आईओसी, पानीपत में हड़ताल : मज़दूर आंदोलन को अपनी कमजोर होती ज़मीन फिर हासिल करनी होगी

राजधानी दिल्ली से महज सौ किमी दूर इंडियन ऑयल के रिफायनरी और पेट्रोकेमिकल्स काम्पलेक्स, पानीपत में काम कर रहे 30 हजार मजदूर 23 फरवरी, 2026 को हड़ताल पर चले गये। वे अपनी कई सारी मांगों के साथ कंपनी के प्रबंधन के खिलाफ प्रदर्शन करने में एकजुट हुए। पुलिस बल के लाठीचार्ज में काफी मजदूर घायल हुए। लेकिन, मजदूरों ने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।

पुलिस बल का अरोप था कि प्रदर्शनकारी मजदूर उनकी गाड़ियों पर पथराव कर रहे थे और रास्ता घेर रहे थे। द इकाॅनोमिक टाइम्स की खबर के अनुसार मजदूर कंपनी के मुख्य गेट पर इकठ्ठा हो रहे थे जहां पहले से ही पुलिस बैरीकेडिंग कर रखी थी और वहां उनकी काफी संख्या मौजूद थी।

ऐसी भिड़ंतों की कहानी लगभग एक जैसी होती है। पुलिस बल के अनुसार उन्होंने मजदूरों से ‘उचित तय जगह’ पर प्रदर्शन करने के लिए कहा। मज़दूरों ने उनकी बात नहीं सुनी और वे नारेबाजी कर रहे थे और तेजी से इकठ्ठा हो रहे थे। अंततः पुलिस बल ने बल प्रयोग कर मजदूरों को नियंत्रित किया।

हाल-फिलहाल में इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों का एकजुट होकर अपनी मांगों के साथ हड़ताल करना और अपनी मांग को लेकर प्रदर्शन करना, पहली घटना है।

द इकाॅनोमिक टाइम्स के अनुसार मजदूरों की मुख्य मांगें थीं : समय पर वेतन दो, गलत तरीके से मजदूरी में कटौती न करो, रिफायनरी में बीमार बना देने वाली व्यवस्था को ठीक करो और साफ-सफाई बनाकर रखो, काम के घंटे को 12 से घटाकर 8 करो, अतिरिक्त काम लेने को ओवरटाइम के साथ जोड़ो, कार्यस्थल पर आवश्यक सुविधाएं दो, टायलेट और पीने के पानी की व्यवस्था रखो, परिवहन की व्यवस्था करो।

मजदूरों की मांग में एक विशाल कारपोरेशन में मजदूरों के काम के हालात साफ दिखते हैं। काम की यह परिस्थितियां यूरोप, खासकर ब्रिटिश कंपनियों 18वीं सदी के काम के हालात की तरह दिखती हैं। साफ पानी, मजदूरी, ट्टटी-पेशाब करने की जगह, स्वास्थ्य-वर्धक जगह की मांगें और 12 घंटे काम के शिफ्ट भारत में उजरत गुलामी का दृश्य बनाते हुए दिखते हैं।

ये हालात कोई अनाम-बेनामी कंपनी के भीतर नहीं, इंडियन ऑयल कारपोरेशन, पानीपत जो 1998 में स्थापित हुआ था, में दिखते हैं। आईओसी, पानीपत की विभिन्न इकाईयों में कई स्रोतों में बताये गये आंकड़ों के अनुसार लगभग 50 हजार मजदूर काम करते हैं। तकनीकी तौर पर यह रिफायनरी इंटिग्रेटेड सिस्टम से काम करती है। जबकि मजदूर की भर्ती और काम लेने की व्यवस्था मुख्यतः ठेकेदारी प्रथा पर निर्भर है।

मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान की ओर से जारी किये पर्चे में लिखा गया है: ‘‘24 फरवरी को मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान की एक टीम ने तथ्यान्वेषण व संघर्षरत मजदूरों से संवाद करने हेतू रिफायनरी परिसर का दौरा किया, जिससे पता लगा कि 23 फरवरी को मजदूरों का उपरोक्त विद्रोह फूटने का मुख्य उत्प्रेरक था। दो दिन पहले रिफायनरी में हुए एक कार्य संबंधित हादसे में 2 मजदूरों की मृत्यु और 1 का बुरी तरह घायल हो जाना (एक पैर घुटने तक कट जाना), और इस पर भी प्रबंधन का उदासीन रवैया। सालों से शोषण और प्रबंधन-ठेकेदारों का अभद्र व्यवहार झेल रहे मजदूरों का दबा हुआ गुस्सा फूट पड़ा।’’

इस पर्चे में मजदूरों की मांगें और भी ठोस रूप में दिखती हैं। इसमें मजूदरों की मांगों में वेतन भुगतान का समय महीने के 1-7 तारीख के बीच करने की मांग की गई है। मजदूरी कंपनी के बोर्ड रेट के अनुसार देने और पीएफ की व्यवस्था की मांग है। कंपनी में दुर्घटना की जिम्मेदारी खुद ले और उसका खर्च उठाये। ओवरटाइम का भुगतान सामान्य भुगतान से दुगना हो। राष्ट्रीय अवकाश की छुट्टी दी जाएं। मासिक कार्यदिवस 26 दिन का हो।

इन मांगों के संदर्भ में देखें तो वहां काम कर रहे मजदूरों से रविवार को भी काम लिया जा रहा है अर्थात हफ्ते में सात दिन। इन मजदूरों को कई स्तर की मजदूरी दी जा रही है और काम की समानता के आधार पर काम का भुगतान नहीं हो रहा है।

अखबार की खबरों में पुलिस के बयान के अनुसार हालात नियंत्रण में हैं और शांति है। लेकिन, मजदूर अपनी मांग को लेकर पीछे नहीं हटे हैं। लगभग 15 साल पहले गुड़गांव के मारूती सुजुकी कंपनी में काम के हालात को लेकर ही आंदोलन उठा था। उस समय भी आज की कई मांगें उस समय भी उठाई गई थी। उन मांगों में एक मांग मजदूर यूनियन बनाने और उसकी मान्यता हासिल करनी भी थी।

आज पानीपत स्थिति इंडियन आयल रिफायनरी के केंद्र जो काम के हालात दिख रहे हैं, वह और भी बदतर हो चले हैं। पिछले 15 सालों में मजदूरों के काम के हालात ठीक करने की बजाय केंद्र और राज्य सरकारें ‘श्रम कानून में सुधार’ के नाम पर मजदूरों को भयावह उजरती गुलामी की ओर ठेल रही हैं।

हाल में, केंद्र सरकार द्वारा श्रमिकों संदर्भ में लाये गये ‘चार लेबर कोड इन बदतर हालातों को वैध बना देने की कोशिशों की तरह दिखते हैं। ये सुधार मजदूरों की ज़िंदगियों को मुनाफे की चक्की में पिस जाने के लिए फेंकते दिख रहे हैं। आज मजदूर आंदोलन के सामने मजदूर वर्ग काम के इस हालात से बाहर लाने की चुनौती है। काम के हालात जितने ही भयावह होंगे, राजनीतिक चुनौतियां उतनी ही बड़ी होती जाती हैं।

भारत में पूंजीपति वर्ग की पार्टियां विशाल गरीब, भूमिहीनों, किसानों और मेहनतकश मजदूरों के सामने जीवन जीने के भयावह हालात की ओर ठेल रही हैं और दूसरी ओर वह खुद अपनी सत्ता के बल पर पहले से अधिक मुनाफा कमाने और एकाधिकारी प्रवृत्ति की बनती जा रही हैं। मजदूर आंदोलन को अपनी कमजोर होती गई जमीन को फिर से हासिल करने के लिए काम के हालात को बेहतर बनाने की लड़ाई को हर कोशिश के साथ आगे बढ़ाना चाहिए।

(अंजनी कुमार लेखक-टिप्पणीकार हैं।)

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