भारतीय चित्रकारों में पुरोधा माने जाने वाले नंदलाल बोस का परिवार पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा चलाये गये एसआईआर का शिकार हो गया है। उनके पोते सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी दीपा सेन के नाम मतदाता सूची से गायब मिले हैं। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद उन्हें आगामी विधान सभा में वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायधीशों ने उन्हें अपीलीय ट्रिब्यूनल जाने के लिए कहा है।
पश्चिम बंगाल में चुनाव करीब आ रहा है। चुनाव की सरगर्मियां तेज हैं। वहां धार्मिक नफरतों की आंधी में कई झड़पों और हिंसा की खबरें आ चुकी हैं। ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ की कहानी भाजपा के नेताओं की जुबानी सुनी जा सकती है, जिसके भीतर राष्ट्रवाद के नाम पर धार्मिंक घृणा की लहर को देखा जा सकता है। आदिवासी, बिहारी को लेकर पहले से ही माहौल बनाये जाने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इस चुनाव में मारवाड़ी बनाम प्लासी युद्ध और बंगाली राष्ट्रवाद को भी उठाया गया।
हैरानी की बात यह भी रही है कि इस चुनावी सरगर्मी में राष्ट्रपति द्रुपदी मुर्मू का नाम भी घसीट लिया गया।
चुनाव आयोग का एसआईआर मतदाताओं के गहन परीक्षण के नाम पर चलाया जा रहा है और यह कोर्ट में जाकर नागरिक पहचान जैसे विवादों से जा मिला है। ‘कागज’ दिखाने के नाम पर लाखों मतदाताओं के नाम गायब हो जा रहे हैं। अब तक के आंकड़े यह दिखा रहे हैं कि यह पूरी प्रक्रिया पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है और इसके पीछे मूल कारण इसकी वह पद्धति है जिससे समस्या पैदा हो रही है। इस पद्धति का चुनाव किसने किया, से लेकर चुनाव आयोग की स्वायत्तता भी सवालों के घेरे में है।
चुनाव आयोग पर बेहद गंभीर सवाल उठ चुके हैं, लेकिन स्वायत्तता के नाम पर आयोग लगभग बेलगाम तरीके से काम कर रहा है। एक ओर ऐसे मतदाताओं के नाम दिख रहे हैं जिनकी पहचान संदिग्ध दिखती है और दूसरी ओर प्रख्यात अर्थशास्त्री आमृत्य सेन को नोटिस भेज दिया जाता है। अब यही हाल महान चित्रकार नंदलाल बोस के परिवार के साथ हुआ है।
नंदलाल बोस भारत की आधुनिक चित्रकला की अवनिंद्रनाथ टैगोर के सानिध्य में बनी दूसरी पीढ़ी के चित्रकार थे। उनके गुरूओं में स्टेला क्रेमरिश जैसी कला मर्मज्ञ थीं। नंदलाल बोस, असित हलदार जैसे युवा कलाकारों ने बाघ गुफाओं के चित्रों की कैनवास पर उसकी प्रतिलिपि बनाई और उसे संरक्षित करने में महान योगदान दिया।
इन्हीं चित्रों को उतारते हुए उन्होंने भारत की कला के उस मर्म को पकड़ा जिसे उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को सिखाया, प्रशिक्षित किया और इस रास्ते ही उन्होंने अपने साथी कलाकारों के साथ कला के बंगाल स्कूल को स्थापित किया और आगे बढ़ाया। बाघ गुफा चित्रों का उन पर काफी गहरा असर था। उनके अनन्य मित्र असित हालदार बंगाल से उत्तर प्रदेश, राजस्थान गये और यहां कला स्कूलों को स्थापित करने में योगदान दिया।
संगीत की तरलता को रंगों से कैनवास पर उतारने वाली बंगाल कला स्कूल की स्थापना आज भी पाठ्य पुस्तकों का हिस्सा है और इसमें योगदान देने वालों में नंदलाल बोस का नाम अमर है।
नंदलाल बोस ने ही संविधान का आवरण और इसके पन्नों पर चित्रों को रचा। शक्ति की अवधारणा पर रचा गया संविधान का आवरण इसे बनाने वालों के मानस के अनुकूल था। वह इसे ऐसे ही देख रहे थे। भारत के मिथक काव्यों और विरासत को संविधान के प्रत्येक अध्यायों पर उतारते समय उनके जेहन में निश्चित ही बाघ गुफा के वे चित्र थे जो सदियों बाद भी बचे रह गये थे। वे उस परम्परा का वहन कर रहे थे और आधुनिक दौर के शासन प्रावधानों पर उस पुरातन की छाप को रख देना चाहते थे।
उन्होंने एक कलाकार के दायित्व का वहन किया। उस समय शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि इन प्रावधानों पर बनी संस्था ही उनकी भावी पीढ़ी के नागरिक अधिकारों के लिए चुनौती बन जाएगी। सिर्फ उनकी ही भावी पीढ़ी नहीं, देश के लाखों, करोड़ों लोग वोट जैसे मौलिक अधिकारों को हासिल करने के लिए जूझने लगेंगे। यह सिर्फ शर्मनाक नहीं है, यह भयावह है।
जिस देश में राजनीतिक पार्टी, संवैधानिक संस्था अपने ही नागरिकों पर शक की निगाह रखने लगे, उसे अपनी पहचान बताने के लिए ऐसे कागजों की मांग करने लगे जिसे हासिल करना मुश्किल हो, तब इससे सिर्फ नागरिकता को ही चुनौती नहीं मिलती है, इससे किसी भी देश की जमीन भी दरकने लगती है।
चुनाव किसी भी लोकतंत्र का सबसे मौलिक पक्ष है। इसके बिना यह लोकतंत्र हो ही नहीं सकता। चुनाव का मौलिक पक्ष मतदाता होता है। आज चुनाव कराने वाली संस्था के चुनाव कराने और मतदाता की सूची बनाने, दोनों पर ही गंभीर सवाल उठ खड़ा हुआ है। ऐसे में, नंदलाल बोस की भावी पीढ़ी को अपने नागरिक अधिकारों के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़े, तब अधिक चौंकना चाहिए। यह एक बड़े संकट की दस्तक है।
फिलहाल न्यायालय ने इस मसले को हल करने के लिए नंदलाल बोस के परिवार को अपीलीय ट्रिब्यूनल में जाने के लिए कह दिया है। डर है कि यह उम्मीद भी न टूट जाए। हमने लाखों मतदाताओं की उम्मीद को टूटते हुए देख रहे हैं। मतदाता सूची में काट दिये गये लोग सड़कों पर उतरकर घेराबंदी कर रहे हैं, चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं। कौन है जो इन आवाजों को सुन रहा है? आजकल सभी चुनाव जीत जाने की होड़ में हैं। लोकतंत्र का बस यही रह गया है। ऐसा लगता है कि नंदलाल बोस होने का भी अब कोई अर्थ नहीं बचा है।
(अंजनी कुमार लेखक, राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)