विश्व रिकॉर्ड की तालियों के बीच दब गई सैकड़ों लोगों की चीख, दलितों का ठौर और किसानों की जमीनें छिनीं

उत्तर प्रदेश के चंदौली और बनारस की सीमा पर डोमरी और सूजाबाद की ओर जाती सड़क के किनारे कभी बांस और फूस की कतारें दिखाई देती थीं। वही कतारें जो तीन-चार पीढ़ियों से महा दलितों में गिने जाने वाले धरकार समुदाय का घर थीं। आज वहां टूटी खाटें हैं, बिखरे बर्तन हैं और खुले आसमान के नीचे सिमटे हुए करीब 250 लोग हैं।

01 मार्च 2026 को डोमरी और सूजाबाद में पौधरोपण के नाम पर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की तैयारी थी। अफसरों की आवाजाही तेज थी। मंच सजा था। गांव को चमकाया जा रहा था। उसी बीच 27 फरवरी को प्रशासन का आदेश आया और कुछ ही घंटों में धरकारों की मड़इयां उखाड़ दी गईं। यह वही डोमरी है जिसे कुछ वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोद लिया था। गांव विकास की योजनाओं का प्रतीक बना, लेकिन गांव की चौहद्दी पर बसे ये परिवार विकास की तस्वीर में जगह नहीं पा सके।

धरकार, जिन्हें स्थानीय लोग बांसफोर भी कहते हैं और ये लोग पूर्वांचल के पारंपरिक कारीगर हैं। बांस से सूप, डोलिया, टोकरी और शादी-ब्याह में काम आने वाला सामान बनाना उनका पुश्तैनी काम है। सड़क किनारे बनी यही झोपड़ियां उनका घर थीं और यही उनकी कार्यशाला। यहीं बच्चे बड़े हुए। यहीं गृहस्थी बसी। जब पुलिस और अधिकारी पहुंचे तो किसी पुनर्वास योजना की जानकारी नहीं दी गई। आनन-फानन में मड़इयां गिरा दी गईं। बांस की दीवारें टूटीं। छतें बिखरीं और देखते ही देखते तीन पीढ़ियों का ठिकाना मिट्टी में मिल गया।

धरकार बस्ती की तारा और सरोजा आज भी उसी सड़क किनारे बैठी हैं। बच्चों को गोद में लिए तारा की आवाज कांपती है। वह कहती हैं, “हमारी बस्ती इसलिए उजाड़ी गई क्योंकि बड़े अफसर और नेता आने वाले थे। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड का कार्यक्रम था। किसी ने हमें नहीं बताया कि हमारा गुनाह क्या है? बस कहा गया कि जगह खाली करो। हमारी गरीबी उन्हें नहीं दिखनी चाहिए।”

जीरा कहती हैं, “हम अफसरों के आगे आगे जोड़ते रहे। उनके पांव पकड़ते रहे, लेकिन किसी ने हमारी एक नहीं सुनी। वह बताती हैं, “डोमरी को गोद लेने के बाद से ही हमारी बस्ती अफसरों की नजर में थी। कई बार कहा गया हट जाओ। हम कहां जाएं, यह किसी ने नहीं बताया। पौधरोपण और विकास के नाम पर हमें खुले आसमान के नीचे छोड़ दिया गया।”

हमारे पास आधार कार्ड हैं। राशन कार्ड हैं। बैंक खाते हैं। कुछ घरों में उज्ज्वला योजना का गैस कनेक्शन भी है। कागजों में वे लाभार्थी हैं। चुनाव में मतदाता हैं, लेकिन आज हमारे पास सिर छुपाने की जगह नहीं है।”

गिनीज बनाघर उजड़े

भाईराम की पत्नी मंजू टूटी खाट के पास खड़ी होकर कहती हैं, “हम तीन बार से बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वोट देते आए हैं। हमने कभी कुछ नहीं मांगा। जो योजना आई, उसमें नाम जुड़ गया तो हम खुश हो गए। गैस मिली तो लगा सरकार ने हमें देखा। लेकिन न घर मिला और न ही जमीन। हमारी दुनिया ही उजाड़ दी गई।”

मंजू की आंखें भर आती हैं। वह आगे कहती हैं, “जहां जाते हैं, वहां से भगा दिए जाते हैं। हमें महादलित कहा जाता है। लेकिन हमारी कला को किसी ने नहीं पहचाना। अब तो रहने की जगह भी नहीं बची।”

धरकार समुदाय का जीवन रोज की कमाई पर टिका है। बस्ती उजड़ते ही उनका काम भी ठप हो गया। अधबने सूप और बांस की पट्टियां सड़क किनारे पड़ी हैं। तारा देवी कहती हैं, “कई दिनों से काम बंद है। पहले जो कमाते थे, वही खर्च हो जाता था। अब दो वक्त की रोटी भी मुश्किल है। पुलिस ने कहा है कि दोबारा झोपड़ी मत लगाना, नहीं तो पिटाई होगी।”

डोमरी में पौधरोपण का कार्यक्रम भव्य रहा। हरियाली की तस्वीरें सामने आईं। रिकॉर्ड बनने की खबरें चलीं, लेकिन उसी हरियाली के बीच दलितों की एक और बस्ती उजड़ गई।

धरकार बस्ती के सुरेंद्र कहते हैं, “यदि जमीन पर उनका रहना अवैध था तो पुनर्वास की व्यवस्था पहले होनी चाहिए थी। कानून का पालन और इंसान की गरिमा भी जरूरी है। हमारी कई पीढ़ियों से बसे परिवारों को बिना विकल्प दिए उजाड़ देना कहां का न्याय है।बनारस में विकास के नाम पर आधा दर्जन दलित बस्तियां अब से पहले उजाड़ी जा चुकी हैं।”

धरकार बस्ती के लोग बताते हैं कि रात होते ही बच्चे अपनी मांओं से चिपक कर सो जाते हैं। सड़क से गुजरती गाड़ियों की रोशनी उनके चेहरों पर पड़ती है। आसमान ही उनकी छत है। धरती ही उनका बिस्तर। इस बस्ती के लोग बार-बार एक ही सवाल दोहराते हैं, “हम कहां जाएं?” यह सवाल डोमरी की धरकार बस्ती का है, लेकिन गूंज उससे कहीं दूर तक जाती है। विकास की चमक के पीछे छूटती इन जिंदगियों को कौन देखेगा और कौन सुनेगा?

तपती रेत पर उगाई उपलब्धि

बनारस के डोमरी और सूजाबाद में करीब 350 बीघा बालू की रेत पर पहली मार्च को पौधरोपण का कार्यक्रम हुआ, उस दिन गंगा किनारे की हवा भी जैसे तप रही थी। कड़ाके की धूप थी। रेत अंगार की तरह गर्म थी। इसी तपती जमीन पर एक घंटे के भीतर लाखों पौधे रोपे गए और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का दावा किया गया। प्रशासन ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। मंच से घोषणा हुई कि एक घंटे में 2,51,446 पौधे रोपकर चीन का पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया गया है।

इससे पहले वर्ष 2018 में चीन की हेनान प्रांतीय समिति और हेनान शिफांगे ग्रीनिंग इंजीनियरिंग कंपनी ने 1,53,981 पौधे रोपे थे। डोमरी में मियावाकी पद्धति के तहत सुनियोजित तरीके से यह संख्या पार की गई। मौके पर मौजूद निर्णायक ऋषि नाथ और रणनीतिकार निश्चल बारोट ने पूरी प्रक्रिया का सत्यापन किया। तालियों की गूंज के बीच बनारस ने विश्व रिकॉर्ड दर्ज करने का दावा किया।

पौधरोपण के लिए शिक्षकों और सुरक्षा बलों के जवानों की ड्यूटी लगाई गई थी। कतारबद्ध तरीके से गड्ढे तैयार किए गए। पौधे पहले से मंगवाए गए थे। समय की पाबंदी थी। एक घंटे के भीतर रोपण पूरा करना था। कई शिक्षक बताते हैं कि धूप इतनी तीखी थी कि सिर चकरा रहा था, फिर भी कोई रुक नहीं सकता था, क्योंकि हर पौधा गिना जा रहा था, हर सेकंड दर्ज हो रहा था। यह आयोजन केवल हरियाली का नहीं, एक लक्ष्य को समय के भीतर हासिल करने का भी था।

जिस जमीन पर यह उपलब्धि दर्ज की गई, वह साधारण जमीन नहीं है। यह गंगा किनारे का बालू क्षेत्र है। गर्मियों में यहां की रेत सूखी और बिखरी रहती है। पैर रखते ही धंस जाती है। बरसात में यही इलाका पानी से भर जाता है। स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि बाढ़ के दिनों में कई महीने तक यहां गंगा का पानी ठहरा रहता है।

डोमरी के किसान रामदुलार ने कहा, “हम इस धरती को बरसों से जानते हैं। जब पानी चढ़ता है तो पूरा इलाका डूब जाता है और जब गर्मी पड़ती है तो रेत तवे की तरह तपती है। ऐसे में पौधे जड़ कैसे पकड़ेंगे?” उनके स्वर में विरोध से ज्यादा चिंता थी। राम दुलार का आरोप है कि प्रशासन ने पौधरोपण के नाम पर उनकी डेढ़ बीघा जमीन छीन ली, जिस पर वो कई सालों से खेती करते आ रहे थे।

पौधरोपण के कुछ घंटों बाद ही तेज धूप ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। कई पौधों की पत्तियां झुक गईं। कुछ पौधे मुरझाए से दिखे। स्थानीय युवाओं ने बताया कि शाम तक कई पौधों की नमी खत्म होती नजर आ रही थी। अगले दिन जब वे दोबारा वहां पहुंचे तो कुछ पौधे सूखते हुए मिले। प्रशासन का कहना है कि मियावाकी पद्धति घने और तेजी से विकसित होने वाले वन तैयार करने की वैज्ञानिक तकनीक है और नियमित देखभाल से पौधे सुरक्षित रहेंगे।

पर सवाल यह है कि क्या इस विस्तृत बालू क्षेत्र में लगातार सिंचाई और संरक्षण की व्यवस्था लंबे समय तक संभव हो पाएगी।

ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी है कि यह आयोजन पर्यावरणीय आवश्यकता से अधिक एक इवेंट की तरह महसूस हुआ। डोमरी के नौजवान दीपक पटेल ने कहा, “पेड़ लगाना अच्छी बात है। हम चाहते हैं कि यहां हरियाली हो। अगर यह सिर्फ रिकॉर्ड बनाने के लिए है और बाद में पौधे सूख जाएंगे तो इससे क्या फायदा?” उनके सवाल में निराशा नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक दृष्टि थी। वे उस जमीन की प्रकृति को जानते हैं, उसके मिजाज को समझते हैं।

डोमरी के निवासी लालचंद पटेल कहते हैं, “एक ओर विश्व रिकॉर्ड की उपलब्धि है, दूसरी ओर उसी क्षेत्र के आसपास उजड़ी हुई बस्तियों की कहानी। गंगा किनारे की यह रेत अब केवल पौधों की कतारों की गवाह नहीं है, बल्कि उस बहस की भी साक्षी है जिसमें विकास, पर्यावरण और मानवीय सरोकार आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। समय ही बताएगा कि तपती रेत पर रोपे गए ये पौधे सचमुच जड़ें जमा पाएंगे या नहीं? अभी वे पतली टहनियों के सहारे खड़े हैं। धूप से जूझते हुए। हवा के हल्के झोंकों में कांपते हुए।”

19.80 करोड़ रुपये की आय का लक्ष्य

नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने दावा किया है कि इस परियोजना के लिए मध्यप्रदेश की एमबीके संस्था से समझौता किया गया है।350 बीघा भूमि पर विकसित हो रहे इस मियावाकी प्रोजेक्ट के तहत 3,17,120 पौधे लगाए जा रहे हैं और एक घंटे में 20 हजार लोगों द्वारा तीन लाख पौधरोपण कर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने की तैयारी भी पूरी कर ली गई है।

यह प्रोजेक्ट तीसरे वर्ष से निगम को दो करोड़ रुपये की आय देना शुरू करेगा, जो पांचवें वर्ष पांच करोड़, छठे वर्ष छह करोड़ और सातवें वर्ष तक सात करोड़ रुपये वार्षिक तक पहुंचने का अनुमान है। पांच वर्षों में कुल 19.80 करोड़ रुपये की आय का लक्ष्य रखा गया है।

नागपाल के मुताबिक,  जमीन नगर निगम की है, जहां परियोजना में मियावाकी तकनीक के साथ फलदार, औषधीय और पुष्पीय पौधों की समन्वित खेती की जाएगी, ताकि आत्मनिर्भर इको-सिस्टम विकसित हो सके। तीसरे वर्ष से आम, अमरूद, पपीता, अनार जैसे फलदार वृक्षों के साथ अश्वगंधा, शतावरी, गिलोय, एलोवेरा जैसे औषधीय पौधे तथा गुलाब, चमेली और पारिजात के फूलों से राजस्व मिलना शुरू होगा।

सिंचाई के लिए 10 बोरवेल और 10,827 मीटर लंबा पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया गया है। 360 रेनगन स्प्रिंकलर सिस्टम से आधुनिक सिंचाई व्यवस्था की गई है। मार्च से जून की गर्मी में सप्ताह में तीन बार 45 मिनट का विशेष सिंचाई शेड्यूल तय किया गया है। इस वन में बांस, कचनार, महुआ, हरसिंगार सहित 27 प्रकार के देशी पेड़ लगाए गए हैं।

शीशम और अर्जुन को विशेष प्राथमिकता दी गई है, जो नदी किनारे और अस्थायी जलभराव की परिस्थितियों को सहन कर सकते हैं। साथ ही चार किलोमीटर लंबा पाथवे भी विकसित किया जा रहा है।

रेत, नहर और रिकॉर्ड

जिस स्थान पर प्रशासन ने गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने के लिए पौधरोपण कराया, वहां से कुछ ही दूरी पर साल 2021 की एक और कहानी दबी पड़ी है। यह कहानी है बालू की रेत पर खोदी गई उस नहर की, जिसे बड़े दावों और भारी भरकम बजट के साथ बनाया गया था। कहा गया था कि इससे गंगा घाटों पर पानी का दबाव कम होगा।

बिना किसी विशेषज्ञ समिति की स्पष्ट अनुशंसा के लगभग 11.95 करोड़ रुपये खर्च कर यह नहर खोदी गई। जून महीने में काम पूरा हुआ। कुछ ही हफ्तों बाद अगस्त में बारिश आई और उसी साल नहर पानी में डूब गई।

नहर की खुदाई के दौरान बनारस में इसे व्यंग्य में “मोदी नहर” कहा जाने लगा था। नाम में राजनीति थी और बहस भी। लेकिन जब नहर कुछ ही महीनों में रेत में समा गई तो लोगों के मन में सवाल और गहरे हो गए। करोड़ों रुपये खर्च हुए। मशीनें चलीं। बालू निकली। फिर सब कुछ जैसे मिट्टी में मिल गया। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। नहर के मटियामेट होने के बाद शुरू हुआ बालू का एक और खेल।

मई 2021 में करीब सात किलोमीटर लंबी नहर से निकली बालू को नौ अलग-अलग लॉट में दिखाकर टेंडर किया गया। इनमें से सात लॉट का बालू बेचने का ठेका अलॉट कर दिया गया। लेकिन उसी बीच गंगा में बाढ़ आई और कई लॉट बह गए। आरोप है कि इसके बाद खनन विभाग ने नदी पार की रेती पर बिना औपचारिक प्रक्रिया के मनमाने ढंग से खनन की छूट दे दी।

स्थानीय बताते है कि अवैध खनन करने वाली फर्मों ने गंगा की तलहटी तक से बालू खुरचकर निकाल ली। रात के अंधेरे में ट्रैक्टर और ट्रक चलते रहे। रेत की परतें हटती रहीं। नदी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता गया। यह भी आरोप है कि नहर से निकली बालू और बाद के खनन में कुछ लोगों ने लाखों और करोड़ों का फायदा उठाया।

गंगा किनारे खड़े डोमरी के शेखर ने ने कहा, “पहले नहर खोदी गई और वो रेत से भर गई। अब उसी इलाके में रिकॉर्ड बनाने के लिए पौधे लगाए गए हैं। आज उसी रेत पर पौधों की कतारें खड़ी हैं। कुछ ही दूरी पर कभी नहर थी, जो अब दिखाई नहीं देती। गंगा की धारा चुपचाप बह रही है। हमें समझ नहीं आता कि असली विकास क्या है?”

डोमरी और सूजाबाद का यह इलाका अब केवल एक विश्व रिकॉर्ड का स्थल नहीं है। यह उन प्रयोगों की जमीन भी है जहां करोड़ों रुपये की योजनाएं आती हैं, दावे किए जाते हैं, फिर प्रकृति अपनी चाल चलती है और सब कुछ बदल जाता है। रेत का यह विस्तार हर साल आकार बदलता है। गंगा का बहाव अपनी दिशा तय करता है।

रिकॉर्ड के पीछे छूटते खेतों की आवाज

डोमरी और सूजाबाद की जिन जमीनों पर विश्व रिकॉर्ड के नाम पर पौधरोपण कराया गया, उन जमीनों को लेकर अब नया विवाद खड़ा हो गया है। गांव के कई किसान दावा कर रहे हैं कि जिस बालू क्षेत्र को प्रशासन अपनी भूमि बता रहा है, वह दरअसल उनकी पुश्तैनी जमीन है। उनके अनुसार, पिछले साल अचानक कागजों में बदलाव हुआ और उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल कर दिया गया।

डोमरी के किसान संतोष पटेल हमें उस ओर ले जाते हैं जहां अब पौधों की कतारें दिखाई देती हैं। रेत के बीच खड़े होकर वे कहते हैं, “पौधरोपण के लिए हमारी काफी जमीनें जबरिया छीन ली गईं। जिन जगहों पर पौधे लगाए गए हैं वह अराजी नंबर 310/90 में है। पिछले साल तक खतौनी जारी होती थी। अचानक इसे रेत बता दिया गया और खतौनी से हमारा नाम काट दिया गया। हमें कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। बस कागज बदल गए और जमीन हमारी नहीं रही।”

उनकी आवाज में रोष है, लेकिन उससे ज्यादा आहत होने की टीस है। वे आगे कहते हैं, “कितनी अजीब बात है कि जिन जमीनों को प्रशासन अपना बता रहा है, उसी पर कई मठ और मंदिर खड़े हैं। उन्हें छुआ तक नहीं गया। कई इमारतें बिना नक्शे के कई मंजिल तक खड़ी हो गईं। अगर यह सरकारी जमीन है तो फिर वे निर्माण कैसे खड़े हैं?”

संतोष बताते हैं कि यह विवाद नया नहीं है। “साल 2007 में वन विभाग ने इसी जमीन को कछुआ सेंचुरी बताकर खतौनी से मठ-मंदिरों और किसानों का नाम काट दिया था। बाद में नाम दोबारा चढ़ा। करीब  डेढ़ दर्जन मठ-मंदिर उसी इलाके में हैं। कई के पास जमीन के पूरे अभिलेख तक नहीं हैं। सत्ता के बेहद करीबी एक बाबा का मठ भी यहीं है, जिस पर बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे के आरोप हैं, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई सिर्फ किसानों पर हुई।”

रेत के उस विस्तार में चलते हुए संतोष बार-बार जमीन की ओर इशारा करते हैं। वो कहते हैं कि यही उनकी फसल की जगह थी। यहीं उनके परिवार का सहारा था। अब उसी जगह पौधों की कतारें हैं और कागजों में मालिकाना हक बदल चुका है।

भारतीय किसान यूनियन से जुड़े दीपक कुमार से हमारी मुलाकात हुई। उनके पास फाइलों का ढेर थी और खतौनी की प्रतियां भी। उन्होंने पुराने दस्तावेज भी दिखाए।

कागजों को पलटते दीपक ने कहा, “हमारे साथ ही लालचंद, बिंद्रा लाल,  नागेंद्र,  महेंद्र,  मिठाई,  जवाहिर,  विक्रम,  शोबिंद,  धर्मेंद्र,  जितेंद्र, लालचंद समेत करीब 65 किसानों की जमीनें जबरदस्ती ले ली गईं। पुलिस फोर्स की मौजूदगी में जमीन खाली कराई गई। हमें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। कुछ लोगों को बदले में जमीन दी गई है, लेकिन वह भी दूसरे किसानों की जमीन है। यह विवाद और बढ़ेगा।”

दीपक की आवाज में दृढ़ता है। वे आगे कहते हैं, ”हमने संयुक्त रूप से हाईकोर्ट में मुकदमा दाखिल किया है। यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं है, यह हमारे हक का मामला है। देखिएगा, एक दिन हम अपनी जमीन सरकार से वापस लेकर रहेंगे।”

डोमरी गांव में इस मुद्दे पर गहरी बेचैनी है। एक ओर विश्व रिकॉर्ड का जश्न है, दूसरी ओर किसानों का दावा है कि उनकी जमीन बिना सहमति के ले ली गई। कई परिवारों का कहना है कि अचानक कागजों में बदलाव हुआ और उन्हें सूचना भी सही ढंग से नहीं दी गई। गंगा किनारे की यह रेत अब केवल पर्यावरण और रिकॉर्ड की कहानी नहीं कहती। यह उन किसानों की भी कहानी कहती है जो अपने खेतों को अपनी पहचान मानते हैं। जिनके लिए जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं, जीवन है।

वरिष्ठ पत्रकार विनय मौर्य कहते हैं कि डोमरी में उसी जमीन पर रिकार्डधारी पौधे खड़े किए गए हैं, जिन पर किसानों का अपना दावा है। हालांकि कागजों में नाम बदल चुके हैं। मामला अदालत में है और गांव के लोग इंतजार में हैं, कि सच किसके पक्ष में खड़ा होगा। रेत की यह धरती हर साल अपना आकार बदलती है।

लेकिन इस बार जो बदला है, वह सिर्फ भूगोल नहीं है। यहां विश्वास भी बदला है और सवाल अब भी हवा में तैर रहे हैं कि क्या रिकॉर्ड के लिए दर्ज हुई यह जमीन कभी फिर अपने पुराने मालिकों के नाम लौटेगी? अगर जमीनें सचमुच सरकार की थीं, तो मठों और मदिरों को क्यों छोड़ दिया गया? उनकी इमारतों पर बुल्डोजर क्यों नहीं चलाए गए? 

डोमरी को आखिर क्या मिला?

साल 2018 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत नागेपुर और ककहरिया के बाद डोमरी को गोद लेने की घोषणा की, तब इस गांव में उम्मीद की एक लहर दौड़ गई थी। लगा था कि अब डोमरी की किस्मत बदलेगी। सरकारी गाड़ियां आने लगीं। अफसर हालचाल पूछने लगे। योजनाओं की सूची बनी। कागजों पर खाके तैयार हुए।

लेकिन कुछ शुरुआती हलचलों के बाद सब कुछ जैसे ठहर गया। भ्रष्टाचार और लापरवाही के बीच सरकारी योजनाएं धीरे-धीरे अपनी धार खोती गईं। आज हाल यह है कि डोमरी में विकास के नाम पर ठोस बदलाव ढूंढ पाना कठिन हो गया है।

वाराणसी जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर बसे इस गांव का क्षेत्रफल लगभग 486 हेक्टेयर है, जिसमें मात्र 50 हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है। करीब साढ़े सात सौ परिवारों के लगभग पांच हजार लोग यहां रहते हैं। इनमें सौ के आसपास किसान परिवार हैं। सरकारी दस्तावेजों में डोमरी को आदर्श गांव बताया जाता है, पर जमीनी सच्चाई अलग कहानी कहती है।

पटेल, राजभर, मल्लाह और दलित समुदाय की बड़ी आबादी रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझी हुई है। तंग गलियां, टूटी सड़कें और अधूरी सुविधाएं इस गांव की पहचान बन चुकी हैं।

बनारस और चंदौली की सीमा पर बना राजघाट पुल हर दिन लाखों लोगों को जोड़ता है। यह वही पुल है जो ब्रिटिश काल में बना था, जिसके ऊपर सड़क है और नीचे रेल की पटरी। हजारों गाड़ियां और कई ट्रेनें रोज इससे गुजरती हैं। पूर्वांचल में ऐसा पुल आज भी विरला है। पुल से गुजरने वाले लोग डोमरी की ओर देखते हैं, पर शायद ही कोई उस नजर को समझ पाता है जो डोमरी के लोग आने-जाने वालों को देखते हुए डालते हैं। उनमें उम्मीद भी है और एक अजीब सी प्रतीक्षा भी।

पुल से झांकते ही आसमानी रंग की एक पानी की टंकी दिखती है। उसके नीचे बदहाल सड़क है। सड़क के किनारे झुग्गी-झोपड़ियां हैं जहां लोग कठिन जीवन जी रहे हैं। गांव के भीतर जाएं तो तस्वीर और भी निराश करती है। कभी यह मठिया न्याय पंचायत का हिस्सा था। 1978 की भीषण बाढ़ में भी गांव सुरक्षित रहा था। तब पानी गांव में दाखिल नहीं हो पाया था। वक्त बदला। सरकारें बदलीं। लेकिन डोमरी की नियति नहीं बदली।

करीब एक दशक पहले यहां प्लाटिंग का खेल शुरू हुआ। कोलोनाइजर आए। सस्ती जमीनों के दाम आसमान छूने लगे। पांच हजार रुपये प्रति बिस्वा बिकने वाली जमीन 40 से 50 लाख तक पहुंच गई। पश्चिम में गंगा का विस्तृत रेत क्षेत्र है। नदी के किनारे कई जगहों पर सरकारी जमीन घेरकर मठ और मंदिर खड़े कर दिए गए। वाराणसी विकास प्राधिकरण की आंखों के सामने ये निर्माण बढ़ते रहे।

गांव में तालाबनुमा गड्ढों के पास नई और पुरानी इमारतें खड़ी हैं जो बारिश में ताल-तलैया में बदल जाती हैं। दक्षिणी छोर पर अधूरा हेलीपैड है जिसका काम बीच में ही रुक गया।

वादों की रोशनीहकीकत का अंधेरा

सेवालाल यादव के चेहरे पर निराशा साफ झलकती है। वे कहते हैं, “जब डोमरी को गोद लिया गया तो लगा कि हमारी किस्मत बदल जाएगी। अफसर रोज घर आते थे। हालचाल पूछते थे। सबको भरोसा था कि अब डोमरी चमकेगा। लेकिन साल बीत गए। अब न गाड़ियां आती हैं, न कोई पूछने वाला है। हमने भरोसा किया। अब उसी भरोसे का बोझ ढो रहे हैं।”

गांव के अन्य लोग भी इसी तरह की बात करते हैं। उनका कहना है कि 2018 में खूब प्रचार हुआ कि डोमरी शहर की तरह चमकेगा। पर आज भी यहां न ट्यूबवेल है, न सिंचाई की ठोस व्यवस्था। टूटी सड़कें, कच्ची पगडंडियां और उखड़े खड़ंजे रोज की परेशानी हैं। हैंडपंप जर्जर हैं। पावरलूम और पंखे की जाली के छोटे कारखाने दम तोड़ रहे हैं। रसोई गैस के सिलेंडर खाली पड़े रहते हैं। बिजली कटौती आम बात है। हर सुबह मजदूरी की तलाश में निकलने वाले लोगों के चेहरे पर थकान और अनिश्चितता साफ दिखाई देती है।

गंगा किनारे बच्चे बकरियां और गाय-भैंस चराते हैं। महिलाएं उपले बनाती हैं। गांव की कई महिलाएं रुद्राक्ष की माला गूंथती हैं या बिंद बनाने का काम करती हैं। कुछ पुरुष हथकरघे पर साड़ियां बुनते हैं। कभी पंखे की जाली बनाने का काम यहां कुटीर उद्योग की तरह चलता था। अब वह लगभग बंद हो चुका है। राम किशुन कहते हैं, “चाइना मेड पंखों ने हमारा कारोबार खत्म कर दिया। जाली का काम ठप है। हथकरघा भी दम तोड़ रहा है। हमारे पास हुनर है, पर बाजार नहीं। समझ नहीं आता कि हम किस गारंटी पर भरोसा करें।”

संतोष पटेल का दर्द अलग है। वे कहते हैं, “खेती लायक जमीनें भूमाफिया ले गए। जो बची है उसमें छुट्टा पशुओं का आतंक है। नालियां नहीं हैं। बारिश में पानी घर में घुस जाता है। बीमारी फैलने का डर बना रहता है। हमने कई बार लिखकर दिया। अधिकारी आए, देखकर चले गए। कोई सुनवाई नहीं।”

उनके साथ बैठे कई लोग सिर हिलाते हैं। गांव भर का गंदा पानी सड़कों पर बहता है। सीवर की कोई ठोस व्यवस्था नहीं। बिजली के खंभे जरूर खड़े हैं, पर रोशनी अनियमित है। 

डोमरी आज भी उम्मीद और हकीकत के बीच झूल रहा है। कागजों में यह आदर्श गांव है। जमीन पर यह संघर्षरत गांव है। यहां के लोग अब बड़े वादों पर उतना भरोसा नहीं करते। वे छोटे बदलाव चाहते हैं। पक्की सड़क। साफ नाली। सिंचाई का साधन। रोजगार का अवसर। डोमरी को आखिर क्या मिला? यह सवाल गांव की गलियों में गूंजता है। जवाब कहीं अधूरा सा है। उम्मीद अब भी पूरी तरह मरी नहीं है, लेकिन वह थक जरूर गई है।

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)

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