पिछले लगभग चालीस वर्षों तक दुनिया की अर्थव्यवस्था एक बहुत स्पष्ट ढांचे पर चल रही थी। पश्चिमी देश तकनीक, वित्त, ब्रांड और उपभोग का केंद्र बने रहे, जबकि एशिया विशेषकर चीन दुनिया की फैक्ट्री बन गया। अमेरिका और यूरोप ने सोचा था कि चीन सस्ते मजदूरों वाला एक विशाल उत्पादन केंद्र रहेगा, जो पश्चिमी पूंजी के लिए कम लागत पर सामान बनाएगा। बदले में चीन को रोजगार मिलेगा, विकास मिलेगा, और पश्चिम को सस्ते उत्पाद तथा ऊंचे मुनाफे मिलते रहेंगे।
लेकिन धीरे-धीरे चीन ने इस व्यवस्था को केवल स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसी व्यवस्था का उपयोग करके स्वयं को बदलना शुरू कर दिया। उसने केवल फैक्ट्रियां नहीं बनाईं, बल्कि पूरे औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किए। उसने बंदरगाह बनाए, रेल नेटवर्क बनाए, बिजली उत्पादन बढ़ाया, विशाल औद्योगिक शहर खड़े किए, तकनीकी शिक्षा पर निवेश किया, सप्लाई चेन पर नियंत्रण बनाया और धीरे-धीरे ऐसी स्थिति में पहुंच गया जहां दुनिया के अधिकांश उद्योग किसी न किसी रूप में चीन पर निर्भर हो गए।
पश्चिमी पूंजीवाद का मूल आधार था निवेश पर ऊंचा रिटर्न। किसी कंपनी का उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना था। यदि किसी सेक्टर में लाभ कम होने लगे तो पूंजी दूसरे सेक्टर में चली जाती थी। यही कारण था कि अमेरिका और यूरोप में धीरे-धीरे मैन्युफैक्चरिंग कम होती गई और वित्तीय सेवाएं, टेक्नोलॉजी, स्टॉक मार्केट और डिजिटल अर्थव्यवस्था का महत्व बढ़ता गया। वॉल स्ट्रीट और सिलिकॉन वैली ने डेट्रॉइट और पुराने औद्योगिक शहरों की जगह ले ली।
चीन ने बिल्कुल अलग रास्ता अपनाया। वहां राज्य ने उद्योगों को केवल लाभ कमाने वाली इकाई के रूप में नहीं देखा। उद्योग राष्ट्रीय शक्ति का माध्यम बन गए। यदि किसी फैक्ट्री का लाभ बहुत कम भी हो, तब भी वह चल सकती है क्योंकि उसका उद्देश्य केवल शेयरधारकों को रिटर्न देना नहीं बल्कि रोजगार बनाए रखना, उत्पादन क्षमता बढ़ाना, निर्यात बढ़ाना और वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी हासिल करना भी है।
यही वह बिंदु है जहां पश्चिमी मॉडल को सबसे बड़ी चुनौती मिली। क्योंकि यदि एक चीनी कंपनी दो प्रतिशत मार्जिन पर काम कर सकती है, जबकि एक अमेरिकी कंपनी को पंद्रह प्रतिशत रिटर्न चाहिए, तो लंबे समय में प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाती है। चीन ने कई क्षेत्रों में यही किया। स्टील, सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, ईवी, केमिकल्स और मशीनरी जैसे उद्योगों में चीन ने इतनी बड़ी उत्पादन क्षमता खड़ी कर दी कि वैश्विक कीमतें दबने लगीं।
दुनिया की पारंपरिक पूंजीवादी व्यवस्था इस तरह के मॉडल के लिए तैयार नहीं थी। पूंजीवाद का सिद्धांत कहता है कि यदि किसी उद्योग में मुनाफा कम हो जाए तो उत्पादन घटेगा, कंपनियां बंद होंगी और बाजार फिर संतुलन में आ जाएगा। लेकिन चीन में कई बार ठीक उल्टा हुआ। मुनाफा घटने के बावजूद उत्पादन बढ़ता गया। क्योंकि चीन के लिए सवाल केवल लाभ का नहीं बल्कि रणनीतिक नियंत्रण का था।
इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ा। पश्चिमी देशों में मैन्युफैक्चरिंग रोजगार घटने लगे। कई औद्योगिक शहर कमजोर हुए। मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा असुरक्षित महसूस करने लगा। अमेरिका में ट्रंप का उदय केवल राजनीति नहीं था, बल्कि उस आर्थिक असंतुलन का परिणाम भी था जो दशकों से बन रहा था। “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” जैसे नारे वास्तव में उस औद्योगिक गिरावट के खिलाफ प्रतिक्रिया थे जिसे लाखों लोगों ने महसूस किया।
इसी समय चीन केवल सस्ती फैक्ट्री नहीं रहा। उसने टेक्नोलॉजी में भी प्रवेश करना शुरू किया। पहले चीन पश्चिमी कंपनियों के लिए असेंबली करता था। फिर उसने अपने ब्रांड बनाए। उसके बाद उसने रिसर्च और डेवलपमेंट पर भारी निवेश किया। आज चीन केवल खिलौने या सस्ते कपड़े नहीं बनाता। वह इलेक्ट्रिक वाहन, एआई, रोबोटिक्स, ड्रोन, हाई स्पीड रेल, बैटरी और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग में दुनिया को चुनौती दे रहा है।
यहां पश्चिम के सामने असली संकट शुरू होता है। क्योंकि यदि चीन केवल कम लागत वाला श्रम बाजार होता तो अमेरिका और यूरोप ऊपर की वैल्यू चेन में रह सकते थे। लेकिन अब चीन उन्हीं क्षेत्रों में प्रवेश कर रहा है जिन्हें पश्चिम अपनी स्थायी ताकत मानता था।
अमेरिका ने इसका जवाब टैरिफ, प्रतिबंध और तकनीकी नियंत्रण के रूप में देना शुरू किया। लेकिन समस्या यह है कि वैश्विक सप्लाई चेन अब इतनी जटिल हो चुकी हैं कि केवल चीन पर टैरिफ लगाकर उसे रोका नहीं जा सकता। चीन ने अपनी उत्पादन क्षमता को वियतनाम, मेक्सिको, थाईलैंड, इंडोनेशिया और अन्य देशों में फैलाना शुरू कर दिया। अंतिम असेंबली कहीं और होती है, लेकिन मशीनें चीनी होती हैं, पुर्जे चीनी होते हैं, वित्त चीनी होता है और सप्लाई चेन प्रबंधन भी चीनी नेटवर्क के भीतर रहता है।
इसलिए अमेरिका यदि हर उस देश पर टैरिफ लगाए जो चीन से जुड़ा है, तो वह पूरी वैश्विक व्यापार व्यवस्था को ही तोड़ देगा। और यदि ऐसा होता है तो सबसे बड़ा असर स्वयं पश्चिमी उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। पिछले तीस वर्षों में पश्चिमी देशों की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था काफी हद तक सस्ते चीनी उत्पादों पर निर्भर हो चुकी है। यदि अचानक सब कुछ महंगा हो जाए तो महंगाई बढ़ेगी, जीवन स्तर पर असर पड़ेगा और राजनीतिक असंतोष बढ़ेगा।
यहीं पर दुनिया धीरे-धीरे एक नए आर्थिक युग में प्रवेश करती दिखाई देती है। पहले वैश्वीकरण का अर्थ था पूरी दुनिया का एक आर्थिक प्रणाली में जुड़ना। अब लगता है कि दुनिया अलग-अलग आर्थिक ब्लॉकों में बंट रही है। एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी देश हैं, दूसरी तरफ चीन केंद्रित औद्योगिक नेटवर्क है, और बीच में वे देश हैं जो दोनों के साथ संबंध बनाए रखना चाहते हैं।
भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और कई अन्य देश इसी नई व्यवस्था में अपनी जगह खोज रहे हैं। वे पूरी तरह किसी एक खेमे में नहीं जाना चाहते। वे चीन के साथ व्यापार भी करना चाहते हैं और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध भी रखना चाहते हैं।
लेकिन असली सवाल केवल भू राजनीति का नहीं है। असली सवाल पूंजीवाद की प्रकृति का है। यदि दुनिया में उत्पादन क्षमता इतनी अधिक हो जाए कि अधिकांश वस्तुएं बहुत कम लाभ पर बनने लगें, तो पारंपरिक निवेश मॉडल का क्या होगा। यदि उद्योगों में रिटर्न लगातार गिरते रहें, तो पूंजी कहां जाएगी।
इसीलिए पिछले दो दशकों में वित्तीय बाजार वास्तविक अर्थव्यवस्था से अलग होते दिखाई दिए। जब उद्योगों में उच्च लाभ नहीं मिला, तो पूंजी स्टॉक मार्केट, टेक्नोलॉजी शेयर, रियल एस्टेट और वित्तीय संपत्तियों में चली गई। इससे एसेट प्राइस बढ़ते गए जबकि वास्तविक वेतन वृद्धि उतनी तेज नहीं हुई। दुनिया के कई हिस्सों में यही असमानता राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन रही है।
चीन का मॉडल इस संदर्भ में और भी दिलचस्प है। वहां सरकार ने पूंजी को पूरी तरह स्वतंत्र नहीं छोड़ा। यदि राज्य को लगता है कि कोई सेक्टर राष्ट्रीय हित के खिलाफ जा रहा है तो वह हस्तक्षेप कर सकता है। बड़ी टेक कंपनियों पर कार्रवाई इसका उदाहरण थी। पश्चिमी दुनिया के लिए यह असामान्य था क्योंकि वहां बड़ी कंपनियां अक्सर सरकारों पर प्रभाव डालती हैं। चीन में पार्टी अभी भी पूंजी के ऊपर खड़ी दिखाई देती है।
यही कारण है कि चीन के भीतर एक अलग प्रकार की वैधता विकसित हुई है। पश्चिम में लोकतंत्र राजनीतिक स्वतंत्रता से वैधता प्राप्त करता है। चीन में वैधता आर्थिक प्रदर्शन, स्थिरता और राष्ट्रीय गौरव से आती है। यदि सामान्य नागरिक महसूस करते हैं कि उनका जीवन स्तर सुधर रहा है, रोजगार मिल रहा है और देश मजबूत हो रहा है, तो व्यवस्था को समर्थन मिलता रहता है।
चीन ने करोड़ों लोगों को गरीबी से निकाला। यह केवल एक आर्थिक उपलब्धि नहीं बल्कि राजनीतिक स्थिरता का आधार भी बना। बहुत से चीनी नागरिकों के लिए पार्टी वही शक्ति है जिसने उनके जीवन को बदला। इसलिए बाहरी दुनिया अक्सर यह समझने में गलती करती है कि चीन के भीतर समर्थन केवल डर पर आधारित है। वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चीन के सामने समस्याएं नहीं हैं। चीन का मॉडल भारी निवेश और निर्यात पर आधारित रहा है। इससे विशाल उत्पादन क्षमता तो बनी, लेकिन घरेलू उपभोग उतना मजबूत नहीं बन पाया जितना अमेरिका में है। यदि पूरी दुनिया धीमी हो जाए और निर्यात कम हो जाएं, तो चीन को अपने भीतर मांग पैदा करनी होगी। यह आसान नहीं है।
साथ ही चीन में जनसंख्या वृद्ध हो रही है। रियल एस्टेट संकट सामने आया है। स्थानीय सरकारों पर भारी कर्ज है। युवाओं में बेरोजगारी बढ़ी है। यदि विकास की गति लंबे समय तक धीमी रहती है, तो वही सामाजिक अनुबंध दबाव में आ सकता है जिसने अब तक स्थिरता बनाए रखी।
फिर भी दुनिया के गरीब और विकासशील देशों के लिए चीन आकर्षक बना हुआ है। क्योंकि पश्चिमी संस्थाएं अक्सर सुधार, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक शर्तों की बात करती हैं, जबकि चीन सीधे सड़क, बंदरगाह, बिजली संयंत्र और फैक्ट्री बनाता है। कई देशों के लिए यह अधिक व्यावहारिक दिखता है।
चीन स्वयं को धीरे-धीरे “ग्लोबल साउथ” के साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। वह यह संदेश देता है कि पश्चिमी मॉडल ही विकास का एकमात्र रास्ता नहीं है। यह बात अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों में प्रभाव डाल रही है।
इससे पश्चिमी पूंजीवाद के सामने केवल आर्थिक नहीं बल्कि वैचारिक चुनौती भी खड़ी हो गई है। क्योंकि शीत युद्ध के बाद यह माना गया था कि उदार लोकतंत्र और मुक्त बाजार अंततः पूरी दुनिया का अंतिम मॉडल बनेंगे। चीन का उदय इस धारणा को चुनौती देता है।
अब पश्चिम स्वयं औद्योगिक नीति, सब्सिडी, टैरिफ और राज्य हस्तक्षेप की ओर लौट रहा है। अमेरिका का चिप्स एक्ट और औद्योगिक सब्सिडी कार्यक्रम इसी बदलाव का हिस्सा हैं। विडंबना यह है कि चीन ने पश्चिम को उस दिशा में धकेला है जिसे कभी पश्चिम स्वयं गलत मानता था।
लेकिन सबसे गहरी समस्या शायद कहीं और है। आधुनिक पूंजीवाद केवल उत्पादन पर नहीं बल्कि लगातार बढ़ते मुनाफे पर आधारित है। स्टॉक मार्केट की पूरी संरचना इसी उम्मीद पर खड़ी है कि कंपनियां लगातार अधिक लाभ कमाएंगी। यदि चीन जैसी शक्ति वैश्विक स्तर पर लाभ मार्जिन दबाती रहती है, तो यह पूरी वित्तीय व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती है।
क्या भविष्य में दुनिया ऐसे मॉडल की ओर जाएगी जहां उत्पादन तो भरपूर होगा लेकिन लाभ सीमित होंगे। क्या इससे पूंजीवाद का स्वरूप बदल जाएगा। क्या पश्चिमी समाज अपने जीवन स्तर को बनाए रखते हुए चीन जैसी औद्योगिक प्रतिस्पर्धा का सामना कर पाएंगे। क्या अमेरिका वित्तीय और तकनीकी प्रभुत्व के बल पर अपनी स्थिति बनाए रखेगा या औद्योगिक शक्ति फिर से निर्णायक बनेगी। क्या भारत जैसे देश इस संघर्ष में नया संतुलन बना पाएंगे या वे भी दो महाशक्तियों के बीच फंस जाएंगे।
और सबसे बड़ा सवाल शायद यही है कि क्या ऐसा पूंजीवादी ढांचा, जो मुख्य रूप से निवेश पर उच्च रिटर्न की मानसिकता पर बना हो, उस व्यवस्था के सामने टिक पाएगा जहां एक सभ्यता स्तर का राज्य कम मुनाफे के बावजूद दशकों तक औद्योगिक विस्तार जारी रखने को तैयार है।
(रंजन श्रीवास्तव का लेख)