पिछले कुछ वर्षों में भारत में एक अजीब-सी पुनरावृत्ति देखने को मिल रही है। समय-समय पर कोई न कोई तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्तित्व उभरता है—दिव्य शक्तियों के दावे करता है, लोगों को समाधान देने का भरोसा दिलाता है, भीड़ जुटाता है, प्रभाव और संपत्ति अर्जित करता है—और फिर एक दिन उसी के चारों ओर आरोपों, शिकायतों और आपराधिक मामलों का जाल खुलने लगता है। चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन ढाँचा वही रहता है। हाल का अशोक खरात उर्फ ‘कैप्टन बाबा’ प्रकरण इसी श्रृंखला की एक और कड़ी है।
लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि एक और बाबा गिर गया। असली सवाल यह है कि समाज बार-बार उसी जाल में क्यों फँस जाता है?
फँसाव की पहली सीढ़ी
मनुष्य का जीवन अनिश्चितताओं से भरा है। बीमारी का डर, रिश्तों का तनाव, भविष्य की चिंता, असफलता का भय—ये सब मिलकर भीतर एक ऐसी बेचैनी पैदा करते हैं, जिसका कोई सीधा उत्तर नहीं होता। ऐसे में जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि “तुम पर शाप है” या “मैं सब ठीक कर सकता हूँ”, तो वह एक तरह की झूठी लेकिन ठोस निश्चितता देता है।
कई बार यह बात और भी निजी बना दी जाती है—“तुम्हारे पति/पत्नी का किसी गैर से संबंध है”, “तुम बहुत ऊँचे पद पर पहुँचने वाले हो, लेकिन एक अदृश्य बाधा है जिसे केवल मैं जानता हूँ।” ये वाक्य सीधे व्यक्ति के डर और महत्वाकांक्षा को छूते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ से विश्वास का बीज बोया जाता है।
यहीं एक कठोर सच्चाई भी है—जो लोग इन जालों में फँसते हैं, वे हमेशा ‘कमज़ोर’ नहीं होते, बल्कि अक्सर वे अपने जीवन के किसी कठिन मोड़ पर होते हैं। वे समाधान खोज रहे होते हैं। और इसी खोज को इन बाबाओं का तंत्र पकड़ लेता है।
मान्यता का कृत्रिम निर्माण
इन तथाकथित बाबाओं की ताकत केवल उनके दावों में नहीं होती, बल्कि उस माहौल में होती है जो उनके चारों ओर खड़ा किया जाता है। ‘त्रिकालज्ञानी’, ‘अवतार’, ‘दिव्य शक्ति’—ये शब्द केवल आध्यात्मिक भाषा नहीं, बल्कि एक सामाजिक छवि बनाने के औज़ार हैं।
जब यही व्यक्ति नेताओं, अधिकारियों और प्रसिद्ध लोगों के साथ दिखाई देता है, तो उसके चारों ओर एक विश्वसनीयता का घेरा बन जाता है। आम व्यक्ति के लिए यह एक संकेत होता है—अगर इतने प्रभावशाली लोग इनके सामने झुक रहे हैं, तो कुछ तो होगा।
यहीं से आस्था और सत्ता का एक ऐसा गठजोड़ बनता है, जो खतरनाक होता है। बाबा भीड़ और भावनात्मक प्रभाव देते हैं, सत्ता उन्हें संरक्षण देती है। परिणाम यह होता है कि प्रश्न पूछना धीरे-धीरे असामान्य और असुविधाजनक लगने लगता है।
व्यक्तिगत पकड़: विश्वास से निर्भरता तक
जब प्रारंभिक विश्वास बन जाता है, तो अगला चरण शुरू होता है—व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से बाँधना। “तुम पिछले जन्म में अप्सरा थीं”, “तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है”, “तुम विशेष हो”—ऐसे वाक्य व्यक्ति को एक अलग पहचान देते हैं।
धीरे-धीरे वह खुद को ‘चुना हुआ’ मानने लगता है। इस स्थिति में वह आलोचना से दूर होता जाता है, क्योंकि वह उस पहचान को खोना नहीं चाहता।
फिर शुरू होता है उपायों का सिलसिला—छोटे अनुष्ठान, विशेष वस्तुएँ, निजी सलाह, बंद कमरों की बैठकों तक। धीरे-धीरे यह एक ऐसे संबंध में बदल जाता है जहाँ व्यक्ति अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं नहीं, बल्कि उसी ‘गुरु’ के माध्यम से देखने लगता है। यही निर्भरता सबसे बड़ा जाल है।
मान्यता और अंधविश्वास की नेटवर्किंग
यहीं एक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया काम करती है। जो लोग एक बार इस दायरे में आ जाते हैं, वे अक्सर अनजाने में ही उस तंत्र के विस्तार का हिस्सा बन जाते हैं। वे अपने परिवार, मित्रों और परिचितों के बीच उन ‘चमत्कारों’ और ‘फायदों’ की बातें करते हैं, जिन्हें वे सच मान बैठे होते हैं या मानना चाहते हैं। एक तरह से यह मान्यता, अंधविश्वास और भरोसे का एक जाल बनता जाता है, जो किसी नेटवर्क पद्धति की तरह फैलता है—जहाँ हर जुड़ा हुआ व्यक्ति आगे कुछ और लोगों को जोड़ता चलता है।
इस प्रक्रिया में पीड़ित स्वयं भी प्रचार का माध्यम बन जाता है—किसी सुनियोजित भूमिका में नहीं, बल्कि अपने अनुभव को सही ठहराने और अपने विश्वास को बचाए रखने की प्रवृत्ति के कारण। परिणाम यह होता है कि यह पूरा तंत्र केवल टिकता ही नहीं, बल्कि लगातार विस्तार भी करता रहता है।
धर्म का बाजार: आस्था से कारोबार तक
आज धर्म केवल श्रद्धा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि एक व्यवस्थित आर्थिक तंत्र में बदल चुका है। आश्रम, ट्रस्ट, धार्मिक आयोजन, ‘ऊर्जित’ वस्तुएँ, ऑनलाइन प्रवचन, सदस्यता योजनाएँ—सब मिलकर एक ऐसा ढाँचा बनाते हैं जिसमें आस्था को उत्पाद की तरह प्रस्तुत किया जाता है।
दान, विशेष पूजा, कथित उपचार, निजी परामर्श, धार्मिक पर्यटन और जमीन-जायदाद—यह पूरा तंत्र एक समानांतर अर्थव्यवस्था की तरह काम करता है। इसमें पारदर्शिता कम होती है, लेकिन प्रभाव बहुत बड़ा होता है।
और यहीं सबसे बड़ा खतरा छिपा है—जब आस्था को व्यापार में बदला जाता है, तो उसका लक्ष्य मुक्ति नहीं, विस्तार और लाभ हो जाता है।
एक ही पैटर्न: चंद्रास्वामी से कैप्टन बाबा तक
अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो यह सिलसिला नया नहीं है। चंद्रास्वामी के समय में आध्यात्मिकता और राजनीतिक संपर्कों का गहरा मेल दिखा। आसाराम के मामले में बड़े आश्रमों और गंभीर आरोपों का जाल सामने आया। राम रहीम ने इसे भीड़, प्रदर्शन और राजनीतिक प्रभाव के साथ जोड़ा। नित्यानंद ने इसे एक काल्पनिक राष्ट्र और वैश्विक दावों तक पहुँचा दिया। हरियाणा के बाबा रामपाल ने तो अपने आश्रम के भीतर एक तरह की निजी सशस्त्र व्यवस्था तक खड़ी कर ली थी।
अब कैप्टन बाबा उसी क्रम की अगली कड़ी हैं। पैटर्न साफ है—विश्वास अर्जित करो, प्रभाव बढ़ाओ, संसाधन जुटाओ, और अंततः एक ऐसा तंत्र खड़ा करो जो व्यक्ति से बड़ा हो जाए।
बाबाओं के बच निकलने की कला
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि ये बाबा लंबे समय तक बच कैसे जाते हैं। अक्सर उनके खिलाफ शिकायतें देर से सामने आती हैं, और जब आती भी हैं, तो वे तुरंत असर नहीं डाल पातीं। इसके पीछे कई स्तरों पर काम करने वाला एक तंत्र होता है। पहला, राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण—जब किसी बाबा के पास बड़ी संख्या में अनुयायी होते हैं, तो वह एक प्रकार का प्रभाव-समूह बन जाता है, जिसे कोई भी सत्ता सीधे नाराज़ नहीं करना चाहती।
दूसरा, भय का वातावरण—पीड़ित लोग अक्सर सामने आने से हिचकते हैं, क्योंकि उन्हें सामाजिक बदनामी, परिवार टूटने या प्रतिशोध का डर होता है।
तीसरा, आर्थिक और संस्थागत जाल—आश्रम, ट्रस्ट, संपत्ति और दान की जटिल संरचनाएँ ऐसी होती हैं कि उनमें पारदर्शिता कम और नियंत्रण अधिक होता है। इससे जवाबदेही कमजोर पड़ती है। चौथा, छवि-निर्माण—लगातार प्रचार, कथाएँ, चमत्कारों की कहानियाँ और प्रभावशाली लोगों की मौजूदगी एक ऐसा आभामंडल बना देती है, जो आरोपों को भी ‘साजिश’ या ‘ईर्ष्या’ के रूप में पेश कर देता है।
इन सबके बीच, सच धीरे-धीरे दबता रहता है और तंत्र चलता रहता है—कई बार वर्षों तक। यही कारण है कि जब तक कोई मामला खुलकर सामने आता है, तब तक नुकसान बहुत गहरा हो चुका होता है।
सभी संत ऐसे नहीं होते
यह कहना उचित नहीं होगा कि हर आध्यात्मिक व्यक्ति इसी श्रेणी में आता है। समाज में ऐसे लोग भी हैं जो वास्तविक सेवा और मार्गदर्शन का कार्य करते हैं।
लेकिन समस्या यह है कि जब आस्था को बिना सवाल स्वीकार करने की आदत बन जाती है, तो वही जगह दुरुपयोग के लिए खुल जाती है। व्यक्ति जब अपने विवेक को स्थगित कर देता है, तब वह सबसे अधिक असुरक्षित होता है।
आस्था के साथ विवेक भी जरूरी
अंततः यह केवल धर्म का प्रश्न नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी का प्रश्न है। जब व्यक्ति अपने भय, अपनी असफलताओं और अपनी अनिश्चितताओं का सामना करने के बजाय उन्हें किसी और के हाथों में सौंप देता है, तब वह अपनी स्वतंत्र निर्णय-क्षमता खो देता है।
जो लोग इन जालों में फँसते हैं, वे केवल पीड़ित नहीं हैं—वे उस सामाजिक संरचना का हिस्सा भी हैं, जो प्रश्न पूछने से बचती है और आसान उत्तरों की तलाश करती है।
समाधान आस्था को छोड़ने में नहीं है। समाधान यह है कि आस्था के साथ विवेक भी बना रहे। सवाल पूछना, तर्क करना और समझ के आधार पर विश्वास करना—यही वह न्यूनतम सुरक्षा है, जो भारतीय समाज को ऐसे चक्रव्यूह से बचा सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। जनसत्ता से दीर्घकालिक संबंध रहा। वर्तमान में सामाजिक मुद्दों, राष्ट्रीय नीतियों और भू-राजनीतिक विषयों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।)