अप्रैल फूल नहीं अब हर दिन फूल बनिए जनाब!

एक दशक पहले साल में एक बार पहली अप्रैल को अप्रैल फूल खिला करते थे। यह एक मज़ाकिया खेल था, जिसमें जो फूल बन जाता था वह तो मायूसी ओढ़े रहता था किंतु जो बनाने वाले होते थे वे खिलखिला उठते थे।अगले साल अप्रैल फूल बने लोग सावधान रहते थे। लेकिन लापरवाह लोग बराबर इसका शिकार हो ही जाते थे। इसमें महिलाएं भी उत्साह से भाग लेती थीं।

होली में मूर्ख दिवस होता है किंतु उसमें मिलने वाली उपाधियां और मुकुटों से गौरवान्वित होने का रिवाज़ है। यह विशेष लोगों के लिए था। मज़ा तो अप्रैल फूल ने ही भरपूर दिया है।छोटा-बड़ा कोई भी इसमें शरीक होता था। अब उसका स्वरुप विशालतर हो गया है लेकिन वह छुपे रुस्तम की भूमिका में है।

आश्चर्यजनक रुप से अब दुनिया ने इतनी तरक्की कर ली है कि शायद ऐसा कोई दिन जाता हो, जब लाखों की संख्या में अप्रैल फूल ना खिलते हों। दूसरा फ़र्क ये देखा जा रहा है पहले अप्रेल फूल बने व्यक्ति अनमने होकर जीते थे।अब तो प्रगति के क्या कहने? लोगों को सालों साल पता ही नहीं चलता कि वे कब से अप्रैल फूल बने हुए हैं।

इस तरह विकासवान अप्रैल फूल ने अपनी जड़ें इतनी मजबूती से जमा ली हैं कि इसका शिकार पहले पाखंडी, धूर्त और चालाक लोग करते थे लेकिन अब तो सरकारी हुक्मरान और दीगर कर्मचारी भी दिन रात लोगों को अप्रैल फूल बनाकर मौज कर रहे हैं। यह स्थिति पूंजीपतियों द्वारा और सुदृढ़ होती है।

वे 99, 199से बढ़ते हुए 999 के फेर में अरबों रुपया मिनटों में बना लेते हैं। फूल बनने वाला कुछ समझ ही नहीं पाता है। 30 दिन कैसे 27-28 दिन हो जाते हैं, फिर भी हमें लुभाते हैं। सबसे बड़ी बात तो इस प्रक्रिया में देश की सरकार के मुखिया की भूमिका प्रमुख होती है। झूठ बोलो, लगातार बोलो वह सच मान लिया जाएगा। इसे लोग समझ ही नहीं पाएंगे और सरकार ही खिल-खिला कर ही-ही ठी-ठी कर अप्रैल फूल बनाती रहेगी।

जनता उन्हें खुश देखकर खुश होती रहेगी। अब इसे जुमला कहो और अप्रैल फूल का लुत्फ लो। है ना मज़ेदार। 80 करोड़ को राशन और लाड़ली बहना को मिलने वाली राशि के पीछे भी यही फूल काम करता है भले आप कमल के फूल को वोट दें।

बहरहाल, यह कहना समीचीन होगा कि विश्वगुरु से दीक्षा लेकर आज अमेरिका का राष्ट्रपति इस होड़ में आगे निकल गया है। लेकिन ईरान की लताड़ और अमेरिका की अवाम ने उसे इतना ज़लील कर दिया है कि वह अपना आपा खो बैठा है। किंतु विश्वगुरु तो सदाबहार ईश्वरीय अवतार है। उस पर जनता और ना रुस-चीन और 5000वर्ष पुराने दोस्त ईरान से कुछ लेना देना है।

ये बात और है कि इटैलियन प्रधानमंत्री ने भारत के उन जहाजों को रोक लिया है, जिन्हें लेकर जांच हुई तो पता चला विश्वगुरु ईरान को फूल बनाकर फादर लैंड इज़राइल को खतरनाक सामग्री भेज रहे थे।

काश! अप्रैल फूल अपने पुराने, छोटे और सुंदर स्वरूप में लौट आता तो हम सब आज मजमा लगा के मज़ा लेते और ढोंगियों, पाखंडियों, वोट चोरों और उनके अनुरागियों के ही ही ठी ठी पर विराम लग जाता। अक्सर ऐसा होता आया है कि ऊंचाई पर पहुंच कर धड़ाम से गिरना होता है।

(सुसंस्कृति परिहार लेखक व राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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