आज जिस तरह संपूर्ण जगत में पूंजीवादी और सामंतवादी अराजकता बढ़ती जा रही है। राजशाही और धार्मिकता वाली ताकतों की पुनरावृत्ति का ज़ोर है।ऐसे काले समय में भगत सिंह की याद आना स्वाभाविक है।
जिन्हें हम शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के नाम से जानते हैं वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के विचारक और दूरदर्शी क्रांतिकारी थे, जो समग्र जगत कल्याण का ख़्वाब रखते थे।वे इस तरह के इंकलाब लाना चाहते जिसका मकसद सिर्फ़ राजनैतिक आज़ादी पाना नहीं था।बल्कि विश्व में समाजवादी सोच विकसित कर समतावादी विश्व का निर्माण था।
उन्होंने इसलिए अपनी मौत से पहले इसका पूरा खाका तैयार कर लिया था। उन्होंने सारी दुनियां में व्याप्त शोषण के विभिन्न रुपों को भली-भांति जान लिया था इसलिए उनका पहला लक्ष्य इस दिशा में, एक ऐसे शोषण-मुक्त समाज (सोशलिस्ट रिपब्लिक) का निर्माण करना था, जहाँ समानता, न्याय और बंधुत्व हो।भगत सिंह शोषण मुक्त समाज बनाना चाहते थे।
भगत सिंह का सपना था कि दुनिया में गरीबी, भूख, भ्रष्टाचार और वर्गभेद का अंत हो। वे एक ऐसा समाज चाहते थे जहाँ इंसान के हाथों इंसान का शोषण न हो, चाहे वह अंग्रेज हों , तानाशाह,राजे महराजे या बड़े पूंजीपति हो।उनका मानना था कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल अंग्रेजी हुकूमत को हटाना नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था को बदलना है जो आम लोगों का शोषण करता हो ।
यदि भगत सिंह का झुकाव मार्क्सवाद की तरफ हुआ तो उसके पीछे भी कई कारण विद्यमान थे। दरअसल 1917 की रूस की क्रांति के बाद मार्क्सवाद और समाजवाद पूरी दुनिया में बूम कर गया था। सर्वहारा वर्ग द्वारा निरंकुश शासन पर विजय को हर जगह सराहना मिली और इसे सर्वहारा (शोषित) वर्ग के पक्ष में क्रांति कहा गया। दूसरी बात, 1920 के दशक में पूरे विश्व में समाजवाद की लहर दौड़ रही थी।
यही वजह थी कि राष्ट्रीय आंदोलन के कई पुरोधा भी उस लहर से अछूते न रहे। सुभाष चन्द्र बोस और जवाहर लाल नेहरू भी समाजवाद के काफी प्रभावित थे। इसके अलावा, 1929-1930 के समय वैश्विक महामंदी के कारण पूंजीवाद की सर्वश्रेष्ठता का भ्रम टूटा और उसकी खामियां उभरकर सामने आई। इसी दौर में, दुनिया को समाजवाद पूंजीवाद के एक श्रेष्ठ विकल्प के रूप में दिखाई देने लगा।
यहां तक कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी समाजवाद की लहर से अछूती ना रही। यही वो परिस्थितियां थी जिनके आलोक में भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारी भी मार्क्सवाद और समाजवाद की तरफ आकर्षित हुए। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भगत सिंह का मन वैयक्तिक हत्या तथा हिंसक गतिविधियों से विरक्त हो गया था। उनका प्रसिद्ध वक्तव्य था: “पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।” इस प्रकार वे मार्क्सवाद की तरफ प्रभावित हुए।
भगत सिंह ने जेल से कहा था, “मैं एक मानव हूँ और जो कुछ भी मानवता को प्रभावित करता है, उससे मुझे मतलब है”। वे सांप्रदायिक सौहार्द के प्रबल समर्थक थे और जाति-पाति व धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर एक बेहतरीन दुनिया चाहते थे।“लोकतन्त्र सिद्धान्ततः राजनीतिक और कानूनी समानता की व्यवस्था है, किन्तु ठोस और व्यावहारिक रूप में यह झूठ है, क्योंकि जब तक आर्थिक सत्ता में भारी असमानता है, तब तक कोई समानता नहीं हो सकती, न राजनीति में और न कानून के सामने।
…पूँजीवादी शासन में लोकतन्त्र की सारी मशीनरी शासक अल्पमत को श्रमिक बहुमत की यातनाओं के जरिये सत्ता में बनाये रखने के लिए काम करती है।”
जेल में वह सारी मानवजाति के हित में अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संपदा पर वितरण हेतु विश्व समाजवादी क्रांति के विचार में लीन रहे। जेल डायरी के पृष्ठ 190 पर उन्होंने लिखा “समाजवादी व्यवस्था: प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार।” इस प्रकार भगत सिंह के विचारों में समाजवाद की ओर झुकाव काफी पहले से दिखाई देने लगा था।
वे कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों से प्रभावित थे और समाजवाद के पक्के पोषक थे उनका मानना था कि असली आज़ादी तभी आएगी जब सत्ता गरीबों और मज़दूरों के हाथ में होगी
समानता के हिमायती थे, जहां जाति, वर्ग और धर्म के आधार पर भेदभाव न हो। उन्होंने ‘नवजवान भारत सभा’ के माध्यम से युवाओं को इन विचारों से जोड़ा।उन्होंने जेल में मार्क्स, लेनिन और ट्रॉट्स्की को पढ़ा था। वे एक समाजवादी क्रांति के पक्ष में थे जो केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक हो। वैचारिक रुप से वे पूरी तरह स्पष्ट था।
उन्होंने जमींदारी प्रथा और पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे की बात की थी, जिससे किसानों और मजदूरों का शोषण रोका जा सके। वे अंधविश्वास के विरोधी थे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण (साइंटिफिक टेम्पर) के समर्थक थे, जिसे उन्होंने अपने निबंध “मैं नास्तिक क्यों हूँ” में स्पष्ट किया। उनके लिए, ‘इंकलाब’ का अर्थ सिर्फ बम या पिस्तौल नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाना था।
(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट, राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)