तेल का खेल : खाड़ी के तेल पर हमेशा ही रही है अमेरिकी नज़र

अमेरिकी इतिहास को अगर एक लंबी निरंतरता में पढ़ा जाए, तो डोनाल्ड ट्रंप का “अमेरिका टेक द ऑयल” जैसा कथन कोई अचानक उपजा हुआ विचलन नहीं लगता, बल्कि एक गहरे ऐतिहासिक प्रवाह का नया, अधिक स्पष्ट और अनगढ़ संस्करण प्रतीत होता है। यह प्रवाह शक्ति, संसाधन और वैचारिक औचित्य—तीनों के त्रिकोण से निर्मित है।

अमेरिका की आरंभिक ऐतिहासिक चेतना में ही विस्तारवाद की प्रवृत्ति निहित थी। “मेनीफेस्ट डेस्टिनी” का विचार—कि अमेरिका का विस्तार ईश्वरीय नियति है—सिर्फ भूभाग के अधिग्रहण तक सीमित नहीं था, बल्कि एक मानसिक ढाँचा था जिसमें संसाधनों पर अधिकार को नैतिक वैधता मिल जाती थी। मूल निवासियों की भूमि, मैक्सिको के हिस्सों पर कब्ज़ा, और बाद में वैश्विक स्तर पर हस्तक्षेप—इन सबमें यही भाव अंतर्निहित रहा कि शक्ति ही नैतिकता को परिभाषित करती है।

बीसवीं सदी में यह प्रवृत्ति अधिक परिष्कृत रूप में सामने आई। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने स्वयं को वैश्विक व्यवस्था का संरक्षक घोषित किया, परंतु इस “संरक्षण” के भीतर आर्थिक और सामरिक हितों की गहरी छाया थी। मध्य-पूर्व विशेष रूप से इस रणनीति का केंद्र बना। 1953 में ईरान की बगावत के माध्यम से ईरान की लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर शाह को सत्ता में लाना इस बात का उदाहरण है कि तेल और भू-राजनीतिक नियंत्रण के लिए अमेरिका किस हद तक जा सकता है।

इसी क्रम में “कार्टर डॉक्ट्राइन” का उदय हुआ, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि फारस की खाड़ी के संसाधनों पर किसी भी बाहरी शक्ति का नियंत्रण अमेरिका के लिए अस्वीकार्य होगा, और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य शक्ति का प्रयोग किया जाएगा। यह सिद्धांत वस्तुतः ऊर्जा-सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ जोड़ने का औपचारिक उद्घोष था।

इक्कीसवीं सदी में यह रुझान और भी प्रत्यक्ष हुआ। 2003 का ईराक युद्ध भले ही “जनसंहारक हथियार” के नाम पर शुरू हुआ, पर व्यापक विश्लेषणों में इसे तेल और क्षेत्रीय प्रभुत्व की राजनीति से अलग नहीं देखा जाता। युद्ध के बाद इराक के तेल उद्योग में अमेरिकी और पश्चिमी कंपनियों की भूमिका ने इस धारणा को और पुष्ट किया कि संसाधनों पर नियंत्रण अमेरिकी रणनीति का केंद्रीय तत्व है।

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जब आज स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ जैसे संवेदनशील क्षेत्र की बात होती है—जहाँ से विश्व के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है—तो “टेक द ऑयल” जैसा कथन केवल एक उग्र ट्वीट नहीं रह जाता, बल्कि वह उस दीर्घकालिक मानसिकता की प्रतिध्वनि बन जाता है जिसमें संसाधनों को वैश्विक शक्ति-संतुलन का निर्णायक उपकरण माना जाता है।

हालाँकि, एक महत्वपूर्ण अंतर भी ध्यान देने योग्य है। पहले जहाँ अमेरिकी नीतियाँ “लोकतंत्र”, “मानवाधिकार” या “वैश्विक स्थिरता” जैसे नैतिक आवरणों में प्रस्तुत की जाती थीं, वहीं ट्रंप की भाषा उस आवरण को लगभग हटा देती है। यह एक प्रकार की “नग्न यथार्थवाद” है, जिसमें शक्ति और लाभ की बात बिना कूटनीतिक अलंकरण के कही जाती है। इस दृष्टि से ट्रंप कोई अपवाद नहीं, बल्कि परंपरा का अधिक स्पष्ट और बेबाक संस्करण हैं।

फिर भी, यह भी उतना ही सत्य है कि आज की वैश्विक व्यवस्था उन्नीसवीं या बीसवीं सदी जैसी नहीं रही। संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय कानून, वैश्विक मीडिया और बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन—ये सभी ऐसे कारक हैं जो किसी भी देश के लिए प्रत्यक्ष संसाधन-अधिग्रहण को अत्यंत जटिल और जोखिमपूर्ण बना देते हैं। ईरान जैसे देश के संदर्भ में तो यह और भी संवेदनशील है, जहाँ क्षेत्रीय गठबंधन, सैन्य क्षमता और भू-राजनीतिक समीकरण किसी भी एकतरफा कदम को व्यापक संघर्ष में बदल सकते हैं।

इस प्रकार, ट्रंप का बयान एक साथ कई स्तरों पर कार्य करता है—यह इतिहास की निरंतरता भी है और उससे विचलन भी। निरंतरता इसलिए कि अमेरिकी रणनीति में संसाधनों और प्रभुत्व की केंद्रीयता नई नहीं है; विचलन इसलिए कि अब यह भाषा अधिक स्पष्ट, अधिक असंकोच और कम कूटनीतिक हो गई है।

अंततः, यह प्रश्न केवल ट्रंप या अमेरिका का नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था का है जिसमें शक्ति, संसाधन और नैतिकता का संबंध लगातार पुनर्परिभाषित हो रहा है। यदि इतिहास हमें कुछ सिखाता है, तो वह यह कि “तेल” केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि राजनीति का सबसे ज्वलनशील रूपक है—और जब कोई शक्ति इसे “ले लेने” की बात करती है, तो वह केवल संसाधन नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था को चुनौती दे रही होती है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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