किसी व्यक्ति का भविष्य हो या फिर किसी देश के भविष्य की ही बात क्यों न हो इसका पूर्वानुमान तो लगाया जा सकता है लेकिन दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। कभी-कभी वर्तमान की बदलती तस्वीर से आगे के भविष्य की कहानी लिखी तो जाती है लेकिन भविष्य वैसा ही हो इसका दावा तो नहीं किया जा सकता। अभी नेपाल में जो कुछ भी राजनीतिक रूप से वहां के लोगों ने और खासकर युवाओं ने फैसला लिया है और बालेन शाह जैसे युवा व्यक्ति पर चुनावी दाव लगाकर उन्हें जीत दिलाई है उससे अभी यही कहा जा सकता है कि दुनिया की बदलती राजनीति के संग नेपाल भी बढ़ता दिख रहा है।
अब बालेन शाह की पार्टी और खुद उनका नेतृत्व नेपाल को कितना और कैसे आगे बढ़ाते हैं और नेपाल को अपने पैरों पर खड़ा करते हैं वह तो वक्त ही बताएगा लेकिन एक बात साफ़ हो गई है कि जब किसी भी देश की युवा शक्ति सड़कों पर उतर कर सत्ता सरकार के खिलाफ खड़ी होती है तो बड़ा बदलाव आता है।
दुनिया के कई देशों में पिछले एक दशक में बहुत कुछ ऐसा हुआ है और हालिया नेपाल की घटना ने बता दिया है कि युवा शक्ति जिसे आज की दौर में जेन जी कहा जा रहा है, जिसे सिर्फ अपने अपने देश के भविष्य की चिंता है वह कुछ भी करने को तैयार है।
नेपाल के चुनाव में बहुत कुछ बदल गया है। चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि नेपाली युवाओं ने पुराने लोगों को न सिर्फ राजनीति से बाहर कर दिया बल्कि पुरानी पार्टियों को भी सबक सिखा दिया है।
नेपाली युवाओं ने इस बार के चुनाव में क्षेत्रीयता को ताक पर रखकर न सिर्फ नेपाल के कल्याण के लिए एक युवा नेता बालेन शाह को आगे बढ़ाया है बल्कि युवाओं को यह भी उम्मीद है कि 36 वर्षीय बालेन शाह न सिर्फ नेपाल की अस्मिता को कायम रखते हुए वहां विकास की गंगा बहाएंगे बल्कि युवाओं को आगे बढ़ाने के साथ ही भर्ष्टाचार पर भी लगाम लगाएंगे।
युवाओं ने अपना काम तो कर दिया। अब बारी बालेन शाह और उनकी पार्टी के नेताओं की है कि वे नेपाल के युवाओं का मान कितना रखते हैं।
नेपाल की राजनीति लंबे समय तक पारंपरिक नेताओं और स्थापित दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसा चेहरा उभरा है जिसने इस परंपरा को चुनौती दी है। यह चेहरा है बालेन शाह का, जो कभी नेपाली रैप संगीत की दुनिया में लोकप्रिय थे और आज देश की राजनीति में नई पीढ़ी के प्रतीक बनकर उभरे हैं।
मैथिली भाषा में अपने चुनाव अभियान की शुरुआत कर उन्होंने न केवल राजनीतिक संदेश दिया बल्कि नेपाल की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को भी केंद्र में ला दिया। बालेन शाह ने अपने प्रधानमंत्री पद के चुनाव अभियान की शुरुआत जनकपुर से की, जो मधेस प्रांत की राजधानी और सीता की जन्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है।
उन्होंने भाषण की शुरुआत मैथिली में करते हुए कहा—“सर्वप्रथम माता जानकी के प्रणाम।” शाह का अंदाज पूरे नेपाल को खूब भाया। सीता पूरे नेपाल में पूजी जाती है और नेपाली समाज को यह लगा कि यह पहला नेता है जो क्षेत्रीयता की बात नहीं करता। मधेशी होकर भी पूरे नेपाल की बात करता है और फिर नेपाल की बजबजाती राजनीति से नेपाल को बाहर लाने की वकालत भी करता है।
नेपाल के राजनीतिक इतिहास में यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर के नेता आमतौर पर नेपाली भाषा में ही अपने अभियान की शुरुआत करते रहे हैं। मैथिली नेपाल की दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और यह बिहार तथा झारखंड के मिथिला क्षेत्र से गहरे सांस्कृतिक संबंध रखती है। इस तरह बालेन शाह ने संकेत दिया कि उनकी राजनीति केवल सत्ता की राजनीति नहीं बल्कि पहचान और प्रतिनिधित्व की राजनीति भी है।
बालेन शाह की पहचान शुरुआत में एक रैपर और संगीतकार के रूप में बनी है । नेपाली हिप-हॉप की दुनिया में उनका नाम काफी लोकप्रिय रहा है। उनके गानों में अक्सर सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार और राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना दिखाई देती थी। यही वजह है कि युवाओं के बीच उनकी छवि एक ऐसे व्यक्ति की बनी जो व्यवस्था से सवाल पूछता है। बाद में जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया, तो वही छवि उनके लिए राजनीतिक पूंजी बन गई।
उनकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह भी है कि वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं और युवाओं से सीधे संवाद करते हैं। इस कारण उन्हें अक्सर नेपाल की जनरेशन जेड का पसंदीदा नेता कहा जाता है।
बालेन शाह का राजनीतिक करियर तब चर्चा में आया जब उन्होंने काठमांडू महानगरपालिका के मेयर का चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में जीत लिया। उस चुनाव में उन्होंने नेपाल की बड़ी पार्टियों—कम्युनिस्ट और नेपाली कांग्रेस—दोनों को पीछे छोड़ दिया था। मेयर बनने के बाद उन्होंने राजधानी में कई प्रशासनिक और शहरी सुधारों की पहल की।
अवैध निर्माणों पर कार्रवाई, सार्वजनिक स्थानों को खाली कराना और शहर प्रबंधन में तकनीक के उपयोग जैसे कदमों ने उन्हें एक सख्त और सक्रिय प्रशासक की छवि दी।इसी अनुभव ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया।
27 अप्रैल 1990 को काठमांडू के नारादेवी में जन्मे बालेन शाह अभी केवल 36 वर्ष के हैं। नेपाल की राजनीति में यह उम्र काफी कम मानी जाती है, क्योंकि देश का नेतृत्व लंबे समय तक 60–70 वर्ष के नेताओं के हाथ में रहा है। यही कारण है कि उनका उभार नेपाल में एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत माना जा रहा है। युवा मतदाता, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों से निराश रहे हैं, बालेन शाह में एक नया विकल्प देखते हैं।
हालांकि बालेन शाह का पालन-पोषण काठमांडू में हुआ, लेकिन उनके परिवार की जड़ें मधेस प्रांत के महोत्तरी जिले में हैं। वे मधेसी समुदाय से आते हैं, जो नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाला एक बड़ा सामाजिक समूह है। मधेसी समुदाय की भाषा, संस्कृति और सामाजिक संबंध भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश से काफी हद तक जुड़े हुए हैं। नेपाल की आबादी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इस क्षेत्र में रहता है, लेकिन लंबे समय तक इस समुदाय ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी की शिकायत की है।
बालेन शाह की राजनीति का मुख्य आधार सुशासन, पारदर्शिता और युवाओं की भागीदारी है। वे तकनीक आधारित प्रशासन, भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम और स्थानीय स्तर पर विकास को प्राथमिकता देने की बात करते हैं। उनकी शैली पारंपरिक नेताओं से अलग है। वे बड़े राजनीतिक नारों के बजाय प्रशासनिक सुधार और व्यावहारिक बदलाव पर जोर देते हैं।
अब जब इनकी पार्टी की बड़ी जीत हुई है और संभवतः शाह प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं तब यह देखना बाकी होगा कि सत्ता में आने के बाद उनकी नियत बदलती है या फिर युवाओं की सोच के साथ ही आगे बढ़ती है।
पिछले एक दशक में दुनिया की राजनीति, संस्कृति और सामाजिक आंदोलनों में जेन जेड (1997–2012 के बीच जन्मी पीढ़ी) का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों में यह असर और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और वैश्विक संपर्क ने इस पीढ़ी को पारंपरिक राजनीति से अलग सोचने और नए नेतृत्व को स्वीकार करने की क्षमता दी है।
दक्षिण एशिया—जिसमें भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देश आते हैं—दुनिया के सबसे युवा क्षेत्रों में से एक है। यहां बड़ी संख्या में मतदाता 35 वर्ष से कम आयु के हैं। जेन जेड की सबसे बड़ी ताकत डिजिटल प्लेटफॉर्म है। यह पीढ़ी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी राय व्यक्त करती है, राजनीतिक अभियानों में भाग लेती है और कई बार आंदोलन खड़े कर देती है।
भारत में युवाओं की भूमिका चुनावी राजनीति में लगातार बढ़ रही है। छात्र आंदोलनों, ऑनलाइन अभियानों और नए राजनीतिक नैरेटिव में जेन जेड की भागीदारी साफ दिखाई देती है। बांग्लादेश में भी छात्र और युवा समूह कई बार राजनीतिक सुधार और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए सड़क पर उतरे हैं। श्रीलंका में 2022 के आर्थिक संकट के दौरान हुए बड़े जनांदोलन में युवाओं और जेन जेड की भूमिका निर्णायक थी।
उस आंदोलन ने तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को सत्ता छोड़ने पर मजबूर कर दिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि दक्षिण एशिया में जेन जेड केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि वह राजनीतिक बदलाव की वास्तविक ताकत बन रही है
मध्य-पूर्व में भी युवाओं का प्रभाव पिछले दशक में तेजी से बढ़ा है। 2011 के अरब स्प्रिंग को अक्सर युवा और डिजिटल पीढ़ी का आंदोलन माना जाता है। हालांकि कई देशों में राजनीतिक व्यवस्थाएं अभी भी कठोर हैं, फिर भी जेन जेड ने कई स्तरों पर बदलाव की मांग को जीवित रखा है।
ईरान में महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता को लेकर हुए आंदोलनों में बड़ी संख्या में युवा शामिल रहे। लेबनान और इराक में भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में भी युवा नेतृत्व सामने आया।सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों में युवा पीढ़ी सामाजिक और आर्थिक सुधारों की मांग कर रही है, हालांकि वहां बदलाव अधिकतर सरकार की पहल से हो रहा है।
दक्षिण एशिया में जेन जेड के राजनीतिक प्रभाव का सबसे दिलचस्प उदाहरण नेपाल है। यहां लंबे समय तक राजनीति पारंपरिक दलों और बुजुर्ग नेताओं के हाथ में रही—जैसे नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में युवाओं के बीच इन दलों के प्रति असंतोष बढ़ा है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और धीमे विकास के कारण युवा नए विकल्प तलाशने लगे। इसी पृष्ठभूमि में बालेन शाह जैसे नेता उभरे।
जेन जेड की राजनीति पारंपरिक विचारधाराओं से अलग है। यह पीढ़ी अक्सर व्यावहारिक मुद्दों पर ध्यान देती है—जैसे रोजगार, शिक्षा, तकनीक और प्रशासनिक सुधार। इसके साथ ही यह पीढ़ी पहचान की राजनीति को भी नए तरीके से देखती है—जैसे भाषा, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक समानता के सवाल।
नेपाल में बालेन शाह का उभार इस व्यापक बदलाव का प्रतीक है। यह दिखाता है कि युवा मतदाता अब केवल पारंपरिक नेताओं पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि वे ऐसे नेताओं को आगे लाना चाहते हैं जो उनकी आकांक्षाओं और समस्याओं को समझ सकें। आने वाले वर्षों में संभव है कि दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व की राजनीति में जेन जेड का प्रभाव और भी मजबूत हो, जिससे नई राजनीतिक संस्कृति और नए नेतृत्व का उदय होगा।
(अखिलेश अखिल पत्रकार व राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)