मैले हो जाते हैं रिश्ते भी, लिबासों की तरह
दोस्ती हर दिन की मेहनत है, चलो यूं ही सही।
लिबासों को मैला होते तो हम रोज देखते हैं, रिश्तों पर मैल बैठते प्रायः नहीं देख पाते। उस तरफ से अनजान रहते हैं। ध्यान तब जाता है जब मैला होते-होते रिश्ता ही बैठने लगता है। इसी का निदान निदा फाजली साहब अपनी इन पंक्तियों में दोस्ती को बताते हैं, लेकिन इस हिदायत के साथ कि यह हर दिन की मेहनत है।
ऐसा नहीं कि किसी एक दिन बेटे का रिजल्ट खराब हुआ या वह नशे में घर लौटा या मनचाही शादी के लिए अड़ा या आईआईटी के बजाय थिएटर को करियर बनाने की ठानी तो पिताजी झट से उसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दें कि ‘बेटा चलो हम-तुम दोस्त बनते हैं, तुम सब कुछ शेयर करो मेरे साथ।’ ऐसी इन्स्टैंट दोस्ती काम नहीं आती। उसे वक्त लगता है फलित होने में।
लेकिन सवाल तो यह है कि आखिर दोस्ती में ऐसा क्या है जो हर रिश्ते की चमक बढ़ा देता है? रिश्ते, दरअसल समाज की पारंपरिक संरचना के अंदर पैदा होने और फलते-फूलते रहने वाली चीज हैं। सो, एक तरह का सुरक्षाबोध इसका अहम हिस्सा होता है। पर यही सुरक्षाबोध रिश्तों का बोझ भी बन जाता है।
तकरीबन हर रिश्ते के साथ कर्तव्यों की एक अघोषित-अदृश्य फेहरिस्त भी जुड़ी होती है। ये कर्तव्य रिश्तों में अपेक्षाओं का कारण बनते हैं। और अपेक्षाएं धीरे-धीरे बढ़ते-बढते कब रिश्ते का दम घोटने लगती हैं, पता भी नहीं चलता।
दोस्ती बड़ी आसानी से इस प्रक्रिया को रोक देती है। सबसे बड़ी वजह इसकी यह है कि दोस्ती की उत्पत्ति अलग होती है। रिश्ते अमूमन हमें बिना किसी मेहनत के मिल जाते हैं। कुछ रिश्ते जन्म के साथ ही बन जाते हैं, बाकी शादी करने पर। लेकिन दोस्ती हमेशा हमारा चयन होती है। यह समाज के बने-बनाए ढांचे से अलग नए परिवेश में बनती और फलती-फूलती है। इसके साथ अपेक्षाओं का बोझ नहीं होता, इसे जबरन बनाए रखने की मजबूरी नहीं होती।
और हां, बराबरी की भावना इसका अहम हिस्सा होती है। लोकतांत्रिक स्पिरिट तो इसके होने की शर्त ही होती है। अब ये सारी बातें जिस रिश्ते में आ जाएं, उसका ताजगी से भर उठना लाजिमी है।
बस एक बात याद रखने की जरूरत है।
दोस्ती दोस्ती होती है अगर वह सामान्य इंसानों के बीच हो। दोस्ती जहर होती है अगर वह तानाशाहों के बीच हो। तानाशाह मजबूर होते हैं वर्चस्व कायम रखने की अपनी आदत से। वे दोस्ती में भी अपने को ऊपर और दोस्त को अपनी जूती के नीचे रखने की इच्छा से निर्देशित होते रहते हैं। सो कितना भी माइ फ्रेंड, माइ फ्रेंड करें, आखिरकार दोस्त को जलील करते हैं, खुद जलील होते हैं और दोस्ती को जिल्लत में तब्दील कर देते हैं। ऐसी दोस्ती, ऐसों की दोस्ती से खुदा बचाए, लेकिन हर रिश्ते को दोस्ती अता फरमाए।
(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)