्लाह समुदाय से हैं, जिनकी सांसें गंगा की धारा से बंधी हैं। “हमारी रोज़ी-रोटी गंगा से है,” वे कहती हैं। “हमारे अलावा यहां मुस्लिम, हरिजन, पटेल और यादव समाज के लोग भी रहते हैं। सबकी चिंता एक जैसी है कि जमीन जाएगी तो जीवन कैसे चलेगा?”

यह गांव केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि विविध समुदायों की साझी संस्कृति का जीवंत मानचित्र है, जहां नदी, नाव और खेत-तीनों मिलकर जीवन का ताना-बाना बुनते हैं। जिला प्रशासन के दस्तावेज़ बताते हैं कि प्रस्तावित परियोजना का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ताहिरपुर और मिल्कीपुर गांवों में फैलेगा। ताहिरपुर की 15.92 हेक्टेयर और मिल्कीपुर की 12.35 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहित की जानी है। इस प्रक्रिया से दोनों गांवों के कुल 415 परिवार प्रभावित होंगे, जिनमें से 170 परिवार मूलनिवासी हैं। वे लोग जिनकी कई पीढ़ियां इसी धरती पर जन्मीं और यहीं विलीन हुईं।

60 वर्षीया विमला देवी की आंखों में आक्रोश और असुरक्षा साथ-साथ दिखाई देते हैं। वे कहती हैं, “बंदरगाह वाले हमारी जमीन का निशान लगाकर गए हैं। पुलिस-फोर्स बुलाकर जमीन लेना चाहते हैं, लेकिन हमने डटकर विरोध किया।” उनकी आवाज़ में उम्र की थकान से अधिक आत्मसम्मान की दृढ़ता है। जैसे वे अपनी आने वाली पीढ़ियों के हिस्से की जमीन बचाने के लिए खड़ी हों।

फ्रेट विलेज का विरोध क्यों?

फ्रेट विलेज परियोजना को लेकर गंगा किनारे बसे ताहिरपुर और मिल्कीपुर गांवों में विरोध तेज है। यह परियोजना भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण की जल परिवहन योजना से जुड़ी बताई जा रही है, लेकिन स्थानीय किसान, मछुआरे और बौद्ध अनुयायी इसे अव्यावहारिक और कानून-विरुद्ध बताते हैं। 13 दिसंबर 2022 को तथागत विहार चैरिटेबल ट्रस्ट के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों ने मार्च निकालकर चंदौली की जिलाधिकारी ईशा दुहन को ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में कहा गया है कि गंगा तट पर लगभग पांच एकड़ में स्थापित बुद्ध विहार धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक गतिविधियों का केंद्र है। परिसर में भगवान बुद्ध की प्रतिमा, 42 फीट ऊंचा अशोक स्तंभ, बोधिवृक्ष, ध्यान केंद्र और कार्यालय भवन स्थित हैं। परिसर में शीशम, सागौन, कदम, बरगद, पीपल और ताड़ सहित एक हजार से अधिक पेड़ हैं। पूर्वांचल के विभिन्न जिलों से बौद्ध अनुयायी यहां नियमित रूप से दर्शन और ध्यान के लिए आते हैं।

चंदौली जिले के ताहिरपुर और मिल्कीपुर में भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी होने के बाद ग्रामीणों का कहना है कि बुद्ध विहार परिसर को भी अधिग्रहण के दायरे में शामिल किया गया है। ट्रस्ट पदाधिकारियों के अनुसार प्रशासन की ओर से संरचनाओं को हटाने का संकेत दिया गया है। उनका तर्क है कि यह क्षेत्र गंगा तट से 200 मीटर के दायरे में ग्रीन बेल्ट श्रेणी में आता है, जहां भूमि उपयोग में परिवर्तन कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।

ग्रामीणों का दावा है कि ताहिरपुर, मिल्कीपुर (चंदौली) और सटे रसूलगंज (मिर्जापुर) के लगभग 415 परिवार इस अधिग्रहण से प्रभावित होंगे। इन गांवों में करीब ढाई हजार की आबादी है, जिसमें बड़ी संख्या मछुआरों और सीमांत किसानों की है। उनका कहना है कि खेती और मत्स्य व्यवसाय ही आजीविका का मुख्य आधार है।

तथागत विहार चैरिटेबल ट्रस्ट के अनुसार यह भूमि 5 सितंबर 2004 को किसानों और बौद्ध अनुयायियों के सहयोग से विधिवत बैनामा कर खरीदी गई थी। निर्माण के समय सारनाथ स्थित मूलगंध कुटी विहार परिसर से बोधि वृक्ष का क्लोन लाकर लगाया गया था। अशोक स्तंभ के निर्माण पर लगभग 10 लाख रुपये से अधिक खर्च हुए। ट्रस्ट का कहना है कि यह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

परिसर में रहने वाले भिक्षु बुद्ध ज्योति, धम्म ज्योति और दीप ज्योति का आरोप है कि प्रशासन ने करीब पांच बीघा जमीन को “गैर-नामुमकिन” घोषित कर दिया है, ताकि मुआवजा देने की बाध्यता से बचा जा सके। उनका कहना है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया उचित प्रतिकार एवं पारदर्शिता अधिकार अधिनियम 2013 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। वे दावा करते हैं कि कानून के अनुसार 70 से 80 प्रतिशत प्रभावित किसानों की सहमति आवश्यक है, जबकि तीनों गांवों के किसानों ने लिखित रूप से असहमति जताई है।

भिक्षु बुद्ध ज्योति के मुताबिक, यदि सहमति नहीं है तो अधिग्रहण की प्रक्रिया पर पुनर्विचार होना चाहिए। उनका कहना है कि इस मुद्दे को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाएगा। वे आरोप लगाते हैं कि हाल के महीनों में मिल्कीपुर और ताहिरपुर के किसानों की लगभग 25 बीघा जमीन को भी “नामुमकिन” श्रेणी में दर्ज किया गया है, जिससे मुआवजा और स्वामित्व अधिकारों पर असर पड़ सकता है।

जमीन के सर्किल रेट में अंतर

चंदौली जिला प्रशासन की अधिसूचना में दर्ज सर्किल रेट इस खाई को और स्पष्ट कर देते हैं। अधिसूचना के अनुसार, मिल्कीपुर में जमीन का सर्किल रेट 75 हजार से एक लाख रुपये प्रति बिस्वा निर्धारित है, जबकि अधिग्रहित की जाने वाली भूमि के लिए यह दर 93,750 रुपये प्रति बिस्वा तय की गई है। ताहिरपुर में यह दर 85 हजार से 1.18 लाख रुपये प्रति बिस्वा के बीच है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाज़ार में जमीन की कीमत सर्किल रेट से 15 से 20 गुना अधिक है।

तथागत बुद्ध विहार के महासचिव और सेवानिवृत्त शिक्षक 70 वर्षीय विद्याधर बताते हैं, “यहां बाजार के हिसाब से जमीन की कीमत 15 से 20 लाख रुपये प्रति बिस्वा है। एक बिस्वा लगभग 1360 वर्ग फीट के बराबर होता है। लेकिन आईडब्ल्यूएआई सर्किल रेट के आधार पर ही मुआवजा देना चाहता है।” उनके स्वर में आक्रोश से अधिक पीड़ा नजर आती है।

ग्रामीणों और ट्रस्ट प्रतिनिधियों का कहना है कि सिंचाई विभाग की लिफ्ट कैनाल बुद्ध विहार परिसर को मुख्य क्षेत्र से अलग करती है, इसलिए इसे फ्रेट विलेज परियोजना में शामिल करने का औचित्य स्पष्ट नहीं है। उनका तर्क है कि यदि परियोजना जनहित में है तो पहले विस्तृत सामाजिक प्रभाव आकलन और पारदर्शी संवाद होना चाहिए।

माझी और दलित समुदाय के लोगों की जमीनों को बचाने के लिए आवाज बुलंद कर रहे पवन सिंह और वीरेंद्र मौर्य कहते हैं कि परियोजना के लिए अधिकांश भूमि इन सघन आबादी वाले गांवों से ली जानी है। यह क्षेत्र भले प्रशासनिक रूप से चंदौली जिले में आता हो, लेकिन विकास की दृष्टि से यह वाराणसी से सटा हुआ इलाका है और वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) के दायरे में आता है।

यहीं विवाद का दूसरा पहलू उभरता है। ग्रामीणों का कहना है कि वाराणसी और चंदौली के सर्किल रेट में कई गुना का अंतर है, जबकि बाजार में जमीन की कीमतों में ऐसा कोई अंतर नहीं दिखता। सीमा रेखा भले प्रशासनिक हो, लेकिन बाजार भाव उस रेखा को नहीं मानता। ऐसे में मुआवजा चंदौली के सर्किल रेट के आधार पर तय होना उन्हें असंगत लगता है।  ताहिरपुर और मिल्कीपुर में जमीनों का सर्किल रेट सालों से नहीं बढ़ा है।

इस पूरे विवाद के केंद्र में वही पुराना सवाल खड़ा है कि काग़ज़ पर लिखी दर और जमीन की वास्तविक कीमत में जो फासला है उसे कौन पाटेगा? ग्रामीणों के लिए यह अंतर सिर्फ रुपये-पैसों का नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का है। यदि जमीन के बदले मिली राशि से वे उसी क्षेत्र में दोबारा जमीन नहीं खरीद सकते, तो मुआवजा उनके लिए पुनर्वास नहीं, बल्कि विस्थापन का दूसरा नाम बन जाता है।

विकास की रफ्तार और बाज़ार की वास्तविकता के बीच यह असमानता अब एक संवेदनशील मुद्दा बन चुकी है जहां आंकड़ों की भाषा और लोगों की जिंदगी, दोनों एक-दूसरे से जवाब मांग रहे हैं। ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप यही है कि उन्हें उनकी जमीन के वास्तविक बाजार मूल्य से कम मुआवजा प्रस्तावित किया जा रहा है। उनका कहना है कि जो रकम तय की जा रही है, वह भविष्य की सुरक्षा नहीं दे सकती। ज़मीन चली गई तो न खेती बचेगी, न नदी पर निर्भर परंपरागत व्यवसाय का भरोसा रहेगा।

विस्थापन को लेकर आशंकाएं

विकास की भाषा अक्सर चमकदार होती है। संभावना, निवेश और रोजगार के नए द्वारों की भाषा। चंदौली जिला प्रशासन और पोर्ट अथॉरिटी का मानना है कि फ्रेट कॉरिडोर और क्रूज पर्यटन जैसी परियोजनाएँ केवल निर्माण गतिविधियां नहीं, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ हैं। अधिकारियों का तर्क है कि इन योजनाओं से रोजगार के नए अवसर खुलेंगे, परिवहन तंत्र अधिक सस्ता और व्यवस्थित होगा, और क्षेत्र राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक नक्शे पर अधिक मजबूती से उभरेगा।

उनका कहना है कि भूमि अधिग्रहण पूरी तरह वैधानिक प्रक्रियाओं के अनुरूप किया जा रहा है; मुआवजा निर्धारित नियमों के अनुसार तय है और पुनर्वास के विकल्पों पर भी विचार जारी है। प्रशासन की दृष्टि में यह परियोजना भविष्य की ओर बढ़ता हुआ वह सेतु है, जो स्थानीय संसाधनों को व्यापक आर्थिक प्रवाह से जोड़ेगा।

किन्तु ज़मीन पर, ताहिरपुर और मिल्कीपुर में, एक अलग ही कथा आकार ले रही है-चिंताओं और अनिश्चितताओं से भरी हुई। किसानों, मल्लाहों और बुनकरों के मन में सवालों का सैलाब है। वे कहते हैं कि अधिग्रहित की जाने वाली भूमि की स्पष्ट चौहद्दी अब तक सार्वजनिक रूप से चिन्हित नहीं की गई है। पुनर्वास की कोई ठोस, पारदर्शी योजना उनके सामने नहीं रखी गई।

इन आशंकाओं ने गांवों में एक नई एकजुटता को जन्म दिया है। चौपालों से लेकर घरों के आंगनों तक चर्चा है कि यदि जरूरत पड़ी तो बेमियादी धरना दिया जाएगा। ग्राम प्रधान कन्हैया लाल राव का कहना है कि प्रभावित परिवारों में बड़ी संख्या दलित और अल्पसंख्यक समुदाय की है। वे परिवार जिनकी पुश्तैनी ज़मीन ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। दलितों और माझियों का कहना है, “हम अपनी जमीन यूँ ही नहीं जाने देंगे,” वे कहते हैं, “यह केवल खेत नहीं, हमारी पहचान है।”

यह पूरा प्रसंग राष्ट्रीय जलमार्ग योजना के व्यापक परिप्रेक्ष्य में जुड़ा हुआ है। वाराणसी के रामनगर के समीप राल्हूपुर गांव में गंगा तट पर एक मल्टीमॉडल टर्मिनल पहले ही स्थापित हो चुका है। इसी क्रम में दिसंबर 2018 में जहाजरानी मंत्रालय ने मिल्कीपुर में 156 करोड़ रुपये की लागत से फ्रेट विलेज निर्माण को मंजूरी दी। सितंबर 2025 में नरेंद्र मोदी ने वेब कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इसकी आधारशिला रखी। लगभग 100 एकड़ (40.4685 हेक्टेयर) क्षेत्र में प्रस्तावित यह फ्रेट विलेज एक संगठित कार्गो हब के रूप में विकसित किया जाना है, जिससे पेशेवर लॉजिस्टिक्स उद्योग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

चंदौली जिले के पश्चिमी पश्चिमी छोर के अंतिम गांव हैं, ताहिरपुर और मिल्कीपुर। रसूलगंज मिर्जापुर का आखिरी गांव हैं। इन गावों में करीब ढाई हजार लोग पारंपरिक रूप से खेती, किसानी और मछली पकड़ने का काम करते हैं। इनमें सर्वाधिक आबादी मुस्लिम, दलित और पिछड़ी जातियों के लोग हैं। मल्लाह, पटेल, हरिजन, डोम, कोइरी आदि  जातियों की आबादी सबसे ज्यादा है।

ताहिरपुर में 40.77 एकड़ के मुकाबले 2.47 एकड़ खरीदी जा चुकी है। इतनी जमीन सरकारी है जो बंजर के रूप में दर्ज है। राल्हूपुर बंदरगाह फ्रेट विलेज के लिए ताहिरपुर-रसूलगंज, मिल्कीपुर और राल्हूपुर को चुना गया है। भविष्य में छोटा मिर्जापुर, नरायनपुर से लगायत चुनार तक फ्रेट विलेज का विस्तार किया जा सकता है। केंद्रीय जलमार्ग विकास प्रोजेक्ट की राल्हूपुर बंदरगाह और फ्रेट विलेज की लागत ₹ 5,369.18 के आस-पास है।

दिसंबर 2024 में राज्यसभा में प्रस्तुत संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में जहाजरानी मंत्री की ओर से कहा गया कि इस परियोजना से रेल और सड़क से संचालित कार्गो को जलमार्ग में स्थानांतरित करना अधिक सुविधाजनक और किफायती होगा। परियोजना की भूमि का स्वामित्व भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) के पास रहेगा, जो वाराणसी और आसपास के गांवों की भूमि का अधिग्रहण करेगा।

लेकिन इस पूरी रूपरेखा के बीच एक मौलिक प्रश्न उभरता है आजीविका का। जिन परिवारों की ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में है, उनमें बड़ी संख्या मल्लाह समुदाय की है। इनका जीवन गंगा की धारा से अभिन्न रूप से जुड़ा है। उनके लिए नदी सिर्फ़ जलधारा नहीं, बल्कि रोज़ी-रोटी और सांस्कृतिक अस्मिता का आधार है। ग्रामीणों का कहना है कि भूमि का मूल्यांकन वास्तविक बाज़ार दर से कम किया जा रहा है। वे आशंकित हैं कि फ्रेट विलेज और उससे जुड़ी संरचनाओं के कारण गंगा पर आधारित उनकी पारंपरिक आजीविका प्रभावित होगी। नाव चलाने, मछली पकड़ने और नदी-आधारित छोटे व्यापारों से जुड़े लोग मानते हैं कि बड़ी परियोजनाएं उनके हिस्से की जगह को संकुचित कर देंगी।

क्रूज पर्यटन का विस्तार इस चिंता को और गहरा करता है। जैसे-जैसे बड़ी क्रूज नावों की आवाजाही बढ़ रही है, स्थानीय नाविकों का पारंपरिक नौकायन व्यवसाय सिमटता प्रतीत हो रहा है। उनके लिए गंगा केवल जल का स्रोत नहीं-वह विरासत है, पहचान है, जीवन की लय है। ऐसे में विकास और परंपरा के बीच संतुलन का प्रश्न और भी जटिल हो उठता है। एक ओर आधुनिक अवसंरचना का स्वप्न है, जो क्षेत्र को नई आर्थिक ऊंचाइयों तक ले जाने का दावा करता है; दूसरी ओर सदियों से बहती आजीविका की वह धारा है, जिसे विस्थापन का भय मथ रहा है।

विकास की राजनीति, ज़मीन की आवाज़

चंदौली के सांसद वीरेंद्र सिंह मछुआरों और दलितों की जमीनों के अधिग्रहण का सवाल संसद में उठा चुके हैं। उनका कहना है कि पुनर्वास केवल कागज़ी प्रक्रिया न होकर सम्मानजनक और व्यावहारिक होना चाहिए। फ्रेट कॉरिडोर के कारण प्रभावित होने वाले अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं। परियोजना से पहले कराए गए सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण में भी यह दर्ज है कि प्रभावित आबादी का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से सुदृढ़ नहीं है। यानी जिन परिवारों की जमीन ली जानी है, वे पहले से सीमित संसाधनों के सहारे जीवनयापन कर रहे हैं।

प्रस्तावित फ्रेट विलेज के दायरे में बौद्धों का पवित्र स्थल तथागत बुद्ध विहार स्थित है और उसके समीप संत रविदास की पत्नी माता लोना देवी का मंदिर भी है। बुद्ध विहार ट्रस्ट से जुड़े विनय मौर्य का कहना है कि ट्रस्ट की लगभग साढ़े आठ बीघा भूमि इस दायरे में आती है और इसे बेचा नहीं जा सकता। उनके अनुसार इसे लेकर लगातार विरोध दर्ज कराया जा रहा है। इस विरोध में केवल संपत्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि आस्था और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा का आग्रह भी शामिल है।

वाराणसी विकास प्राधिकरण द्वारा तैयार वाराणसी–मुगलसराय–रामनगर महायोजना 2031 में 97 राजस्व गांवों को शहरीकरण के लिए चिन्हित किया गया है। इनमें राल्हूपुर, ताहिरपुर, मिल्कीपुर, रसूलगंज और गोपालपुर जैसे गांव शामिल हैं। ग्रामीणों ने भूमि अधिग्रहण के विरोध में सामूहिक हस्ताक्षर अभियान चलाकर यह सार्वजनिक किया है कि वे अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हैं।

पिछले वर्ष अगस्त में समाजवादी पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने ताहिरपुर का दौरा किया था। मुगलसराय के एसडीएम अनुपम मिश्रा के साथ बैठक भी हुई। प्रतिनिधिमंडल में शामिल विधायक प्रभुनारायण सिंह यादव ने कहा कि किसानों ने साफ तौर पर जमीन देने से इनकार किया है और प्रशासन की ओर से अधिग्रहण की प्रकृति को लेकर कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है।

इसी बीच केंद्र सरकार नदी परिवहन के साथ-साथ नदी पर्यटन को भी बढ़ावा दे रही है। 30 सितंबर 2024 को ‘क्रूज भारत मिशन’ की शुरुआत की गई। भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) क्रूज ऑपरेटरों को प्रोत्साहन दे रहा है और वर्ष 2029 तक क्रूज यात्रियों की संख्या 10 लाख प्रतिवर्ष तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि वर्ष 2023-24 में यह संख्या 4.71 लाख थी।

वाराणसी के घाटों पर नाव चलाने वाले मल्लाहों का कहना है कि इस नई नीति का सबसे अधिक असर उन पर पड़ रहा है। सांसद वीरेंद्र सिंह द्वारा संसद में पूछे गए प्रश्न के जवाब में सरकार ने बताया था कि हल्दिया से वाराणसी जलमार्ग मार्ग पर 87 कार्गो और क्रूज जलयान संचालित हो रहे हैं और मल्टीमॉडल टर्मिनल के संचालन के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल अपनाया जाएगा।

नाविकों के पेट पर चोट

मां गंगा निषादराज सेवा न्यास के अध्यक्ष प्रमोद माझी कहते हैं कि भगीरथ अपने पुरखों के उद्धार के लिए गंगा को धरती पर लाए थे, लेकिन आज यह नदी राजनीतिक उद्धार का साधन बन गई है। गंगा में मछली पकड़ना उनका पुश्तैनी पेशा है और सरकारी नीतियों से घाटों पर उनके लिए जगह सीमित होती जा रही है।

उनका आरोप है कि छोटी नावों को लाइसेंस देने में सख्ती बरती जाती है, जबकि बड़े क्रूज को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनके मुताबिक वाराणसी में लगभग 1,500 नावें संचालित होती हैं और करीब 10,000 मल्लाह इस पेशे से जुड़े हैं। वे मांग करते हैं कि जिन घाटों से परंपरागत रूप से तीर्थयात्रियों को नाव यात्रा कराई जाती रही है, वहां क्रूज को प्रवेश न दिया जाए।

प्रमोद माझी यह भी कहते हैं कि नाविकों का कहना है कि उनके जख्मों पर मरहम लगाने वाला कोई नहीं है। अगर गंगा ने किसी को बेटा बनाया है, तो गंगा किनारे जीवन गुजारने वालों की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? वाराणसी के लगभग 85 घाटों के आसपास बसे 32 से 35 हजार मल्लाहों की आजीविका नौकायन पर टिकी है। करीब 1500 नावें हैं और हर नाव पर औसतन चार लोग काम करते हैं। नाविकों का दावा है कि सरकारी संरक्षण में चल रहे क्रूजों के कारण उनकी आमदनी आधी रह गई है।

चंदौली और बनारस का मल्लाह समुदाय मानता है कि गंगा और उससे जुड़े पेशों पर उसका पहला हक है। पीढ़ियों से यह समुदाय नाव चलाने, मछली पकड़ने, गोताखोरी करने और बालू निकालने का काम करता आया है। माझी समाज के लोग खास तौर पर इन पारंपरिक कामों में दक्ष माने जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकारी नीतियों और पूंजी के बढ़ते हस्तक्षेप ने गंगा किनारे की अर्थव्यवस्था को बदल दिया है।

हालत यह है कि कई मल्लाह अपने पुश्तैनी पेशे को छोड़कर शहर की निर्माणाधीन इमारतों में मजदूरी करने को मजबूर हैं। घाटों पर ऐसे नाविक मिल जाते हैं जो दिन भर बैठने के बाद भी पहली कमाई का इंतजार करते रह जाते हैं। जब से मोदी बनारस आए हैं, नाविकों के अधिकार सीमित होते गए हैं और बाहरी कंपनियों को क्रूज संचालन के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

नाविक रामनाथ कहते हैं कि कड़ी मेहनत के बावजूद घर की जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं। महंगाई ने हालात और कठिन कर दिए हैं। गंगा में मछली पकड़ने पर प्रतिबंध के कारण रामनगर इलाके के गरीब मछुआरों के सामने अतिरिक्त संकट खड़ा हो गया है। कई पीढ़ियों से इस पेशे में जुड़े लोगों के पास वैकल्पिक रोजगार नहीं है। प्रतिबंध के बावजूद वे पूरी तरह काम छोड़ नहीं सकते, क्योंकि जीवनयापन का कोई दूसरा साधन नहीं है।

नमो घाट, राजघाट, पंचगंगा घाट, दशाश्वमेध और अस्सी घाट जैसे प्रमुख स्थानों को छोड़ दें तो अन्य घाटों पर नाविकों के सामने रोजी-रोटी का संकट गहराता जा रहा है। वे कहते हैं कि क्रूजों की संख्या बढ़ती जा रही है और अगर यही स्थिति रही तो नाविकों का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।

बबलू उर्फ राकेश साहनी का कहना है कि निषाद समुदाय नाव चलाने, मछली पकड़ने, गोताखोरी करने और गंगा पार रेत पर खेती करने जैसे कामों से जुड़ा रहा है। डूबते लोगों को बचाने या शव निकालने के समय प्रशासन अक्सर इन्हीं की मदद लेता है, लेकिन मान्यता और सुविधाएं उन्हें नहीं मिलतीं। समुदाय के भीतर यह भावना भी है कि राजनीतिक दल गंगा पुत्र होने का दावा तो करते हैं, पर वास्तविक गंगा किनारे रहने वालों की परेशानियों की अनदेखी करते हैं।

मोदी सरकार ने जनवरी 2023 में दुनिया के सबसे लंबे रिवर क्रूज ‘एमवी गंगा विलास’ को हरी झंडी दिखाई थी। दावा किया गया कि इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन नाविकों का कहना है कि बड़े क्रूज पारंपरिक नाविकों के धंधे पर सीधा असर डाल रहे हैं। राजघाट के दुर्गा माझी, जिनके परिवार की चार पीढ़ियां गंगा से जुड़ी रही हैं, कहते हैं कि बड़े क्रूजों के सामने छोटी नावों की प्रतिस्पर्धा संभव नहीं है। उनके मुताबिक, जब वे दो घंटे के लिए 50 रुपये मांगते हैं तो सैलानी मोलभाव करते हैं, जबकि क्रूज पर सैकड़ों रुपये खर्च करने में हिचक नहीं होती। लॉकडाउन के दौरान लिया गया कर्ज आज भी उनके सिर पर है और ब्याज बढ़ता जा रहा है।

दुर्गा माझी की पत्नी रानी देवी बताती हैं कि कई बार पर्यटक घाट पर आए बिना ही ऑनलाइन क्रूज बुक कर लेते हैं। उनका कहना है कि अगर यही स्थिति रही तो नाविकों की नावें किनारे बंधी रह जाएंगी और समाज का पारंपरिक कारोबार खत्म हो जाएगा। महिलाओं के सामने रसोई खर्च, बच्चों की पढ़ाई और बुजुर्गों की दवा का इंतजाम बड़ी चुनौती बन चुका है। कुछ परिवारों को गहने बेचने पड़े, बच्चों की पढ़ाई छूट गई और लॉकडाउन के बाद से जीवन पटरी पर नहीं लौट सका।

गोताखोर कल्लू माझी का कहना है कि जब कोई गंगा में डूबता है तो उन्हें ही पानी में उतारा जाता है, लेकिन सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाते। रामनगर के पार्षद अशोक साहनी का आरोप है कि नियम-कानून केवल नाविकों पर लागू होते हैं, जबकि क्रूज संचालकों को खुली छूट मिलती है। उनका कहना है कि बड़े कार्यक्रमों के समय पुलिस नाविकों की नावें बंद करा देती है, जिससे उनकी रोजी पर सीधा असर पड़ता है।

एक्टिविस्ट डा.लेनिन सवाल उठाते हैं कि क्रूज संचालन से होने वाली बड़ी कमाई का लाभ किसे मिल रहा है? उनके अनुसार रामनगर से सराय मोहाना तक बड़ी आबादी मल्लाह समुदाय से जुड़ी है और बढ़ते हस्तक्षेप के कारण पारंपरिक आजीविका कमजोर हो रही है। गंगा किनारे बड़े निर्माण और व्यावसायिक परियोजनाएं नदी के स्वभाव और घाटों की संरचना पर दीर्घकालिक असर डाल सकती हैं।

दौलत साहनी का कहना है कि पर्यटकों की बढ़ती संख्या का फायदा सीमित लोगों को मिला है, जबकि अधिकांश नाविक आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। बनारस के मल्लाह केवल नाविक नहीं, बल्कि गंगा की जीवित परंपरा हैं। उनकी आजीविका को कमजोर करना शहर की सांस्कृतिक आत्मा को कमजोर करना है।

डा.लेनिन यह भी कहते हैं, “क्रूज पर्यटन के विस्तार से छोटे नाविकों के पारंपरिक काम पर व्यावसायिक हित हावी हो रहे हैं। उनके अनुसार सुरक्षा का तर्क अक्सर छोटे मछुआरों पर लागू किया जाता है, जबकि बड़े क्रूज को अनुमति दी जाती है। उनका मानना है कि बनारस की पहचान घाटों पर चलती छोटी नावों और उनसे जुड़ी जीवन-शैली से है, और यदि यही संतुलन बिगड़ गया तो शहर अपनी मूल पहचान खो देगा। इस पूरे परिदृश्य में विकास, आजीविका, आस्था और पर्यावरण एक-दूसरे से उलझे हुए प्रश्नों की तरह सामने खड़े हैं। निर्णय केवल ढांचागत निर्माण का नहीं, बल्कि उस सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने का भी है, जिसने सदियों से गंगा किनारे बसे इस भूभाग को जीवित और विशिष्ट बनाए रखा है।”

नीति और नीयत पर सवाल

बनारस के रामनगर के समीपवर्ती गांव राल्हूपुर में आईडब्ल्यूएआई के बंदरगाह का उद्घाटन 12 नवंबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। उस समय इस बंदरगाह को जल परिवहन कि दिशा में मील का पत्थर बताया गया था और दावा किया गया था कि इसके जरिये सस्ती दरों पर माल की ढुलाई हो सकेगी।

बंदरगाह में 5.586 हेक्टेयर में मल्टी मॉडल टर्मिनल का निर्माण कराया गया है। यहां 200 मीटर लंबा और 42 मीटर चौड़ा गंगा नदी पर जेट्टी बनाई गई है। प्रशासनिक भवन का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। लोडिंग अनलोडिंग के लिए 50 टन क्षमता के दो मोबाइल हार्बर क्रेन खड़े हैं और वो जंग खा रहे हैं। यात्रियों को चढ़ने उतरने के लिए फ्लोटिंग जेट्टी और सीढ़ी का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है।

इस बंदरगाह को दिल्ली-हावड़ा रेल मार्ग से जोड़ने लिए नजदीकी जिवनाथपुर स्टेशन से नई सिंगल लाइन बिछाई जा रही है। यह रेलवे लाइन 5.6 किमी लंबी होगी। ताजा स्थिति यह है कि राल्हूपुर बंदरगाह सन्नाटे में है। बंदरगाह के इर्द-गिर्द गाय-भैस और गधे जुगाली करते नजर आते हैं। पिछले चार सालों में बनारस-कलकत्ता अंतर्देशीय जलमार्ग पर लगातार न कोई जलपोत चला और न ही माल की ढुलाई हो सकी।

मकबूल आलम रोड पर स्थित आईडब्ल्यूएआई के चमचमाते दफ्तर में मौजूद सहायक जलीय सर्वेक्षक समेत कोई भी अफसर मीडिया के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार नहीं होता। हर कोई पल्ला झाड़ लेता है। नाम नहीं छापने की शर्त पर वो इतना ही कहते हैं कि “हमने जलमार्ग तैयार कर दिया है। जब तक कारोबारियों और व्यापारियों की सोच नहीं बदलेगी, तब तक न गंगा नदी में जलपोत चल सकेंगे और न माल की ढुलाई संभव हो पाएगी।”

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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