हमारे देश में राष्ट्रपति के पद पर आमतौर पर सरकार की पसंद का या सरकारी पार्टी से जुड़ा व्यक्ति ही चुना जाता है लेकिन चुने जाने के बाद उससे अपेक्षा की जाती है कि वह दलीय राजनीति और सरकार के रोजमर्रा के कामकाज से अपने को सर्वथा दूर रखेगा। यह संविधान सम्मत अपेक्षा है, जिसके पूरा होने से इस सर्वोच्च पद की और उस पर बैठने वाले व्यक्ति की गरिमा बढ़ती है।
हालांकि आमतौर पर राष्ट्रपति की तटस्थता का पलड़ा उस पार्टी या सरकार और उसकी विचारधारा की ओर ही झुका रहता है, जो उसे इस पद पर पहुंचाती है। फिर भी राष्ट्रपति को दलगत राजनीति से परे रखा जाए और उन्हें लेकर किसी तरह का विवाद न हो, यह देखने का काम उनके सचिवालय और केंद्र सरकार का होता है। खुद राष्ट्रपति को तो इस बारे में सचेत रहना ही चाहिए लेकिन पिछले करीब एक दशक से ऐसा बिल्कुल नहीं हो रहा है।
राष्ट्रपति को देश का अभिभावक और संविधान का संरक्षक माना जाता है लेकिन हमारे यहां फखरुद्दीन अली अहमद, प्रतिभा पाटिल, प्रणब मुखर्जी, रामनाथ कोविंद आदि ने तो राष्ट्रपति पद पर रहते हुए ज्यादातर समय सरकार के अभिभावक और संरक्षक की भूमिका ही निभाई है। मौजूदा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी अपने इन्हीं पूर्ववर्तियों की श्रेणी में शुमार की जाएंगी। कई मामलों में तो वे अपने इन पूर्ववर्तियों से भी आगे निकल चुकी हैं।
राष्ट्रपति पद के चुनाव में द्रौपदी मुर्मू बेशक भारतीय जनता पार्टी और उसके गठबंधन की उम्मीदवार थीं। उससे इससे पहले भाजपा की केंद्र सरकार ने ही उन्हें राज्यपाल भी बनाया था और उससे भी पहले वे लंबे समय तक भाजपा के माध्यम से राजनीति में सक्रिय रही थीं। ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार में वे भाजपा की ओर से मंत्री भी रहीं।
लेकिन उनके राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनसे स्वाभाविक अपेक्षा थी कि वे अपनी दलीय और वैचारिक निष्ठा को परे रखते हुए संवैधानिक मर्यादा के मुताबिक अपनी भूमिका निभाएंगी। मगर अफसोस कि वे एक भी मौके पर ऐसा नहीं कर सकीं।
भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू ने अपने कार्यकाल का तीन चौथाई समय यानी पौने चार साल पूरे कर लिए है। अगले साल यानी 2027 में 25 जुलाई को उनका पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा हो जाएगा। राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल वैसे तो कई बातों के लिए याद किया जाएगा और उसकी अलग-अलग व्याख्याएं भी होंगी, लेकिन उनके कार्यकाल को सबसे ज्यादा इस बात के लिए याद किया जाएगा कि उन्होंने राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी की नेता की तरह ही बर्ताव किया है।
इस सिलसिले में उनकी हाल ही की पश्चिम बंगाल यात्रा का जिक्र खास तौर पर किया जाएगा।
पश्चिम बंगाल की अपनी इस यात्रा को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बहुत खिन्न हैं। उन्हें इस बात का मलाल है कि उनकी पश्चिम बंगाल यात्रा के दौरान प्रोटोकॉल संबंधी कई खामियां रहीं और जिस अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में वे मुख्य अतिथि थीं, उसके आयोजन के लिए राज्य सरकार ने उचित जगह उपलब्ध नहीं कराई। इस बात को लेकर उनसे भी ज्यादा हास्यास्पद अफसोस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को है।
उन्होंने भी तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार पर राष्ट्रपति को अपमानित करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि राष्ट्रपति के साथ जो व्यवहार हुआ वह शर्मनाक और अभूतपूर्व है।
प्रधानमंत्री मोदी का अफसोस हास्यास्पद इसलिए है कि पिछले 10-12 वर्षों के दौरान राष्ट्रपति पद का जितना अपमान या उसकी गरिमा का जितना हनन खुद मोदी ने किया है, उतना किसी और प्रधानमंत्री ने नहीं किया। कभी कभार किसी ने किया भी होगा तो अनजाने में, लेकिन मोदी ने तो सुनियोजित तरीके से किया है।
अयोध्या में बने राम मंदिर का शिलान्यास और उद्घाटन खुद मोदी ने किया लेकिन राष्ट्रपति को उन आयोजनों से दूर रखा, क्योंकि शिलान्यास के वक्त रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति थे जो कि दलित समुदाय से आते हैं और उद्घाटन के समय द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति थी जो कि आदिवासी समुदाय से आती हैं। वैसे आदर्श स्थिति तो यही होती कि खुद प्रधानमंत्री भी राम मंदिर के शिलान्यास और उद्घाटन से अपने को दूर रखते।
संसद के दोनों सदनों के साथ ही राष्ट्रपति भी संसद का प्रमुख अंग होता है। लेकिन नए संसद भवन का शिलान्यास और उद्घाटन भी धार्मिक कर्मकांड के साथ खुद प्रधानमंत्री मोदी ने किया और इन दोनों आयोजनों से राष्ट्रपति को दूर रखा गया। वजह वही रही, राष्ट्रपति का दलित और आदिवासी होना। इसके अलावा विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के आगमन पर उनके स्वागत के मौकों पर भी प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के साथ कई बार दोयम दर्जे का व्यवहार किया।
असल में प्रधानमंत्री मोदी पिछले दस सालों से राष्ट्रपति को भी अपनी राजनीति के शुभंकर की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। जब कोई उनके ऐसा करने पर सवाल उठाता है तो वे कभी दलित राष्ट्रपति का अपमान तो कभी आदिवासी राष्ट्रपति के अपमान का शोर मचाने लगते हैं, जिसमें उनके प्रचार तंत्र का हिस्सा बन चुका मीडिया भी बढ़-चढ़ कर उनका साथ देता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की पश्चिम बंगाल यात्रा के दौरान जो विवाद हुआ है उसे टाला जा सकता था। मगर ऐसा लगता है कि विवाद पैदा करने के लिए ही राष्ट्रपति की यह यात्रा आयोजित की गई थी। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा से एक हफ्ते पहले राष्ट्रपति का एक जातीय सम्मेलन में जाना, चाहे वह कितना भी बड़ा और महत्वपूर्ण सम्मेलन क्यों न हो, कोई उचित फैसला नहीं था।
राष्ट्रपति संथाल समुदाय से आती हैं और संथाल समुदाय के किसी कार्यक्रम में उनके शामिल होने पर कोई सवाल नहीं उठा सकता लेकिन यह सिर्फ संयोग नहीं था कि अंतरराष्ट्रीय संथाल परिषद का नौवां सम्मेलन पश्चिम बंगाल में हो रहा था और वह भी चुनाव से ठीक पहले। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में सात फीसदी के करीब आदिवासी वोट हैं, जिनमें सबसे ज्यादा संथाल हैं।
हालांकि इस मामले में गलती ममता बनर्जी की ओर से भी हुई। यह जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति के स्वागत के लिए मुख्यमंत्री ही मौजूद रहे लेकिन राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल और स्थापित परंपरा के लिहाज से उन्हें अपने किसी वरिष्ठ मंत्री को राष्ट्रपति के स्वागत के लिए तैनात करना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके अलावा कार्यक्रम की जगह बदलने का भी कोई औचित्य नहीं था।
लेकिन जब ममता बनर्जी ने यह भांप लिया कि चुनाव से ऐन पहले बंगाल में इस सम्मेलन को आयोजित करने का मकसद पूरी तरह राजनीतिक है तो फिर उन्होंने जो कुछ भी किया उस राजनीति के लिहाज से ही किया।
इस सम्मेलन को लेकर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि पिछले 16 साल से यह सम्मेलन नहीं हुआ था। उससे पहले जब 1980 के दशक में अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन की शुरुआत हुई तो हर चार या पांच साल पर यह आयोजन होता था। अगर सिर्फ इस सदी की बात करें तो 2003, 2007 और 2010 में संथाल सम्मेलन हुआ लेकिन उसके बाद यह आयोजन बंद हो गया था।
अब पश्चिम बंगाल में चुनाव से ऐन पहले ही संथाल सम्मेलन रखा गया तो निश्चित रूप से राष्ट्रपति को और उनके सचिवालय को यह सोचना चाहिए था कि इस आयोजन का कोई राजनीतिक अर्थ निकाला जा सकता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वही अर्थ निकाला भी और वे राष्ट्रपति की अगवानी करने नहीं पहुंचीं।
फिर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने जिस तरह की प्रतिक्रिया जताई, उसका भी उन्होंने उसी तल्ख अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रपति का इस्तेमाल कर रही है।
राष्ट्रपति द्वारा जताई गई प्रतिक्रिया पर भी उन्होंने तीखी टिप्पणी करते कहा, ”जब मणिपुर में आदिवासी महिलाओं को नंगा करके सड़कों पर घुमाया जा रहा था और जब मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को डंडे के बल पर उनके जल, जंगल, जमीन से बेदखल किया जा रहा था तब राष्ट्रपति क्यों नहीं कुछ बोल थीं?’’ उन्होंने राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए दो टूक कहा, ”आपके लिए भाजपा प्राथमिकता है लेकिन मेरी प्राथमिकता मेरे राज्य के लोग हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से काटे जाने के खिलाफ मैं संघर्ष कर रही हूं।’’
वैसे यह कोई पहला मौका नहीं था कि राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर गई हों और वहां के मुख्यमंत्री ने उनकी अगवानी नहीं की। पिछले महीने ही 13 फरवरी को राष्ट्रपति प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी संस्थान के ओम शांति रिट्रीट सेंटर के रजत जयंती समारोह का उद्घाटन करने हरियाणा के गुरुग्राम गई थीं, तब राज्य के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी उनकी अगवानी करने नहीं पहुंचे थे।
इसी सेंटर में वे तीन साल पहले 9 फरवरी 2023 को भी एक कार्यक्रम में गई थीं तब भी हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर वहां नहीं आए थे। इसी तरह 4 अक्टूबर, 2024 को वे माउंट आबू में वे प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्बारा आयोजित एक अंतररराष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल होने गई थी तब वहां भी राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा मौजूद नहीं थे।
लेकिन इनमें किसी मौके पर राष्ट्रपति ने मुख्यमंत्री की गैर मौजूदगी पर सवाल नहीं उठाया था। इसलिए अभी वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पर सवाल उठा रही हैं तो जाहिर है कि उसे राजनीतिक नजरिये से ही देखा जाएगा।
दरअसल राष्ट्रपति की हाल की बंगाल यात्रा को लेकर जो विवाद पैदा हुआ है, उसके लिए मूल रूप से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार ही जिम्मेदार है।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई राज्यपालों ने अपने पद की गरिमा और संवैधानिक मर्यादा को ठेंगा दिखाते हुए भाजपा नेताओं की तरह बर्ताव किया है। यहां तक कि कुछ राज्यपालों ने तो भाजपा के लिए चुनाव प्रचार तक करने से परहेज नहीं किया है। तो अभी तक प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की शह पर जो काम राज्यपाल करते आ रहे थे वैसे ही काम में अब राष्ट्रपति को भी झोंक दिया है। द्रौपदी मुर्मू से पहले राष्ट्रपति रहे रामनाथ कोविंद का भी सरकार ने खूब राजनीतिक इस्तेमाल किया था।
(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)