नेताओं व अफसरों पर जूता फेंकना चलाना मारना, विरोध का एक जाना माना तरीका है, हालांकि किसी को कुछ भी मारना हिंसा है, और लोकतांत्रिक समाज में इसका समर्थन नहीं किया जाना चाहिए। गांधीवादी कार्यकर्ता के रूप में मैं हर तरह की हिंसात्मक गतिविधियों से किनाराकशी कर लेता हूं।
लेकिन कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि किसी ज़ुल्म पर जूता चलाना, या किसी पर जूता फेंकना, विरोध का अहिंसक तरीका है….इससे शारीरिक रूप से बहुत नुक्सान नहीं होता, हां इस विरोध का गुणात्मक महत्व बहुत होता है।
कभी किसी को जूता मारना एक बड़ा विरोध हो जाता है, और कभी यह उच्चता दिखाने का भौंड़ा तरीका भी होता है जब जाति या अपने अहंकार/कुंठा और व्यक्तिगत हितों को लेकर इसका इस्तेमाल होता है।
किसी कमज़ोर दबे कुचले पीड़ित तबके द्वारा जूते का इस्तेमाल समाज में एकदम चर्चित हो जाता भारत में जूता मारने की बहुत सी घटनाएं हुई हैं जिनमें कुछ प्रायोजित और प्रचार के उद्देश्य से की गई थीं। पीड़ित का अपनी पीड़ा, अपमान और शोषण के ख़िलाफ़ अपने शोषक पर जूता फेंकने की गूंज इतिहास में हमेशा रही है।
ऐसी ही एक घटना इराकी गुस्से की लपट की तरह इतिहास में 14 दिसंबर 2008 को दर्ज हो चुकी है। जब बगदाद में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और इराकी प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। तभी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल जवाब के बीच अल-बगदादिया टीवी के पत्रकार मुंतधर अल-जैदी ने बुश के मुंह की तरफ एक जूता फेंका और वो चीखा —”यह इराकी लोगों की ओर से विदाई का चुम्बन है, ओ कुत्ते!” बुश और उसके सुरक्षा कर्मी जब तक कुछ संभल पाते जैदी दूसरा जूता फेंकते हुए चिल्लाया, “यह इराक की विधवाओं, अनाथों और मारे गए लोगों की तरफ से है।”
अचानक जूते की बौछार से बुश सहम गया उसे चोट तो नहीं आई लेकिन वो खिसियाकर बोला, यह अपमानजनक है, लेकिन कोई नुकसान नहीं हुआ।
यह जूता फिंकाई नुकसान के लिए था भी नहीं, क्या नुकसान होता, मुंह की ज़रा खाल छिल जाती, इसका असली मक़सद तो इराकी जनता पर अमेरिकी ज़ुल्म का प्रतीकात्मक विरोध करना था। जूता फेंकना सिर्फ बुश की बेइज्जती नहीं थी, बल्कि 2003 के अमेरिकी हमले के खिलाफ गुस्से का इज़हार था।
अल-जैदी अल-बगदादिया टीवी चैनल के रिपोर्टर थे और इराक युद्ध में अमेरिकी सेना द्वारा की गई हिंसा, बलात्कार व हत्याओं की खबरें कवर करते थे। उन्होंने जूता फेंकने से पहले अपनी अंगूठी और पहचान पत्र अपने कैमरामैन को दे दिए थे। उस दौर में इराक़ी जनता अमेरिकी ज़ुल्म से बहुत गुस्से में थी, जैदी का यह काम बस एक नमूना था। अमेरिकी हमलावर पर जूता फिंकाई से सालों बाद इराकी जनता के चेहरे पर मुस्कराहट और हौसले की रोशनी आईं।
2003 में अमेरिका ने “मास डिस्ट्रक्शन वेपन” या ख़तरनाक रासायनिक हथियारों की मौजुदगी के बहाने से इराक पर हमला किया था, सद्दाम हुसैन की सरकार को हटा दिया था जिसमें लाखों नागरिक मारे गए, अमेरिकी हमले से इराक पूरी तरह तबाह हो गया था। जिससे इराकी जनता बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम हो गई थी।
इराक पर कब्जे के बाद अमेरिकी फौज पर लूट के आरोप लगे, अमेरिकियों ने तेल संसाधनों पर कब्जा कर लिया, उस दौर में भारत सहित दुनिया भर की मीडिया/अखबारों में अमेरिकी फौजियों द्वारा बगदाद संग्रहालय को लूटने और ऐतिहासिक पुरातात्विक धरोहरों में तोड़फोड़ करने और चोरी करने की खबरें और फोटो छपती थीं, इस बात के भी खुलासे हुए कि अमेरिकी फौजियों/अफसरों ने इराकी ऐतिहासिक धरोहरों को ब्लैक मार्केट में बिक्री करके करोड़ों डालर कमाए थे।

अमेरिकी कंपनियां (हैलिबर्टन जैसी) ने पुनर्निर्माण और कथित विकास के नाम पर अरबों डॉलर के ठेके हथिया लिए और संसाधन लूट लिए। अमेरिका की इन हरकतों को इराक़ी जनता ने उनके मुल्क पर कब्जे और शोषण के रूप में देखा, न कि उनकी मुक्ति के रूप में।
इन ज़ुल्मों से अमेरिका समर्थित इराकी फौजी शासन के खिलाफ विद्रोह होने लगा, अमेरिकी फौज और उसकी कठपुतली शासन का जनता और मिलिशिया बहादुरी से मुकाबला करने लगी। सुन्नी-शिया मिलिशिया, और विद्रोही गुटों ने गोरिल्ला युद्ध लड़े— आत्मघाती और आईईडी हमले हुए। फालुजा, नजफ जैसे शहर खून से लाल हुए।
अमेरिकी हमलों के बाद लाखों इराकी विस्थापित हुए पूरे इराक में क़त्लो गारत आम हो गया। जनता का गुस्सा सड़कों पर उतरा—प्रदर्शन, तोड़फोड़ होते रहे।
अमेरिकी हमले के बाद सद्दाम हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया, अमेरिकी निर्देश पर बनाए गए इराकी विशेष न्यायाधिकरण ने सद्दाम हुसैन को मानवता के खिलाफ कथित अपराध का दोषी ठहराया। नवंबर 2006 में फांसी की सजा सुनाई गई थी और एक सुबह उनको फांसी दे दी गई।
पत्रकार जैदी का यह जूता फेंकना उसी निरंतर प्रतिरोध की कड़ी था, जो अमेरिकी कब्जे और ज़ुल्म ज्यादतियों के एहतिजाज में हो रहा था। एशियाई देशों सहित अरब संस्कृति में जूता फेंकना बहुत बेइज्जती वाला माना जाता है, इसलिए पत्रकार ज़ैदी का यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति बुश के लिए नफ़रत की हद तक नाराजगी वाला था।
इस घटना के तुरंत बाद पत्रकार मुंतधर अल-जैदी को सुरक्षाकर्मियों ने पकड़ लिया। उन्हें हमले के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया, उन्होंने अमेरिका की पिट्ठू इराक़ी सरकार की यातनाएं झेलीं इन यातनाओं से उनकी नाक-दांत टूटे। बाद में उन्हें बुश पर जूता फेंकने के अपराध में 1साल/9 महीने जेल हुई, (अमेरिकी राष्ट्रपति को कुत्ता कहने और गाली देने पर जैदी को सज़ा हुई या नहीं यह मुझे पता नहीं चला उस वक्त मैंने इसकी बहुत खोजबीन की थी लेकिन इस बारे में कुछ भी सार्वजनिक नहीं हुआ था।)

जूता फेंकू पत्रकार की रिहाई पर उनका हीरो की तरह ख़ैर मख़्दम हुआ। वो अरब विरोध के प्रतीक बने। पूरी दुनिया सहित अरब जगत में उनके जूतों की नकलें खूब बिकीं। यह वारदात इराकी प्रतिरोध का चिह्न बनी अमेरिकी लूट, हिंसा के खिलाफ प्रतीक की तरह इसका इस्तेमाल हुआ। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुए। अल-जैदी ने बाद में कहा कि उनका एकमात्र पछतावा यह था कि उनके पास सिर्फ दो जूते थे।
मुंतधर अल-जैदी की जूता फेंकने की घटना ने पत्रकारों के अधिकारों पर सीधा कानूनी प्रभाव नहीं डाला, लेकिन यह प्रेस स्वतंत्रता का प्रतीक बन गई। इसने वैश्विक स्तर पर पत्रकारों को सत्ता के खिलाफ बोलने की हिम्मत दिलाई।
उस दौर में इस घटना का प्रतीकात्मक यह प्रभाव भी पड़ा कि विश्व के बड़े-बड़े लीडर प्रेस कॉन्फ्रेंस में एहतियात बरतने लगे। तीसरी दुनिया के देशों में सरकार प्रमुख और मंत्री अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जूते उतरवाकर या उसे मशीन से बंधवाकर पत्रकारों से बात करने लगे (इन पंक्तियों के लेखक ने भी तब वो स्थिति झेली थी) नेताओं मंत्रियों संत्रियों को पत्रकारों की क़लम के अलावा ऐसी वैसी ख़तरनाक हरकतों से सम्भावित ख़ौफ लगने लगा था और यह ख़ौफ आज तक जारी है।
(लेखक, पत्रकार, शायर और गांधीवादी कार्यकर्ता इस्लाम हुसैन का जन्म 1954 में रानीखेत में हुआ था, वो 1975 से लेखन के क्षेत्र में हैं। हिन्दी, उर्दू अंग्रेजी के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दैनिक साप्ताहिक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में उनकी अनेक लेख, फीचर रिपोर्ट्स, कहानियां शायरी प्रकाशित हुई हैं, उनकी अनेक रिपोर्ट्स शोधकर्ताओं द्वारा अपने शोध में सम्मिलित की गई हैं, उनके सामाजिक कार्यों पर भी शोधकार्य हुए हैं और कुमाऊं विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता को पीएचडी मिल चुकी है। वो भारत सरकार की दो संस्थानों के मॉनीटर रह चुके हैं। वो उत्तराखंड में मुस्लिम समाज के जानकार हैं, इस्लाम हुसैन मान्यता प्राप्त पत्रकार रहे हैं, उनकी अब तक चार किताबें छप चुकी है। अनेक राष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े वो गांधी विचार की शीर्ष संस्था अखिल भारतीय सर्व सेवा संघ की राज्य इकाई उत्तराखंड सर्वोदय मण्डल के अध्यक्ष भी हैं।)