रुपया ठीक नहीं चल रही, निर्मलाजी!

दिल बहलाने के लिए मोहतरमा ख़्याल अच्छा है। क्या कीजिएगा अमेरिका-इज़राइल की यारी का दंड तो झेलना ही पड़ेगा। लेकिन यह भी सच है कि रुपए का अवमूल्यन सिर्फ चंद दिनों के युद्ध से नहीं बढ़ा है यह तो पिछले दस साल से लगातार डालर के मुकाबले गिरता चला जा रहा है। एक वित्त मंत्री भली-भांति जानता है कि यह स्थिति संतोषजनक नहीं है किंतु जनता को सही बात बताने की मनाही है । क्योंकि कर्जदार भारत अपनी सत्ता कायम करने जिस तरह के निर्णय लेता रहा है यह उसका ही गंभीर परिणाम है।

एक ज़माना था जब रुपया डॉलर को टक्कर दिया करता था। तब भारत 1947 में आज़ाद हुआ तो डॉलर और रुपये का दम बराबर का था। मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया तब देश पर कोई कर्ज़ भी नहीं था। फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी।1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रुपये हो गई और 1985 में डॉलर का भाव हो गया 12 रुपये।

1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम से गिरने लगा। दरअसल निर्यात को बढ़ावा देने के लिए रुपये का अवमूल्यन किया गया था। अगले 10 साल में ही इसने 47-48 के भाव दिखा दिए।

और अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे 95 तक पहुंचा दिया है।वे बड़े ठाठ से सदन में कह रही हैं रुपया ठीक चल रहा है। 2013 में जो 56 के करीब रुपए की वेल्यू थी उसकी तुलना में ये गिरकर निर्मला जी ने 11 साल में 94.56 के स्तर पर पहुंचा दी है। लगता है निर्मला जी शीध्रातिशीध्र ही इसे शतक तक पहुंचा देंगी।

लेकिन गर्व से कह रही हैं देश की आर्थिक बुनियाद मजबूत है। दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में, भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले बिल्कुल ठीक चल रहा है। वित्त मंत्री ने लोकसभा में एक पूरक प्रश्न का जवाब देते हुए कहा कि पूरी दुनिया हमारे राजकोषीय घाटे के प्रबंधन की तारीफ कर रही है। हमारे पास ठोस विदेशी मुद्रा भंडार है।

उन्होंने कहा कि दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ठीक चल रहा है। स्पष्टीकरण यह है कि मार्च 2026 तक, भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर है, जो वैश्विक तनाव, तेल की कीमतों और अन्य आर्थिक कारकों से प्रभावित है। 

एक समय था जब रुपए के अवमूल्यन को सरकार की गिरती इज्ज़त बताया जाता था।आज वह ठीक चल रहा है और देश मज़बूत स्थिति में है।उनको पिछली सरकारों की तरह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वजह है रुपए के अवमूल्यन की। वास्तविकता,रुपये की कमजोरी का सबसे बड़ा कारण पूंजी प्रवाह में कमी और विदेशी निवेश में बड़ी गिरावट है। इसका असर रुपये की तुलना में अमेरिकी डॉलर, यूरो, पाउंड, येन और युआन के मुकाबले उसकी गिरावट में देखा जा सकता है।

कहा जाता है कि अन्य देशों के मुकाबले मजबूती: इंडोनेशियाई रूपैया (1₹ = 222.58), वियतनामी डॉन्ग (1₹ = 340.39), और पाकिस्तानी रुपए (1₹ = ~2.9) जैसे देशों की तुलना में भारतीय रुपया काफी मजबूत है, जिससे वहां घूमने जाना सस्ता पड़ता है। ऐसे उदाहरण देकर भारतीय रुपए की बढ़ती साख बताना निर्लज्जता की परिधि में आता है।

कुल मिलाकर अमरीका की तरह देश में मोदीजी ने झूठ की जो इमारत खड़ी की है वह जर्जर हुई है किंतु उनके सिपहसालार उसे जिस ऊंचे मंसूबे के साथ जनता को परोस रहे हैं वह देश को निरंतर खोखला किए जा रहा है। इसकी चिंता वर्तमान सरकार को लेशमात्र भी नहीं है। ईरान इज़राइल युद्ध जिस मोड़ पर पहुंच गया है उसमें भारत की स्थिति बहुत ही नाज़ुक और चिंताजनक है।

(सुसंस्कृति परिहार लेखक व राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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