ईरान इस्राइल की मौजूदा जंग के बीच विश्व के अधिकांश देशों के साथ यूरोपीय देशों ने जिस तरह इस्राइल की आलोचना की है और अमेरिकी जुगलबंदी के साथ आक्रामकता का विरोध किया है, उससे गांधी जी के उन विचारों की अहमियत बढ़ जाती है जो उन्होंने इस्राइल की एक आपरेशन से जबरदस्ती पैदाइश के बारे में कहे थे। और कहा था कि फिलिस्तीनियों का हक़ छीनकर यहूदियों के लिए इस्राइल का नया मुल्क बनाना बहुत ग़लत है। तब उन्होंने कहा था कि यहूदी जिन जिन देशों में रह रहे हैं वो सलामती के साथ रहें। यह सुझाव दिया था कि अगर यहूदियों के लिए कोई राज्य बनाना ज़रूरी हो तो उसे यूरोप में कहीं बनाया जाए।
यह जान लेना ज़रूरी है कि पहली और दूसरी जंगे अज़ीम (विश्व युद्ध) के दौरान अमेरिका सहित यूरोपीय मित्र देशों और सहयोगियों ने षड्यंत्र करके जबरदस्ती अरब इलाक़े के फिलिस्तीन में इस्राइल का निर्माण किया था।
लेकिन इस समय यह बहुत बड़ी बात हुई है कि, इस्राइल की पैदाइश में जिस ब्रिटेन की अहम भागीदारी थी उसने इस ईरान इस्राइल जंग से खुद को न सिर्फ अलग कर लिया बल्कि इस्राइल और उसके सरपरस्त/गार्जियन अमेरिका की आलोचना भी की है।
यहां यह बात महत्वपूर्ण है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने ईरान पर हमलों की ना सिर्फ निंदा की, बल्कि ट्रम्प की अपील के बावजूद ब्रिटेन को ईरान जंग में इस्राइल के पक्ष में युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया है। साथ ही उन्होंने डी एस्केलेशन (De-escalation) की अपील की। जिसका मतलब होता है कि हर तरह के संघर्ष, तनाव, हिंसा और आक्रामक स्थिति की तीव्रता को जल्द से जल्द कम करना है। इससे पहले ब्रिटेन इस्राइल के खिलाफ एक और कड़ा कदम उठा चुका है, उसने इस्राइल के दो मंत्रियों बेन-ग्वीर और स्मोट्रिच के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया है।
यह कार्रवाई ब्रिटेन द्वारा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया,न्यूज़ीलैंड और नॉर्वे जैसे सहयोगी देशों के साथ मिलकर की गई है, जो इस मुद्दे पर एक समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्यवाही मानी जानी चाहिए। जिसमें दोनों नेताओं के यूके में प्रवेश पर रोक लगाने के अलावा उनकी संपत्तियों को फ्रीज़ किया जाना शामिल है, साथ ही उनके वित्तीय लेन-देन पर भी निगरानी बढ़ा दी गई है।
हालांकि यह प्रतिबंध फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा को लेकर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चिंताओं के मद्देनजर लगाया गया था, जिसका इस जंग में ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के इस्राइल विरोधी रुख के कारण महत्व और बढ़ जाता है। यह कदम सामान्य कूटनीतिक असहमति से आगे बढ़कर एक औपचारिक प्रतिबंध की श्रेणी में आता है, जो यह गंभीर अंतरराष्ट्रीय संदेश देता है कि इस्राइली सरकार/समाज ने इंसानियत के सबसे निचले तक़ाज़ों को अभी तक अपने तौर तरीकों में शामिल नहीं किया है।
इस कार्रवाई के पीछे फिलिस्तीनियों/गाजा पर आतंकी कार्रवाई की वजह बताई गई थी। इस प्रतिबंध को लगाने में ब्रिटेन के क़रीब क़रीब सभी सहयोगी देश थे, इन प्रतिबंधों के पीछे जो मुख्य कारण बताए हैं, उनमें शामिल हैं,
फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा को उकसाने वाले बयान और कट्टरपंथी, व विभाजनकारी राजनीतिक रुख तथा वेस्ट बैंक में बस्तियों को लेकर विवादास्पद नीतियों का समर्थन इसका हिस्सा था।
मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इन इस्राइली नेताओं की बयानबाज़ी ने क्षेत्र में तनाव को और भड़काया है।
ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के इस क़दम की बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया हुई है और इसका व्यापक और स्थाई प्रभाव पड़ने की सम्भावना है।
ब्रिटेन का यह कदम ऐसे समय में आया है जब United Nations सहित कई वैश्विक संस्थाएं गाज़ा और वेस्ट बैंक की स्थिति को लेकर चिंता जता चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि, इससे इस्राइल की अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर पड़ेगा और पश्चिमी देशों और इस्राइल के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ जाएगा।
ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों द्वारा उठाया गया यह कदम केवल इस्राइल के दो अतिवादी मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि एक व्यापक संदेश है—कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब मानवाधिकार और शांति के मुद्दों पर सख्त रुख अपनाने को तैयार है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस फैसले का मध्य-पूर्व की राजनीति और वैश्विक कूटनीति पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।
महात्मा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को फिलिस्तीन में अन्याय का मूल कारण माना, जहाँ ब्रिटेन ने यहूदियों को अरबों पर थोपने के लिए खाड़ी के देशों पर फौजी कार्यवाही का सहारा लिया। गांधी जी ने 1931 में कहा कि ज़ायनिज़्म (फिलिस्तीन पर यहूदी पुनर्स्थापना) उन्हें आकर्षित नहीं करता, और यहूदियों को ब्रिटिश सहायता के बिना अरबों की सद्भावना से ही बसना चाहिए।
ब्रिटिश नीति की आलोचना करते हुए गांधी ने 1938 के ‘हरिजन’ लेख में ब्रिटिश मैंडेट को अनैतिक बताया, क्योंकि “फिलिस्तीन अरबों का है उसी तरह जैसे इंग्लैंड अंग्रेज़ों का।” उन्होंने बाल्फोर घोषणा को युद्ध की सैन्य शक्ति पर आधारित करार दिया, जो मानवता के विरुद्ध अपराध है।
ब्रिटेन को डिवाइड एंड रूल नीति का दोषी ठहराते हुए उन्होंने कहा कि यहूदियों का बसना ब्रिटिश निर्णय पर निर्भर है, जो हिंसक और अमानवीय है।
1921 में ‘डेली हेराल्ड’ को दिए बयान में गांधीजी ने सहयोगियों द्वारा फिलिस्तीन को यहूदियों को सौंपने को मुसलमानों के साथ विश्वासघात कहा। उनका मानना था कि धार्मिक कार्य बम या बंदूक से नहीं हो सकता।
वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को भारत और फिलिस्तीन दोनों में विभाजनकारी बताते थे, और अहिंसा से मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा पर जोर देते थे।
ईरान-इज़राइल युद्ध के दौरान स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने इज़राइल-अमेरिकी हमलों को “अवैध, क्रूर और अमानवीय” कहा है, और इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया उन्होंने यूएस को स्पेनिश बेस इस्तेमाल की अनुमति देने से इंकार कर दिया।और इसे मध्य पूर्व को अस्थिर करने वाला कदम बताया।
जबकि ब्रिटेन के कीर स्टार्मर ने इज़राइल का सीधा विरोध नहीं किया लेकिन ब्रिटेन को युद्ध (और शायद हिंसा और अन्याय से भी) से अलग कर लिया है।
चीन ने हमलों पर “गहरी चिंता” जताई, और तत्काल युद्धविराम और वार्ता की मांग की।
फ्रांस के इमैनुएल मैक्रॉं ने हमलों में शामिल न होने का बयान दिया और विवादों को वार्ता से हल करने पर ज़ोर दिया। अरब लीग ने इज़राइल-यूएस हमलों को संप्रभुता का उल्लंघन कहा। तुर्की, रूस, ब्राजील ने इस्राइल के हमलों की निंदा की और क्षेत्रीय युद्ध भड़कने की चेतावनी दी है।
ऐसे में गांधी जी का पक्ष बहुत समीचीन लग रहा है। अब इस्राइल का अस्तित्व तो खत्म नहीं हो सकता लेकिन उसे ग्रेटर इस्राइल (अखंड…… टाइप) जैसे मूर्खतापूर्ण विचार और कोशिशों को दफन करके पड़ोसियों के साथ शान्ति पूर्ण सम्बन्ध रखने चाहिए।
(लेखक, पत्रकार और शायर, गांधीवादी कार्यकर्ता इस्लाम हुसैन का जन्म 1954 में रानीखेत में हुआ था, वो 1975 से लेखन के क्षेत्र में हैं। हिन्दी, उर्दू अंग्रेजी के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दैनिक साप्ताहिक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख, फीचर रिपोर्ट्स, कहानियां शायरी प्रकाशित हुई हैं, उनकी अनेक रिपोर्ट्स शोधकर्ताओं द्वारा अपने शोध में सम्मिलित की गई हैं, उनके सामाजिक कार्यों पर भी शोधकार्य हुए हैं और कुमाऊं विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता को पीएचडी मिल चुकी है। वो भारत सरकार के दो संस्थानों के मॉनीटर रह चुके हैं। इस्लाम हुसैन मान्यता प्राप्त पत्रकार रहे हैं, उनकी अब तक चार किताबें छप चुकी हैं।)