सत्ता, महानताबोध और मनोविकृति 

समकालीन विश्व-राजनीति एक ऐसे संक्रमण के दौर से गुजर रही है जहाँ सत्ता के पारंपरिक ढाँचे तेजी से व्यक्तित्व-प्रधान होते जा रहे हैं। राष्ट्र, संस्थाएँ और नीतियाँ अब उतनी निर्णायक नहीं रह गईं जितना कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति का स्वभाव, उसकी महत्वाकांक्षाएँ और उसकी मनोवैज्ञानिक संरचना। डोनाल्ड ट्रम्प के संदर्भ में उभरा विमर्श इसी गहरी विडंबना को उजागर करता है, जहाँ एक व्यक्ति का निजी दृष्टिकोण और उसका आत्मबोध वैश्विक राजनीति को अस्थिर करने की क्षमता रखता है।

राजनीतिक मनोविज्ञान लंबे समय से यह स्थापित करता रहा है कि जब संस्थाएँ कमजोर पड़ती हैं, तब नेता का व्यक्तित्व नीति-निर्माण का केंद्रीय तत्व बन जाता है। यही स्थिति तब और खतरनाक हो जाती है जब निर्णय-प्रक्रिया तर्क, विशेषज्ञता और विमर्श से हटकर सहज प्रवृत्तियों, तात्कालिक प्रतिक्रियाओं और निजी हितों पर आधारित होने लगे।

डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में की जा रही आलोचनाएँ इसी ओर संकेत करती हैं कि सत्ता का उपयोग एक व्यापक राष्ट्रीय या वैश्विक दृष्टि के बजाय, व्यक्तिगत छवि और विरासत गढ़ने के साधन के रूप में किया जा रहा है।

ईरान के साथ जारी संघर्ष इस प्रवृत्ति का एक स्पष्ट उदाहरण बनकर सामने आता है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या यह युद्ध किसी सुविचारित रणनीति का परिणाम है या फिर शक्ति-प्रदर्शन और तात्कालिक राजनीतिक लाभ की आकांक्षा का विस्तार। आलोचकों के अनुसार, यह निर्णय दीर्घकालिक कूटनीतिक समझ के बजाय एक प्रकार के ‘जुए’ की तरह लिया गया प्रतीत होता है, जिसमें यह मान लिया गया कि शीर्ष नेतृत्व को समाप्त कर देने से पूरा तंत्र ध्वस्त हो जाएगा।

किंतु सद्दाम हुसैन के इराक से भिन्न, ईरान की सत्ता-संरचना बहुस्तरीय और जटिल है, जो इस प्रकार की सरलीकृत रणनीतियों को असफल बना सकती है। बेंजामिन नेतन्याहू जैसे सहयोगियों के प्रभाव का उल्लेख भी इस बात को रेखांकित करता है कि वैश्विक निर्णय अक्सर बहुस्तरीय दबावों और व्यक्तिगत समीकरणों से निर्मित होते हैं।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक चिंताजनक पहलू अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता का क्षरण है। आधुनिक विश्व-व्यवस्था केवल सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि नियमों, संधियों और पारस्परिक सहमति पर आधारित है, जिसका प्रतिनिधित्व यूनाइटेड नेशन्स जैसी संस्थाएँ करती हैं। जब शक्तिशाली राष्ट्र इन नियमों की अनदेखी करते हैं, तो वे न केवल अपनी नैतिक वैधता खोते हैं, बल्कि एक ऐसी अराजकता को जन्म देते हैं जिसमें हर राष्ट्र अपने-अपने हितों के अनुसार नियमों को तोड़ने के लिए स्वतंत्र हो जाता है।

यूनाइटेड स्टेट्स की भूमिका इस संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है, और यदि वही राष्ट्र नियम-आधारित व्यवस्था से विचलित होता है, तो वैश्विक संतुलन पर उसका प्रभाव और भी व्यापक हो जाता है।

बाहरी आक्रामकता के साथ-साथ एक आंतरिक संकट भी उभरता है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण के रूप में सामने आता है। जब सत्ता के केंद्र में बैठा व्यक्ति स्वयं को नियमों से ऊपर समझने लगे, आलोचना को शत्रुता के रूप में देखने लगे और अपने चारों ओर केवल सहमति देने वालों का घेरा बना ले, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है।

यूनाइटेड स्टेट्स में उभरती यह प्रवृत्ति इस बात का संकेत देती है कि लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित होता जा रहा है, जबकि उसका मूल तत्व—संस्थागत संतुलन और आलोचनात्मक विमर्श—धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।

इसी के साथ एक और प्रवृत्ति उभरती है, जिसे साम्राज्यवाद के नए रूप के रूप में देखा जा सकता है। यह पारंपरिक आर्थिक या सामरिक हितों से आगे बढ़कर व्यक्तिगत विरासत और ऐतिहासिक स्मृति के निर्माण से जुड़ती है। ग्रीनलैंड या वेनेजुएला जैसे क्षेत्रों के संदर्भ में व्यक्त विस्तारवादी इच्छाएँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि भू-राजनीति अब केवल संसाधनों या सुरक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक प्रकार के प्रतीकात्मक प्रभुत्व का माध्यम बनती जा रही है।

इस प्रवृत्ति में तर्कसंगतता की जगह प्रतीकात्मकता ले लेती है, और प्रतीक अक्सर विवेक की तुलना में अधिक उग्र और अस्थिर होते हैं।

यह समूचा परिदृश्य इस ओर संकेत करता है कि हम केवल किसी एक नेता या एक देश के संकट की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक व्यापक वैश्विक परिवर्तन के साक्षी हैं, जिसमें व्यक्तित्व संस्थाओं पर हावी होता जा रहा है, और शक्ति नैतिकता पर।

डोनाल्ड ट्रम्प इस प्रवृत्ति का एक सशक्त उदाहरण अवश्य हैं, किंतु इसे केवल उनके व्यक्तित्व तक सीमित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यह उस व्यापक मानसिकता का परिणाम है जिसमें त्वरित निर्णय, आक्रामकता और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा को दूरदर्शिता, संतुलन और सामूहिक उत्तरदायित्व पर वरीयता दी जा रही है।

अंततः यह प्रश्न हमारे समय की सबसे बड़ी चिंता के रूप में उभरता है कि क्या आधुनिक लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था इस प्रकार के व्यक्तित्व-प्रधान और आवेगशील नेतृत्व का सामना कर पाएँगे। यदि संस्थाएँ निरंतर कमजोर होती रहीं और व्यक्तित्व अधिक सशक्त, तो वह स्थिति दूर नहीं जब विश्व-राजनीति विवेक के बजाय आवेग, और सहयोग के बजाय टकराव के आधार पर संचालित होने लगेगी—और तब उसका परिणाम केवल किसी एक राष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी मानवता को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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