एआई समिट से लेकर डेटा सिटी तक: किसके हाथ में होगा भविष्य?

कल्पना कीजिए, एक सुबह आप जागते हैं और पाते हैं कि दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्ति अब कोई साम्राज्य, कोई सेना या चुनावी जनादेश नहीं, अदृश्य सर्वरों में दौड़ती हुई वे गणनाएँ हैं जो तय कर रही हैं कि आपको कौन-सी खबर दिखेगी, किसे कर्ज मिलेगा, किसे नौकरी के लिए शॉर्टलिस्ट किया जाएगा और कौन-सा शोध आगे बढ़ेगा।

न किसी क्रांति का बिगुल बजा, न किसी तख्तापलट की घोषणा हुई। बस निर्णय लेने की प्रक्रिया धीरे-धीरे मनुष्य से खिसककर मशीनों की ओर सरकती चली गई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर जो हलचल आज दिखाई दे रही है, वह तकनीकी उन्नति के साथ साथ पूंजी, श्रम, राज्य और समाज के बीच बदलते संबंधों की कहानी है।

एआई अब प्रयोगशाला का खिलौना नहीं रहा। यह निवेश, शासन, रियल एस्टेट, वैज्ञानिक शोध, रोजगार और वैश्विक कूटनीति तक फैल चुका है। सवाल यह है कि इस विस्तार का लाभ किसे मिलेगा और कीमत कौन चुकाएगा।

दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट को ऐतिहासिक क्षण बताया जा रहा है। वैश्विक तकनीकी दिग्गज, निवेशक और नीति निर्माता एक मंच पर हैं। भाषणों में समावेशी विकास, नवाचार, रोजगार सृजन और डिजिटल भविष्य की बातें हैं। लेकिन जब हम इन घोषणाओं को निवेश की खबरों के साथ जोड़ते हैं, तो तस्वीर और स्पष्ट होती है।

ब्लैकस्टोन जैसे वैश्विक निवेशकों द्वारा सैकड़ों मिलियन डॉलर का निवेश, एआई क्लाउड स्टार्टअप्स का अरबों डॉलर का मूल्यांकन, और डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी पूंजी व्यय यह संकेत देते हैं कि आने वाले समय में डेटा और एल्गोरिद्म ही नई संपत्ति के रूप में स्थापित हो रहे हैं।

यहां एक बुनियादी प्रश्न उठता है। जब किसी नई तकनीक को जनहित के नाम पर आगे बढ़ाया जाता है, तो क्या उसका नियंत्रण भी जन के हाथ में होता है? या फिर नियंत्रण उन कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के हाथ में सिमट जाता है जिनके पास निवेश की क्षमता है?

एआई की मौजूदा दौड़ में हम देख रहे हैं कि जिनके पास सर्वर फार्म हैं, जिनके पास विशाल डेटा है, जिनके पास पूंजी है, वही नियम भी तय कर रहे हैं। राज्य की भूमिका अक्सर नियामक की बजाय सुगमकर्ता की हो जाती है। वह भूमि, बिजली, नीतिगत छूट और अनुकूल वातावरण प्रदान करता है, ताकि निजी निवेश फल-फूल सके।

एआई को लेकर सबसे अधिक चर्चा रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर है। कुछ विशेषज्ञों ने 12 से 18 महीनों के भीतर व्हाइट कॉलर जॉब्स में बड़े बदलाव की आशंका जताई है। ऑटोमेशन अब फैक्ट्री फ्लोर तक सीमित नहीं है। रिपोर्टिंग, कोडिंग, डिजाइन, कस्टमर सपोर्ट, यहां तक कि कानूनी ड्राफ्टिंग जैसे काम भी एल्गोरिद्म संभालने लगे हैं। इसे उत्पादकता में वृद्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

कंपनियों के लिए यह लागत में कटौती और मुनाफे में वृद्धि का अवसर है। लेकिन इनमें काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह असुरक्षा, पुन: कौशल की अनिश्चित दौड़ और आय में गिरावट का संकेत भी हो सकता है।

इतिहास बताता है कि जब भी नई तकनीक आई, उसने काम करने के तरीके बदले। मशीनों ने हाथों का काम लिया, कंप्यूटर ने कागजी दफ्तरों को बदल दिया। लेकिन हर बार सवाल यही रहा कि तकनीकी प्रगति का फल किस अनुपात में बंटेगा। यदि उत्पादकता बढ़ती है, तो क्या श्रमिक का जीवन स्तर भी उसी अनुपात में सुधरता है, या केवल शेयरधारकों का लाभ बढ़ता है?

एआई के मामले में यह प्रश्न और तीखा हो जाता है, क्योंकि यहां मशीन केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि बौद्धिक श्रम का भी स्थान ले रही है।

वैज्ञानिक खोज की गति को रणनीतिक संपत्ति बताया जाता है। एआई के कारण दवाओं की खोज, सामग्री विज्ञान, जलवायु मॉडलिंग और रक्षा अनुसंधान में तेजी आई है। इसमें संदेह नहीं कि यह मानवता के लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन जब खोज की गति स्वयं प्रतिस्पर्धा का हथियार बन जाए, तो विज्ञान भी बाजार की दौड़ में शामिल हो जाता है। जो देश और कंपनियां अधिक डेटा और कंप्यूटिंग शक्ति पर कब्जा रखती हैं, वे ज्ञान उत्पादन में भी आगे निकलती हैं। इससे वैश्विक असमानताएं और गहरी हो सकती हैं।

रियल एस्टेट पर एआई के प्रभाव की खबर भी रोचक है। अमीर खरीदारों के लिए प्रॉपर्टी चयन, निवेश विश्लेषण और जीवन शैली के निजीकरण में एल्गोरिद्म का उपयोग बढ़ रहा है। इसका अर्थ है कि तकनीक केवल उत्पादन क्षेत्र में नहीं, बल्कि संपत्ति संचय के नए रूपों में भी काम कर रही है। जब पूंजी पहले से ही केंद्रित हो और तकनीक उसे और दक्ष बना दे, तो संपत्ति का केंद्रीकरण और तेज हो सकता है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म, डेटा एनालिटिक्स और भविष्यवाणी मॉडल धनी वर्ग के लिए जोखिम कम करते हैं, जबकि छोटे निवेशकों के लिए उसी स्तर की सुविधा उपलब्ध नहीं होती।

सरकारी शासन में जियो-एआई और राष्ट्रीय मास्टर प्लान जैसे प्रयासों को दक्षता की दिशा में कदम बताया जा रहा है। सड़कों, रेल, लॉजिस्टिक्स और शहरी नियोजन में डेटा आधारित निर्णय से संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव है। यह स्वागतयोग्य है। परंतु यह भी देखना होगा कि डेटा किसका है और उसका उपयोग किस उद्देश्य से हो रहा है।

यदि नागरिकों के व्यवहार, आवाजाही और लेनदेन का विशाल डेटा संग्रहित होता है, तो निजता और निगरानी का प्रश्न भी उठता है। शासन और निगरानी के बीच की रेखा बहुत पतली हो सकती है।

एआई डेटा सिटी जैसी परियोजनाएं यह संकेत देती हैं कि भारत भी वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं रहना चाहता। अमेरिका और चीन के बीच चल रही तकनीकी होड़ में भारत अपनी जगह बनाना चाहता है। यह आकांक्षा स्वाभाविक है।

लेकिन केवल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर देने से आत्मनिर्भरता नहीं आती। यदि चिप निर्माण, कोर एल्गोरिद्म और क्लाउड प्लेटफॉर्म पर निर्भरता बनी रहती है, तो हम उपभोक्ता बने रहेंगे, निर्माता नहीं। वास्तविक परिवर्तन तब होगा जब तकनीक का स्वामित्व और कौशल व्यापक समाज में फैले।

एआई निवेश के सिलसिले में कंपनियों को आकर्षित करने की अपील की गई है। कर प्रोत्साहन, सरल नियम और पूंजी प्रवाह को सुगम बनाने की बात कही जा रही है। यह दृष्टिकोण आर्थिक वृद्धि पर केंद्रित है। लेकिन वृद्धि अपने आप में तटस्थ नहीं होती। वह जिस दिशा में बहती है, उसी दिशा में समाज की संरचना बदलती है। यदि निवेश केवल उन क्षेत्रों में जाए जहां शीघ्र लाभ हो, तो शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्र पीछे छूट सकते हैं। एआई को केवल लाभ अधिकतम करने का उपकरण बना देना, उसकी संभावनाओं को सीमित कर देना है।

एआई का एक और पहलू है श्रम का अदृश्य होना। जब कोई चैटबॉट ग्राहक सेवा संभालता है, तो उसके पीछे हजारों लेबलिंग वर्कर, डेटा एनोटेटर और मॉडरेशन कर्मचारी काम करते हैं। वे अक्सर अस्थायी अनुबंधों पर, कम वेतन में और बिना सामाजिक सुरक्षा के काम करते हैं। तकनीक चमकदार है, लेकिन उसके नीचे श्रम की एक परत है जो दृश्य नहीं होती। यदि नीति निर्माता और सरकारें इस पर ध्यान नहीं देंगे, तो असमानता का नया रूप जन्म ले सकता है।

यह भी सच है कि एआई से नई नौकरियां भी पैदा होंगी। डेटा साइंस, मशीन लर्निंग इंजीनियरिंग, साइबर सुरक्षा और एथिक्स जैसे क्षेत्र बढ़ेंगे। परंतु इन नौकरियों के लिए उच्च कौशल और शिक्षा की आवश्यकता है। यदि शिक्षा प्रणाली समय रहते खुद को अनुकूलित नहीं करती, तो एक छोटा सा प्रशिक्षित वर्ग आगे निकल जाएगा और बड़ा हिस्सा पीछे छूट जाएगा। तब तकनीक सामाजिक गतिशीलता का साधन नहीं, बल्कि विभाजन का साधन बन सकती है।

इस पूरे परिदृश्य में राज्य की भूमिका निर्णायक है। वह केवल निवेश आकर्षित करने वाला मंच न बने, बल्कि यह सुनिश्चित करे कि तकनीकी लाभ व्यापक समाज तक पहुंचे। सार्वजनिक डेटा अवसंरचना को निजी एकाधिकार से बचाया जाए। ओपन सोर्स पहल को बढ़ावा मिले। शिक्षा और पुन: कौशल कार्यक्रमों में सार्वजनिक निवेश हो। श्रमिकों के लिए सुरक्षा जाल तैयार हो। तभी एआई विकास का अर्थ व्यापक कल्याण होगा।

एआई को लेकर उत्साह स्वाभाविक है। यह स्वास्थ्य सेवा को सुलभ बना सकता है, कृषि को अधिक उत्पादक बना सकता है, आपदा प्रबंधन को बेहतर कर सकता है। लेकिन हर तकनीक अपने साथ शक्ति का पुनर्वितरण भी लाती है। यदि हम केवल उसके चमकदार पक्ष को देखें और संरचनात्मक प्रभावों की अनदेखी करें, तो भविष्य असंतुलित हो सकता है।

एआई भारत के लिए अवसर का क्षण है। परंतु अवसर केवल उन लोगों के लिए न रह जाए जिनके पास पहले से संसाधन हैं, यह सुनिश्चित करना समाज और नीति निर्माताओं की जिम्मेदारी है। तकनीक को साधन बनाना है, स्वामी नहीं। यदि उत्पादन क्षमता बढ़ती है, तो उसका लाभ श्रम, उपभोक्ता और छोटे उद्यमी तक पहुंचे। यदि डेटा नई संपत्ति है, तो उसका उपयोग सार्वजनिक हित में हो।

शायद आने वाले वर्षों में हमें यह नहीं पूछा जाएगा कि हम तकनीक के पक्ष में हैं या विरोध में। सवाल इससे अलग होगा। क्या हमने उस समाज की कल्पना की थी जिसमें यह तकनीक काम करेगी? क्या हमने तय किया था कि दक्षता से पहले गरिमा आएगी, लाभ से पहले जीवन की गुणवत्ता? यदि हमने यह बातचीत अभी नहीं की, तो भविष्य हमारे सामने तैयार हालत में खड़ा होगा और हम केवल उसके उपभोक्ता रह जाएंगे।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं।)

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