कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर इंटरनेट पर बहस गरम है। कोई इसे युवाओं के आक्रोश का प्रतीक बता रहा है, कोई संपूर्ण क्रांति की याद दिला रहा है, कोई अन्ना आंदोलन की ठगी का हवाला दे रहा है।
लेकिन एक बात सबमें कॉमन है- सब यही बोल रहे हैं, यह सब इंटरनेट पर है, कुछ ज़मीन पर हो तो बात बने और साथ में एक अजीब धारणा भी — जैसे ज़मीन पर कुछ हो ही नहीं रहा, जैसे असली संघर्ष का इंतज़ार है किसी वायरल पोस्ट के लिए।
लेकिन ज़मीन पर बहुत कुछ हो रहा है। बस देखने वाली नज़र चाहिए।
इस साल की शुरुआत से ही बरौनी (बिहार), पानीपत (हरियाणा), सिंगरौली (मध्यप्रदेश) से होते हुए अप्रैल-मई तक।
हड़तालों की एक ज़बरदस्त लहर मानेसर, नोएडा, भिवाड़ी, बाड़मेर, हरिद्वार और रुद्रपुर तक फैल चुकी है।
हाल के दशकों में मज़दूरों का यह सबसे व्यापक और तीव्र आंदोलनों में से एक है। हर दिन किसी न किसी फैक्ट्री में स्ट्राइक हो रही है। मेनस्ट्रीम मीडिया — चाहे गोदी हो या तथाकथित “प्रगतिशील” — दोनों ने इन संघर्षों को या तो पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया है, या फिर “हिंसा” और “बवाल” की शब्दावली में निपटा दिया है।
और दमन भी उतनी ही रफ्तार से हुआ है। मानेसर में 60 और नोएडा में 1100 से ज़्यादा देहरादून मे 13 मजदूरों की गिरफ्तारियाँ , यूनियन सदस्यों पर गुंडा ऐक्ट, जिलाबदर और “साजिश” के मुकदमे, एक पत्रकार और एक कलाकार पर एनएसए।
अब ज़रा रुककर सोचिए। और यह बात मैं खासतौर पर उस तबके से कह रहा हूँ जो खुद को प्रगतिशील और जागरूक कहता है जो मार्क्स और ग्राम्सी पढ़ता है, अम्बेडकर के कोट्स शेयर करता है, और हर चुनाव के बाद “फासीवाद के उभार” पर लंबे-लंबे थ्रेड लिखता है।
उन्हीं से पूछना है — अभी इस वक्त नोएडा और मानेसर की जेलों में कितने मज़दूर और एक्टिविस्ट बंद हैं? शायद नहीं पता। क्योंकि वह खबर किसी वेरिफाइड हैंडल ने रिट्वीट नहीं किया — तो वह मुद्दा “एक्ज़िस्ट” ही नहीं करता, है ना?
यह भी पूछना है — आज कितनी फैक्टरियों में स्ट्राइक चल रही है? जब कथित रूप से वेतन बढ़ भी गया है, तो फिर फरीदाबाद से लेकर हरिद्वार-देहरादून तक मज़दूर लगातार सड़क पर क्यों हैं?
पिछले एक महीने से हरियाणा में दमकल और सफाई कर्मचारी धरने पर क्यों बैठे हैं? निर्माण मज़दूर और मनरेगा मज़दूर क्यों संघर्ष कर रहे हैं?
दिल्ली-एनसीआर में ट्रांसपोर्टरों की तीन दिवसीय हड़ताल, यह सब आज हो रहा है — अभी, इसी वक्त। गए किसी धरने पर? सुनी उनकी बात? गए किसी प्रदर्शन में, या प्रेस कान्फ्रेन्स में?
मज़दूरों या यूनियन कार्यकर्ताओं से जेल में मिलने कोई गया? उनके परिजनों से पूछा कि घर कैसे चल रहा है, बच्चों की फीस कहाँ से आएगी?
न किसी ने हाल-चाल लिया, न मज़दूर बस्तियों में जाकर मिनिमम लीगल एड देने की कोशिश हुई।
लेकिन कॉकरोच पार्टी “डिस्रप्टिव” है, “आउट ऑफ़ द बॉक्स” है, “सिस्टम को चैलेंज” कर रही है — यह विश्लेषण करने में हमारी प्रगतिशील बिरादरी ने रात के दो बजे तक कोई कसर नहीं छोड़ी।
और हाँ, बाद में इस मज़दूर आंदोलन पर अकादमिक पर्चे भी खूब लिखे जाएंगे — “नोट्स ऑन ए वर्कर्स मूवमेंट” याकि “कैन वर्कर्स स्पीक” — बस अभी, जब ज़रूरत है, तब फुर्सत नहीं।
जो लड़ाई जमीन पर चल रही है वह न ट्रेंडिंग है, न ग्लैमरस है, न उस पर कोई स्नैपी मीम बनता है। उसमें धूल है, थकान है, दमन है — और बेहद कम संसाधनों में लड़ते हुए लोग हैं, जिनके लिए “आंदोलन” कोई इंटेलेक्चुअल एक्सरसाइज नहीं, बल्कि रोज़ की रोटी और इज़्ज़त का सवाल है।
तो एक बार मानेसर और नोएडा की उस बस्ती में जाइए जहाँ किसी गिरफ्तार मज़दूर का परिवार नहीं जानता कि वकील कहाँ से लाएगा। एक बार उस यूनियन दफ्तर तक पहुँचिए जिस पर “साजिश” का मुकदमा लटका है। वह लड़ाई असली है, उसके लोग असली हैं, उनकी ज़रूरतें असली हैं — और वे आपका इंतज़ार कर रहे हैं।
बस आपका एल्गोरिदम और मजदूरों के रील्स उन तक नहीं पहुँचता।
(के संतोष का लेख ‘वर्कर्स यूनिटी’ से साभार। लेखक मज़दूर पत्रिका और मासा से जुड़े हैं।)