सामाजिक चेतना का क्षय होना

तकनीकी प्रगति, उपभोगवादी चमक और राजनीतिक उन्माद के समकालीन परिदृश्य में सामाजिक चेतना का क्षरण हमारे समय की सबसे गंभीर बौद्धिक और नैतिक चुनौतियों में से एक है। सूचना-विस्फोट के इस युग में व्यक्ति पहले की अपेक्षा अधिक ‘सूचित’ अवश्य हुआ है, किंतु यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि क्या वह उतना ही ‘संवेदनशील’ और ‘सामाजिक रूप से उत्तरदायी’ भी हुआ है।

ज्ञान और सूचना के बीच का अंतर यहाँ निर्णायक हो उठता है। सूचना तात्कालिक, विखंडित और उपभोग के लिए तत्पर सामग्री है; जबकि ज्ञान गहराई, संदर्भ और नैतिक विवेक से निर्मित होता है। सामाजिक चेतना इसी ज्ञानात्मक आधार पर विकसित होती है।

सामाजिक चेतना का आशय केवल सामूहिक घटनाओं पर त्वरित प्रतिक्रिया देना नहीं है। यह अपने परिवेश के दुःख-सुख, अन्याय-असमानता, शोषण-वंचना और सामूहिक उत्तरदायित्व के प्रति सतत सजग रहने की वृत्ति है। यह सजगता व्यक्ति को निजी हितों की सीमाओं से बाहर निकालकर व्यापक सामाजिक सरोकारों से जोड़ती है।

भारतीय संदर्भ में यह चेतना कई ऐतिहासिक आंदोलनों की प्रेरक शक्ति रही है। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले स्वतंत्रता आंदोलन ने सत्य, अहिंसा और सामूहिक नैतिक प्रतिरोध के आधार पर व्यापक जनसमुदाय को सक्रिय किया। इसी प्रकार डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक अधिकारों के प्रश्न को जनचेतना के केंद्र में स्थापित किया।

इन आंदोलनों में व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर एक व्यापक नैतिक समुदाय का हिस्सा बनता था। सामाजिक चेतना यहाँ भावनात्मक उफान नहीं, बल्कि वैचारिक प्रतिबद्धता और दीर्घकालिक संघर्ष का परिणाम थी।

समकालीन परिदृश्य में यह स्थिति परिवर्तित होती दिखाई देती है। सूचना माध्यमों की बहुलता—विशेषकर डिजिटल और सोशल मीडिया—ने घटनाओं तक पहुँच को लोकतांत्रिक बनाया है, परंतु इस लोकतंत्रीकरण के साथ ही एक विखंडन भी आया है। घटनाएँ ‘ट्रेंड’ बनती हैं, ‘वायरल’ होती हैं और शीघ्र ही विस्मृति में विलीन हो जाती हैं। करुणा और आक्रोश का सार्वजनिक प्रदर्शन एक क्लिक, एक पोस्ट या एक इमोजी तक सीमित हो जाता है।

सामाजिक सरोकार ‘कंटेंट’ में रूपांतरित हो जाते हैं, जहाँ उनकी उपस्थिति का मूल्य उनकी नैतिक गंभीरता से अधिक उनकी दृश्यता और लोकप्रियता से निर्धारित होता है। इस प्रकार सहभागिता का आभास तो निर्मित होता है, पर वास्तविक सामाजिक हस्तक्षेप दुर्लभ होता जाता है।

उपभोक्तावाद इस प्रक्रिया को और जटिल बनाता है। वैश्विक पूँजीवादी व्यवस्था ने व्यक्ति को ‘नागरिक’ से अधिक ‘उपभोक्ता’ के रूप में परिभाषित किया है। पहचान, प्रतिष्ठा और सफलता का मानदंड सामाजिक योगदान नहीं, बल्कि क्रय-शक्ति और बाजार-उपलब्धियों से निर्धारित होने लगा है। व्यक्ति स्वयं को एक ‘ब्रांड’ की तरह प्रस्तुत करने में व्यस्त है—सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल, निजी उपलब्धियाँ और उपभोग की वस्तुएँ उसकी सामाजिक उपस्थिति का आधार बनती हैं।

इस ब्रांड-चेतना में सामाजिक प्रश्नों से जुड़ना अक्सर जोखिमपूर्ण या अलाभकारी माना जाता है। परिणामस्वरूप सामाजिक असमानताओं, पर्यावरणीय संकटों और मानवीय त्रासदियों पर विमर्श सतही रह जाता है।

शिक्षा-व्यवस्था की दिशा भी इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षा, जो परंपरागत रूप से आलोचनात्मक चिंतन, नैतिक विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व का माध्यम मानी जाती थी, वह धीरे-धीरे रोजगार-केंद्रित कौशल तक सीमित होती जा रही है। कौशल और दक्षता का महत्व असंदिग्ध है, किंतु जब शिक्षा का समूचा उद्देश्य केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा तक सिमट जाता है, तब सामाजिक चेतना का विकास बाधित होता है।

विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में मानवीय मूल्यों, लोकतांत्रिक संवाद और सामाजिक संवेदनशीलता पर केंद्रित विमर्शों का क्षरण एक चिंताजनक संकेत है। इससे ऐसी पीढ़ी तैयार होती है जो तकनीकी रूप से दक्ष तो है, पर सामाजिक रूप से उदासीन।

राजनीतिक उन्माद और ध्रुवीकरण भी सामाजिक चेतना को प्रभावित करते हैं। जब सार्वजनिक विमर्श तर्क और संवाद के स्थान पर आरोप-प्रत्यारोप, भावनात्मक उत्तेजना और पहचान-आधारित राजनीति पर आधारित हो जाता है, तब विवेकशील असहमति के लिए स्थान संकुचित हो जाता है। नागरिकता का अर्थ विचारशील सहभागिता के बजाय भीड़-मानस में शामिल होना बन जाता है।

ऐसी स्थिति में सामाजिक चेतना का विकास कठिन हो जाता है, क्योंकि वह प्रश्न पूछने, आत्मालोचन करने और सत्ता-संरचनाओं की समीक्षा करने की क्षमता पर निर्भर करती है।

फिर भी यह निष्कर्ष निकालना अतिशयोक्ति होगी कि सामाजिक चेतना पूरी तरह लुप्त हो चुकी है। विभिन्न स्थानीय आंदोलनों, नागरिक पहलों, पर्यावरण संरक्षण अभियानों और वैकल्पिक सांस्कृतिक मंचों पर यह चेतना अब भी सक्रिय है। युवाओं के बीच स्वयंसेवी कार्यों, सामुदायिक सहयोग और सामाजिक उद्यमिता के नए रूप भी उभर रहे हैं। किंतु इन प्रयासों की मुख्यधारा में उपस्थिति अपेक्षाकृत कम है। आवश्यकता इस बात की है कि इन विखंडित पहलों को व्यापक वैचारिक आधार और संस्थागत समर्थन प्राप्त हो।

समाधान का मार्ग सामाजिक चेतना की पुनर्स्थापना में निहित है, जो तीन स्तरों पर संभव है। प्रथम, शिक्षा में आलोचनात्मक चिंतन और नैतिक विमर्श को पुनः केंद्रीय स्थान दिया जाए। द्वितीय, मीडिया-साक्षरता को बढ़ावा देकर नागरिकों को सूचना और प्रचार के बीच भेद करने की क्षमता प्रदान की जाए। तृतीय, लोकतांत्रिक संवाद की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाए, जहाँ असहमति को शत्रुता नहीं, बल्कि विचार-विस्तार का अवसर माना जाए।

अंततः सामाजिक चेतना किसी बाहरी अनुदान से नहीं आती; वह आत्मानुशासन, संवेदनशीलता और सामूहिक उत्तरदायित्व के अभ्यास से विकसित होती है। यदि व्यक्ति स्वयं को केवल उपभोक्ता या दर्शक के रूप में देखना बंद कर पुनः सक्रिय नागरिक के रूप में पहचानने लगे—सवाल पूछने का साहस, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की नैतिक प्रतिबद्धता और सामूहिक भलाई के लिए दीर्घकालिक प्रयास—तो सामाजिक चेतना का स्वर पुनः मुखर हो सकता है।

हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि सूचना की प्रचुरता को संवेदना की गहराई में रूपांतरित किया जाए और निजी उपलब्धियों के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भी जीवन-मूल्य के रूप में पुनर्स्थापित किया जाए।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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