प्रख्यात अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमणियन का कहना है कि देश के सामने आये हुए मौज़ूदा संकट के लिए जिम्मेदार लोगों को उनके पद से हटाया जाना चाहिए। श्री सुब्रमणियन 2014 से 1018 तक भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं और वे वर्तमान में वाशिंगटन डीसी पीटरसन इंस्टिट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में सीनियर फेलो हैं।
उनका कहना है कि सरकार को ऐसे प्रतिभाशाली लोगों की भर्ती करनी चाहिए जो अपनी गुणवत्ता, स्वतंत्रता और नए विचारों के लिए जाने जाते हों, न कि वफादारी और चापलूसी के लिए। अधिकारियों को साफ-साफ स्वीकार करना चाहिए मौजूदा दौर गंभीर आर्थिक चुनौतियों का है।
श्री अरविंद सुब्रमणियन ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में छपे अपने लेख में पूछा है कि देश के इतने गंभीर आर्थिक संकट में फंसने और रुपये के इस हद तक गिरने देने की जिम्मेदारी किसकी है? इस सवाल का जवाब अब देना ही होगा, और इसके जिम्मेदार लोगों को बदल दिया जाना चाहिए। यह संदेश दिया जाना जरूरी है कि नेतृत्व एक निर्णायक व्यक्ति के हाथों में है।
इस संकट के दौर में नेतृत्व की अजीबोग़रीब किंकर्तव्यविमूढ़ता की ओर इशारा करते हुए श्री सुब्रमणियन लिखते हैं कि आर्थिक निर्णय लेने के दो प्रमुख केंद्रों में से एक, नई दिल्ली में सन्नाटा पसरा हुआ है, और अनिश्चितता छाई हुई है, जबकि दूसरे केंद्र, मुंबई से ऐसा प्रतीत होता है कि इस हालत में सबको सांप सूंघ गया है।
वे प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए लिखते हैं कि, यहां तक कि प्रधानमंत्री द्वारा आम जनता से निजी त्याग करने के आह्वान का प्रभाव भी चिंताजनक ही रहा, लेकिन इसके बाद की उनकी लंबी विदेश यात्रा ने और भी गुड़ गोबर कर दिया। इसका स्पष्ट संदेश गया कि ऐसी हालत में देश में निर्णय लेने के मामले में असमर्थता है और आगे की कार्रवाई के लिए किसी स्पष्ट कार्ययोजना का अभाव है। इसने नीतिगत पंगुता की भावना को और भी मजबूत कर दिया।
उनका मानना है कि देश को वर्तमान कठिन दौर में पहुंचाने के जिम्मेदार लोगों को हटाया जाना इसलिए भी जरूरी है, कि अब यह सोचने, कि ‘क्या किया जाना चाहिए’ से ज्यादा जरूरी यह हो गया है कि ‘क्या किया जाना बंद कर देना चाहिए।’
श्री सुब्रमणियन लिखते हैं कि ईरान युद्ध और इससे भारत की ऊर्जा-निर्भरता के कारण लगे झटके पर रुपये के मूल्य में हो रही गिरावट का ठीकरा फोड़ना ग़लत बात है। यह महज आंशिक सत्य है। दरअसल भारत की मध्यम अवधि की विकास की संभावनाएं पहले से ही संदेह के दायरे में हैं। सच्चाई तो यह है कि युद्ध से पहले भी अन्य उभरते देशों की मुद्राओं की तुलना में रुपये का प्रदर्शन सबसे खराब था।
युद्ध से पहले के दो-तीन वर्षों में, तुर्की को छोड़कर किसी भी देश ने मुद्रा में इतनी गिरावट का सामना नहीं किया, जबकि केंद्रीय बैंक ने मुद्रा को बचाने के लिए काफी प्रयास किए थे। 2022 और फरवरी 2026 के बीच, आरबीआई के हाजिर और अग्रिम (स्पॉट और फॉरवर्ड) बाजारों में हस्तक्षेप के बावजूद, रुपये में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई, जो विदेशी परिसंपत्तियों के लगभग 50 प्रतिशत के बराबर थी।
रुपये की गिरावट ने उस बात को उजागर कर दिया है जिसे आधिकारिक आंकड़ों में काफी समय से छिपाया जा रहा था—कि निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था में अपना विश्वास खो रहे हैं। उन्होंने देर से ही सही, उस संकेत को पहचान लिया है जो काफी समय से खतरे की घंटी बजा रहा था: कि निजी कॉर्पोरेट पूंजी-निवेश नहीं हो रहा है।
निजी कॉर्पोरेट पूंजी-निवेश, जो 2000 के दशक की शुरुआत में जीडीपी के 17 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर था और आज यह उसके आधे के बराबर है। हालांकि कोविड के बाद इसमें थोड़ा सुधार हुआ था, लेकिन वह अब खत्म हो चुका है।
कमजोर निजी कॉरपोरेट पूंजी-निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्या है और इसे पुनर्जीवित करना ही सबसे बड़ी चुनौती है। यह मामला केवल नीतिगत “सुधार” से नहीं हल होने वाला है। बंटाधार करने वाले जिम्मेदार लोगों को हटाये बिना कोई भी नीतिगत बदलाव बेकार हो जाएगा।
सरकार ने हाल ही में व्यापार की लागत को कम करने के उद्देश्य से कई सुधार लागू किए हैं। सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में कटौती की और उसे सरल बनाया है, श्रम कानूनों को तर्कसंगत बनाया है और उसमें सुधार किया है, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) को अधिक क्षेत्रों में उदार बनाया है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने यूरोपीय संघ के साथ एक मुक्त व्यापार समझौता किया है और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक व्यापार समझौते पर अस्थायी रूप से सहमति व्यक्त की है।
इसके अलावा, सरकार के पास अर्थव्यवस्था को विनियमित करने के लिए दो समितियां भी हैं। वैसे तो सरकार हाथ खड़े कर सकती है और पूछ सकती है, कि आखिर “हम और क्या कर सकते हैं?”
हालांकि, इन सुधारों से भी निवेशकों को भरोसा नहीं मिला है। इस विरोधाभास का समाधान क्या है? इतना कुछ करने के बावजूद निजी निवेश बढ़ क्यों नहीं रहा है? इसका मुख्य कारण है कि व्यापार करने की लागत को कम करने वाले जो क़दम सरकार द्वारा कागज़ पर उठाए गए हैं, दरअसल, सरकारी तंत्र में गहराई तक बैठी हुई सोच ज़मीनी स्तर पर व्यापार करने के जोखिमों को कम नहीं होने देती है, और सुधार की काग़जी योजनाओं को बेकार कर देती है।
सारी कोशिशों को मटियामेट करने वाली मुख्य रूप से ये प्रवृत्तियां हैं:
- पूरी नियामक व्यवस्था को इस तरह से मोड़ा जा रहा है, जिससे कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंच रहा है और उसकी क़ीमत घरेलू और विदेशी निवेशकों को चुकानी पड़ रही है।
- विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों की तुलना में भाजपा शासित राज्यों को प्राथमिकता देते हुए संसाधनों का आवंटन किया जा रहा है और पूंजीनिवेश की दिशा मोड़ी जा रही है।
- राजनीतिक विरोधियों और व्यवसायों को निशाना बनाने के लिए राज्य के दमनकारी तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है।
- कर कानूनों को अत्यधिक उत्साहपूर्वक और मनमाने ढंग से लागू किया जा रहा है और भारत की संघीय निर्णय लेने की संरचनाओं को कमजोर किया जा रहा है। इसकी वजह से निवेशकों में न तो आत्मविश्वास पैदा हो रहा है, न ही सरकारी तंत्र पर उनको भरोसा हो रहा है।
‘क्या किया जाना चाहिए’ की सूची में नीतिगत सुधारों को शामिल किये जाने की जरूरत है। लेकिन ‘क्या किया जाना बंद कर देना चाहिए’ की सूची में इन बुरी प्रवृत्तियों को शामिल किये जाने की जरूरत है।
सरकार द्वारा इन प्रवृत्तियों और आदतों से अलग होने का संकेत केवल तभी मिलेगा जब मंत्रिस्तरीय, तकनीकी और नौकरशाही स्तरों पर इसके लिए जिम्मेदार लोगों को हटाया जाएगा। सरकार को ऐसी नई प्रतिभाओं की भर्ती करनी चाहिए, जिन्हें उनकी गुणवत्ता, स्वतंत्रता और नए विचारों के लिए सराहा जाए, न कि वफादारी और चापलूसी के लिए। नेतृत्व को मौजूदा चुनौतियों को स्वीकार करने में अधिक खुला और यथार्थवादी बनना होगा।
श्री सुब्रमणियन लिखते हैं कि उसी टीम को लगातार बनाये रखना और विचारों का बासीपन सभी राजनीतिक प्रणालियों के लिए घातक है। यहां तक कि राजनीतिक रूप से प्रभावशाली शासकों को भी केवल ऊपर से आने वाले संदेशों पर अमल करने वाली व्यवस्था को बंद करना होता है और निरंतर बदलाव को अपनाना होता है। सच्चाई यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अपना रंग-रूप और अपनी आदतें बदलनी होंगी, अन्यथा पूरे देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
(प्रस्तुति : शैलेश)