गुरमीत राम रहीम बरी होना : अन्याय का राज?

पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति की हत्या के मामले में गुरमीत राम रहीम को बरी किया जाना क्या दण्डमुक्ति को नया जीवन मिलने जैसा है? उनके परिवार और मित्र, जो पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के इस फैसले को चुनौती देने और इंसाफ़ के लिए अपने 24 वर्षों से जारी अथक संघर्ष को जारी रखने के लिए संकल्पबद्ध हैं, का कहना है नहीं।

राजनीतिक रूप से प्रभावशाली धार्मिक संगठन डेरा सच्चा सौदा का प्रमुख गुरमीत राम रहीम फ़िलहाल दो शिष्याओं के साथ बलात्कार के मामले में जेल में है, जहाँ वह 2017 में दी गयी 20 साल की सज़ा काट रहा है। जनवरी 2019 में राम रहीम के अलावा तीन अन्य लोगों को 2002 में पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था।

हालांकि, 7 मार्च 2026 को पत्रकारों के ख़िलाफ़ अपराधों में जवाबदेही को झटका लगा जब चीफ़ जस्टिस शील नागू और जस्टिस विक्रम अग्रवाल की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष गुरमीत राम रहीम के ख़िलाफ़ साज़िश का आरोप साबित नहीं कर सका है, लेकिन अन्य आरोपियों—शूटर कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और तीसरे आरोपी किशन लाल—की सज़ा को बरक़रार रखा। अपील लम्बित रहने के दौरान किशन लाल की मृत्यु हो गयी और उसके परिवार को अपील जारी रखने की अनुमति दी गयी थी।

इस उम्मीद के साथ कि सीबीआई इस मामले में अपील दाख़िल करने में देरी नहीं करेगी, क़त्ल किये गये पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने कहा, “हम इस फैसले से निराश हैं और हम इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे।” 

21 नवम्बर 2002 को, हिन्दी सायंकालीन अख़बार “पूरा सच” के सम्पादक राम चन्द्र छत्रपति की हरियाणा के सिरसा स्थित उनके घर के बाहर गुरमीत राम रहीम के दो अनुयायियों द्वारा गोली मारे जाने के 28 दिन बाद दिल्ली के एक अस्पताल में मौत हो गयी थी।

दोनों हमलावरों में से एक को स्थानीय पुलिस ने तुरन्त पकड़ लिया था, जबकि दूसरे को बाद में गिरफ्तार किया गया था। उनके पास से गोलियाँ और एक रिवॉल्वर बरामद हुई, और उनके अनुसार यह हथियार उन्हें डेरा प्रबन्धक किशन लाल ने दिये थे, जिसके नाम पर उस रिवॉल्वर का लाइसेंस था।

पंचकुला की विशेष सीबीआई अदालत ने लम्बे और उतार-चढ़ाव से भरे विस्तृत जाँच और 16 वर्षों तक चले क़ानूनी संघर्ष के बाद 11 जनवरी 2019 को डेरा प्रमुख को हत्या का दोषी ठहराया और 17 जनवरी 2019 को इसकी सज़ा सुनाई। 2017 में बलात्कार मामले में उसकी गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थकों द्वारा किये गये दंगों में 23 लोगों की मौत हो गई थी। राम रहीम लगभग 200 दिन पैरोल पर जेल से बाहर रह चुका है, जिनमें हालिया 40 दिन की 15वीं पैरोल 4 जनवरी 2026 को दी गयी थी।

राम रहीम को इससे पहले 2002 में अपने पूर्व प्रबन्धक रणजीत सिंह की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सज़ा सुनायी गयी थी, लेकिन फरवरी 2025 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से उन्हें उस मामले में बरी कर दिया गया था। 2018 में पंचकुला की विशेष सीबीआई अदालत में दायर उनके और दो डॉक्टरों के ख़िलाफ़ लगभग 400 अनुयायियों के कथित बधियाकरण का मामला अभी भी न्यायाधीन है।

डेरा प्रमुख के ख़िलाफ़ मामलों की शुरुआत 8 अगस्त 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सम्बोधित लिखे एक गुमनाम पत्र के प्रकाशन के बाद हुई। इस ख़त में दो महिला अनुयायियों के साथ बलात्कार और उनमें से एक के भाई की हत्या का आरोप लगाया गया था।

यह पत्र 17 मई 2002 को “अमर उजाला”, 19 मई 2002 को “पंजाब केसरी” और 30 मई 2002 को “पूरा सच” में प्रकाशित हुआ। पत्र के प्रकाशन के बाद 06 जून 2002 को अख़बार के दफ़्तर पर हमला भी किया गया। छत्रपति तर्कशील सोसाइटी नामक एक तर्कवादी समूह के सदस्य भी थे।

मार्च 2026 के अपने आदेश में अदालत ने गुरमीत राम रहीम के ड्राइवर खट्टा सिंह की गवाही को ख़ारिज कर दिया और कहा कि वह ग़ैर भरोसेमन्द गवाह है क्योंकि उसने कई बार अपना बयान बदला है।

सीबीआई के अनुसार, खट्टा सिंह पत्रकार की हत्या की साज़िश का गवाह था। वह बधियाकरण का भी शिकार था और रणजीत सिंह हत्या तथा बधियाकरण मामलों में गवाही दे चुका था। लगातार मिल रही धमकियों के कारण उसने अपना बयान बदल दिया था, लेकिन बाद में हिम्मत जुटा कर उसने सही बयान दिया था। लेकिन अदालत का कहना था कि चूँकि वह अपना बयान कई दफ़ा बादल चुका था इसलिए वह ग़ैर-भरोसेमन्द था।

अदालत के अनुसार तीनों आरोपियों (कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और दिवंगत किशन लाल) ने अपने स्तर पर इस कार्रवाई को अंजाम दिया और गुरमीत राम रहीम को छत्रपति के क़त्ल की साज़िश का हिस्सा नहीं माना जा सकता है।

आदेश में कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने इस सम्भावना पर विचार नहीं किया कि डेरा के अनुयायियों ने गुरमीत राम रहीम की संलिप्तता के बिना भी हमला किया हो सकता है और यह भी कि विशेष सीबीआई कोर्ट ने धार्मिक और राजनीतिक समूहों के अनुयायियों की कट्टरता की सीमा तक जाने वाली अन्धभक्ति को भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया। इस आदेश के अनुसार ट्रायल कोर्ट इसे सही नज़रिये से देख पाने में असमर्थ रहा।

राम रहीम एक लोकप्रिय हस्ती था और ट्रायल कोर्ट ने इस सम्भावना पर विचार नहीं किया कि इस क़दम (पत्रकार की हत्या के) को उनके अनुयायियों ने अपने तईं उठाया हो सकता है। अदालत के अनुसार, “हमारे देश में मज़हब, जाति, पंथ बेहद बड़ी भूमिका अदा करते हैं। मज़हब, जाति और पंथ के नाम पर लोग जान ले और दे सकते हैं। मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा पर विवाद हमारे लिए कोई नयी चीज़ नहीं है”।

सीबीआई की जाँच की आलोचना करते हुए अदालत ने कहा कि यह “गम्भीर चिन्ता का विषय है कि एक प्रमुख जाँच एजेंसी ने मामले में सफलता पाने के लिए इस तरह की कार्यपद्धति अपनायी। प्रयास होना चाहिए था कि इस मामले की तह तक जा कर सच्चाई का पता लगाया जा सके।”

दण्डमुक्ति और खामोश कर दी गयी कहानियाँ

पत्रकारों के ख़िलाफ़ अपराधों में दण्डमुक्ति को लेकर भारत का रिकॉर्ड बेहद चिन्ताजनक बना हुआ है। फ्री स्पीच कलेक्टिव की रिपोर्ट गेटिंग अवे विथ मर्डर” के अनुसार, 2010 के बाद से पेशे के कारण से मारे गये 30 पत्रकारों में केवल तीन मामलों में ही सज़ा दी गयी है।

छत्रपति का मामला मील का पत्थर बना क्योंकि उनके परिवार ने बेहद कम या नगण्य पुलिस सुरक्षा के बीच शक्तिशाली डेरा प्रमुख के ख़िलाफ़ इंसाफ़ की लड़ाई जारी रखी, अपनी जान जोख़िम में डालते हुए अदालतों के कई चक्कर लगाये और साक्ष्य पेश किये।

एक पूर्व साक्षात्कार में अंशुल ने पूरी लड़ाई का ब्योरा दिया था, जिसमें पुलिस से एफ़आईआर में डेरा प्रमुख का नाम शामिल करवाने की प्रक्रिया भी शामिल थी। 25 अक्टूबर को राम चन्द्र छत्रपति ने एक ऑपरेशन के बाद होश में आने पर पुलिस को एक बयान दिया था जिसमें उन्होंने गुरमीत राम रहीम को मुख्य आरोपी बताया था।

अंशुल छत्रपति ने भी पुलिस को बयान दिया था। लेकिन नवम्बर में पिता के अन्तिम संस्कार के बाद ही 21 वर्ष के अंशुल को मालूम हुआ कि पुलिस ने उनके बयानों को एफ़आईआर में शामिल ही नहीं किया था।

अंशुल याद करते हैं, “डेरा और राज्य सरकार के बीच में साफ़ तौर पर कोई आपसी सहमति थी। राज्य सरकार पुलिस पर दबाव डाल रही थी कि एफ़आईआर में डेरा का नाम किसी सूरत में न आए और पुलिस की सन्देह की सुई उस दिशा से हट जाए।” पुलिस ने यह कहकर भी इस मामले को घुमाने की कोशिश की कि गोलीबारी किसी सम्पत्ति विवाद का नतीजा थी। लेकिन इससे बात नहीं बनी।

सीबीआई जाँच की माँग और बलात्कार मामले को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष जारी रहा। एक गुमनाम पत्र के आधार पर सीबीआई ने 18 लड़कियों से पूछताछ की, जिनमें से केवल दो शिकायत दर्ज करवाने के लिए आगे आईं। छत्रपति परिवार को लगातार धमकियों, बम की धमकियों और हमलों का सामना करना पड़ा।

इस दौरान गुरमीत राम रहीम और ताकतवर बन गया, ज़ेड प्लस सुरक्षा का लाभ उठाता रहा, टीवी पर कार्यक्रम के दौरान भक्तों के सामने गाता और नाचता रहा और यहाँ तक कि की दो फ़िल्मों में अभिनय तक कर डाला। राजनेताओं ने खुले आम उसका समर्थन किया, और अब भी हर दफ़ा उसके पैरोल पर बाहर आने पर ऐसा ही करते हैं।

लगभग छह महीने पहले, 2025 के अन्त में, अंशुल की पुलिस सुरक्षा बिना किसी सूचना के वापस ले ली गयी। वे कहते हैं, “अधिकांश लोग लड़ाई छोड़ देते हैं। हमें काफी समर्थन मिला (वकील अश्विनी बक्शी, लेखराज धोत, और वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस चीमा ने निःशुल्क सहायता की)। इंसाफ़ के लिए यह 17 वर्षों की लड़ाई रही है, लेकिन अब काफ़ी कुछ बदल गया है।”

उदाहरण के लिए, मामले की जाँच करने वाले सीबीआई अधिकारी (इस मामले की जाँच कर रहे सतीश डागर, केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो के सुपरिन्टेंडेंट ऑफ़ पुलिस ने 2016 में समयपूर्व सेवानिवृत्ति ले ली) सेवानिवृत्त हो चुके हैं और सत्तारूढ़ भाजपा के साथ डेरा का राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव और ताकतवर हो गया है।

इसके बावजूद, अंशुल कहते हैं कि वे इंसाफ़ के लिए हर दरवाज़ा खटखटाएंगे: “यह अपने पिता और जिस पत्रकारिता के लिए वे क़ुर्बान हो गये, उसके प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।”

(गीता सेषु की रिपोर्ट फ्री स्पीच कलेक्टिव से साभार। अनुवाद : वृषाली श्रुति। मूल अंग्रेज़ी रिपोर्ट यहाँ पढ़ सकते हैं।) 

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