काकरोच जनता पार्टी वर्तमान व्यवस्था और सरकार से देश के युवाओं के मोहभंग और बेचैनी की सामूहिक अभिव्यक्ति है।दो करोड़ से ऊपर युवाओं का चंद दिनों में अभूतपूर्व समर्थन हासिल कर इसने एक नया इतिहास रच दिया है। बहरहाल इसकी असली परीक्षा यथार्थ की खुरदरी जमीन पर तब होगी जब यह आभासी दुनिया से निकलकर वास्तविक दुनिया में ठोस मूर्त रूप ग्रहण करेगी। अभी तो न इसकी विचारधारा ज्ञात है न राजनीतिक दिशा पूरी तरह स्पष्ट है।
बहरहाल जिस तरह के मुद्दे इसने उठाए हैं उससे यह साफ है कि इसका हाथ जनता विशेषकर युवाओं की नब्ज पर है।नीट की परीक्षा लीक होने पर इन्होंने शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा है जिसे लाखों युवाओं ने समर्थन दिया है। सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों को राज्यसभा भेजने पर रोक लगाने की मांग की है। महिला आरक्षण तिहाई की बजाय आधा करने की और परिसीमन के आधार पर बढ़ी सीटों की बजाय अभी से उसको लागू करने की मांग की है।
इसी तरह चुनावों की शुचिता तथा मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की मांग की गई है। जाहिर है ये मांगें लोकतांत्रिक आंदोलन की मांगें हैं और आम लोगों विशेषकर युवाओं के दिल की आवाज हैं। यही इस अभियान की अकल्पनीय सफलता के पीछे का राज है
दरअसल इस पहल को लेकर लोगों के मन में जो संदेह है उसके पीछे ठोस कारण हैं। अतीत में इस तरह के आंदोलनों का अनुभव कड़वा है। सर्वोपरि उसने संघ भाजपा को अग्र गति दी। 74 का जेपी आंदोलन इंदिरा निरंकुशता के विरुद्ध निर्णायक पहल साबित हुआ। लेकिन इस तथ्य को नहीं भूला जा सकता कि इसी आंदोलन ने संघ को केंद्र में पहली बार सत्ता में पहुंचा दिया। आरएसएस को फासीवादी कहे जाने पर जेपी उसके बचाव में इस हद तक चले गए कि उन्होंने कहा था कि अगर आरएसएस फासीवादी है तो वे स्वयं भी फासीवादी हैं।
गांधी जी की हत्या के बाद हाशिए पर जा चुके आरएसएस को राजनीतिक स्वीकार्यता दिलाने में इस आंदोलन और जनता पार्टी ने अहम भूमिका निभाई। जनता पार्टी का वह पूरा प्रयोग ढाई साल में ही बिखर गया। जेपी का सम्पूर्ण क्रांति का नारा सम्पूर्ण भ्रांति में बदल गया।
इसी तरह राजीव गांधी के समय बोफोर्स तोप सौदे को लेकर वीपी सिंह ने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम छेड़ी, उस आंदोलन में शामिल होकर भाजपा संघ ने एक लंबी छलांग लगाई। सबसे ताजा मामला अन्ना आंदोलन का है जो मनमोहन सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के समूल उच्छेद के आकर्षक नारे के साथ खड़ा हुआ था। लेकिन उस आंदोलन के गर्भ से एक एनजीओ मार्का पार्टी निकली जो आम पार्टियों जैसी ही साबित हुई। सबसे ज्यादा नुकसानदेह परिणाम यह निकला कि इस आंदोलन ने भाजपा मोदी के केंद्र में राज्यारोहण का रास्ता साफ कर दिया।
काकरोच जनता पार्टी के प्रति इसी कारण तमाम लोग अविश्वास से भरे हुए हैं। पार्टी अपने को युवाओं की, युवाओं के लिए, युवाओं के द्वारा निर्माणाधीन घोषित कर रही है।
शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य के साथ इस अभियान का सर्वाधिक जोर भ्रष्टाचार उन्मूलन पर है। पार्टी के नेता वैसे तो व्यवस्था परिवर्तन की बात कर रहे हैं लेकिन जाहिर है फिलहाल उनके निशाने पर मौजूदा सरकार और उसके कारनामे हैं। शिक्षामंत्री का इस्तीफा उन्होंने मांगा है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग की है।
स्वाभाविक रूप से सरकार इस नए प्रयोग से डरी हुई और नाराज है, उसने उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर हमला बोल दिया है। दीपके को जान से मारने की कथित धमकियां दी जा रही हैं। आरोप है कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रह रहे उनके अभिभावकों को डराया धमकाया जा रहा है।
दरअसल नए दौर में युवा पीढ़ी का आक्रोश कब क्या रूप धारण कर लेगा इससे स्थापित पार्टियों और सत्तारूढ़ दलों का डरना स्वाभाविक है। पड़ोसी नेपाल, बांग्लादेश या फिर हमारे तमिलनाडु के चुनाव इसके गवाह हैं। इस अभियान का अंततः जो भी हश्र हो, इसने युवाओं के मन में सुलगते आक्रोश को सामने ला दिया है। बस एक चिंगारी पूरे जंगल में आग लगा सकती है। विपक्षी दलों को इसे सही दिशा में गोलबंद करना चाहिए।
(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)