अमरीका के संघीय अभियोजक ने गौतम अडानी के खिलाफ भारत में सौर परियोजना को पाने के लिए अधिकारियों को घूस देने सेे सम्बंधित एक आपराधिक मुकदमा यह कह कर वापस ले लिया कि उनके पास पर्याप्त सबूत नहीं हैं। गौतम और उसके भतीजे सागर अडानी ने करीब रु. 1.8 अरब जुर्माना देकर प्रतिभति एवं विनिमयन आयोग में एक दीवानी धोखाधड़ी के मुकदमे को बिना जुर्म कबूल किए निपटाया।
अडानी इंटरप्राइजे़ज़ ने अमरीका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लंघन कर ईरान से द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस या एलपीजी खरीदने के आरोप से मुक्त होने के लिए करीब रु. 27.5 अरब अमरीकी सरकारी खजाने में जमा कराए। साफ है कि अमरीका में दोषमुक्त होने के लिए अडानी को एक भारी कीमत चुकानी पड़ी। उनके अभिन्न मित्र नरेन्द्र मोदी, जो एक समय ‘अबकी बार, ट्रम्प सरकार’ का नारा देकर डोनाल्ड ट्रम्प को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे, उनको बचाने के लिए कुछ भी नहीं कर पाए।
उल्टे अमरीका भारत से अपनी सभी शर्तें, भारत को बेइज्जत करते हुए भी, मनवा रहा है।
अडानी ने सिर्फ जुर्माना ही नहीं दिया बल्कि यह भी घोषणा की है कि वे अमरीकी अर्थव्यवस्था में 15,000 लोगों को रोजगार देने के लिए करीब रु. 10 खरब का पूंजीनिवेश करने जा रहे हैं। बल्कि उनको न्यायालय से मुक्त कराने में उनके वकील, जो डोनाल्ड ट्रम्प का भी व्यक्गित वकील है, ने दलील दी कि यदि अडानी के खिलाफ मुकदमा चलेगा तो वे अमरीका में पूंजीनिवेश कैसे कर पाएंगे? वकील ने ही न्यायालय को बताया कि अडानी अमरीका में आधारभूत संरचना की परियोजनाओं में करीब रु. 10 खरब लगाने को तैयार हैं।
एक तरह से अडानी ने पैसे से अपने लिए न्याय खरीद लिया। सवाल यह है कि यदि अडानी ने कोई जुर्म किया नहीं था तो इतना बड़ा जुर्माना क्यों दिया? शायद उनके मित्र नरेन्द्र मोदी ने ही सलाह दी होगी कि पैसा देकर मामला निपटा दो। मोदी कह चुके हैं कि वे एक गुजराती होने के नाते व्यापार कि दांव-पेंच बहुत अच्छी तरह समझते हैं।
मोदी ने अपने मित्र को तो बचा लिया किंतु देश का बहुत बड़ा नुकसान किया है। 2019 में उन्होंने अमरीका के कहने पर ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। इस वर्ष अमरीका के दबाव में भारत ने रूस से भी तेल खरीदने की मात्रा घटा दी है। हालांकि अब पता लग रहा है कि रूस से सस्ते तेल खरीदने का फायदा भारत की आम जनता के ज्यादा अम्बानी की रिलायंस कम्पनी को हो रहा था जो उसे जामनगर परिशोधन संयंत्र में प्रसंस्करित कर यूरोपीय देशों को निर्यात कर रही थी।
अमरीका चाहता है कि भारत उसी से तेल खरीदे। ईरान पर युद्ध के समय जब होर्मूज़ संकरे मार्ग से तेल की आपूर्ति बाधित हुई तब अमरीका ने पहले भारत को रूस से एक माह के लिए तेल खरीदने की छूट दी और फिर वह अवधि बढ़ाई। अमरीका भारतीय उत्पादों पर दुनिया में किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे अधिक शुल्क लगा रहा है। उसने बंग्लादेश से कह दिया है कि यदि वह चाहता है कि उसके यहां बने कपड़े अमरीका में बिकें तो वह भारत के बजाए अमरीका से ही कपास खरीदे।
यानी अमरीका हर तरीके से भारत को नुकसान पहुंचा रहा है।
अमरीका जब ईरान से साथ युद्धरत था तो उस दौरान ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की कि मुकेश अंबानी की रिलायंस इण्डस्ट्रीज़ अमरीका के टेक्सस राज्य में एक तेल परिशोधन संयंत्र स्थापित करने जा रहा है, जिसकी क्षमता 1,68,000 कच्चे तेल के पीपे रोजाना प्रसंस्करण की होगी। 20 वर्ष के करार में वे प्राथमिकता के आधार पर अमरीका से तेल खरीदेंगे और उसका प्रसंस्करण कर बेचेंगे। ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस संयंत्र में मुकेश अंबानी रु. 300 खरब का पूंजीनिवेश करेंगे। इसके निर्माण में 2,000 लोगों को व स्थाई रूप से 300 पेशेवर लोगों को रोजगार मिलेगा।
नरेन्द्र मोदी ने जब भारतीय अर्थव्यवस्था की बागडोर सम्भाली थी तो बड़े जोर-शोर से ‘मेक इन इंडिया’ यानी ‘भारत में निर्मित करो’ का नारा दिया और दुनिया भर से कम्पनियों को भारत में पूंजी निवेश करने के लिए आकर्षित कर रहे थे। पूरा देश यही जान रहा था कि उनकी विदेश यात्राएं विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए आयोजित हो रही हैं। अब वे अपने दो सबसे चहेते पूंजीपति मित्रों से अमरीकी अर्थव्यवस्था में पूंजीनिवेश करवा रहे हैं या कहा जाए तो अमरीका ने उन्हें पूंजीनिवेश करवाने के लिए मजबूर किया है।
क्या भारत में बेरोजगारी की समस्या खत्म हो गई है जो अब अमरीका के लोगों को रोजगार देने के लिए भारतीय पूंजीपति वहां की अर्थव्यवस्था में पूंजीनिवेश करेंगे? सबको याद है किस तरह भारतीय लोग जो अवैध तरीके से अमरीका में रोजगार की तलाश में गए थे, को अमरीका ने मालवाहक जहाज में हथकड़ियां पहना कर भारत वापस भेजा था। भारत ने इसके जवाब में क्या किया? कुछ तथाकथित बंग्लादेशियों को जो रोजगार की तलाश में दिल्ली आए थे पकड़ कर बंग्लादेश भेज दिया।
बाद में पता चला के उसमें एक गर्भवती भारतीय महिला भी थी जिसे न्यायालय के आदेश से वापस लाया गया। लेकिन भारत ने अमरीका को कुछ नहीं कहा। पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद बड़े जोर-शोर से सात प्रतिनिधिमण्डल विदेश भेजे गए दुनिया को यह समझाने के लिए कि पाकिस्तान आतंकवाद का संरक्षक है। किंतु संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में आतंकवाद-विरोधी समिति का पाकिस्तान को उपाध्यक्ष बना दिया गया और तालिबान पर प्रतिबंध लगाने वाली समिति का अध्यक्ष।
अमरीका के राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असिम मुनीर को वाइट हाउस आमंत्रित किया। अब ईरान के साथ युद्ध विराम हेतु वार्ता के लिए भी अमरीका पाकिस्तान की ही मदद ले रहा है। इस तरह पाकिस्तान के खिलाफ भारत की पूरी मुहिम की अमरीका ने हवा ही निकाल दी। किंतु भारत की तरफ से चुप्पी ही जवाब है। आखिर अमरीका के सामने हमारे प्रधान मंत्री इतने असहाय क्यों हो जाते हैं?
अब नरेन्द्र मोदी की असलियत खुलकर सामने आ गई है। पाकिस्तान के सामने छद्म बहादुरी दिखाते हैं और दुनिया की महाशक्तियों अमरीका व चीन के सामने उनकी बोलती बंद हो जाती है। अमरीका का तो उन्होंने भारत को लगभग गुलाम या उपनिवेश ही बना दिया है। हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद के साथ यही सबसे बड़ा खतरा है। वह तभी तक नजर आता है जब सारे समीकरण उसके पक्ष में हों, जैसे ही विपरीत परिस्थिति आती है वह दुम दबा कर गाायब हो जाता है। खतरे का सामना तो वह बिल्कुल नहीं करता।
(संदीप पांडेय सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के प्रधान महासचिव हैं।)